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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

४. सू० ] बुद्धेरनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २२५

४. सू० ] बुद्धेरनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २२५
अर्थस्याभेद¹ इति चेत् ? समानम् । भिन्नार्था एते शब्दा इति तत्र
व्यवस्थानुपपत्तिरित्येवं चेन्मन्यसे ? समानं भवति । पुरुषश्चेतयते, बुद्धिर्जानीते
इत्यत्राप्यर्थो न भिद्यते; तत्रोभयोश्चेतनत्वादन्यतरलोप इति । यदि पुनर्बुध्यते-
ऽनेनेति बोधनं बुद्धिर्मन एवोच्यते, तच्च नित्यम् ? अस्त्येतदेवम्, न तु मनसो
विषयप्रत्यभिज्ञानान्नित्यत्वम् । दृष्टं हि करणभेदे ज्ञातुरेकत्वात् प्रत्यभिज्ञानम्—
'सव्यदृष्टस्येतरेण प्रत्यभिज्ञानात्' इति चक्षुर्वत् प्रदीपवच्च—प्रदीपान्तरदृष्टस्य
प्रदीपान्तरेण प्रत्यभिज्ञानमिति । तस्माद् ज्ञातुरयं नित्यत्वे हेतुरिति ॥ ३ ॥
यच्च मन्यते—बुद्धेरवस्थिताया यथाविषयं वृत्तयो ज्ञानानि निश्चरन्ति,
वृत्तिश्च वृत्तिमत्तो नान्येति, तच्च
न; युगपद्ग्रहणात् ॥ ४ ॥
वृत्तिवृत्तिमत्तोरनन्यत्वे वृत्तिमतोऽवस्थानाद् वृत्तीनामवस्थानमिति यानी-
यदि यह कहो कि—'चेतयते' 'बुद्ध्यते' इत्यादि का अर्थभेद होने के कारण, एक
ही ज्ञाता के कर्ता होने पर उक्त प्रयोग की व्यवस्था उपपन्न नहीं होगी, अतः उस
एक का ही सब के साथ सम्बन्ध उचित नहीं ? तो यह बात आप के पक्ष में भी समान
ही है, क्योंकि आप भी जब यह कहते हैं कि 'बुद्धि जानती है' तो बुद्धि तथा ज्ञान एक
ही चीज हैं, तब उस का सम्बन्ध उसी में कैसे होगा ? एक बात और ! जब आप कहते
हैं कि 'पुरुष चेतना देता है, बुद्धि जानती है' तो ये पुरुष और बुद्धि—दोनों ही चेतन
हैं । अतः एक चेतन का आप के मत में विनाश मानना पड़ेगा ।
यदि यह व्युत्पत्ति करोगे कि 'जिससे जाना जाये वह बुद्धि है' तो यह मन हो गया,
और मन नित्य है ? ठीक है, परन्तु विषयप्रत्यभिज्ञानसमवायिता के कारण वह नित्य
नहीं है । क्योंकि लोक में करण ( इन्द्रिय ) का भेद होने पर भी एक ज्ञाता के देखे जाने
से उसी को प्रत्यभिज्ञान होता है, जैसे—बायीं आँख से देखे गये का ही दाहिनी आँख से
देखा जाने पर प्रत्यभिज्ञान होता है । अथवा—एक दीप से देखा जाने के बाद दूसरे
दीप से वही चीज देखी जाने पर प्रत्यभिज्ञान होता है । अतः यह प्रत्यभिज्ञान ज्ञाता के
नित्यत्व का साधक है, मेन के नित्यत्व का नहीं ॥ ३ ॥
जो यह मानता है कि—बुद्धि के स्थिर ( नित्य ) रहते हुए ही विषयानुसार वृत्तियाँ
( ज्ञान ) उसमें से निकलती रहती हैं; यह वृत्ति वृत्तिमान् से भिन्न नहीं है ?
युगपद् ग्रहण न होने से ऐसा नहीं कह सकते ॥ ४ ॥
यदि वृत्ति और वृत्तिमान्—दोनों का अभेद मानोगे तो वृत्तिमान् के स्थिर रहते वृत्तियाँ
१. अर्थस्य भेदः—इति पाठ० ।
न्या० द० : १५

