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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

५३. सू० ] शब्दसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् १२३

५३. सू० ] शब्दसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् १२३
आप्तोपदेशसामर्थ्याच्छब्दार्थसम्प्रत्ययः ॥ ५३ ॥
स्वर्गः, अप्सरसः, उत्तरा कुरवः, सप्तद्वीपसमुद्रो १ लोकसन्निवेश इत्येव-
मादेरप्रत्यक्षस्यार्थस्य न शब्दमात्रात् प्रत्ययः, किं तर्हि ? ‘आप्तैरयमुक्तः शब्दः’
इत्यतः सम्प्रत्ययः; विपर्यये सम्प्रत्ययाभावाद् । न त्वेवमनुमानमिति ।
२. यत्पुनरुपलब्धेरद्विप्रवृत्तत्वादिति ? अयमेव शब्दानुमानयोरुपलब्धेः
प्रवृत्तिभेदः—तत्र विशेषे सत्यहेतुविशेषाभावादिति ।
३. यत्पुनरिदं सम्बन्धाच्चेति ? अस्ति च शब्दार्थयोः सम्बन्धोऽनुज्ञातः,
अस्ति च प्रतिषिद्धः । ‘अस्येदम्’ इति षष्ठीविशिष्टस्य वाक्यस्यार्थविशेषोऽनु-
ज्ञातः, प्राप्तिलक्षणस्तु शब्दार्थयोः सम्बन्धः प्रतिषिद्धः । कस्मात् ? प्रमाणतोऽनुप-
लब्धेः २ । प्रत्यक्षतस्तावच्छब्दार्थप्राप्तेर्नोपलब्धिः, अतीन्द्रियत्वात् । येनेन्द्रियेण
गृह्यते शब्दः, तस्य विषयभावमतिवृत्तोऽर्थो न गृह्यते । अस्ति चातीन्द्रियविषय-
आप्तोपदेश-सामर्थ्य से शब्द द्वारा ही अर्थज्ञान हो जाता है ॥ ५३ ॥
स्वर्ग, अप्सराएँ, उत्तर कुरुदेश, सात समुद्रवाला भूमण्डल इत्यादि अप्रत्यक्ष अर्थ
का केवल शब्द से ज्ञान नहीं होता, 'आप्तपुरुषों ने यह शब्द इस अर्थ में कहा है' इस
लिये उस शब्द से ज्ञान नहीं होता, अपितु 'आप्त पुरुषों ने यह शब्द इस अर्थ में कहा
है' इसलिये उस शब्द से उस अर्थ का ज्ञान हो पाता है । यदि किसी शब्द के लिये वैसा
आप्तोपदेष्टृत्व नहीं मिलता तो उस शब्द से शब्दरहित ज्ञान भी नहीं होता । इस
तरह शब्दज्ञान का अनुमान प्रमाण में अन्तर्भाव नहीं होता ।
२. पूर्वपक्षी ने जो यह कहा—'उपलब्धि भिन्न प्रकार की नहीं है' ? यह भी
उचित नहीं; क्योंकि शब्द की उक्त प्रवृत्ति अनुमान से भिन्न सिद्ध हो गयी । अतः
अनुमान से शब्द में विशेषता आ गयी—तब 'विशेषाभाव' हेतु देना अयुक्त है ।
३. पूर्वपक्षी ने जो यह कहा था कि 'शब्द एवं अर्थ का सम्बन्ध ज्ञात होना आवश्यक
है, अतः सम्बन्ध होने से शब्द पृथक् प्रमाण नहीं है' ? यह भी उचित नहीं; क्योंकि
शब्द-अर्थ का सम्बन्ध स्वीकृत भी है, प्रतिषिद्ध भी है । जैसे—'इसका यह है' इस षष्ठी-
विशिष्ट वाक्य को षष्ठी का अर्थविशेष सम्बन्ध स्वीकृत है, संयोग-समवायान्यतरस्वरूप
शब्दार्थ का सम्बन्ध प्रतिषिद्ध है; ऐसा क्यों ? क्योंकि प्रमाण से उस अर्थविशेष की उपलब्धि
नहीं होती । यतः प्रत्यक्ष प्रमाण से शब्दार्थ-सम्बन्ध की उपलब्धि नहीं हो सकती; क्यों
कि वह अतीन्द्रिय है । जिस इन्द्रिय से शब्द गृहीत होता है उस इन्द्रिय के विषयत्व को
अर्थ अतिक्रान्त कर जाता है । अर्थ अतीन्द्रिय विषय है, कि शब्द उसका विषय नहीं बन
१. 'सप्त द्वीपाः, समुद्रो'—इति पाठ० ।
२. क्वचित् सूत्रत्वेन परिगणितमेतद् भाष्यम् । न्यायसूचीनिबन्धे तु नास्ति, वृत्ति-
कृतापि च न व्याख्यातम्, नातः सूत्रम् ।

