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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

६०. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३०९

६०. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३०९
कल्पन्ते । विहितं च जायमानम्, विधीयते च जायमानम् । तेन यः सम्बद्ध्यते
सोऽयं जायमान इति ।
प्रत्यक्षविधानाभावादिति चेद् ? न; प्रतिषेधस्यापि प्रत्यक्षविधानाभावादिति ।
प्रत्यक्षतो विधीयते गार्हस्थ्यं ब्राह्मणेन, यदि चाश्रमान्तरमभविष्यत् तदपि
व्यधास्यत् प्रत्यक्षतः, प्रत्यक्षविधानाभावान्नास्त्याश्रमान्तरमिति ? न; प्रतिषेध-
स्यापि प्रत्यक्षतो विधानाभावात् । न प्रतिषेधोऽपि वै ब्राह्मणेन प्रत्यक्षतो
विधीयते, 'न सन्त्याश्रमान्तराणि एक एव गृहस्थाश्रमः' इति प्रतिषेधस्य प्रत्यक्ष-
तोऽश्रवणादयुक्तमेतदिति ।
अधिकाराच्च विधानं विद्यान्तरवत् । यथा शास्त्रान्तराणि स्वे स्वेऽधिकारे
प्रत्यक्षतो विधायकानि, नार्थान्तराभावात्; एवमिदं ब्राह्मणं गृहस्थशास्त्रं स्वेऽधिकारे
प्रत्यक्षतो विधायकम्, नाश्रमन्तराणामभावादिति ।
ऋग्ब्राह्मणं चापवर्गाभिधाय्यभिधीयते । ऋचश्च ब्राह्मणानि चापवर्गा-
भिवादीनि भवन्ति ।
ऋचश्च तावत्—
'कर्मभिर्मृत्युमृषयो निषेदुः प्रजावन्तो द्रविण॒च्छमानाः ।
अथापरे ऋषयो मनीषिणः परं कर्मभ्योऽमृतत्वमानशुः ॥
फलसाधन हैं न कि फल; वे सम्पन्न होते हुए फल को कल्पित करते हैं। यहाँ 'जायमान'
विहित है; इससे जो यहाँ सम्बद्ध होता है वही (गृहस्थ) जायमान है ।
इस ब्राह्मण में जरा का संकेत है, प्रव्रज्या का प्रत्यक्षविधान तो है नहीं ? ऐसा न
कहें; क्योंकि उस प्रव्रज्यानिषेध का भी तो प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है । पूर्वपक्षी शंका करता
है कि उक्त ब्राह्मण में गार्हस्थ्यविधान तो प्रत्यक्ष है, यदि आश्रमान्तर उसके लिये विहित
होता तो उसका भी प्रत्यक्ष विधान होता, अतः ज्ञात होता है गार्हस्थ्यातिरिक्त आश्र-
मान्तर नहीं है ? सिद्धान्ती उत्तर देता है—उक्त ब्राह्मण में प्रव्रज्याप्रतिषेध का भी तो
प्रत्यक्षविधान नहीं है, अतः यह हम कैसे मान लें कि आश्रमान्तर होता ही नहीं ! एक
बात और, इस ब्राह्मणवाक्य की बात छोड़ भी दें, तो भी अन्यत्र हमें यह नहीं मिलता
कि एक गृहस्थाश्रम ही है, अन्य आश्रम नहीं हैं । अतः आपका कहना अयुक्त ही है ।
बल्कि यह समझिये कि यह ब्राह्मणवाक्य अपने अधिकार का विधान करता है । जैसे
विद्यान्तर का विधान अन्य शास्त्र में नहीं प्राप्त होता । क्योंकि वे शास्त्र अपने-अपने
अधिकार में प्रत्यक्ष विधायक हैं, अर्थान्तर न होने से; उसी तरह यह ब्राह्मण भी गृहस्थ-
शास्त्र का प्रत्यक्ष विधायक है आश्रमान्तर का यहाँ विधान न होने से ।
उधर ऋग्वेद का ब्राह्मण भी अपवर्ग का बोधक है । कुछ ऋचाएँ तथा उनके
ब्राह्मण अपवर्ग के बोधक हैं । पहले ऋचाओं को लें । जैसे वाजसनेयिसंहिता (३१.१८)
में कहा है—कुछ ऋषि पुत्रपौत्रादि युक्त धन को चाहते हुए कर्मों से बन्ध कर मृत्यु को

