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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

४०. सू० ] अनुमानपरीक्षाप्रकरणम् ११५

४०. सू० ] अनुमानपरीक्षाप्रकरणम् ११५
स्रोतसो बहुत्वरफेनफलपर्णकाष्ठादिवहनं चोपलभमानः पूर्णत्वेन नद्याः 'उपरि
वृष्टो देवः' इत्यनुमिनोति, नोदकवृद्धिमात्रेण । पिपीलिकाप्रायस्याण्डसञ्चारे
'भविष्यति वृष्टिः' इत्यनुमीयते, न कासाञ्चिदिति । 'नेदं मयूरवाशितं तत्सदृशो-
ऽयं शब्दः' इति विशेषापरिज्ञानान्मिथ्यानुमानमिति । यस्तु विशिष्टाच्छब्दाद्
विशिष्टमयूरवाशितं गृह्णाति तस्य विशिष्टोऽर्थो गृह्यमाणो लिङ्गम्, यथा—
सर्पादीनामिति । सोऽयमनुमातुरपराधो नानुमानस्य, योऽर्थविशेषेणानुमेयमर्थं
विशिष्टार्थदर्शनेन बुभुत्सत इति ॥ ३९ ॥
वर्तमानकालपरीक्षा
त्रिकालविषयमनुमानं त्रैकाल्यग्रहणादित्युक्तम्, अत्र च—
वर्त्तमानाभावः, पततः पतितपतितव्यकालोपपत्तेः ? ॥ ४० ॥
वृन्तात्प्रच्युतस्य फलस्य भूमौ प्रत्यासीदतो यदूर्ध्वं स पतितोऽध्वा, तत्संयुक्तः
कालः पतितकालः, योऽधस्तात् स पतितव्योऽध्वा, तत्संयुक्तः कालः पतितव्य-
पत्ते, जंगल की लकड़ी-आदि उस जल में वेग से बहते हुए देखे और साथ में नदी को
भी बढ़ा हुआ देखे तब वह अनुमान में हेतु बनती है कि 'ऊपर वर्षा हुई है, नदी बढ़ी
होने से', अर्थात् केवल उदकवृद्धि से नहीं । इसी तरह बहुत-सी चींटियों के बराबर
गमनागमन से 'वृष्टि होगी' यह अनुमान होता है, न कि कुछ चींटियों के गमनागमन
से । 'यह मोर की बोली नहीं है, उसी तरह की पुरुष की बोली है'—ऐसा विशेष
ज्ञान न होने से मिथ्यानुमान होता है । जो प्रमाता विशिष्ट शब्द से विशिष्ट मयूर
ध्वनि ( बोली ) को जब ग्रहण करता है तब उस ध्वनि का विशिष्ट अर्थ गृहीत होता
हुआ हेतु बनता है, जैसे सर्पादियों को मयूर की खास बोली सुनकर ही उनके अस्तित्व
का अनुमान हो जाता है । इस प्रकार अनुमाता का ही यह अपराध माना जायेगा कि
वह अर्थविशेष हेतु से अनुमेय अर्थ को सामान्य अर्थ से जानने की इच्छा करता है,
अनुमान का इसमें क्या दोष ! ॥ ३९ ॥
पूर्वपक्ष—पीछे (१.१.५ में) आप 'त्रिकालयुक्त अर्थ अनुमान से गृहीत होते हैं, अतः
अनुमान त्रिकालविषय है'—ऐसा कह आये हैं; और यहाँ—
वर्तमानकाल नहीं है; क्योंकि गिरती हुई वस्तु के केवल पतितकाल तथा पतितव्य-
काल ही उपपन्न हैं ? ॥ ४० ॥
डाल से टूटे फल के भूमि की ओर आते समय ऊपर (डाल और फल के बीच)
का मार्ग पतित-मार्ग हुआ, उसमें लगने वाला काल 'पतितकाल' कहलाया । जो नीचे
भूमि तक आने का मार्ग है वह पतितव्य-मार्ग हुआ, उसमें लगने वाला काल 'पतितव्य-

