वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽंशः ११९
पाना संभव नहीं। 'बिन्दु' में प्रवेश किये बिना सरल मार्ग में प्रवेश करना असंभव
है। मात्र 'शुद्ध विद्या' (भगवदानुग्रह) ही अर्धमात्रा रूप काल को अतिक्रान्त करा
सकती है। आध्यात्मिक यात्रा के आरोहण-पथ में सद्गुरु काल की मात्रा से
अर्धमात्रा की धारा को जोड़ देता है। जहाँ से अर्धमात्रा प्रारंभ होती है वहीं से
सरल गति का आरंभ है। काल के राज्य में लोक-लोकान्तर तैर रहे हैं। काल
को अर्धमात्रा में प्रतिष्ठित करना चाहिए। उक्त सरल गति के क्रमविकास के साथ
ही साथ मात्रायें भी सूक्ष्मतर होती चली जाती हैं। यह सूक्ष्मता अर्धमात्रा आदि के
रूप में विभक्त होती है। यथा 'बिन्दुस्थान' में अर्धमात्रा किन्तु अर्धचन्द्र में १।४
अंश मात्रा एवं निरोधिका में १।८ मात्रा हो जाती है। इसी प्रकार काल की
क्षीणतम मात्रा तक पहुँचना पड़ता है। काल की क्षीणतम मात्रा का नाम है 'काल
का परमाणु' अर्थात् 'लव'। 'लव' = कालिक विभाग की ऊर्ध्व गति की चरम
सीमा। किन्तु यह चरम सीमा नहीं है। मात्रा-विभाग की चरम सीमा १/५१२
मात्रा का भी योगियों ने अनुभव किया है। यही सूक्ष्मतम मात्रा है काल की।
इससे भी अधिक मात्रा की सूक्ष्मता संभव तो है किन्तु अभी तक संभव नहीं हुई।
'बिन्दु' में भेद ज्ञान है 'नाद' में अभेद ज्ञान है।१ 'बिन्दु' से 'नाद' में जाने के
लिए भगवती का आदेश आवश्यक है। इसी प्रकार से नाद से बिन्दु में अवतरित
होने के लिए भी भगवती का आदेश आवश्यक है। 'नाद' में भी सभी सत्ताओं
का ज्ञान होता है किन्तु अपने से अभिन्न रूप में।
नाद के ज्ञान के साथ समग्र विश्व के नदन का अनुभव—समस्त विश्व की
समस्त सत्ता 'मैं' के रूप में ज्ञात होने लगना 'नदन' है। बिन्दु में स्थित योगी ही
विश्व के सञ्चालक है। आरोहण-क्रम = गुरुमन्त्र (गुरु की चित् शक्ति से सम्पन्न
मन्त्र) पश्यन्ती में शिष्य के बीजमन्त्र का उद्धार—मध्यमावस्था में उस बीज की
कल्पना के राज्य में 'मध्यमा वाक्' से शिष्य को अर्पण (गुरु का भौतिक आकाश
में उतरना)—वैखरी शब्दों से मन्त्र-दान—गुरु द्वारा शिष्य कर्ण में प्रदत्त मन्त्र का
स्थूल अंश + उसका स्थूल आवरण स्थित होना—शिष्य द्वारा मन्त्र जप से
स्थूलावरण का भेदन—(गुरु-मन्त्र के रूप में शिष्य श्रुतमन्त्र 'आवरण' है उसका
भेदन)—स्थूल आवरण का जप—ज्योतिदर्शन = चिताकाश का साक्षात्कार (मध्यमा
वाक् की परिपक्वावस्था)—मध्यमा ज्योति या चित् ज्योतिरूप का—चिदालोक में
परिणमन—चिदाकाश दर्शन—(विश्वोऽहं की अनुभूति) ॥
बिन्दु से नाद में प्रवेश—नदन की अनुभूति (स्थूल-सूक्ष्म देह का भी बोध
नहीं। विश्वोऽहं का बोध) नदन—विज्ञानमय से आनन्दमय कोष में गति ॥ नाद—
नदन किया आस्वाद।
'नादान्त' ही ब्रह्मरंध्रस्थ ज्योति का स्थान है। उसी के बाद 'चिदाकाश' में
गति। बिन्दु का नामान्तर 'चिदाकाश' है।
१. नादस्तु पद्मरागवदण्डद्वयमध्यवर्तिनीव सिरा।