न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
३. सू० ] निग्रहस्थानपञ्चकप्रकरणम् ३७१
३. सू० ] निग्रहस्थानपञ्चकप्रकरणम् ३७१
शब्दो घटवत्' इति कृते, अपर आह—'दृष्टमैन्द्रियकत्वं सामान्ये नित्ये, कस्मान्न
तथा शब्दः' इति प्रत्यवस्थिते, इदमाह—'यद्यैन्द्रियकं सामान्यं नित्यं कामं घटो
नित्योस्तु' इति । स खल्वयं साधकस्य दृष्टान्तस्य नित्यत्वं प्रसञ्जयन्निगमनान्तमेव
पक्षं जहाति, पक्षं जहत्प्रतिज्ञां जहातीत्युच्यते; प्रतिज्ञाश्रयत्वात् पक्षस्येति ॥ २ ॥
प्रतिज्ञातार्थ प्रतिषेधेधर्मविकल्पात् तदर्थनिर्देशः प्रतिज्ञान्तरम् ॥ ३ ॥
प्रतिज्ञातार्थः अनित्यः शब्द ऐन्द्रियकत्वात् घटवत्' इत्युक्ते योऽस्य प्रतिषेधः
प्रतिदृष्टान्तेन हेतुव्यभिचारः 'सामान्यमैन्द्रियकं नित्यम्' इति, तस्मिंश्च प्रतिज्ञातार्थ-
प्रतिषेधे धर्मविकल्पादिति दृष्टान्तप्रतिदृष्टान्तयोः साधर्म्ययोगे धर्मभेदात् 'सामान्य-
मैन्द्रियकं सर्वगतम्, ऐन्द्रियकस्त्वसर्वगतो घटः' इति धर्मविकल्पात्तदर्थनिर्देश इति
साध्यसिद्धयर्थम्, कथम् ? यथा घटोऽसर्वगतः, एवं शब्दोऽप्यसर्वंगतो घटवदेवा-
नित्य इति । 'तत्रानित्यः शब्द' इति पूर्वा प्रतिज्ञा, 'असर्वगतः' इति द्वितीया
प्रतिज्ञा प्रतिज्ञान्तरम् । तत्कथं निग्रहस्थानमिति ? न प्रतिज्ञायाः साधनं
प्रतिज्ञान्तरम्, किन्तु हेतुदृष्टान्तौ साधनं प्रतिज्ञायाः, तदेतदसाधनोपादान-
मनर्थकमिति । आनर्थक्यान्निग्रहस्थानमिति ॥ ३ ॥
होने से शब्द अनित्य है, घट की तरह'—ऐसा प्रयोग करने पर प्रतिवादी कहे—'यह
ऐन्द्रियकत्व सामान्य नित्य में भी देखा गया है, तो शब्द भी नित्य क्यों न मान लिया
जाये', इसे सुनकर वादी कहे कि 'यदि ऐन्द्रियकसामान्य नित्य है .तो क्यों न घट भी
नित्य मान लिया जाये !' यों यह वादी प्रतिवाद्युक्त ऐन्द्रियकत्व हेतु से नित्यत्व स्वीकार
कर अपने पक्ष को निगमनान्त तक सिद्ध न कर सका । यों पक्ष को छोड़ता हुआ वह
अपनी प्रतिज्ञा से भी च्युत हो गया; क्योंकि प्रतिज्ञा पक्षाश्रित ही होती है ॥ २ ॥
प्रतिज्ञात अर्थ का निषेध होने पर धर्मविकल्प से उस अर्थ के निर्देश को 'प्रतिज्ञान्तर
निग्रहस्थान कहते हैं ॥ ३ ॥
वादी (वैशेषिक) द्वारा 'शब्द अनित्य है, ऐन्द्रियक होने से, घट की तरह' यह
प्रतिज्ञातार्थ कहने पर, इसका 'सामान्य ऐन्द्रियक नित्य होता है' इस प्रकार प्रतिदृष्टान्त
से प्रतिवादी (मीमांसक ने) प्रतिषेध किया, इस ऐन्द्रियक में अनित्यत्व के प्रतिषेध में प्रति-
वादी द्वारा 'सामान्य ऐन्द्रियक सर्वगत होता है, यह दृष्टान्त और प्रतिदृष्टान्त में साधर्म्य
होते हुए भी धर्मविकल्प है, जैसे सामान्य सर्वगत है । घट असर्वगत इस दशा में असर्व-
गतत्व मान कर 'घट असर्वगत होने से अनित्य है तो शब्द भी असर्वगत है, वह भी घट
की तरह अनित्य है' । इसके पूर्व 'शब्द अनित्य है' यह प्रतिज्ञा थी, अभी 'शब्द असर्वगत
है' यह दूसरी प्रतिज्ञा हुई । इसे ही 'प्रतिज्ञान्तर' कह देते हैं । यह निग्रहस्थान कैसे
हुआ ? प्रतिज्ञा का साधन 'प्रतिज्ञान्तर' नहीं, अपितु हेतु दृष्टान्त होते हैं, वह न देकर