३१० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ०
न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः ।
परेण नाकं निहितं गुहायां विभ्राजते यद् यतयो विशन्ति' ॥
'वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।
तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय' ॥
अथ ब्राह्मणानि—
'त्रयो धर्मस्कन्धाः—यज्ञोऽध्ययनं दानमिति, प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचा-
र्याचार्यकुलवासीति तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन् । सर्वे एवैते
पुण्यलोका भवन्ति । ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' ।
'एतमेव प्रव्राजिनो लोकमभीप्सन्तः प्रव्रजन्ति' इति ।
'अथो खल्वाहुः—काममय एवायं पुरुष इति स यथाकामो भवति तथाक्रतु-
र्भवति, यथाक्रतुर्भवति तथा तत्कर्म कुरुते, यत्कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते' ।
इति कर्मभिः संसरणमुक्त्वा प्रकृतमन्यदुपदिगन्ति—
'इति नु कामयमानोऽथाकामयमानो योऽकामो निष्काम आत्मकाम आप्त-
प्राप्त हुए; तथा दूसरे बुद्धिमान् धर्मज्ञ ऋषि उन कर्मों से दूर रहकर अमृतत्व ( अपवर्ग )
पा गये ।
उन्हें न कर्म से, न पुत्रपौत्रादिक से, न धन से यह अमृतत्व मिल पाया अपितु
केवल त्याग से मिल पाया । यह अमृतत्व अविद्या से दूर गुह्यतम होते हुये भी देदी-
प्यमान तेजःपुंज है, जिसे जितेन्द्रिय पुरुष ही पा सकते हैं ।
तैत्तिरीयारण्यक (३. १२. ७) में लिखा है—'मैं इस आदित्यवर्ण ( तेजोमय ) तम
(अविद्या) से दूर महान् पुरुष (आत्मा) को जानता हूँ । इसी को जानकर मनुष्य मृत्यु
(जन्म-मरण) को पार कर सकता है । मोक्ष का अन्य कोई मार्ग नहीं है।'
अब ब्राह्मण के कुछ उदाहरण सुनिये—
छान्दोग्योपनिषद् (२. २३. १) का ब्राह्मणवाक्य है—'ये तीन धर्मस्कन्ध हैं । यज्ञ,
अध्ययन तथा दान यह प्रथमस्कन्ध (गृहस्थ), तथा तप द्वितीयस्कन्ध (वानप्रस्थ) है ।
तीसरा है—आचार्य कुल में रहकर ब्रह्मचर्यव्रतपूर्वक आचार्य की आज्ञा में अपना समय
बिताना (ब्रह्मचर्य) । ये सभी पुण्यफलप्रद हैं । परन्तु ब्रह्मज्ञानी (संन्यासी) अमृतत्व
(मोक्ष) को प्राप्त कर लेता है, अतः वह श्रेष्ठ हैं'।
बृहदारण्यक के ब्राह्मण (४. ४. २२) में लिखा है—'इसी संन्यासियों के लोक को
चाहते हुए बुद्धिमान् लोग प्रव्रज्या लेते हैं।'
दूसरे स्थान (४. ४. ५) पर यही कहता है—'ज्ञानी लोग कहते हैं यह प्राणी
वासनामय है, जैसी वासना करेगा वैसे इसके संकल्प होंगे, संकल्पों के अनुसार यह कर्म
करेगा; जैसा कर्म करेगा वैसा फल मिलेगा।'
इस तरह संसार को कर्ममय बताकर प्रसङ्गोपात्त दूसरी बात का भी उपदेश देते
हैं—'यह तो हुई वासना की बात; परन्तु जिसको वासना नहीं है वह अकाम पुरुष
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