न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
५०. सू० ] शब्दसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् १२१
५०. सू० ] शब्दसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् १२१
यदा ह्ययमुपयुक्तोपमानो गोदर्शी गवा समानमर्थं पश्यति, तदाऽयम् 'गवय'
इत्यस्य संज्ञाशब्दस्य व्यवस्थां प्रतिपद्यते, न चेदमनुमानमिति ।
परार्थं चोपमानम्, यस्य ह्युपमेयमप्रसिद्धं तदर्थं प्रसिद्धोभयेन क्रियते इति ।
परार्थमुपमानमिति चेद् ? न; स्वयमध्यवसायात् । भवति च भोः ! स्वयम-
ध्यवसायः-'यथा गौरेवं गवयः' इति ? नाध्यवसायः प्रतिषिध्यते, उपमानं तु
तन्न भवति-'प्रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम्' (१. १. ६)। न च यस्योभयं
प्रसिद्धं तं प्रति साध्यसाधनभावो विद्यत इति ॥ ४८ ॥
तथेत्युपसंहारादुपमानसिद्धेर्नाविशेषः ॥ ४९ ॥
तथेति समानधर्मोपसंहारादुपमानं सिध्यति, नानुमानम्। अयं चानयोर्विशेष
इति ॥ ४९ ॥
(क) शब्दसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् [ ५०-५७ ]
[ पूर्वपक्षः ]
शब्दोऽनुमानमर्थस्यानुपलब्धेरनुमेयत्वात् ? ॥ ५० ॥
वधारितसंज्ञक विषय को आँखों से देखता है तब (उद्बुद्धसंस्कार) 'यह गवय है' ऐसी
उस संज्ञाशब्द की नियत शक्ति को प्रतिपन्न होता है—यह प्रक्रिया अनुमान कैसे हुई !
क्योंकि गवय के प्रत्यक्ष की तरह अनुमान में वह्नि का प्रत्यक्ष आवश्यक नहीं !
दूसरी बात यह है कि (अनुमान से स्वयं को ज्ञान होता है, जबकि) उपमान से
दूसरे को संज्ञाशब्द की व्युत्पत्ति करायी जाती है । जिसको उपमेय (गवय) का ज्ञान
न हों उसको उपमान द्वारा उपमेय की प्रसिद्धि दिखला कर ज्ञान कराया जाता है ।
तो परार्थोपमान ही क्यों न मान लिया जाय ? नहीं; इसमें स्वयम् को भी अध्यव-
साय होने से इसे परार्थोपमान नहीं मान सकते । 'जैसी गौ वैसा यह गवय है' यह स्वयम्
को अध्यवसाय होता है ? अध्यवसाय नहीं होता—यह हम नहीं कह रहे, हम तो कहते
हैं—वैसा परार्थोपमान नहीं होता ! उपमान का लक्षण है—'प्रसिद्ध-सादृश्य से साध्य
की सिद्धि' (१.१.६) । जिसको दोनों (उपमा, उपमेय) ही ज्ञात है उसके लिये साध्य-
साधनभाव क्या बनेगा ? ॥ ४८ ॥
'तथा'—इस उपसंहार से उपमान-सिद्धि होने से अनुमान तथा उपमान दोनों एक
नहीं हो सकते ॥ ४९ ॥
उपमान में समानधर्म का 'वैसा यह'—इस प्रकार उपसंहार होने से उपमान प्रमाण
सिद्ध होता है, ऐसा उपसंहार अनुमान में नहीं होता । अर्थात् अनुमान में—'जैसा धूम
वैसी अग्नि'—यह उपसंहार नहीं हो पाता, परन्तु उपमान में 'जैसी गौ वैसा यह
गवय'—यों उपसंहार होता है । यही अनुमान तथा उपमान में भेद है। अतः दोनों को
पृथक् प्रमाण माना गया ॥ ४९ ॥