प्रतिज्ञा का साधन करना 'प्रतिज्ञान्तर' है । यों साधन प्रकट न करने से प्रतिज्ञा निरर्थक
हो गयी और वादी पराजित हो गया । अतः यह 'प्रतिज्ञान्तर' निग्रहस्थान है ॥ ३ ॥
३७२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ०
प्रतिज्ञाहेत्वोर्विरोधः प्रतिज्ञाविरोधः ॥ ४ ॥
गुणव्यतिरिक्तं द्रव्यमिति प्रतिज्ञा, रूपांदितोऽर्थान्तरस्यानुपलब्धेरिति
हेतुः, सोऽयं प्रतिज्ञाहेत्वोर्विरोधः । कथम् ! यदि गुणव्यतिरिक्तं द्रव्यम्,
रूपादिभ्योऽर्थान्तरस्यानुपलब्धिर्नोपपद्यते । अथ रूपादिभ्योऽर्थान्तरस्यानुपलब्धिः,
'गुणव्यतिरिक्तं द्रव्यम्' इति नोपपद्यते, गुणव्यतिरिक्तं च द्रव्यं रूपादिभ्यश्चा-
र्थान्तरस्यानुपलब्धिरिति विरुध्यते = व्याहन्यते, न सम्भवतीति ॥ ४ ॥
पक्षप्रतिषेधे प्रतिज्ञातार्थापनयनं प्रतिज्ञासंन्यासः ॥ ५ ॥
'अनित्यः शब्द ऐन्द्रियकत्वात्' इत्युक्ते परो ब्रूयात्—'सामान्यमैन्द्रियकं न
चानित्यमेवं शब्दोऽप्यैन्द्रियको न चानित्यः' इति । एवं प्रतिषिद्धे पक्षे यदि
ब्रूयात्—'कः पुनराह अनित्यः शब्दः' इति ! सोऽयं प्रतिज्ञातार्थनिह्नवः प्रतिज्ञा-
संन्यास इति ॥ ५ ॥
अविशेषोक्ते हेतौ प्रतिषिद्धे विशेषमिच्छतो हेत्वन्तरम् ॥ ६ ॥
निदर्शनम्—'एकप्रकृतीदं व्यक्तम्' इति प्रतिज्ञा, कस्माद्धेतोः ? एकप्रकृतीनां
विकाराणां परिमाणात् । मृत्पूर्वकाणां शरावादीनां दृष्टं परिमाणम् ।
यावान् प्रकृतेर्व्यूहो भवति तावान् विकार इति, दृष्टं च प्रतिविकारं परिमाणम् ।
प्रतिज्ञा तथा हेतु का परस्पर विरोध 'प्रतिज्ञाविरोध' कहलाता है ॥ ४ ॥
'द्रव्य गुणव्यतिरिक्त है'—यह प्रतिज्ञा हुई । 'रूपादि से अर्थान्तर की उपलब्धि
न होने से'—यह हेतु है । यहाँ प्रतिज्ञा-हेतु का विरोध है । कैसे ? यदि द्रव्य गुण-
व्यतिरिक्त है तो रूपादि से अर्थान्तर की अनुपलब्धि उपपन्न नहीं होती । तथा यदि
रूपादि से अर्थान्तर की अनुपलब्धि है तो 'द्रव्य गुणव्यतिरिक्त है'—यह उपपन्न नहीं
होता । द्रव्य गुणव्यतिरिक्त हो तथा रूपादि से अर्थान्तर की अनुपलब्धि भी हो ये दोनों
विषय परस्पर विरुद्ध हैं, यों विरुद्ध होने से ये दोनों बातें (प्रतिज्ञा और हेतु) एक साथ
सम्भव नहीं ॥ ४ ॥
स्वपक्षप्रतिषेध होने पर प्रतिज्ञातार्थ को छिपाना 'प्रतिज्ञा-संन्यास' कहलाता है ॥ ५ ॥
'शब्द अनित्य है, ऐन्द्रियक होने से' ऐसा कहने पर प्रतिवादी कहे—'सामान्य
ऐन्द्रियक है, पर अनित्य नहीं है; इसी तरह शब्द भी ऐन्द्रियक है; वह भी अनित्य नहीं' ।
यों प्रतिषिद्ध होने पर वादी यदि यह कहें—'हमने कब कहा कि शब्द अनित्य है !' यह
प्रतिज्ञातार्थनिह्नव (उसको छिपाना या उससे हट जाना) 'प्रतिज्ञासंन्यास' कहलाता हैं ॥५॥
सामान्य रूप से उक्त हेतु के प्रतिषिद्ध होने पर उसमें कुछ 'विशेष' लगाकर सिद्धि
चाहने वाले का 'हेत्वन्तर' निग्रहस्थान होता है ॥ ६ ॥
उदाहरण—वादी ( साङ्ख्यमतानुयायी ) की प्रतिज्ञा है—'व्यक्त एकप्रकृति है',
किस हेतु से ? 'एकप्रकृतिक विकारों के परिमाण होने से' । मृत्तिका से बने शरावादि
में परिमाण देखा जाता है, जितने प्रकार की प्रकृति का संस्थान होता है उन सभी का
विकार देखा जाता है। प्रत्येक विकार में परिमाण भी देखा जाता है । यह परिमाण