सूत्रोक्त 'च' का अर्थ कण्ठादि स्थान तथा प्रयत्नादि न होना है। यह अनुमान से भी

१२४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ०
भूतोऽप्यर्थः, समानेन चेन्द्रियेण गृह्यमाणयोः प्राप्तिर्गृह्यत इति ॥ ५३ ॥
प्राप्तिलक्षणे च गृह्यमाणे सम्बन्धे शब्दार्थयोः शब्दान्तिके वार्थः स्यात्,
अर्थान्तिके वा शब्दः स्याद्, उभयं वोभयत्र। अथ खल्वयम्—
पूरणप्रदाहपाटनानुपलब्धेश्च सम्बन्धाभावः ॥ ५४ ॥
स्थानकरणाभावादिति चार्थः। न चायमनुमानतोऽप्युपलभ्यते-शब्दान्ति-
केऽर्थ इति। एतस्मिन् पक्षेऽप्यास्यस्थानकरणोच्चारणीयः शब्दस्तदन्तिकेऽर्थ
इति—अन्नाग्न्यसिशब्दोच्चारणे पूरणप्रदाहपाटनानि गृह्येरन्, न च गृह्यन्ते।
अग्रहणाच्चानुमेयः प्राप्तिलक्षणः सम्बन्धः। अर्थान्तिके शब्द इति स्थानकरणा-
सम्भवाद् अनुच्चारणम्। स्थानम् = कण्ठादयः; करणम् = प्रयत्नविशेषः,
तस्यार्थान्तिकेऽनुपपत्तिरिति। उभयप्रतिषेधाच्च नोभयम्। तस्मान्न शब्देनार्थः
प्राप्त इति ॥ ५४ ॥
शब्दार्थव्यवस्थानादप्रतिषेधः ? ॥ ५५ ॥
सकता। व्यवहार यह देखा जाता है कि दोनों के समान इन्द्रिय से गृहीत होने पर ही
उनका सम्बन्ध गृहीत होता है ॥ ५३ ॥
शब्दार्थ के संयोग-समवायान्तरस्वरूप सम्बन्ध को गृहीत करते समय या तो अर्थ
शब्दाधिकरण हो, या फिर शब्द अर्थाधिकरण हो या दोनों के अधिकरण हो। तब
यह—
सम्बन्ध नहीं बनता; पूरण, प्रवाह, पाटन की उपलब्धि न होने से ॥ ५४ ॥
सूत्रोक्त 'च' का अर्थ कण्ठादि स्थान तथा प्रयत्नादि न होना है। यह अनुमान से भी
सिद्ध नहीं होता कि अर्थ शब्दाधिकरण है। इस पक्ष में कण्ठादि स्थान तथा वायुक्रियादि
प्रयत्नविशेष से उच्चारणीय शब्द को अर्थ का अधिकरण माना जाये तो 'अन्न', 'अग्नि'
तथा 'असि' शब्दों के उच्चारण करने परं क्रमशः उनके अर्थ 'पूरण' (पेट भरना),
'दाह' (जलना) या 'पाटन' (फाड़ना)—इनका मुख में ग्रहण होना चाहिये; परन्तु
ग्रहण नहीं होता, अतः सिद्ध होता है कि शब्द-अर्थ का वैसा सम्बन्ध नहीं बनता।
'शब्द अर्थाधिकरण हैं'—ऐसा मानें तो अर्थ के स्थान तथा करण न होने से उच्चा-
रण ही असम्भव है। 'स्थान' का अर्थ है कण्ठादि तथा 'करण' का वाय्वादि क्रियारूप
प्रयत्नविशेष। इन दोनों की अर्थाधिकरणपक्ष में उपपत्ति नहीं बनती। इस प्रकार अर्था-
धिकरणता तथा शब्दाधिकरणता—दोनों का ही प्रतिषेध हो जाने पर दोनों नहीं बनते,
अतः दोनों में ही संयोगसम्बन्ध सिद्ध नहीं हुआ ॥ ५४ ॥
लोक में शब्द तथा अर्थ की व्यवस्था देखने से प्रतिषेध नहीं बनेगा ? ॥ ५५ ॥
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