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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

३. सू० ] इन्द्रियव्यतिरिक्तात्मपरीक्षाप्रकरणम् १७७

३. सू० ] इन्द्रियव्यतिरिक्तात्मपरीक्षाप्रकरणम् १७७
सति न भवति सति भवति, तस्य तदिति विज्ञायते । तस्माद् रूपग्रहणं चक्षुषः,
चक्षू रूपं पश्यति । एवं घ्राणादिष्वपीति । तानीन्द्रियाणीमानि स्वस्वविषय-
ग्रहणाच्चेतनानि; इन्द्रियाणां भावाभावयोर्विषयग्रहणस्य तथाभावात् । एवं
सति किमन्येन चेतनेन ?
सन्दिग्धत्वादहेतुः । योऽयमिन्द्रियाणां भावाभावयोर्विषयग्रहणस्य तथाभावः,
स किमयं चेतनत्वात् ? आहोस्वित् चेतनोपकरणानां ग्रहणनिमित्तत्वात् ? इति
सन्दिह्यते । चेतनोपकरणत्वेऽपीन्द्रियाणां ग्रहणनिमित्तत्वाद् भवितुमर्हति ॥ २ ॥
यच्चोक्तम्—विषयव्यवस्थानादिति ?
तद्व्यवस्थानादेवात्मसद्भावादप्रतिषेधः ॥ ३ ॥
यदि खल्वेकमिन्द्रियमव्यवस्थितविषयं सर्वज्ञं सर्वविषयग्राहि चेतनं स्यात्,
कस्ततोऽन्यं चेतनमनुमातुं शक्नुयात् ? यस्मात्तु व्यवस्थितविषयाणीन्द्रियाणि,
तस्मात् तेभ्योऽन्यश्चेतनः सर्वज्ञः सर्वविषयग्राही विषयव्यवस्थितिमतीतोऽनु-
मीयते । तत्रेदमभिज्ञानमप्रत्याख्येयं चेतनवृत्तमुदाह्रियते—रूपदर्शी खल्वयं
नहीं होता और जिसके होने पर होता है, वह उसका विषय होता है । इसलिये रूपज्ञान
चक्षु का विषय है; क्योंकि चक्षु रूप को देखता है । इसी तरह घ्राणादि के विषय में भी
समझ लेना चाहिये । ये सभी इन्द्रियाँ अपने विषय का ज्ञान करनेवाली हैं, अतः 'चेतन'
हैं; क्योंकि इन्द्रियों के भावाभाव से उनके विषयों के ग्रहण का भावाभाव होता है । अतः
दूसरा चेतन मानने की क्या आवश्यकता ?
उत्तर—सन्दिग्ध होने से वह हेतु नहीं बन सकता; क्योंकि यह जो इन्द्रियों के .
भावाभाव से विषयज्ञान का तथात्व है, वह क्या चेतन होने से है, या चेतन कर्ता के
सहकारि कारण होने से ज्ञान का निमित्त है—यह सन्देह होता है । चेतन का उपकरण
होने पर भी, इन्द्रियों के ग्रहणनिमित्त ( ज्ञानसाधन ) होने से उक्त व्यवस्था हो
सकती है ॥ २ ॥
यह जो कहा कि विषयव्यवस्था से ? यह हेतु भी असिद्ध है; क्योंकि—
तद्व्यवस्थान से आत्मा की सत्ता सिद्ध होने से प्रतिषेध नहीं बनेगा ॥ ३ ॥
यदि एक ही इन्द्रिय अव्यवस्थित विषय होती हुई सर्वज्ञरूप में सब विषयों का ग्रहण
करनेवाली चेतन होती तो उससे भिन्न चेतन का अनुमान कोई क्यों करे ! चूंकि इसके
विपरीत, इन्द्रियाँ व्यवस्थित विषय वाली हैं, अतः उनसे एक अन्य सर्वज्ञ, सर्वविषयग्राही,
विषयव्यवस्था की परिधि के बाहर चेतन की सत्ता का अनुमान किया जाता है । चेतन
की सत्ता को प्रमाणित करने के लिये यह दृढ़ प्रत्यभिज्ञान ( असाधारण चिह्न )
उदाहृत किया जा सकता है—'जिसने पहले रूप को देखा था, वही अब पूर्वगृहीत रस या
न्या० द० : १२

