न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
३४. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २४३
३४. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २४३
स्यानेकस्य युगपत् स्मरणं प्रसज्यते; प्रदेशसंयोगपर्यायाभावादिति । आत्मप्रदे-
शानामद्रव्यान्तरत्वादेकार्थसमवायस्याविशेषे स्मृतियौगपद्यप्रतिषेधानुपपत्तिः ।
शब्दसन्ताने तु श्रोत्राधिष्ठानप्रत्यासत्त्या शब्दश्रवणवत् संस्कारप्रत्यासत्त्या
मनसः स्मृत्युत्पत्तेर्न युगपदुत्पत्तिप्रसङ्गः । पूर्वं एव तु प्रतिषेधो नानेकज्ञानसम-
वायादेकप्रदेशे युगपत् स्मृतिप्रसङ्ग इति ॥ ३३ ॥
यत् 'पुरुषधर्मो ज्ञानमन्तःकरणस्येच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखानि धर्माः' इति
कस्यचिद्दर्शनम्, तत् प्रतिषिध्यते—
ज्ञस्येच्छाद्वेषनिमित्तत्वादारम्भनिवृत्त्योः ॥ ३४ ॥
अयं खलु जानाति तावद्—इदं मे सुखसाधनमिदं मे दुःखसाधनमिति, ज्ञात्वा
स्वस्य सुखसाधनमाप्तुमिच्छति, दुःखसाधनं हातुमिच्छति। प्राप्तीच्छाप्रयुक्तंस्या-
स्य सुखसाधनावाप्तये समीहाविशेष आरम्भः, जिहासाप्रयुक्तस्य दुःखसाधन-
परिवर्जनं निवृत्तिः, एवं ज्ञानेच्छाप्रयत्नद्वेषसुखदुःखानामेकेनाभिसम्बन्धः । एक-
कर्तृत्वं ज्ञानेच्छाप्रवृत्तीनां समानाश्रयत्वं च । तस्माद् ज्ञस्येच्छाद्वेषप्रयत्न-
मन संयुक्त होता है तब ज्ञातपूर्व अनेक अर्थ का युगपत् स्मरण प्रसक्त हो सकता है;
प्रदेशसंयोग में अनेकोत्पत्ति का सामर्थ्य होने से । आत्मप्रदेश द्रव्यानंतर तो हैं नहीं, अतः
एकार्थक समवाय का सम्बन्धसमानतया स्मृतियौगपद्यप्रतिषेध अनुपपन्न ही है ।
शब्दसन्तान में तो शब्द श्रोत्रेन्द्रिय से साक्षात् सम्बद्ध है, वही सुनायी देता है, न
कि शब्दसन्तानगत समग्र शब्द; इसी तरह सहकारिकारणसंस्कारप्रत्यासत्ति से मन में
स्मृति उत्पन्न होती है, अतः उसमें यौगपद्यप्रसङ्ग न होगा । एकदेशिमत का भी वही
प्रतिषेध समझना चाहिये, जो हम पीछे ( ३. २. २६ में) कह आये हैं कि अनेकज्ञान-
समवाय होने से एक प्रदेश में युगपत्स्मृतिप्रसङ्ग न होगा ॥ ३३ ॥
'ज्ञान पुरुषधर्म है; इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख अन्तःकरण के धर्म हैं'—ऐसा
कुछ ( साङ्ख्यमतानुयायी ) विद्वान् मानते हैं, सूत्रकार इस का खण्डन करते हैं—
इच्छा, द्वेषादि भी ज्ञाता के ही गुण हैं; क्योंकि अर्थ में प्रवृत्ति-निवृत्ति उस ज्ञाता
के ही इच्छाद्वेष के कारण होती हैं ॥ ३४ ॥
यह ज्ञाता जानता है , कि 'यह मेरे लिये सुखसाधन है, यह दुःखसाधन हैं', ऐसा
जानकर वह सुखसाधन को पाना चाहता है, तथा दुःखसाधन को छोड़ देना चाहता हैं।
पाने की इच्छा से युक्त इस सुखसाधन की प्राप्ति के लिये समीहाविशेष को 'आरम्भ'
कहते हैं । और जिहासाप्रयुक्त दुःखसाधन का परिवर्जन 'निवृत्ति' कहलाता है । इस
