न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
२८. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् ९९
२८. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् ९९
इन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य ग्रहणम्, नात्ममनसोः सन्निकर्षस्येति । एकदा खल्वयं
प्रबोधकालं प्रणिधाय सुप्तः प्रणिधानवशात् प्रबुध्यते । यदा तु तीव्रौ ध्वनि-
स्पर्शा प्रबोधकारणं भवतः, तदा प्रसुप्तस्येन्द्रियार्थसन्निकर्षनिमित्तं प्रबोधज्ञान-
मुत्पद्यते, तत्र न ज्ञातुर्मनसश्च सन्निकर्षस्य प्राधान्यं भवति, किं तर्हि ? इन्द्रि-
यार्थयोः सन्निकर्षस्य । न ह्यात्मा जिज्ञासमानः प्रयत्नेन मनस्तदा प्रेरयतीति ।
एकदा खल्वयं विषयान्तरासक्तमनाः सङ्कल्पवशाद्विषयान्तरं जिज्ञासमानः
प्रयत्नप्रेरितेन मनसा इन्द्रियं संयोज्य तद्विषयान्तरं जानीते । यदा तु खल्वस्य
निःसङ्कल्पस्य निर्जिज्ञासस्य च व्यासक्तमनसो बाह्यविषयोपनिपातनाज्ज्ञान-
मुत्पद्यते तदेन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य प्राधान्यम् । न ह्यत्रासौ जिज्ञासमानः प्रयत्नेन
मनः प्रेरयतीति । प्राधान्याच्चेन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य ग्रहणं कार्यम्, गुणत्वाद्
नात्ममनसोः सन्निकर्षस्येति ॥ २७ ॥
प्राधान्ये च हेत्वन्तरम्—
तैश्चापदेशो ज्ञानविशेषाणाम् ॥ २८ ॥
प्रत्यक्षलक्षण में इन्द्रियार्थसन्निकर्ष का ग्रहण है, आत्ममनःसन्निकर्ष का नहीं ।
कोई पुरुष 'मैं अमुक समय पुनः जग जाऊँगा'—ऐसा निश्चय करके सो जाता है, तो
उस निश्चय के अनुसार जग जाता है । परन्तु जब कोई तीव्र शब्द या किसी वस्तु का
स्पर्श जगने में कारण बन जायें तो उस सोये हुए को बीच में इन्द्रियसन्निकर्षहेतुक प्रबोध
ज्ञान हो जाता है । उक्त प्रबोध ज्ञान में आत्मा या मन का सन्निकर्ष प्रधान (मुख्य)
नहीं हैं; अपितु इन्द्रियार्थसन्निकर्ष का ही प्राधान्य है; क्योंकि उस समय आत्मा किसी
जिज्ञासा से प्रयत्नपूर्वक मन को कोई प्रेरणा नहीं करता ।
इसी प्रकार कभी आत्मा किसी समय किसी दूसरे विषय में चित्त के आसक्त होने
पर भी संकल्पवश अन्य विषय की जिज्ञासा करता हुआ मन को इन्द्रिय से लगा कर
विषयान्तर जान लेता है; परन्तु यही निःसङ्कल्प रहे या कोई जिज्ञासा न करे तथा अन्य
विषय में आसक्त हो तो उस समय भी बाह्य विषय का जो अकस्मात् ज्ञान होता है—
उसमें इन्द्रियार्थसन्निकर्ष ही प्रधान होता है, न कि आत्ममनःसन्निकर्ष; क्योंकि इसमें
भी आत्मा कोई प्रयत्न करके मन को प्रेरणा नहीं करता ।
इस प्रकार उक्त प्रत्यक्षलक्षण में मुख्य होने के कारण इन्द्रियार्थसन्निकर्ष का ही
ग्रहण करना चाहिये, न कि गौण आत्ममनःसन्निकर्ष का ॥ २७ ॥
इस इन्द्रियार्थसन्निकर्ष के मुख्य होने में एक और कारण है—
ज्ञानविशेषों (चाक्षुष, घ्राणज आदि विभिन्न प्रत्यक्षज्ञानों) का उन्हीं इन्द्रियों से
व्यवहार होता है ॥ २८ ॥
