वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२० वरिवस्यारहस्ये
'नादान्त'—ब्रह्मरंध्र में नादान्त है । यह भी शून्य है ।१ 'नाद' पद्मराग की
कान्ति वाल । दो अण्डों के मध्य वर्तमान सिरा की भाँति स्थित है । बाईं ओर
स्थित बिन्दु से युक्त, विद्युतवत प्रकाशित 'नादान्त' हल की आकृति के समान है ।
'शक्ति'—दो बिन्दुओं के बाएँ से उदित होने वाली सिरा की आकृति वाली
होती है ।२ 'व्यापिका' बिन्दु एवं उसके ऊपर त्रिकोण के समान आकृति वाली है ।३
'समना' की आकृति रेखा के ऊपर-नीचे स्थित दो बिन्दुओं के समान होती है ।४
ऊपर वाले बिन्दु के बिना उपर्युक्त समना ही 'उन्मना' है । इसके ऊपर 'महाबिन्दु'
स्थित है ।५
रुन्धिनी, रोधिनी, रोद्धा, ज्ञानरोधा, तमोपहा—ये 'अर्धचन्द्र' में स्थित पाँच
कलायें हैं । इसी प्रकार रुन्धिनी, रोधिनी, रोद्धा, ज्ञानरोधा, तमोपहा—ये
'निरोधिका' की कलायें हैं । नाद की कलायें निम्न हैं—'इन्धिका दीपिका चैव
रेचिका मेचिका तथा ऊर्ध्वगा तासां पञ्चमी परमा कला ।।' नाद का अन्त ब्रह्मरंध्र में
होता है—'नादस्यान्तो लयो यत्र भवति ब्रह्मरन्ध्रक ।।' 'नादान्त'—नाड्याधारस्तु
नादान्तोभित्वा सर्वमिद जगत् ।।' 'शक्ति'—शक्तितत्वं समाख्यातं भुवनैरावृतं महत् ।
'शक्तिर्बिन्दुद्वयमध्ये वामभागस्थबिन्दूद्यत्स्थिरा रूपा ।।' (दीपिका) ।।
परमात्मा की जो पाँच शक्तियाँ हैं उनमें से मात्र 'इच्छाशक्ति' ही 'उन्मनी' से
सम्बंध रखती है—
सा शक्तिः परमा सूक्ष्मा उन्मना शिवरूपिणी ।
अस्तित्वमात्रत्मात्मानं क्षोभ्यं क्षोभयते सदा ।। ६० ।।
समानासौ विनिर्दिष्टा शक्तिः सर्वाध्ववर्तिनी ।
क्रीडीकरोति या विश्वं संहृत्य सृजते पुनः ।। ६१ ।।
कुण्डलाख्या महाशक्तिस्तृतीयाप्युचर्यते ।
ध्वनिरूपो यदा स्फोटस्त्व दृष्टाच्छिव विग्रहात् ।। ६२ ।।६
सारांश—'इच्छाशक्ति' = 'उन्मना'—'समना'—कुण्डलिनी नादस्वरूप सदाशिव
—निरोधिका ।।
१. नादान्तस्तडिदाभः सव्यस्थितबिन्दुयुक्तलाङ्गलवत् ।
२. तिर्यग्बिन्दुद्वितये वामोदगच्छत्सिराकृतिः शक्तिः ।
३. बिन्दुद्गच्छत्त्र्यश्राकारधरा व्यापिका प्रोक्ता ।
४. ऊर्ध्वाधोबिन्दुद्वयसंयुतरेखाकृतिः समना ।
५. सैवोर्ध्वबिन्दु हीनोन्मना तदूर्ध्वं महाबिन्दुः ।
'अर्धचन्द्रो' बिन्दोरर्धभाराः तथाकारो दीपाकार एव । ज्योत्स्नाकारा चन्द्रिका-
समकान्तिः । तदष्टांशा मात्राष्टांशोच्चारणकाला । त्र्यस्रविग्रहा त्रिकोणाकारा
'रोधिनी' अर्धचन्द्रस्तदूर्ध्वं तु रोधिनी तस्य चोपरि । ज्योत्स्ना ज्योत्स्नावती
कान्तिः सुप्रभाविमलापि च ।। (स्वच्छन्द तन्त्र)
६. नेत्रतन्त्र