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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

३५. सू० ] अनित्यसमप्रकरणम् ३६३

३५. सू० ] अनित्यसमप्रकरणम् ३६३
सिद्धिः ? साधर्म्यादसिद्धिः प्रतिषेधस्याप्यसिद्धिः, प्रतिषेध्येन साधर्म्यादिति ॥३३॥
दृष्टान्ते च साध्यसाधनभावेन प्रज्ञातस्य धर्मस्य हेतुत्वात् तस्य चोभयथा
भावान्नाविशेषः ॥ ३४ ॥
दृष्टान्ते यः खलु धर्मः साध्यसाधनभावेन प्रज्ञायते, स हेतुत्वेनाभिधीयते।
स चोभयथा भवति—केनचित् समानः, कुतश्चिद्विशिष्टः। सामान्यात्साधर्म्यम्,
विशेषाच्च वैधर्म्यम्। एवं साधर्म्यविशेषो हेतुर्नाविशेषेण साधर्म्यमात्रम्,
वैधर्म्यमात्रं वा। साधर्म्यमात्रं वैधर्म्यमात्रं चाऽऽश्रित्य भवानाह—'साधर्म्यात्
तुल्यधर्मोपपत्तेः सर्वानित्यत्वप्रसङ्गादनित्यसमः' इति, एतदयुक्तमिति।
अविशेषसमप्रतिषेधे (५. १. २४) च यदुक्तं तदपि वेदितव्यम् ॥ ३४ ॥
नित्यसमप्रकरणम् [ ३५-३६ ]
नित्यमनित्यभावादनित्ये नित्यत्वोपपत्तेर्नित्यसमः ॥ ३५ ॥
'अनित्यः शब्दः' इति प्रतिज्ञायते, तदनित्यत्वं किं शब्दे नित्यमथानित्यम् ?
यदि तावत् सर्वदा भवति, धर्मस्य सदा भावाद्धर्मिणोऽपि सदा भाव इति नित्यः
से अनित्यत्वासिद्धि मानोगे तो साधर्म्य से भी प्रतिषेध की असिद्धि होगी, कारण उसमें
प्रतिषेध्यसाधर्म्य भी है।
अथ च—
दृष्टान्त में साध्य साधन भाव से प्रज्ञात धर्म के हेतुत्व से तथा उसके उभयथा रहने
से भी प्रतिषेध नहीं बनता ॥ ३४ ॥
दृष्टान्त में जो धर्म साध्यसाधनभाव से प्रज्ञात होता है, वह 'हेतु' कहलाता है। वह
उभयथा होता है—किसी के साथ वह उनमें सामान्य रूप साधर्म्य से होता है, किसी के
साथ विशिष्ट ( भेदक ), अर्थात् वह दोनों में नहीं रहता है। सामान्य से वह 'साधर्म्य'
तथा विशेष से 'वैधर्म्य' कहलाता है। इस प्रकार, साधर्म्यविशेष से कहा जानेवाला हेतु
सामान्यतया सर्वत्र साधर्म्य या वैधर्म्य नहीं होता । अतः आप का केवल साधर्म्य तथा
वैधर्म्य को लेकर यह कहना कि—"साधर्म्य से समानधर्मोपपादन द्वारा सब कुछ की
अनित्यत्वप्रसक्ति से 'अनित्यसम' होता है"—अयुक्त ही है।
पूर्वोक्त ( ५.१.२४ ) 'अविशेषसम' जाति का प्रतिषेध करते समय हमने जो कुछ
कहा है, उसे यहाँ भी समझ लेना चाहिये ॥ ३४ ॥
'नित्यसम' का लक्षण करते हैं—
अनित्यत्व के नित्य रहने तथा अनित्य में नित्यत्व उपपन्न होने से 'नित्यसम' प्रति-
षेध होता है ॥ ३५ ॥
'शब्द अनित्य है' ऐसी प्रतिज्ञा की जा रही है, यहाँ यह अनित्यत्व शब्द में नित्य
रहता है या अनित्य ? यदि नित्य रहता है तो इस धर्म के सदा अपेक्षित होने से

