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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

१७ सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ९१

१७ सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ९१
प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि—प्रत्यक्षेणोपलभे, अनुमानेनोपलभे, उपमानेनोपलभे,
आगमेनोपलभे; प्रत्यक्षम् मे ज्ञानम्, आनुमानिकं मे ज्ञानम्, औपमानिकं मे
ज्ञानम्, आगमिकं मे ज्ञानमिति विशेषा१ गृह्यन्ते । लक्षणतश्च ज्ञाप्यमानानि
ज्ञायन्ते विशेषेण—‘इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम्’ इत्येवमादिना ।
सेयमुपलब्धिः प्रत्यक्षादिविषया किं प्रमाणान्तरतः, अथान्तरेण प्रमाणा-
न्तरमसाधनेति ?
कश्चात्र विशेषः ?
प्रमाणतः सिद्धेः प्रमाणानां प्रमाणान्तरसिद्धिप्रसङ्गः ? ॥ १७ ॥
यदि प्रत्यक्षादीनि प्रमाणेनोपलभ्यन्ते ? येन प्रमाणेनोपलभ्यन्ते तत् प्रमा-
णान्तरमस्तीति प्रमाणान्तरसद्भावः प्रसज्यत इति अनवस्थामाह—तस्याप्यन्येन,
तस्याप्यन्येनेति । न चानवस्था शक्याऽनुज्ञातुम्; अनुपपत्तेरिति ॥ १७ ॥
अस्तु तर्हि प्रमाणान्तरमन्तरेण निःसाधनेति ?
विभक्त प्रमाणरूप से प्रत्यक्षादि का ग्रहण करता है। इसी तरह ‘मेरा यह ज्ञान प्रत्यक्ष से
हुआ है’, ‘अनुमान से हुआ है’, ‘उपमान से हुआ है’, ‘आगम से हुआ है’, ऐसे भेद से
भी ये प्रमाण गृहीत होते हैं। ये प्रत्यक्षादि, लक्षण से जाने जाते हुए ‘यह ज्ञान इन्द्रिया-
र्थसन्निकर्षजन्य है, अतः प्रत्यक्ष है’—ऐसे अपनी विशेषताओं से पृथक् हैं।
हमारा आशय यह है कि प्रत्यक्षादि का यह उपर्युक्त ज्ञान क्या किसी प्रमाणान्तर
से होता है ? या किसी प्रमाणान्तर के बिना ही असाधन हैं ?
सिद्धान्ती पूछता है—यह ज्ञान तुम्हारे बताये प्रकारों में से किसी भी प्रकार से हो,
विशेषता क्या आयेगी ? प्रश्नकर्ता उत्तर देता है—
यदि यह ज्ञान अन्य प्रमाण से सिद्ध होता है तो ( इनसे भिन्न ) प्रमाणान्तर मानना
पड़ेगा ? ॥ १७ ॥
यदि प्रत्यक्षादि प्रमाण से उपलब्ध होते हैं तो ये जिस प्रमाण से उपलब्ध होते हों
उस प्रमाणान्तर की सत्ता माननी पड़ेगी । इससे अनवस्था यह पैदा होगी कि उस उस
ज्ञान के लिये पूर्व-पूर्व प्रमाणान्तर की अनन्त कल्पनायें करनी पड़ेंगी । प्रायः अयुक्त होने
के कारण इस अनवस्था का मानना उचित नहीं है ॥ १७ ॥
तो दूसरा पक्ष—प्रमाणान्तर के बिना ही असाधन है—यह मान लें ? पूर्वपक्षी
कहता है—
१. ‘ज्ञानविशेषाः’ इति पाठ० ।
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९२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ०
तन्निवृत्तेर्वा प्रमाणसिद्धिवत् प्रमेयसिद्धिः ? ॥ १८ ॥
यदि प्रत्यक्षाद्युपलब्धौ प्रमाणान्तरं निवर्तते, आत्माद्युपलब्धावपि प्रमाणान्तरं
निवत्स्य॑ते, अविशेषात् ? ॥ १८ ॥
एवं च सर्वप्रमाणविलोप इत्यत आह—
न; प्रदीपप्रकाशवत् तत्सिद्धेः ॥ १९ ॥
यथा प्रदीपप्रकाशः प्रत्यक्षाङ्गत्वात् दृश्यदर्शने प्रमाणम्, स च प्रत्यक्षान्तरेण
चक्षुषः सन्निकर्षेण गृह्यते। प्रदीपभावाभावयोर्दर्शनस्य तथाभावाद् दर्शनहेतुर-
नुमीयते। 'तमसि प्रदीपमुपाददीथाः' इत्याप्तोपदेशेनापि प्रतिपद्यते। एवं प्रत्यक्षा-
दीनां यथादर्शनं प्रत्यक्षादिभिरेवोपलब्धिः।
इन्द्रियाणि तावत् स्वविषयग्रहणेनैवानुमीयन्ते। अर्थाः प्रत्यक्षतो गृह्यन्ते।
इन्द्रियार्थसन्निकर्षस्त्वावरणेन लिङ्गेनानुमीयन्ते। इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं
ज्ञानमात्ममनसोः संयोगविशेषादात्मसमवायाच्च सुखादिवद् गृह्यते। एवं
उक्त प्रत्यक्षादि के ज्ञान में प्रमाणान्तर न मानने पर आत्मादि प्रमेय की सिद्धि में
भी प्रमाणान्तर नहीं मानना पड़ेगा ? ॥ १८ ॥
यदि इस प्रत्यक्षादि ज्ञान में प्रमाणान्तर निवृत्त हो जाता है तो प्रमेय (आत्मा आदि)
के ज्ञान में भी प्रमाणान्तर मानने की क्या आवश्यकता है; क्योंकि बात दोनों जगह
बराबर है ? ॥ १८ ॥
इस तरह आपका 'सब प्रमाणों का प्रकरण' ही समाप्त हो जायेगा ? (इसका
सिद्धान्ती उत्तर देते हैं— )
नहीं; प्रदीपप्रकाश की तरह उसकी सिद्धि हो जायेगी ॥ १९ ॥
जैसे—दीपक का प्रकाश प्रत्यक्ष का अङ्ग ( साधन ) होने से दृश्य को दिखाने में
प्रमाण है, और वह प्रत्यक्षान्तर—चक्षुःसन्निकर्ष—से गृहीत होता है। तथा 'दीपक के
रहते अन्धकार में दृश्य का दिखायी देना, और दीपक के न रहने पर दिखायी न देना—'
इस व्यतिरेकव्याप्ति से दीपक में दर्शनहेतुत्व अनुमान प्रमाण से, तथा 'अन्धकार में दीपक
का सहारा लेना चाहिये'—इस आप्तोपदेश से भी सिद्ध किया जा सकता है ! अतः सिद्ध
हो गया कि दीपक की तरह प्रत्यक्षादि प्रमाणों का भी दर्शन के अनुसार उन्हीं प्रत्यक्षादि
प्रमाणों से ज्ञान हो जाता है।
अतीन्द्रिय इन्द्रियों का स्वविषयग्रहणरूप हेतु से अनुमान होता है, अर्थों का प्रत्यक्ष
होता है, इन्द्रिय और अर्थ का सम्बन्ध आवरण हेतु से अनुमित होता है, इन्द्रियार्थसन्निकर्ष
से उत्पन्न ज्ञान भी सुखादि ज्ञान की तरह आत्मनःसंयोग, तथा आत्मा के साथ समवाय
( सम्बन्ध ) से होता है—इस प्रकार प्रमाणविशेष का विभागपूर्वक विवेचन करना
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