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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 225, कुल 530 में से

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पृष्ठ 225

प्रथमोऽंशः १२३
निष्कर्ष—
(१) ‘वाग्भवकूट’—‘क ए ई ल ह्रीं’—‘क’ (क् + अ), ‘ए’, ई, ल (ल

  • अ) = ६ वर्ण ।। ह्रीकार के वर्ण ह, र्, ई, बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद,
    नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना एवं उन्मनी = १२ वर्ण ६ + १२ = १८ वर्ण
    (२) ‘कामराजकूट’ = ‘ह स क ह ल ह्रीं’—ह् + अ, स् + अ, क् +
    अ, ह् + अ, ल् + अ = १० वर्ण ।
    ह्रीं के १२ वर्ण—ह, र्, ई, बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति,
    व्यापिका, समना, उन्मनी = १२ वर्ण । योग = १० + १२ = २२ वर्ण
    (३) ‘शक्तिकूट’ = ‘स क ल ह्रीं’
    स् + अ, क् + अ, ल् + अ, = ६ वर्ण, ‘ह्रीं’ के १२ वर्ण (ह + र् +
    ई + बिन्दु, अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नाद, शक्ति, व्यापिका, समना उन्मनी) =
    १२ वर्ण ।। योग = ६ + १२ = १८ वर्ण
    (६ + १० + ६) + १२ + १२ = (२२ + ३६) = ५८ वर्ण ।।
    भास्करराय इसी तथ्य को इस प्रकार पुष्ट करते हैं—
    ‘एवं च प्रथम तृतीय कूटे अष्टादश वर्णात्मके । मध्यकूटं तु चतुरधिकम्
    संहत्याष्ट पञ्चाशद्वर्णात्मिका विद्येति सिद्धम् ॥१’
    वर्णानां कालानाह—
    मात्राद्वितयोच्चार्या कामकला च त्रिकोणा च ।
    बिन्दुरहितहल्लेखा मात्राकालत्रयोच्चार्याः ॥ १५ ॥
    अन्येषां वर्णानां मात्राकालो ऽर्धमात्रया सहितः ।
    बिन्दोरर्ध मात्रा परे परे चापि पूर्वपूर्वार्धाः ॥ १६ ॥
    संहत्यैकलवोनो मात्राकालोऽस्य नादस्य ।
    (‘कामकला’, ‘त्रिकोण’ एवं ‘हल्लेखा’ का उच्चारणकाल)
    कामकला (ई) एवं त्रिकोण (ए) का उच्चारण दो मात्राओं द्वारा एवं
    बिन्दु-रहित हल्लेखा (ह्रीं) का उच्चारण तीन मात्राओं से (तीन मात्रा काल के
    बराबर) किया जाना चाहिए) ॥ १५ ॥
    अन्य वर्णों (के उच्चारण) का काल अर्धमात्रा सहित मात्रा-काल (अर्थात् डेढ़
    मात्राकाल) एवं बिन्दु का अर्धमात्राकाल है । उत्तर वर्ती का वर्णों का उच्चारण-काल
    अपने पूर्ववर्ती (वर्ण के उच्चारण-काल का) का आधा होना चाहिए ॥ १६ ॥

१. वरिवस्यारहस्यम्