न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
६५ सू० ] अर्थपरीक्षाप्रकरणम् २१५
६५ सू० ] अर्थपरीक्षाप्रकरणम् २१५
पर्यन्तेभ्य इति । कथं तर्हि तरब्निर्देशः ? स्वतन्त्रविनियोगसामर्थ्यात् । तेनोत्तर-
शब्दस्य परार्थाभिधानं विज्ञायते । उद्देशसूत्रे हि स्पर्शपर्यन्तेभ्यः परः शब्द
इति । तन्त्रं वा, स्पर्शस्य विवक्षितत्वात् । स्पर्शपर्यन्तेषु नियुक्तेषु योज्यस्तदुत्तरः
शब्द इति ॥ ६२-६३ ॥
न; सर्वगुणानुपलब्धेः ॥ ६४ ॥
नायं गुणनियोगः साधुः । कस्मात् ? यस्य भूतस्य ये गुणा न ते तदात्म-
केनेन्द्रियेण सर्वे उपलभ्यन्ते । पार्थिवेन हि घ्राणेन स्पर्शपर्यन्ता न गृह्यन्ते, गन्ध
एव एको गृह्यते । एवं शेषेष्वपीति ॥ ६४ ॥
कथं तर्हीमे गुणा विनियोक्तव्या इति ?
एकैकश्येनोत्तरगुणसद्भावादुत्तरोत्तराणां तदनुपलब्धिः ? ॥ ६५ ॥
गन्धादीनामेकैको यथाक्रमं पृथिव्यादीनामेकैकस्य गुणः, अतस्तदनुपलब्धिः ।
तेषां तयोः तस्य चानुपलब्धिः—घ्राणेन रसरूपस्पर्शानाम्, रसनेन रूपस्पर्शयोः,
चक्षुषा स्पर्शस्येति ?
अर्थ समझना चाहिए । 'उत्तर' यह तरप्प्रत्यय से निर्देश क्यों किया ? क्योंकि सूत्रकार में
शब्दों के स्व-तन्त्रानुसार विनियोग (प्रयोग) की सामर्थ्य रहती है । इस तरब्निर्देश से
उत्तर शब्द पर अर्थ को बतलाता है—ऐसा विज्ञात होता है । उद्देशसूत्र में कथित स्पर्श-
पर्यन्तों से पर शब्द ऐसी व्यवस्था है । या उत्तर शब्द में, स्पर्श विवक्षित होने से,
तन्त्र समझना चाहिए—'स्पर्शपर्यन्तों के बारे में निर्धारण कर देने के बाद बाकी बचा
उस स्पर्श से आगे का शब्द'—ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥ ६२-६३ ॥
शंका—
एक भूत में अनेक गुण नहीं हैं; क्योंकि सब गुणों की उपलब्धि नहीं हो पाती ? ॥ ६४॥
आप का यह गुणयोग उचित नहीं है, क्योंकि जिस भूत के ये गुण नहीं हैं, वे सब
तदात्मक इन्द्रिय से उपलब्ध नहीं हो पाते । पार्थिव घ्राणेन्द्रिय से स्पर्शपर्यन्त सभी
विषय गृहीत नहीं हो पाते; अपितु एक गन्ध विषय ही गृहीत हो पाता है । घ्राणपृथ्वी
में सभी गुणों के रहने से सब का उससे ग्रहण होना चाहिये । इसी तरह अवशिष्ट के
बारे में भी समझ लें ? ॥ ६४ ॥
अतः इन गुणों का विनियोग कैसे समझा जाय ?
एकैकक्रम से उत्तरोत्तर ( रसादि के ) गुण होने से उत्तरोत्तर ( अबादि ) के गुणों
( रसादि ) की उपलब्धि नहीं होती ? ॥ ६५ ॥
गन्धादि गुणों में से एक-एक क्रमशः पृथ्वी आदि में पूर्व-पूर्व में उत्तरोत्तर का
सम्बन्ध रहने पर भी गुण यथाक्रम पृथिव्यादि एक एक महाभूत का हैं, अतः उन अति-
रिक्त—तीन, दो, या एक की उपलब्धि नहीं हो पाती । जैसे घ्राण से रस-रूप-स्पर्श की,
रसन से रूप-स्पर्श की, चक्षु से स्पर्श की उपलब्धि नहीं हो पाती ?