११६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १ . आ०
कालः; नेदानीं तृतीयोऽध्वा विद्यते यत्र पततीति वर्त्तमानः कालो गृह्येत !
तस्माद् वर्त्तमानः कालो न विद्यत इति ? ॥ ४० ॥
तयोरप्यभावो वर्त्तमानाभावे; तदपेक्षत्वात् ॥ ४१ ॥
नाध्वव्यङ्ग्यः कालः; किं तर्हि ? क्रियाव्यङ्ग्यः—'पतति' इति । यदा पतन-
क्रिया व्युपरता भवति स कालः पतितकालः, यदोत्पत्स्यते स पतितव्यकालः,
यदा द्रव्ये वर्त्तमाना क्रिया गृह्यते स वर्त्तमानः कालः । यदि चायं द्रव्ये वर्त्तमानं
पतनं न गृह्णाति कस्योपरममुत्पत्स्यमानतां वा प्रतिपद्यते ! पतितः काल इति
भूता क्रिया, पतितव्यः काल इति चोत्पत्स्यमाना क्रिया । उभयोः कालयोः
क्रियाहीनं द्रव्यम्, अधः पततीति क्रियासम्बद्धम् । सोऽयं क्रियाद्रव्ययोः सम्बन्धं
गृह्णातीति वर्त्तमानः कालः, तदाश्रयौ चेतरौ कालौ तदभावे न स्याता-
मिति ॥ ४१ ॥
अथापि—
नातीतानागतयोरितरेतरापेक्षासिद्धिः ॥ ४२ ॥
काल' कहलायेगा; अब ऐसा तीसरा कौन मार्ग रह गया जिसे हम 'गिरता है'—
ऐसा कहते हुये वर्तमान काल कह सकें ! अतः वर्तमान काल ही नहीं है—ऐसा हम
मान लें ? ॥ ४० ॥
उत्तर देते हैं—
वर्तमानकाल न मानोगे तो वर्तमानापेक्षित भूत, भविष्यत् काल की भी अनुपपत्ति
होने लगेगी ॥ ४१ ॥
समय मार्ग से नहीं, अपितु 'पड़ता है'—इस क्रिया से व्यक्त होता है । 'पड़ता है'
से आरंभ होकर जब पतन-क्रिया समाप्त हो जाती है वह काल 'पतितकाल', तथा जब
पतन-क्रिया उत्पन्न होगी वह काल 'पतितव्य काल' कहलाता है, और जब फल आदि
द्रव्य में वर्तमान पतन-क्रिया गृहीत होती है, वह 'वर्तमानकाल' कहलाता है । यदि यह
पूर्वपक्षी वर्तमान पतनक्रिया को नहीं जानता है तो वह समाप्ति (भूतकाल) तथा
प्रागभाव (भविष्यत्काल) किसके सम्बन्ध में प्रतिपादन करेगा ? पतितकाल भूत-क्रिया
का तथा पतितव्यकाल भविष्यत्क्रिया का बोधक है । इन दोनों ही कालों में द्रव्य
क्रियाहीन रहता है । 'नीचे गिरता है'—यह वर्तमानकाल अवश्य वर्तमान क्रिया से
सम्बद्ध है । यह वर्तमानकाल द्रव्य-क्रिया का सम्बन्ध ग्रहण करता है, बाकी दोनों काल
इसी पर आश्रित हैं, यदि यह न होगा तो वे कहाँ से होंगे ! ॥ ४१ ॥
भूत भविष्यत् को परस्परनिरूपणाधीन मान लें, उनके लिये एक पृथक् वर्तमानकाल
मानने की क्या आवश्यकता है ? इसपर सूत्रकार कहते हैं—
अतीत (भूत) अनागत (भविष्यत्) की इतरेतरापेक्षया सिद्धि नहीं हो सकती ॥ ४२ ॥