२२६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ०
मानि विषयग्रहणानि तान्यवतिष्ठन्त इति युगपद् विषयाणां ग्रहणं प्रसज्यत
इति ॥ ४ ॥
अप्रत्यभिज्ञाने च विनाशप्रसङ्गः ॥ ५ ॥
. अतीते च प्रत्यभिज्ञाने वृत्तिमानप्यतीत इत्यन्तःकरणस्य विनाशः प्रसज्यते,
विपर्यये च नानात्वमिति ॥ ५ ॥
अविभु चैकं मनः पर्यायेणेन्द्रियैः सम्प्रयुज्यत इति—
क्रमवृत्तित्वादयुगपद् ग्रहणम् ॥ ६ ॥
इन्द्रियार्थानाम् । वृत्तिवृत्तिमतोर्नानात्वमिति । एकत्वे च प्रादुर्भावतिरो-
भावयोरभाव इति ॥ ६ ॥
अप्रत्यभिज्ञानं च विषयान्तरव्यासङ्गात् ॥ ७ ॥
अप्रत्यभिज्ञानम् = अनुपलब्धिः । अनुपलब्धिश्च कस्यचिदर्थस्य विषयान्तर-
व्यासक्ते मनस्युपपद्यते; वृत्तिवृत्तिमतोर्नानात्वात् । एकत्वे हि अनर्थको व्यासङ्ग
इति ॥ ७ ॥
विभुत्वे चान्तःकरणस्य पर्यायेणेन्द्रियैः संयोगः—
भी स्थिर रहेंगी, तब जितने भी विषयज्ञान होंगे वे सब स्थिर हो जायेंगे, फिर एक साथ
सभी विषयों का ज्ञान प्रसक्त होने लगेगा ॥ ४ ॥
[ वृत्ति तथा वृत्तिमान् के अभेद में एक और दूषण दिखा रहे हैं—]
अप्रत्यभिज्ञान में विनाश-प्रसक्ति होने लगेगी ॥ ५ ॥
प्रत्यभिज्ञान के अतीत ( समाप्त ) होने पर वृत्तिमान् भी अतीत हो जायेगा, तब
अन्तःकरण का विनाश प्रसक्त होगा । वृत्ति का नाश होने पर भी प्रत्यभिज्ञान ( अन्तः-
करण ) का अनाश—यों विपर्यय मानने पर मन का नानात्व प्रसङ्ग होने लगेगा ॥ ५ ॥
एक ही विनाशी मन कालभेद से इन्द्रियों के साथ संप्रयुक्त होता है, अतएव
क्रमवृत्ति होने से युगपज्ज्ञान नहीं हो पाता ॥ ६ ॥
इन्द्रियों के विषयों का । ज्ञान को अनेकता का कारण वृत्तिमान् का नानात्व मानना
ही पड़ेगा; अन्यथा ज्ञान का प्रादुर्भाव तथा तिरोभाव कैसे होगा ! ॥ ६ ॥
[ स्वमत में प्रत्यभिज्ञान का उपपादन करते हैं—]
मन के विषयान्तर में व्यासक्त होने से अप्रत्यभिज्ञान हो जाता है ॥ ७ ॥
अप्रत्यभिज्ञान से तात्पर्य है—अनुपलब्धि । यह अनुपलब्धि मन के विषयान्तर में
व्यासक्त होने पर होती है; क्योंकि हम वृत्ति तथा वृत्तिमान् को नाना मानते हैं । एक
मानने वाले के मत में भले ही उसका विषय में व्यासङ्ग होना निरर्थक रहे ! ॥ ७ ॥
मन को विभु मानने पर कालभेद से इन्द्रियों के साथ संयोग—