न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
११. सू० ] क्षणभङ्गपरीक्षाप्रकरणम् २२९
११. सू० ] क्षणभङ्गपरीक्षाप्रकरणम् २२९
स्फटिकेऽप्यपरावरोत्पत्तेः क्षणिकत्वाच्चव्यक्तीनामहेतुः ॥ १० ॥
स्फटिकस्याभेदेनावस्थितस्योपधानभेदान्नानात्वाभिमान इत्ययमविद्यमान-
हेतुकः पक्षः । कस्मात् ? स्फटिकेऽप्यपरावरोत्पत्तेः । स्फटिकेऽपि अन्या व्यक्तय
उत्पद्यन्ते, अन्या निरुद्ध्यन्त इति । कथम् ? क्षणिकत्वाद् व्यक्तीनाम् । क्षणश्चा-
ल्पीयान् कालः, क्षणस्थितिकाः = क्षणिकाः । कथं पुनर्गम्यते-क्षणिका व्यक्तय
इति ? उपचयापचयप्रबन्धदर्शनाच्छरीरादिषु । पक्तिनिर्वृत्तस्याहाररसस्य शरीरे
रुधिरादिभावेनोपचयोऽपचयश्च प्रबन्धेन प्रवर्त्तते । उपचयाद् व्यक्तीनामुत्पादः,
अपचयाद् व्यक्तिनिरोधः । एवं च सत्यवयवपरिणामभेदेन वृद्धिः शरीरस्य काला-
न्तरे गृह्यते इति । सोऽयं व्यक्तिविशेषधर्मो व्यक्तिमात्रे वेदितव्य इति ॥ १० ॥
नियमहेत्वभावाद्यथादर्शनमभ्यनुज्ञा ॥ ११ ॥
सर्वासु व्यक्तिषु उपचयापचयप्रबन्धः शरीरवदिति नायं नियमः । कस्मात् ?
हेत्वभावात् । नात्र प्रत्यक्षमनुमानं वा प्रतिपादकमस्तीति । तस्माद् यथादर्शनम्-
स्फटिक में दूसरे-दूसरे व्यक्तियों की उत्पत्ति होते रहने के कारण व्यक्तियों के
क्षणिक होने से उक्त हेतु नहीं बनेगा ॥ १० ॥
'अभेदेन उपस्थित स्फटिक में अनुग्रहभेद से नानात्व का आरोप हैं' यह पक्ष
( प्रतिज्ञात अर्थ ) अविद्यमानहेतुक है; क्योंकि स्फटिक में भी क्षण-क्षण में दूसरे-दूसरे
की उत्पत्ति है । अर्थात् प्रतिक्षण स्फटिक व्यक्ति उत्पन्न होती है, तो पहली निरुद्ध
होती रहती हैं । कारण, व्यक्ति तो क्षणिक है । अल्पतर काल को 'क्षण' तथा क्षणभर
स्थितिवाले को 'क्षणिक' कहते हैं । यह कैसे ज्ञात होता है कि व्यक्ति क्षणिक हैं ?