४२. सू० ] अनुमानपरीक्षाप्रकरणम् ११७
यद्यतीतानागता वितरेतरापेक्षौ सिद्ध्येताम्, प्रतिपद्येमहि वर्त्तमानविलोपम् ।
नातीतापेक्षाऽनागतसिद्धिः, नाप्यनागतापेक्षाऽतीतसिद्धिः । कया युक्त्या ? केन
कल्पेनातीतः कथमतीतापेक्षाऽनागतसिद्धिः, केन च कल्पेनानागतः कथमनागता-
पेक्षातीतसिद्धिरिति नैतच्छक्यं निर्वक्तुम्, अव्याकरणीयमेतद्वर्त्तमानलोप इति ।
यच्च मन्येत—'ह्रस्वदीर्घयोः, स्थलनिम्नयोः, छायाऽऽतपयोश्च यथेतरेतरा-
पेक्षया सिद्धिरेवमतीतानागतयोः' इति ? तन्नोपपद्यते, विशेषहेत्वभावात् । दृष्टा-
न्तवत् प्रतिदृष्टान्तोऽपि प्रसज्यते, यथा—रूपस्पर्शौ गन्धरसौ नेतरेतरापेक्षौ
सिध्यतः; एवमतीतानागताविति, नेतरेतरापेक्षा कस्यचित्सिद्धिरिति । यस्मादे-
काभावेऽन्यतराभावादुभयाभावः । यद्येकस्यान्यतरापेक्षा सिद्धिरन्यतरस्येदानीं
किमपेक्षा ? यद्यन्यतरस्यैकापेक्षा सिद्धिरेकस्येदानीं किमपेक्षा ? एवमेकस्याभावे
अन्यतरन्न सिध्यतीत्युभयाभावः प्रसज्यते ॥ ४२ ॥
अर्थसद्भावव्यङ्ग्यश्चायं वर्त्तमानः कालः—'विद्यते द्रव्यम्, विद्यते गुणः,
विद्यते कर्म' इति । यस्य चायं नास्ति, तस्य—

यदि अतीत व अनागत काल एक दूसरे के आश्रय से सिद्ध हो सकें तो हम भी
वर्तमानकाल को न मानें; परन्तु न भूत की अपेक्षा रखकर भविष्यत् की सिद्धि की जा
सकती है, न भविष्यत् की अपेक्षा रखकर भूत की । किस तर्क से ? किस समर्थ प्रमाण
से वह अतीत है तथा उसपर आश्रित अनागत की सिद्धि हो पायेगी ! अथ च, किस समर्थ
प्रमाण से अनागत है तथा तदपेक्ष अतीत की सिद्धि हो पायेगी ! —इसका आप निर्वचन
नहीं कर सकते, अतः वर्तमान का न मानना भी सभी को निर्वचन में बाधक होगा !
जो यह मानता है कि—'जैसे ह्रस्व-दीर्घ की, उच्च-नीच स्थल की, छाया-आतप
की इतरेतरापेक्षया सिद्धि होती है, उसी तरह अतीत-अनागत की भी मान लें' ? यह
नहीं मान सकते; क्योंकि ऐसा मानने में कोई विशेष हेतु नहीं है । दृष्टान्त की तरह
प्रतिदृष्टान्त ( विपरीत दृष्टान्त ) भी प्रसक्त होता है; जैसे रूप तथा स्पर्श, गन्ध तथा
रस इतरेतरापेक्षया सिद्ध नहीं किये जा सकते, इसी प्रकार अतीत अनागत में समझना
चाहिये । और इतरेतरापेक्षया किसी की भी सिद्धि नहीं होती; क्योंकि एक का अभाव
होने पर दूसरे का अभाव ( अन्यतराभाव ) होने से दोनों का ही अभाव (उभयाभाव)
हो जायेगा । यदि एक की दूसरे की अपेक्षा से सिद्धि मानें तो बाकी बचे दूसरे की
किसकी अपेक्षा से सिद्धि होगी ? यदि अन्यतर की एकापेक्षया सिद्धि मानें तो उस एक
की अब किसकी अपेक्षा से सिद्धि होगी ? इस प्रकार एक का अभाव होने पर दूसरा भी
सिद्ध नहीं हो पायेगा, अतः दोनों का ही असिद्धि-प्रसङ्ग आ पड़ेगा ॥ ४२ ॥
यह वर्त्तमानकाल न केवल पतनादि क्रिया से, अपितु अर्थ-सत्ता से भी व्यक्त होता
है, जैसे—'यह द्रव्य वर्तमान है', 'यह गुण वर्तमान है', 'यह कर्म विद्यमान है'—आदि।
जिस अर्थ की सत्ता नहीं होती, उसके—

