न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
३२. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०३
३२. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०३
माणैकदेशवदिति । अथ एकदेशग्रहणादेकदेशान्तरानुमाने समुदायप्रतिसन्धानात्
तत्र वृक्षबुद्धिः ? न तर्हि वृक्षबुद्धिरनुमानमेवं सति भवितुमर्हतीति । द्रव्यान्तरो-
त्पत्तिपक्षे नावयव्यनुमेयः, अस्यैकदेशसम्बद्धस्याग्रहणात्, ग्रहणे चाविशेषादनु-
मेयत्वाभावः । तस्माद् वृक्षबुद्धिरनुमानं न भवति ।
एकदेशग्रहणमाश्रित्य प्रत्यक्षस्यानुमानत्वमुपपाद्यते । तच्च—
न; प्रत्यक्षेण यावत्तावदप्युपलम्भात् ॥ ३२ ॥
न प्रत्यक्षमनुमानम् । कस्मात् ? प्रत्यक्षेणैवोपलम्भात् । यत् तदेकदेशग्रहण-
माश्रीयते, प्रत्यक्षेणासावुपलम्भः । न चोपलम्भो निर्विषयोऽस्ति । यावच्चार्थ-
जातं तस्य विषयः, तावदभ्यनुज्ञायमानं प्रत्यक्षव्यवस्थापकं भवति ।
किं पुनस्ततोऽन्यदर्थजातम् ? अवयवी, समुदायो वा । न चैकदेशग्रहणम-
नुमानं भावयितुं शक्यम्; हेत्वभावादिति ।
अन्यथापि च प्रत्यक्षस्य नानुमानत्वप्रसङ्गः; तत्पूर्वकत्वात् । प्रत्यक्षपूर्वकम्-
नुमानं सम्बद्धावग्निधूमौ प्रत्यक्षतो दृष्टवतो धूमप्रत्यक्षदर्शनादग्नावनुमानं
भवति । तत्र यच्च सम्बद्धयोर्लिङ्गलिङ्गिनोः प्रत्यक्षम्, यच्च लिङ्गमात्रप्रत्यक्ष-
अगृह्यमाण एकदेश (अवशिष्ट अवयव) भी वृक्ष नहीं है, तब तो 'यह वृक्ष है' इस
बुद्धि का ही अपलाप होने लगेगा ! यदि यह कहो कि एकदेश के ग्रहण से अवशिष्ट एक-
देश का अनुमान करके समूहप्रतिसन्धान से 'यह वृक्ष है'—ऐसी बुद्धि हो सकती है ? हम
कहते हैं कि तत्र भी 'यह वृक्ष है'—ऐसी बुद्धि कैसे बनेगी; क्योंकि तुमने अवयवान्तरों
का ही अनुमान किया है, वृक्ष का तो अनुमान किया नहीं ! द्रव्यान्तरोत्पत्तिपक्ष में भी—
अवयवान्तरसम्बद्ध होकर अवयवी कैसे गृहीत होगा ? यदि होता है तो दृश्यमान अवयव
से सम्बद्ध होकर अवयवी का प्रत्यक्ष हो गया, तब वह अनुमेय नहीं होगा !
एकदेश का ग्रहण होकर वृक्षप्रत्यक्ष का अनुमान में अन्तर्भाव करना उचित—
नहीं; क्योंकि उस अवशिष्ट एकदेश का ग्रहण भी प्रत्यक्ष से ही होता है ॥ ३२ ॥
प्रत्यक्ष अनुमान में अन्तर्भूत नहीं हो सकता; क्योंकि पूर्वपक्षी द्वारा गृहीत उस वृक्ष
के अवशिष्ट एकदेश का भी प्रत्यक्ष होता है । जिसके एकदेश का ग्रहण आधार माना
जाता है वह भी प्रत्यक्षविषय है । ऐसा कोई ज्ञान नहीं, जो विषय-रहित हो; क्योंकि
जितने अग्रभाग के साथ अर्थसमुदाय विषय होंगे वे सब प्रत्यक्ष-व्यवस्थापक हैं—ऐसा
मानने पर प्रत्यक्ष भी सिद्ध हो जाता है ।
दृश्यमान अवयवों से भिन्न इस अवशिष्ट अर्थसमूह को आप क्या मानते हैं ? अव-
यवी, या समुदाय ! तब हेतु के न रहते उस एकदेश का ग्रहण अनुमान से कैसे होगा !