प्रत्यक्ष से अर्थोपलब्धि न होने पर अनुमेय होने से शब्दप्रमाण अनुमान है ? ॥ ५० ॥
१२२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ०
१. शब्दोऽनुमानम्, न प्रमाणान्तरम्; कस्मात् ? शब्दार्थस्यानुमेयत्वात् ।
कथमनुमेयत्वम् ? प्रत्यक्षतोऽनुपलब्धेः। यथाऽनुपलभ्यमानो लिङ्गी मितेन लिङ्गेन
पश्चान्मीयत इति अनुमानम्, एवं मितेन शब्देन पश्चान्मीयतेऽर्थोऽनुपलभ्यमान
इत्यनुमानं शब्दः ? ॥ ५० ॥
२. इतश्चानुमानं शब्दः—
उपलब्धेर्द्विप्रवृत्तित्वात् ? ॥ ५१ ॥
प्रमाणान्तरभावे द्विप्रवृत्तिरुपलब्धिः । अन्यथा ह्युपलब्धिरनुमाने, अन्य-
थोपमाने; तद्व्याख्यातम्। शब्दानुमानयोस्तूपलब्धिर्द्विप्रवृत्तिः, यथानुमाने प्रवर्त्तते
तथा शब्देऽपि विशेषाभावादनुमानं शब्द इति ? ॥ ५१ ॥
सम्बन्धाच्च ? ॥ ५२ ॥
३. शब्दोऽनुमानमिति वर्त्तते। सम्बद्धयोश्च शब्दार्थयोः सम्बन्धप्रसिद्धौ
शब्दोपलब्धेरर्थग्रहणम्, यथा सम्बद्धयोर्लिङ्गलिङ्गिनोः सम्बन्धप्रतीतौ लिङ्गो-
पलब्धौ लिङ्गिग्रहणमिति ? ॥ ५२ ॥
[ सिद्धान्तपक्षः ]
१. यत्तावदर्थस्यानुमेयत्वादिति, तन्न—
१. शब्द अनुमान ही है, पृथक् प्रमाणान्तर नहीं; क्योंकि उसका अर्थ अनुमेय है ।
कैसे अनुमेय है ? प्रत्यक्ष से अनुपलब्ध होने के कारण । जैसे—अनुपलभ्यमान वह्नि
प्रत्यक्ष से ज्ञात धूम अनुमित होता है, एवमेव शब्दप्रत्यक्षानन्तर उससे अनुपलभ्यमान
अर्थ की अनुमिति होता है, अतः हम शब्द को अनुमान ही मान लें ? ॥ ५० ॥
२. इस वक्ष्यमाण कारण से भी शब्द अनुमान ही है—
शब्द ज्ञान के अनुमान से भिन्न प्रकार का न होने से ॥ ५१ ॥
शब्द यदि प्रमाणान्तर होता तो अनुमान से भिन्न प्रकार की उपलब्धि होनी चाहिये ।
आप पीछे उपमानप्रकरण में कह आये हैं—'उपमान में भिन्न उपलब्धि होती है,
अनुमान में भिन्न, अतः उपमान एक स्वतन्त्र प्रमाण है न कि अनुमानान्तर्भूत', परन्तु
शब्द तथा अनुमान के वारे में यह बात नहीं कही जा सकती; इन दोनों की तो समान
उपलब्धि है, जैसे अनुमान से ज्ञान उत्पन्न होता है, ठीक उसी विधि से शब्द से भी ।
कोई विशेषता न होने से हम तो यही समझते हैं कि शब्द अनुमान ही है ॥ ५१ ॥
और सम्बन्ध से भी (शब्द अनुमान ही सिद्ध होता है) ॥ ५२ ॥
३. सम्बद्ध शब्दार्थ में ही सम्बन्ध-प्रसिद्धि होने पर शब्दोपलब्धि से अर्थग्रहण होता
है, जैसे—सम्बद्ध लिङ्ग-लिङ्गी की सम्बन्ध-प्रसिद्धि होने पर लिङ्ग की उपलब्धि से
लिङ्गी का ज्ञान होता है ? तात्पर्य यह निकला कि शब्द ज्ञान भी व्याप्तिज्ञानजन्य है,
अतः वह वस्तुतः अनुमान ही है, उसे पृथक् प्रमाण मानने से क्या लाभ ? ॥ ५२ ॥
१. पूर्वपक्षी ने जो यह कहा कि—'अर्थ के अनुमेय होने से शब्द प्रमाण अनुमान
हैं, वह उचित नहीं—