११८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ०
वर्त्तमानाभावे सर्व्वाग्रहणं प्रत्यक्षानुपपत्तेः ॥ ४३ ॥
प्रत्यक्षमिन्द्रियार्थसन्निकर्षजम्, न चाविद्यमानमसदिन्द्रियेण सन्निकृष्यते । न
चायं विद्यमानं सत्किञ्चिदनुजानाति । प्रत्यक्षनिमित्तं प्रत्यक्षविषयः प्रत्यक्षज्ञानं
सर्वं नोपपद्यते, प्रत्यक्षानुपपत्तौ तत्पूर्वकत्वादनुमानागमयोरनुपपत्तिः । सर्वप्रमाण-
विलोपे सर्वग्रहणं न भवतीति ॥ ४३ ॥
उभयथा च वर्त्तमानः कालो गृह्यते-क्वचिदर्थसद्भावव्यङ्ग्यः, यथा-अस्ति
द्रव्यमिति; क्वचित् क्रियासन्तानव्यङ्ग्यः, यथा-पचति, छिनत्तीति । नानाविधा
चैकार्था क्रिया क्रियासन्तानः क्रियाभ्यासश्च । नानाविधा चैकार्था क्रिया पचतीति
स्थाल्यधिश्रयणमुदकासेचनं तण्डुलावपनमेधोऽपसर्पणमग्न्यभिज्वालनं दर्वीघट्टनं
मण्डस्रावणमधोऽवतारणमिति । छिनत्तीति क्रियाभ्यासः, उद्यम्योद्यम्य परशुं
दारुणि निपातयन् छिनत्तीत्युच्यते । यच्चेदं पच्यमानं छिद्यमानं च तत्क्रिय-
माणम् । तस्मिन् क्रियमाणे—


वर्तमान के अभाव में प्रत्यक्ष न होने से सभी का ग्रहण नहीं होगा ॥ ४३ ॥
प्रत्यक्ष इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्य होता है, और अविद्यमान असत् इन्द्रिय से सन्निकृष्ट
नहीं हो सकता । यह पूर्वपक्षी विद्यमान सत् को कुछ स्वीकार नहीं करता, तो उसके
मतमें प्रत्यक्ष का कारण, प्रत्यक्ष का विषय तथा प्रत्यक्ष ज्ञान—यह सब उपपन्न नहीं
हो सकेगा । अनुमान तथा शब्द प्रमाण के प्रत्यक्षपूर्वक होने से, प्रत्यक्ष के अभाव में वे
दोनों भी अनुपपन्न ही रहेंगे । यों, सब प्रमाणों के विलुप्त हो जाने से सभी का ग्रहण
न हो सकेगा ॥ ४३ ॥
वर्तमानकाल दो प्रकार से गृहीत होता है—कहीं वह अर्थ-सत्ता से व्यक्त होता है,
जैसे—'यह द्रव्य है'; कहीं क्रियासन्तान से व्यक्त होता है, जैसे—'पकाता है', 'काटता
है' आदि । एक अर्थ के लिये होने वाली नाना प्रकार की क्रियायें 'क्रियासन्तान' तथा
'क्रियाभ्यास' कहलाती हैं । 'क्रियासन्तान' का उदाहरण है—'पचति' । यहाँ एक अर्थ
के लिये—बटलोई (पात्र) का चूल्हे पर चढ़ाना, उसमें जल भरना, चावल डालना,
चूल्हे में अग्नि जलाना, अग्नि तेज करने के लिये लकड़ी सरकाना, करछी से चावल को
हिलाना, मांड़ पसारना, अन्त में बटलोई को नीचे उतारना—आदि अनेक प्रकार की
क्रियायें होती हैं । 'छिनत्ति'—यह 'क्रियाभ्यास' का उदाहरण है, यहाँ 'कुठार को
ऊपर उठा उठाकर काष्ठ पर पटकता हुआ काटता है'—ऐसा अर्थ निकलता है । इन
दोनों क्रियाओं में पकाया जा रहा तथा काटा जा रहा 'क्रियमाण' (वर्तमान क्रिया-कर्म)
कहलाता है । उस क्रियमाण में—