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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

३७ सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०९

३७ सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०९
इदमेव च परीक्ष्यते—किमेकप्रत्ययोऽणुसञ्चयविषयः, आहोस्वन्नेति ?
अणुसञ्चय एव सेनावनाङ्गानि । न च परीक्ष्यमाणमुदाहरणमिति युक्तम्;
साध्यत्वादिति ।
दृष्टमिति चेत् ? न; तद्विषयस्य परीक्षोपपत्तेः । यदपि मन्यते—दृष्टमिदं
सेनावनाङ्गानां पृथक्त्वस्याग्रहणादभेदेनैकमिति ग्रहणम्, न च दृष्टं शक्यं प्रत्या-
ख्यातुमिति ? तच्च नैवम्; तद्विषयस्य परीक्षोपपत्तेः । दर्शनविषय एवायं परी-
क्ष्यते । योऽयमेकमिति प्रत्ययो दृश्यते, स परीक्ष्यते—किं द्रव्यान्तरविषयो वा,
अथाणुसञ्चयविषय इति ? अत्र दर्शनमन्यतरस्य साधकं न भवति । नानाभावे
चाणूनां पृथक्त्वस्याग्रहणादभेदेनैकमिति ग्रहणम् अतस्मिंस्तदिति प्रत्ययः, यथा
स्थाणौ पुरुष इति । ततः किम् ? अतस्मिंस्तदिति प्रत्ययस्य प्रधानापेक्षित्वात्
प्रधानसिद्धिः ।
स्थाणौ पुरुष इति प्रत्ययस्य किं प्रधानम्¹ ? योऽसौ पुरुषे पुरुषप्रत्ययस्त-
इस प्रसङ्ग में यही परीक्ष्य है कि क्या अणुसमूह 'एक' इस बुद्धि का विषय बनता
है ? या नहीं ? सेनाङ्ग या वनाङ्ग वाले उदाहरण भी अणुसमूह की तरह ही समझें ।
अणुसमूह के समान वे भी यहाँ, साध्य होने से परीक्षा के विषय हैं, उन्हें, उदाहरणरूप
में प्रयुक्त नहीं किया जा सकता ।
उनका वैसा ( अभेदेन ) प्रत्यक्ष होता है—यह नहीं कह सकते; क्योंकि वह प्रत्यक्ष
परीक्षा ( संशय ) का विषय बन सकता है । यह जो मानते हो—"सेनाङ्ग या वनाङ्गों
का पार्थक्य गृहीत न होने से 'अभेदेन एक हैं' ऐसा प्रत्यक्ष होता है, एक बार कृतप्रत्यक्ष
का प्रत्याख्यान हो नहीं सकता" ? यह बात भी उचित नहीं है; क्योंकि उसी प्रश्न पर
तो वहाँ विचार हो रहा है कि दर्शनविषय कौन बन सकता है । 'एक—इस बुद्धि का
विषय कौन बने—क्या उस बुद्धि का विषय द्रव्यान्तर है या वही अणुसमूह ?' इस
परीक्षा के अवसर पर किसी एक ( सेना इत्यादि ) का उदाहरण प्रत्यक्षसाधक रूप से
प्रयुक्त नहीं किया जा सकता । अणुओं के नाना होने पर भी पृथक्त्व के गृहीत न होने
से 'अभेदेन एक' यह ज्ञान तो वैसा ही है जैसा तदभाववान् में सत्ता का आरोपित ज्ञान,
जैसे स्थाणु में पुरुषत्व का आरोप । इससे क्या नुकसान ( अनिष्ट ) होगा ? 'अतत् में
तत् का सत्ताज्ञान' के प्रधानापेक्षी होने से प्रधान ( अणुसमूह में अभेदेन एकत्व ) की
सिद्धि होने लगेगी ।
'स्थाणु में पुरुष'—इस ज्ञान में प्रधान कौन है ? यह जो 'पुरुष' में पुरुषबुद्धि है
उसके रहते पुरुषसामान्य का ग्रहण हो कर 'यह पुरुष है' यह ज्ञान स्थाणु में भी होता
१. येन प्रत्ययेन विपरीतारोपः सम्पाद्यते सादृश्यवशात् तत्प्रधानम्, यथा—स्थाणौ
पुरुषप्रत्ययस्य पुरुषे पुरुषप्रत्ययः ।
CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

११० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ०
स्मिन् सति पुरुषसामान्यग्रहणात् स्थाणौ पुरुषोऽयमिति । एवं नानाभूतेष्वेक-
मिति सामान्यग्रहणात् प्रधाने सति भवितुमर्हति । प्रधानं च सर्वस्याग्रहणादिति
नोपपद्यते । तस्मादभिन्न एवायमभेदप्रत्यय एकमिति ।
इन्द्रियान्तरविषयेष्वभेदप्रत्ययः प्रधानमिति चेद्, न; विशेषहेत्वभावात्
दृष्टान्ताव्यवस्था । श्रोत्रादिविषयेषु शब्दादिष्वभिन्नेष्वेकप्रत्ययः प्रधानमने-
कस्मिन्नेकप्रत्ययस्येति । एवं च सति दृष्टान्तोपादानं न व्यवतिष्ठते; विशेषहेत्व-
भावात् । अणुषु सञ्चितेष्वेकप्रत्ययः किमतस्मिंस्तदिति प्रत्ययः स्थाणौ पुरुष-
प्रत्ययवत् ? अथाथंस्य तथाभावात्तस्मिंस्तदिति प्रत्ययः, यथा—शब्दस्यैकत्वादेकः
शब्द इति ? विशेषहेतुपरिग्रहणमन्तरेण दृष्टान्तौ संशयमापादयत इति । कुम्भ-
वत् सञ्चयमात्रं गन्धादयोऽपीत्यनुदाहरणं गन्धादय इति ।
एवं परिमाणसंयोगस्पन्दजातिविशेषप्रत्ययानप्यनुयोक्तव्यः, तेषु चैवं प्रसङ्ग
इति ।
१. एकत्वबुद्धिस्तस्मिंस्तदिति इति विशेषहेतुर्महदिति प्रत्ययेन सामाना-
हें । इसी प्रकार 'अनेकों में एक'—इस.सामान्यग्रहण से कोई प्रधान हो तो अनेक में एकत्व
गृहीत हो सकता है, पर अणुओं के नाना होने से सब का ग्रहण न हो पाने के कारण
उनमें प्रधानत्व उपपन्न नहीं हो पा रहा है। अतः अभिन्न में अभेद का प्रत्यय ही, 'एक'
ऐसी बुद्धि हैं !
यदि यह कहो कि श्रवणादि इन्द्रियान्तर के विषयों (शब्दादि) में अभेदज्ञान को ही
यहाँ प्रधान मान लिया जाये ? तो यह भी नहीं कह सकते; क्योंकि विशेष हेतु न होने
से इस दृष्टान्त की अव्यवस्था बनेगी । तात्पर्य यह है कि श्रोत्रादि के प्रत्यक्षविषया'शब्दादि
अभिन्न में एक प्रत्यय का यहाँ (चाक्षुषपरीक्षाप्रसङ्ग में) प्राधान्येन उपन्यास करना—
युक्तियुक्त नहीं है; क्योंकि आपका यह दृष्टान्त विशेष हेतु न होने से स्वयं अव्यवस्थित
है । इकट्ठे अणुओं में एकबुद्धि क्या 'अतत् में तत्ता' ज्ञान है, जैसे—स्थाणु में पुरुष का
ज्ञान ? या अर्थ ही वैसा होने से स्वसत्ताज्ञान, जैसे एक शब्द होने से उसमें एकत्वबुद्धि ?
यों दोनों ही तरह से, विशेष हेतु न मिलने के कारण आपके दृष्टान्त संशयग्रस्त हैं ।
जैसे—'घट की तरह गन्धादि भी अणुसञ्चय मात्र हैं' इसमें गन्धादि उदाहरण
संशायापन्न है; क्योंकि उनकी सञ्चयता भी घटादि की तरह साध्य है ।
इस प्रसङ्ग में इस अणुसमूहवादी से—एकवृद्धि की तरह परिमाण, संयोग, चेष्टा,
जाति-विशेष, आदि के ज्ञान को लेकर भी प्रश्न करना चाहिये ।
१. तत् में एकत्वप्रत्यय विशेष हेतु है तो इस साध्य में 'महत्' ज्ञान से सामानाधि-
करण्य होने के कारण 'यह एक हैं' तथा 'महान् हैं'—ये दोनों ज्ञान एक ही विषय तथा