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१०० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ०
तैरिन्द्रियैरर्थैश्च व्यपदिश्यन्ते ज्ञानविशेषाः । कथम् ? घ्राणेन जिघ्रति,
चक्षुषा पश्यति, रसनया रसयतीति; घ्राणविज्ञानं चक्षुर्विज्ञानं रसनविज्ञानं
गन्धविज्ञानं रूपविज्ञानं रसविज्ञानमिति च । इन्द्रियविषयविशेषाच्च पञ्चधा
बुद्धिर्भवति । अतः प्राधान्यमिन्द्रियार्थसन्निकर्षस्येति ॥ २८ ॥
यदुक्तम्—‘इन्द्रियार्थसन्निकर्षग्रहणं कार्यम्, नात्ममनसोः सन्निकर्षस्येति,
कस्मात् ? सुप्तव्यासक्तमनसामिन्द्रियार्थयोः सन्निकर्षस्य ज्ञाननिमित्तत्वात्' इति,
सोऽयम्—
व्याहतत्वादहेतुः ॥ २९ ॥
यदि तावत् क्वचिदात्मनसोः सन्निकर्षस्य ज्ञानकारणत्वं नेष्यते ? तदा
'युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्' ( १. १. १६ ) इति व्याहन्येत । नेदानीं
मनसः सन्निकर्षमिन्द्रियार्थसन्निकर्षोऽपेक्षते । मनःसंयोगानपेक्षायां च युगपद्
ज्ञानोत्पत्तिप्रसङ्गः । अथ मा भूद् व्याघात इति सर्वविज्ञानानामात्ममनसोः सन्निकर्षः
कारणमिष्यते ? तदवस्थमेवेदं भवति—'ज्ञानकारणत्वादात्ममनसोः सन्निकर्षस्य
ग्रहणं कार्यम्' इति ॥ २९ ॥
उन उन इन्द्रिय तथा अर्थों से वे वे ज्ञान व्यवहृत होते हैं । जैसे—नाक से सूंघता
है, आँख से देखता है, जिह्वा से चखता है; या यह नाक से प्रत्यक्ष हुआ ज्ञान है, यह
आँख से हुआ ज्ञान है, यह घ्राणेन्द्रिय से उत्पन्न गन्ध का ज्ञान है, यह चक्षुरिन्द्रिय से
उत्पन्न रूप का ज्ञान है और यह जिह्वेन्द्रिय से उत्पन्न रस का ज्ञान है आदि । इन्द्रिय
तथा उनके विषयों के भेद से यह ज्ञान पाँच प्रकार का है । अस्तु । इस लिये भी
इन्द्रियार्थसन्निकर्ष के प्रधान होने से प्रत्यक्षलक्षण में इस 'इन्द्रियार्थसन्निकर्ष' का शब्दतः
ग्रहण हुआ है ॥ २८ ॥
पूर्वपक्ष—यह जो कहा था कि 'इन्द्रियार्थसन्निकर्ष को ही प्रत्यक्षलक्षण में लेना
चाहिये, आत्ममनःसन्निकर्ष को नहीं; क्योंकि सुप्त तथा व्यासक्तमना पुरुषों के आकस्मिक
ज्ञान में इन्द्रियार्थसन्निकर्ष ही प्रधानतया कारण हैं'—यह हेतु
विरोधी होने के कारण असद्धेतु है ? ॥ २९ ॥
क्योंकि यदि आत्ममनःसन्निकर्ष को कहीं प्रत्यक्ष ज्ञान में कारण न मानोगे तो
'युगपज्ज्ञानानुत्पाद ही मन की सत्ता में हेतु हैं' (१.१.१६)—यह वचन-भंग हो जायेगा;
क्योंकि सुप्त-व्यासक्तमना पुरुषों का इन्द्रियार्थसन्निकर्षज ज्ञान मनःसन्निकर्ष की अपेक्षा
नहीं रखता । यदि यह ज्ञान मनःसन्निकर्ष की अपेक्षा न रखेगा तो फिर युगपद् अनेक
ज्ञान भी उत्पन्न होने लगेंगे । और यदि, उक्त वचनभङ्ग न हो, इसलिए सभी प्रत्यक्ष
ज्ञानों में आत्ममनःसन्निकर्ष मानोगे तो फिर वही बात मान लेनी होगी कि ज्ञानकारण
होने से आत्ममनःसन्निकर्ष का भी प्रत्यक्षलक्षण में ग्रहण करना चाहिए ? ॥ २९ ॥
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