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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 530 में से

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पृष्ठ 219

प्रथमोऽंशः ११७
(२) 'अर्धचन्द्र' १—बिन्दु के ऊपर अर्धचन्द्र स्थित है जो दीप्ति एवं आकृति
दोनों दृष्टियों से अर्ध चन्द्रमा के समान है—'तदुपरिगतो अर्धचन्द्रोऽन्वर्थः कान्त्या
तथा कृत्या ।।'
'अर्धमात्रा' एकाग्रता एवं निरोध के संधिस्थान में स्थित है । यह द्वितीय भूमि
है । प्रथम भूमि है—'बिन्दु' । 'अर्धमात्रा' की मात्रा है—१।४ बिन्दु को पूर्णचन्द्र
या चन्द्रबिन्दु कल्पना अर्धचन्द्र की उसी के अर्धांशरूप में कल्पना की गई है ।
यह बिन्दु के ऊपर स्थित है इसके चारों ओर चार एवं केन्द्र में एक—(५ कलाएँ)
कला हैं । यह शून्य नहीं है । 'बिन्दु' मात्रा से मात्राहीन में जाने का द्वार है—जहाँ
कि ज्ञाता-ज्ञेय-ज्ञान एकाकार हो जाते हैं । मात्रा-भङ्ग होते ही अधर्ममात्रा का उदय
होता है । इसी भूमि से ईश्वर का आभास मिलना प्रारंभ होता है । बिन्दु से ऊपर
जाने में कपाल में जो 'सोमरस' दिखाई पड़ता है वही 'अर्द्धचन्द्र' है ।
(३) 'रोधिनी'—ब्रह्मरंध के नीचे त्रिकोण में 'रोधिनी' स्थित है जो कि
अर्धचन्द्र के ऊपर अवस्थित है । चूँकि यह पाँच विश्वस्वामियों को ऊर्ध्वगति से
निवृत्त करती है इसीलिए इसका नाम है 'रोधिनी' ।
“निरोधयति या देवान्ब्रह्मादींश्च सुराधिपे ।।
निरोधिकेति साख्याता.................... ।। (१०।१२२३)
परमशिवाभेदाख्यातिरे व ब्रह्मादेर्निरोधः ।।
ध्वनिरध्वगतो यत्र विश्राम्यंत्यतिनिरोधितः ।।
निरोधिनीति विख्याता सर्वदेव निरोधिका ।।'' (नेत्रतन्त्र)
रोधिनी तक ही 'बिन्दु' का आवरण है । यह भी 'शून्य' है । यहाँ दिक
एवं काल का पार्थक्य स्मृत नहीं रहता । निम्न मन एवं प्राण का यहाँ अनुभव भी
नहीं रहता । इसके बाद ही 'नाद' है जो कि ब्रह्मरंध के सम्मुख स्थित है ।
(४) नाद—निरोधिका के ऊर्ध्वदेश में एवं ब्रह्मरंध्र के सम्मुख 'नादस्थान' है ।
यह मन्त्र महेश्वररूपी महापुरुषों द्वारा परिवृत है । 'नाद' के अन्तर्गत भुवन पञ्चक
के मध्य की शक्ति 'ऊर्ध्वगा' कहलाती है । यहीं से विशुद्ध, चिद्बोध का सूत्रपात
होता है । ब्रह्मरंध्र के भीतर 'नादान्त' है । काल-भेदन के आरोह-क्रम में
प्रथमावस्था है—'बिन्दुपद' एवं दूसरी अवस्था है 'नाद पद' । बिन्दु पद के
अधिष्ठाता हैं 'ईश्वर' एवं नाद पद के 'सदाशिव' । बिन्दुअवस्था—सर्वज्ञत्व लाभ =
१. नेत्रतन्त्र : अर्द्धचन्द्र की कलाएँ निम्न हैं—
ज्योत्स्ना ज्योत्स्नावती चैव सुप्रभा विमला शिवा ।
अर्द्धचन्द्र कलाः ह्येताः सर्वज्ञपद संस्थिताः ।।
विद्या वरण संबद्धा मन्त्र कोटि विभूषिताः ।
क्रिया शक्तिस्वरूपस्तु संस्थिता विमला शुभाः ।। (नेत्रतन्त्र)