२१६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ०
कथं तह्य॑नेकगुणानि भूतानि गृह्यन्त इति ?
संसर्गाच्चानेकगुणग्रहणम् । अबादिंससर्गाच्च पृथिव्यां रसादयो गृह्यन्ते ।
एवं शेषेष्वपीति ? ॥ ६५ ॥
नियमस्तर्हि न प्राप्नोति, संसर्गस्यानियमाच्चतुर्गुणा पृथिवी, त्रिगुणा आपः,
द्विगुणं तेजः, एकगुणो वायुरिति ?
नियमश्चोपपद्यते, कथम् ?
विष्टं ह्यपरं परेण ? ॥ ६६ ॥
पृथिव्यादीनां पूर्वपूर्वमुत्तरेणोत्तरेण विष्टम्, अतः संसर्गनियम इति । तच्चैतद्
भूतसृष्टौ वेदितव्यम्, नैतर्हीति ? ॥ ६६ ॥
न, पार्थिवाप्ययोः प्रत्यक्षत्वात् ॥ ६७ ॥
नेति त्रिसूत्रीं प्रत्याचष्टे । कस्मात् ? पार्थिवस्य द्रव्यस्याप्यस्य च प्रत्यक्षत्वात् ।
'महत्त्वानेकद्रव्यत्वाद्रूपाच्चोपलब्धिः' (वै. सू. ४.१.६) इति तैजसमेव द्रव्यं प्रत्यक्षं
स्यात्, न पार्थिवमाप्यं वा; रूपाभावात् । तैजसवत्तु पार्थिवाप्ययोः प्रत्यक्षत्वात् न
सिद्धान्ती—अनेक गुणवाले भूतों का ग्रहण कैसे होता है ?
पूर्वपक्षी—सम्बन्ध से अनेक गुणों का ग्रहण हो जायेगा। जलादि के सम्बन्ध से
पृथ्वी में रसादि गृहीत हो जाते हैं। इसी तरह अवशिष्ट के बारे में भी समझ लेना
चाहिये ॥ ६५ ॥
सिद्धान्ती—तब-तो एक-एक वाला नियम बन नहीं पायगा जलादि संसर्ग का नियम
न होने से यह कैसे बनेगा कि पृथ्वी में चार गुण ( विषय ) होते हैं, जल में तीन गुण
होते हैं, तेज में दो गुण होते हैं, वायु में एक गुण होता है ?
पूर्वपक्षी—नियम भी उपपन्न हो सकता है। कैसे ?
पृथिव्यादि अबादि से सम्बद्ध है ? ॥ ६६ ॥
पृथिवी-आदि में पहला पहला भूत, अपने उत्तर उत्तर भूत से सम्बद्ध है। अतः
सम्बन्ध से नियम बन सकता है। यह नियम विषयभूतसृष्ट्यादि के प्रतिपादक पुराणादि
ग्रन्थों में स्पष्ट प्रतिपादित है, भले ही आज हम लोगों के ध्यान में न आवें ? ॥ ६६ ॥
इस मत का नैयायिक प्रत्याख्यान करते हैं—
पार्थिव और आप्य द्रव्य के प्रत्यक्ष होने से ( एकगुणवान् नहीं हैं ) ॥ ६७ ॥
'न' इस पद से सूत्रकार पूर्वोक्त त्रिसूत्री से प्रतिपादित विषय का प्रत्याख्यान करते
हैं। कैसे ? पार्थिव और आप्य द्रव्य के प्रत्यक्ष होने से । तब तो महत्त्व से, अनेक द्रव्या-
श्रित होने से, और रूपवान् होने से उसी की उपलब्धि होती है, यों तैजस द्रव्य का तो
प्रत्यक्ष हो जायेगा, परन्तु रूपवान् न होने से पार्थिव और आप्य द्रव्य का प्रत्यक्ष न हो
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