सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 410 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 134

११६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १ . आ०
कालः; नेदानीं तृतीयोऽध्वा विद्यते यत्र पततीति वर्त्तमानः कालो गृह्येत !
तस्माद् वर्त्तमानः कालो न विद्यत इति ? ॥ ४० ॥
तयोरप्यभावो वर्त्तमानाभावे; तदपेक्षत्वात् ॥ ४१ ॥
नाध्वव्यङ्ग्यः कालः; किं तर्हि ? क्रियाव्यङ्ग्यः—'पतति' इति । यदा पतन-
क्रिया व्युपरता भवति स कालः पतितकालः, यदोत्पत्स्यते स पतितव्यकालः,
यदा द्रव्ये वर्त्तमाना क्रिया गृह्यते स वर्त्तमानः कालः । यदि चायं द्रव्ये वर्त्तमानं
पतनं न गृह्णाति कस्योपरममुत्पत्स्यमानतां वा प्रतिपद्यते ! पतितः काल इति
भूता क्रिया, पतितव्यः काल इति चोत्पत्स्यमाना क्रिया । उभयोः कालयोः
क्रियाहीनं द्रव्यम्, अधः पततीति क्रियासम्बद्धम् । सोऽयं क्रियाद्रव्ययोः सम्बन्धं
गृह्णातीति वर्त्तमानः कालः, तदाश्रयौ चेतरौ कालौ तदभावे न स्याता-
मिति ॥ ४१ ॥
अथापि—
नातीतानागतयोरितरेतरापेक्षासिद्धिः ॥ ४२ ॥
काल' कहलायेगा; अब ऐसा तीसरा कौन मार्ग रह गया जिसे हम 'गिरता है'—
ऐसा कहते हुये वर्तमान काल कह सकें ! अतः वर्तमान काल ही नहीं है—ऐसा हम
मान लें ? ॥ ४० ॥
उत्तर देते हैं—
वर्तमानकाल न मानोगे तो वर्तमानापेक्षित भूत, भविष्यत् काल की भी अनुपपत्ति
होने लगेगी ॥ ४१ ॥
समय मार्ग से नहीं, अपितु 'पड़ता है'—इस क्रिया से व्यक्त होता है । 'पड़ता है'
से आरंभ होकर जब पतन-क्रिया समाप्त हो जाती है वह काल 'पतितकाल', तथा जब
पतन-क्रिया उत्पन्न होगी वह काल 'पतितव्य काल' कहलाता है, और जब फल आदि
द्रव्य में वर्तमान पतन-क्रिया गृहीत होती है, वह 'वर्तमानकाल' कहलाता है । यदि यह
पूर्वपक्षी वर्तमान पतनक्रिया को नहीं जानता है तो वह समाप्ति (भूतकाल) तथा
प्रागभाव (भविष्यत्काल) किसके सम्बन्ध में प्रतिपादन करेगा ? पतितकाल भूत-क्रिया
का तथा पतितव्यकाल भविष्यत्क्रिया का बोधक है । इन दोनों ही कालों में द्रव्य
क्रियाहीन रहता है । 'नीचे गिरता है'—यह वर्तमानकाल अवश्य वर्तमान क्रिया से
सम्बद्ध है । यह वर्तमानकाल द्रव्य-क्रिया का सम्बन्ध ग्रहण करता है, बाकी दोनों काल
इसी पर आश्रित हैं, यदि यह न होगा तो वे कहाँ से होंगे ! ॥ ४१ ॥
भूत भविष्यत् को परस्परनिरूपणाधीन मान लें, उनके लिये एक पृथक् वर्तमानकाल
मानने की क्या आवश्यकता है ? इसपर सूत्रकार कहते हैं—
अतीत (भूत) अनागत (भविष्यत्) की इतरेतरापेक्षया सिद्धि नहीं हो सकती ॥ ४२ ॥