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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 530 में से

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पृष्ठ 216

११४ वरिवस्यारहस्ये
ऊर्ध्वगा मध्यगा तासां पञ्चमी परमा कला । चन्द्र कोटिसम प्रख्यं तन्मध्येऽर्बुद-
योजनम् । पद्ममध्ये समासीनमीश्वरं चोर्ध्वगामिनम् । चन्द्रायुतप्रतीकाशं पञ्चवक्त्रं
त्रिलोचनम् । इन्धिका वृद्वैवृत्तं देवं शूलपाणिं जटाधरम् । तस्योत्सङ्गता मूर्ध्वगामिनी
परमां शिवाम् । ध्यायेत् ।।'१
अर्धचन्द्र एवं रोधिनी—'अर्धचन्द्रस्थिता ह्येताः कलाः पञ्च प्रकीर्तिताः ।
रून्धिनी रोधिनी रोद्धा ज्ञानरोधा तमोपहा । निरोधिका कलाः पञ्च कथितास्तव
सुन्दरि । ब्रह्मादिपरमेशानां परमाप्तिनिरोधनात् । निरोधिकेति सा प्रोक्ता तस्या भेदा
वरानने ।।'२
'योगिनीहृदय' में 'व्यापिका', 'समना', एवं 'उन्मनी' का स्वरूप इस प्रकार
व्यक्त किया गया है—
'व्यापिका बिन्दुविलसत्त्रिकोणाकारतां गता ।
बिन्दुद्वयान्तरालस्था ऋजुरेखामयी पुनः ।। ३२ ।।३
समना बिन्दु विलसद् ऋजुरेखा तथोन्मना ।
शक्त्यादीनां वपुः स्फूर्जद्द्वादशादित्यसन्निभम् ।। ३३ ।।४
चतुःषष्टितदूर्ध्वं तु द्विगुणं द्विगुणं ततः ।
शक्त्यादीनां तु मात्रांशो मनोन्मन्यास्तथोन्मनी ।। ३४ ।।५
अमृतानन्दनाथ 'दीपिका' में कहते हैं—'व्यापिका बिन्दुविलसद्वामा दित्रिशक्ति-
मयत्रिकोणरूपतां गता ।।' भास्कराचार्य 'सेतुबंध' में कहते हैं—'शक्तित्रिकोणस्य
स्वाभिमुखकोणे बिन्दु लेखनेन व्यापिकाया आकारो भवतीति सम्प्रदायः ।।' दुर्भेद्य
शक्तिकला का भेदन करके 'व्यापिनी' (महाशून्य) में आरूढ़ होना पड़ता है । यहाँ
प्राणों का सञ्चरण नहीं है, यहाँ क्रिया भी अस्तमित है । यहाँ नित्य सर्ग एवं
महादिन का भी अस्तित्व नहीं है । कलनात्मक काल यहाँ साम्यरूप में स्थित है ।
यह महाशून्य शक्तिपर्यन्त नीचे के समस्त विश्व में व्यापक है । ब्रह्मरंध्र के ऊपर
'शक्तिस्थान' है (यहीं ऊर्ध्व कुण्डलिनी प्रसुप्त है और भुजङ्गाकार रूप में स्थित है)
उसके ऊपर 'व्यापिनी' है केन्द्र में स्थित शक्ति की कला ही 'व्यापिनी' है । तथापि
यह 'शक्ति' से पृथक् है । वस्तुतः शक्तितत्त्व ही अनाश्रित भुवन हैं । इसमें
'व्यापिनी' 'व्योमात्मिका', 'अनन्ता', 'अनाथानामक शक्तियाँ हैं । मध्य में 'अनाश्रिता
शक्ति' स्थित है । 'व्यापिनी' भी शून्य है । किसी-किसी ने इसे 'महाशून्य' भी
कहा है । किन्तु वह महाशून्य नहीं है क्योंकि उसके बाद भी शून्य है । यहाँ पर
साकार-निराकार भाव तिरोहित है ।
परमात्मा सृष्टि-स्थिति-प्रलय-तिरोधान-अनुग्रह कृत्य 'समना' में निष्पादित करता
है । पूर्ण ब्रह्म की चिदात्मिका ईक्षरम शक्ति 'समना रूप' में अवतीर्ण होकर समष्टि
मन में सञ्चरित होती है 'समना' ब्रह्मविल के भीतर अतीत मन का स्थान है । यहाँ
मन नहीं है 'व्यापिनी' के परे ऊर्ध्व में—अनाश्रित भुवन के ऊपर 'समना' है ।
१-२. स्वच्छन्द संग्रह ३-५. योगिनी हृदय