१७८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ०
रसं गन्धं वा पूर्वगृहीतमनुमिनोति, गन्धप्रतिसंवेदी च रूपरसावनुमिनोति । एवं
विषयशेषेष्वपि वाच्यम्। रूपं दृष्ट्वा गन्धं जिघ्रति, घ्रात्वा च गन्धं रूपं पश्यति ।
तदेवमनियतपर्यायं सर्वविषयग्रहणमेकचेतनाधिकरणमनन्यकर्तृकं प्रतिसन्धत्ते,
प्रत्यक्षानुमानागमसंशयान् प्रत्ययांश्च नानाविषयान् स्वात्मकर्तृकान् प्रतिसन्द-
धाति, प्रतिसन्धाय वेदयते । सर्वविषयं च शास्त्रं प्रतिपद्यते । अर्थमविषयभूतं
श्रोत्रस्य क्रमभाविनो वर्णान् श्रुत्वा पदवाक्यभावेन प्रतिसन्धाय शब्दार्थव्यवस्थां
च बुध्यमानोऽनेकविषयमर्थजातमग्रहणीयमेकैकेनेन्द्रियेण गृह्णाति । सेयं सर्वज्ञस्य
ज्ञेयाव्यवस्थाऽनुपदं न शक्या परिक्रमितुम् । आकृतिमात्रं¹ तूदाहृतम् । तत्र यदु-
क्तम्—'इन्द्रियचैतन्ये सति किमन्येन चेतनेन', तदयुक्तं भवति ॥ ३ ॥
शरीरव्यतिरिक्तात्मपरीक्षाप्रकरणम् [ ४-६ ]
१. इतश्च देहादिव्यतिरिक्त आत्मा, न देहादिसङ्घातमात्रम्;
शरीरदाहे पातकाभावात् ॥ ४ ॥
शरीरग्रहणेन शरीरेन्द्रियबुद्धिवेदनासङ्घातः प्राणिभूतो गृह्यते, प्राणिभूतं
गन्ध का ज्ञान कर रहा है, गन्धप्रतिसंवेदी रूप-रस का अनुमान कर रहा है'। इसी तरह
अन्य विषयों के बारे में कहना चाहिये—यह रूप को देखकर गन्ध सूंघता है, गन्ध
सूंघकर रूप को देखता है । इस प्रकार प्रमाता अनियतक्रम सर्वविषय-ज्ञान को एक चेतन
के आश्रय से तथा एककर्तृक रूप में प्रतिसन्धान करता है; प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द तथा
संशयों को एवं नानाविषयक ज्ञानों को एककर्तृक रुप में प्रतिसन्धान करता है, वैसा
करके जान लेता है, सर्वविषयक शास्त्र को जान लेता है ! प्रमाता श्रोत्र के अगोचर अर्थ
को, क्रमभावी वर्णों को, सुनकर पदवाक्यभाव में प्रतिसन्धान करके शब्दार्थव्यवस्था को
समझता हुआ एक ही इन्द्रिय से ग्रहण न करने योग्य अनेकविषयक अर्थों को एक-एक
इन्द्रिय से ग्रहण करता है । सर्वज्ञ की यह ज्ञेयव्यवस्था किसी भी तरह अतिक्रान्त नहीं
की जा सकती । यों हमने सामान्यतः यह एक उदाहरण दे दिया है । अतः आप
(पूर्वपक्षी—चार्वाकमतानुयायी) का यह कहना—'इन्द्रियचैतन्य के रहते अन्य चेतन
मानने की आवश्यकता नहीं'—सर्वथा आयुक्त है ॥ ३ ॥
१. इस कारण भी देहादिसङ्घात नहीं, अपितु देहादिव्यतिरिक्त ही आत्मा हैं;
शरीर-दाह में पातक न होने से ॥ ४ ॥
सूत्र में 'शरीर' से शरीर, इन्द्रिय, बुद्धि, वेदनासमूहरूप प्राणी से तात्पर्य है । शास्त्र
में प्राणमय शरीर को जलाने में प्राणिहिंसा कृत पाप 'पातक' कहा गया है (केवल शरीर
१. 'सामान्यमात्रमित्यर्थः' । तदेतच्चेतनवृत्तं देहादिभ्यो व्यावर्तमानं तदतिरिक्तं
चेतनं साधयतीति नेच्छाद्याधारत्वं देहादीनाम्' इति तात्पर्यटीकायां वाचस्पतिमिश्राः ।