श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ
पृष्ठ 187, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 187ब्रह्मवेत्तालोग जिसके जन्मका अभाव बतलाते हैं, और जिसे नित्य
इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यपरमहंसपरिव्राजकाचार्य-
अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७३
ब्रह्मवेत्तालोग जिसके जन्मका अभाव बतलाते हैं, और जिसे नित्य
कहते हैं उस जराशून्य पुरातन सर्वात्माको, जो विभु होनेके कारण
सर्वगत है, मैं जानता हूँ ॥ २१ ॥
वेदाहमेतमिति । वेद जाने- 'वेदाहमेतम्' इत्यादि । इस
ऽहमेतमजरं विपरिणामधर्मवर्जितं अजर अर्थात् विपरिणामधर्मशून्य और
पुराणं पुरातनं सर्वात्मानं सर्वेषा- पुराण—पुरातन सर्वात्माको सबके
मात्मभूतं सर्वगतं विभुत्वादाकाश- स्वरूपभूतको, जो विभु—आकाशके
वद्व्यापकत्वात् । यस्य च जन्म- समान व्यापक होनेके कारण सर्वगत
निरोधमुत्पत्त्यभावं प्रवदन्ति ब्रह्म- है तथा ब्रह्मवेत्तालोग जिसके जन्म-
वादिनो हि नित्यम् । स्पष्टोऽर्थः का अभाव नित्य बतलाते हैं, मैं
॥ २१ ॥ जानता हूँ। शेष अर्थ स्पष्ट है ॥२१॥*
इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यपरमहंसपरिव्राजकाचार्य-
श्रीमच्छङ्करभगवत्प्रणीते श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्ये
तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
- श्रीशङ्करानन्दजीने इस मन्त्रके उत्तरार्धकी व्याख्या इस प्रकार की है—"जन्म
च निरोधश्च जन्मनिरोधमुत्पत्तिनाशावित्यर्थः प्रवदन्ति प्रकर्षेण कथयन्ति मूढा इति शेषः,
यस्य आत्मनः······ब्रह्मवादिनः उत्पन्नतत्त्वसाक्षात्कारा हि प्रसिद्धाः प्रवदन्ति
प्रकर्षेण कथयन्ति नित्यम्।" अर्थात् "जन्म और निरोधका नाम जन्मनिरोध है यानी
उत्पत्ति और नाश-इन्हें मूढलोग जिस आत्माके बतलाते हैं और जिसे ब्रह्मवादीलोग
—जिन्हें तत्त्वसाक्षात्कार हो गया है नित्य प्रतिपादन करते हैं।" भाष्यकी अपेक्षा
यह अर्थ अधिक उपयुक्त जान पड़ता है, क्योंकि भाष्यके अनुसार अर्थ करनेसे यहाँ
'प्रवदन्ति' क्रियाका दूसरी बार प्रयोग होनेका कोई प्रयोजन नहीं जान पड़ता।