प्रकार ज्ञान, इच्छा, प्रयत्न, द्वेष एवं सुख-दुःखों का एक ( ज्ञाता ) से ही अभिसम्बन्ध
बनता है । ज्ञानेच्छादिकों का एककर्तृत्व तथा सामानाधिकरण्य है, अतः ज्ञाता
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२४४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ०
सुखदुःखानि धर्माः, नाचेतनस्येति । आरम्भनिवृत्त्योश्च प्रत्यगात्मनि दृष्टत्वात्
परत्रानुमानं वेदितव्यमिति ॥ ३४ ॥
अत्र भूतचैतनिकः १ आह—
तल्लिङ्गत्वादिच्छाद्वेषयोः पार्थिवाद्येष्वप्रतिषेधः ? ॥ ३५ ॥
आरम्भनिवृत्तिलिङ्गाविच्छाद्वेषाविति यस्यारम्भनिवृत्ती तस्येच्छाद्वेषौ तस्य
ज्ञानमिति प्राप्तम्—पार्थिवाप्यतैजसवायवीयानां शरीराणारम्भनिवृत्तिदर्शना-
दिच्छाद्वेषज्ञानैर्योग इति चैतन्यम् ? ॥ ३५ ॥
परश्वादिष्वारम्भनिवृत्तिदर्शनात् ॥ ३६ ॥
शरीरे चैतन्यनिवृत्तिः। आरम्भनिवृत्तिदर्शनादिच्छाद्वेषज्ञानैर्योग इति प्राप्तं
परश्वादेः करणस्यारम्भनिवृत्तिदर्शनाच्चैतन्यमिति । अथ शरीरस्येच्छादिभि-
र्योगः, परश्वादेस्तु करणस्यारम्भनिवृत्ती व्यभिचरतः ? न तर्ह्ययं हेतुः 'पार्थिवा-
प्यतैजसवायवीयानां शरीराणामारम्भनिवृत्तिदर्शनादिच्छाद्वेषज्ञानैर्योगः' इति ।
के ही इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःखादि धर्म हैं, अचेतन के नहीं । यों यह प्रवृत्ति-
निवृत्ति जीवात्मा में प्रमाण से जान लेने के बाद परमात्मा में भी अनुमान प्रमाण से
समझ लेनी चाहिये ॥ ३४ ॥
यहाँ भूतचैतनिक चार्वाक कहता है—
इच्छा द्वेष के शरीरनिमित्तिक होने से पार्थिवादि देहों में चैतन्यप्रतिषेध नहीं
बनता ? ॥ ३५ ॥
'इच्छा, द्वेष आरम्भ-निवृत्ति के हेतु हैं'—इस सिद्धान्त से जिसके आरम्भ-निवृत्ति
होंगे, उस के इच्छा-द्वेष हैं तथा उसी का ज्ञान होना चाहिये; तब पार्थिव, आप्य, तैजस,
वायवीय शरीरों के भी आरम्भ-निवृत्ति देखे जाने से इच्छा द्वेषादि का योग भी उन्हीं
के साथ होगा, तब ज्ञान भी उन्हीं को होना चाहिये, तो क्यों न उन शरीरों में ही
चैतन्य मान लें ? ॥ ३५ ॥
परशु-आदि में भी आरम्भनिवृत्ति देखे जाने से ॥ ३६ ॥
शरीरों में चैतन्य नहीं मानना चाहिये । यदि चर्वाक यह सिद्धान्त बनायेगा कि
'जिसमें आरम्भ-निवृत्ति देखे जाय उसी का इच्छा द्वेष तथा ज्ञान से सम्बन्ध होगा' तो
परशु ( कुठार ) आदि साधनों की भी आरम्भ-निवृत्ति देखे जाने से उसे भी चैतन्य
मानना पड़ेगा । यदि कहें कि शरीर का इच्छा-द्वेषादि से ही सम्बन्ध होता है, परश्वादि
साधनों की आरम्भ-निवृत्ति तो कहीं-कहीं व्यभिचरित भी देखी जाती है ? तो यह कोई
हेतु नहीं बना, तथा इसी परश्वादि दृष्टान्त से आपका यह सिद्धान्त भी व्यभिचरित हो
जायेगा कि पार्थिव, आप्य, तैजस, वायवीय शरीरों की आरम्भ-निवृत्ति देखे जाने से
उनका इच्छा द्वेष तथा ज्ञान से सम्बन्ध है ।
१. 'ज्ञानेच्छादीनां पार्थिवमिदं शरीरमेवाधिकरणम्' इति भूतचेतनवादी चार्वाक
इत्यर्थः ।