शरीरादि में वृद्धि तथा ह्रास का प्रवाह देखा जाने से । जठराग्नि पाक से निष्पन्न रस से
शरीर में रुधिरादिभाव की वृद्धि तथा ह्रास के प्रवाह से वृद्धि ह्रास देखे जाते हैं । वहाँ
उपचय से व्यक्ति का उत्पाद कहलाता है तथा अपचय से व्यक्ति का निरोध । इस
रीति से अवयवों में परिणति होते रहने से कालपरिपाकवश शरीर के वृद्धि या ह्रास
गृहीत होते हैं । यह व्यक्तिविशेष में दिखाया गया निदर्शन स्फटिकादि सभी व्यक्तियों
में समझना चाहिये । कहने का तात्पर्य यह है कि हमारा (बौद्ध) मत स्वीकार कर लेने
पर स्फटिकान्यत्व के आरोप की आवश्यकता न ही पड़ेगी, वहाँ तो क्षणिक सिद्धान्त से
स्फटिकान्यत्व उपस्थित ही है ? ॥ १० ॥
आचार्य उत्तर देते हैं—
क्षणिकवाद का कोई नियमहेतु न होने से जहाँ जैसा देखें वहाँ वैसा अभ्यनुज्ञान
कर लेना चाहिये ॥ ११ ॥
'सभी व्यक्तियों का उपचयापचयप्रबन्ध शरीर की तरह होता हैं'—ऐसा कोई नियम
नहीं; क्योंकि इस नियम का साधक कोई हेतु नहीं है । इस नियम का प्रतिपादक न
२३० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ०
भ्यनुज्ञा। यत्र यत्रोपचयापचयप्रबन्धो दृश्यते, तत्र तत्र व्यक्तीनामपरापरो-
त्पत्तिरुपचयापचयप्रबन्धदर्शनेनाभ्यनुज्ञायते, यथा—शरीरादिषु। यत्र यत्र न
दृश्यते तत्र तत्र प्रत्याख्यायते, यथा—ग्रावप्रभृतिषु। स्फटिकेऽप्युपचयापचय-
प्रबन्धो न दृश्यते। तस्मादयुक्तम्—स्फटिकेऽप्यपरापरोत्पत्तिरिति। यथा चार्कस्य
कटुकिम्ना सर्वद्रव्याणां कटुकिमानमापादयेत्, तादृगेतदिति ॥ ११ ॥
यश्च—अशेषनिरोधेनापूर्वोत्पादं निरन्वयं द्रव्यसन्ताने क्षणिकतां मन्यते,
तस्यैतत्
न; उत्पत्तिविनाशकारणोपलब्धेः ॥ १२ ॥
उत्पत्तिकारणं तावदुपलभ्यते—अवयवोपचयो वल्मीकादीनाम्। विनाश-
कारणं चोपलभ्यते—घटादीनामवयवविभागः। यस्य त्वनपचितावयवं निरुध्यते
अनुपचितावयवं चोत्पद्यते, तस्याशेषनिरोधे निरन्वये वाऽपूर्वोत्पादे न कारण-
मुभयत्राप्युपलभ्यते इति ॥ १२ ॥
क्षीरविनाशे कारणानुपलब्धिवद् दध्युत्पत्तिवच्च तदुत्पत्तिः ? ॥ १३ ॥
कोई प्रत्यक्ष है, न अनुमान; अतः जहाँ जैसे देखें वैसा स्वीकार लेना चाहिये। जहाँ-
जहाँ उपचयापचयप्रबन्ध देखें वहाँ-वहाँ व्यक्तियों के उपचयापचय से उनके उत्पाद-
विनाश की कल्पना से यथाकथमपि अपर अपर व्यक्ति के उत्पत्ति-विनाश माने जा
सकते हैं, जैसे—शरीरादि में; परन्तु जहाँ-जहाँ उपचयापचय न दिखायी दे वहाँ उक्त
कल्पना का प्रत्याख्यान भी किया जा सकता है, जैसे—शिला आदि में। स्फटिक में भी
अपर-अपर व्यक्ति के उत्पाद-विनाश की कल्पना अयुक्त ही है; अन्यथा यह बात तो
वैसी ही होगी जैसे कोई पुरुष अर्क के कटुत्व का अनुभव करके सभी द्रव्यों को कटु
समझने लगे ॥ ११ ॥
और जो वादी (बौद्ध) सर्वावयवनाश हेतु से पूर्वांश से असम्बद्ध वैसे अपूर्व
उत्पाद को द्रव्यसन्तान-धारा में क्षणिकता को स्वीकार करता है, उसकी यह बात
उचित नहीं; उत्पत्ति तथा विनाश का कारण उपलब्ध होने से ॥ १२ ॥
(लोक में) वृद्धिरूप उत्पत्ति में कारण मिलता है, जैसे—वल्मीकादि का अवयवो-
पचय। अपचयरूप विनाश में भी कारण उपलब्ध होता है, जैसे—घटादि का अवयवशः
विभाग। जिसके मत में अनपचितावयव द्रव्य विनष्ट तथा उपचितावयव द्रव्य उत्पन्न
हो जाता है, उसके इस (सर्वावयवनाश तथा अपूर्व उत्पाद) मत के दोनों ही पक्षों
का साधक कोई हेतु लोक में नहीं मिलता ॥ १२ ॥
शंका—
दूध के विनाश में कारणानुपलब्धि की तरह तथा दधि की उत्पत्ति की तरह
(उपर्युक्त तथाविध) उत्पत्ति सिद्ध हो जायेगी ? ॥ १३ ॥