३६४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ०
शब्द इति। अथ न सर्वदा भवति, अनित्यत्वस्याभावान्नित्यः शब्दः। एवं
नित्यत्वेन प्रत्यवस्थानात्—नित्यसमः ॥ ३५ ॥
अस्योत्तरम्—
प्रतिषेध्ये नित्यमनित्यभावादनित्येऽनित्यत्वोपपत्तेः प्रतिषेधाभावः ॥ ३६ ॥
प्रतिषेध्ये शब्दे नित्यमनित्यत्वस्य भावादित्युच्यमाने, अनुज्ञातं शब्दस्या-
नित्यत्वम्। अनित्येऽनित्यत्वोपपत्तेश्च नानित्यः शब्द इति प्रतिषेधो नोपपद्यते।
अथ नाभ्युपगम्यते नित्यमनित्यत्वस्य भावादिति हेतुर्न भवतीति हेत्वभावात्
प्रतिषेधानुपपत्तिरिति।
उत्पन्नस्य निरोधादभावः—शब्दस्यानित्यत्वम्, तत्र परिप्रश्नानुपपत्तिः।
सोऽयं प्रश्नः—'तदनित्यत्वं किं शब्दे सर्वदा भवति, अथ न?' इत्यनुपपन्नः, कस्मात्?
उत्पन्नस्य यो निरोधादभावः शब्दस्य तदनित्यत्वम्, एवं च सत्यधिकरणाधेय-
विभागो व्याघातान्नास्तीति।
नित्यानित्यत्वविरोधाच्च। नित्यत्वमनित्यत्वं च एकस्य धर्मिणो धर्माविति
विरुध्येते, न सम्भवतः। तत्र यदुक्तम्—नित्यमनित्यत्वस्य भावाद् नित्य एव,
तदवर्तमानार्थमुक्तमिति ॥ ३६ ॥
तद्वान् धर्मी भी नित्य रहेगा तो अनित्य शब्द नित्य हो गया ! यदि सदा नहीं रहता तो
अनित्यत्व के अभाव से पुनः शब्द नित्य हो गया । यों नित्यत्व से प्रतिषेध 'नित्यसम'
कहलाता है ॥ ३५ ॥
इसका उत्तर—
'प्रतिषेध्य में अनित्यभाव सर्वदा रहने से अनित्य में भी अनित्यत्वोपपत्ति बन जाने
से प्रतिषेध नहीं होगा ॥ ३६ ॥
'प्रतिषेध्य शब्द में अनित्यत्व के नित्य रहने से' ऐसा कहने पर शब्द का अनित्यत्व
स्वीकार कर लिया गया, इस प्रकार अनित्य शब्द में अनित्यत्वोपपत्ति से 'शब्द अनित्य
नहीं है' यह प्रतिषेध नहीं बनता। यदि ऐसा नहीं मानते तो अनित्यत्व के नित्य होने से
वह हेतु नहीं बनेगा, यों हेत्वभाव से प्रतिषेध नहीं बनेगा ।
शब्द के अनित्यत्व से तात्पर्य है उत्पन्न के निरोध से अभाव । इस स्थिति में प्रश्न
ही नहीं बनता कि क्या 'शब्द में ,अनित्यत्व सर्वदा रहता है या नहीं ?' क्योंकि
उत्पन्न के निरोध से अभाव रूप शब्द में अनित्यत्व रहेगा कैसे ? वह है नहीं । इस
प्रकार परस्पर विरोध से आधाराधेयविभाग नहीं है ।
नित्यानित्यविरोध से भी । एक धर्मी में नित्यत्व अनित्यत्व—ये दो धर्म विरुद्ध होने
से असम्भव हैं । अतः वह कहना कि 'अनित्यत्व के नित्य रहने से वह नित्य ही है'—
अर्थशून्य है ॥ ३६ ॥