एक दूसरी युक्ति भी प्रत्यक्ष के अनुमानान्तर्भाव की बाधिका है, वह है—तत्पूर्वकत्व ।
अर्थात् अनुमान तो स्वयं प्रत्यक्षपूर्वक होता है, उसमें प्रत्यक्ष का अन्तर्भाव कैसे हो पावेगा !
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१०४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ०
ग्रहणम्, नेतदन्तरेणानुमानस्य प्रवृत्तिरस्ति । नत्वेतदनुमानम्; इन्द्रियार्थसन्निकर्ष-
जत्वात् । न चानुमेयस्येन्द्रियेण सन्निकर्षादनुमानं भवति । सोऽयं प्रत्यक्षानु-
मानयोर्लक्षणभेदो महानाश्रयितव्य इति ॥ ३२ ॥
न चैकदेशोपलब्धिरवयविसद्भावात् १ ॥ ३३ ॥
न चैकदेशोपलब्धिमात्रम् । किं तर्हि ? एकदेशोपलब्धिः, तत्सहचरितावयव्यु-
पलब्धिश्च । कस्मात् ? अवयविसद्भावात् । अस्ति ह्ययमेकदेशव्यतिरिक्तोऽवयवी,
तस्यावयवस्थानस्योपलब्धिकारणप्राप्तस्यैकदेशोपलब्धावनुपलब्धिरनुपपन्नेति ।
अकृत्स्नग्रहणादिति चेद्, न; कारणतोऽन्यस्यैकदेशस्याभावात् । न चावयवाः
पहले कभी धूम-अग्नि को एक साथ प्रत्यक्ष देखने वाले को ही अब धूम के प्रत्यक्षदर्शन
से अग्नि का अनुमान हो पाता है। अन्यथा अनुमान की इस पूरी प्रक्रिया में सम्बद्ध लिङ्ग
( धूम ) तथा लिङ्गी ( वह्नि ) का पहले प्रत्यक्ष, तथा अनुमानकाल में लिङ्गदर्शन के
बिना अनुमान की प्रवृत्ति कैसे होगी ? इसे आप अनुमान तो कह नहीं सकते; क्योंकि यह
इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्य ही है । अनुमेय ( वह्नि ) का यदि इन्द्रियसन्निकर्ष हो जाये तो
वह अनुमान क्यों कर होगा ! यह अनुमान और प्रत्यक्ष का सबसे बड़ा भेद है—इसे
प्रत्येक जिज्ञासु को समझे रखना चाहिये ॥ ३२ ॥
[ नैयायिकों के मत से घटावयवों से भिन्न एक अलग घटादि अवयवी होता है,
परन्तु बौद्धों के मत में यह अवयवी कोई पृथक् प्रमेय नहीं है, अपितु वह परमाणुरूप
अवयवसमूह ही है। बौद्धों के मत में परमाणुरूप कतिपय अवयवों का प्रत्यक्ष होता है,
परन्तु नैयायिकों के मत में अवयवी का भी होता है। अतः बौद्धों का आक्षेप है कि
घटादि अवयवी का प्रत्यक्ष नहीं होगा, इसका समाधान कर रहे हैं—]
एकदेश का ही प्रत्यक्ष नहीं होता, अपितु उसके साथ अवयवी का भी प्रत्यक्ष होता
है; क्योंकि वहाँ अवयवी भी रहता है ॥ ३३ ॥
- एकदेश ( अवयव ) मात्र का ही प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता; अपितु एकदेश के ज्ञान के
साथ तत्सहचरित अवयवी का भी ज्ञान हो जाता है। कैसे ? क्योंकि उस इन्द्रियार्थ-
सन्निकर्ष के समय अवयव के साथ उस अवयवी की भी सत्ता रहती है। यद्यपि यह
अवयवी अपने उस अवयव से पृथक् है, परन्तु जब वह अवयवसंस्थानविशेष के रूप में
में उपलब्धि-कारण हो तब एकदेश की उपलब्धि के समय कारण बन कर प्रत्यक्षज्ञान
करा देगा तो वहीं मौजूद अवयवी का ज्ञान न हो—यह कैसे हो सकेगा !
यदि कहो कि एकदेश का ग्रहण होने से वह नहीं दिखायी देगा ? तो यह भी नहीं कह
सकते; क्योंकि समवायिकारण को छोड़कर दूसरा एकदेश पृथक् नहीं है। पूर्वपक्षी कहता है कि
१. इदं न सूत्रं किन्तु भाष्यमेवेति केचित् । केचित्पुनरवयविसद्भावादित्येव सूत्रमिति
वदन्ति ।
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