सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

२५. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २३७

२५. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २३७
हेतुः-गुणानामाश्रयाभावः, विरोधी च गुणः । नित्यत्वादात्मनोऽनुपपन्नः पूर्वः,
विरोधी च बुद्धेर्गुणो न गृह्यते । तस्मादात्मगुणत्वे सति बुद्धेर्नित्यत्व-
प्रसङ्गः ? ॥ २३ ॥
अनित्यत्वग्रहात् बुद्धेर्बुद्ध्यन्तराद्विनाशः शब्दवत् ॥ २४ ॥
अनित्या बुद्धिरिति सर्वशरीरिणां प्रत्यात्मवेदनीयमेतत् । गृह्यते च बुद्धि-
सन्तानस्तत्र बुद्धेर्बुद्ध्यन्तरं विरोधी गुण इत्यनुमीयते, यथा-शब्दसन्ताने शब्दः
शब्दान्तरविरोधीति ॥ २४ ॥
असंख्येयेषु ज्ञानकारितेषु संस्कारेषु स्मृतिहेतुष्वात्मसमवेतेष्वात्ममनसोश्च
सन्निकर्षे समाने स्मृतिहेतौ सति न कारणस्यायौगपद्यमस्तीति युगपत्स्मृतयः
प्रादुर्भवेयुः, यदि बुद्धिरात्मगुणः स्यादिति ?
तत्र कश्चित् सन्निकर्षस्यायौगपद्यमुपपादयिष्यन्नाह-
ज्ञानसमवेतात्मप्रदेशसन्निकर्षान्मनसः स्मृत्युत्पत्तेर्न युगपदुत्पत्तिः ? ॥ २५ ॥
उन के आश्रय का अभाव हो जाये, २. या फिर उसका विरोधी गुण पैदा हो जाये ।
नित्य होने से आत्मा में पहला विकल्प तो बनेगा नहीं; तथा बुद्धि का कोई विरोधी गुण
गृहीत नहीं होता, अतः बुद्धि को आत्मगुण मानने पर उसमें नित्यत्वप्रसङ्ग होने
लगेगा ? ॥ २३ ॥
उत्तर-
बुद्धि के अनित्यत्वग्रहण से, बुद्ध्यन्तर से उसका विनाश हो जाता है, शब्द की
तरह ॥ २४ ॥
'ज्ञान अनित्य है'-यह बात सभी प्राणियों को अनुभवसिद्ध है, प्रत्येक ज्ञान के
पश्चात् ज्ञानधारा होती है, जैसे-पहले घटज्ञान हुआ, फिर 'इस घट को मैं जानता
हूँ'-यह ज्ञान अथवा घटज्ञान ही प्रतिक्षण में उत्पन्न होते हैं-यों क्रम से ज्ञान होते
चलते हैं । यह क्रमिक ज्ञान ही बुद्धि के बुद्ध्यन्तर गुण का विरोधी है-ऐसा अनुमान
किया जाता है । जैसे शब्द-सन्तान में शब्द का शब्दान्तरविरोधी होता है ॥ २४ ॥
शङ्का-
स्मृतिहेतुक आत्मसमवेत असंख्य ज्ञानजनित संस्कारों एवं आत्ममनःसन्निकर्ष के
समान रूप से स्मृतिहेतु होने पर कारण का अयौगपद्य नहीं है, अतः बुद्धि को आत्मगुण
मानेंगे तो युगपत् स्मृतियाँ प्रादुर्भूत होने लगेगी ?
वहाँ कोई एकदेशी सन्निकर्ष के अयौगपद्य का उपपादन करने के लिए
कहता है-
ज्ञानसमवेत आत्मप्रदेशसन्निकर्ष हेतु से मन द्वारा स्मृत्युत्पत्ति होने से युगपद् उत्पत्ति
नहीं होगी ॥ २५ ॥

२३८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ०
ज्ञानसाधनः संस्कारो ज्ञानमित्युच्यते, ज्ञानसंस्कृतैरात्मप्रदेशैः पर्यायेण मनः
सन्निकृष्यते । आत्ममनःसन्निकर्षात् स्मृतयोऽपि पर्यायेण भवन्तीति ? ॥ २५ ॥
न; अन्तःशरीरवृत्तित्वान्मनसः ॥ २६ ॥
सदेहस्यात्मनो मनसा संयोगो विपच्यमानकर्माशयसहितो जीवनमिष्यते ।
तत्रास्य प्राक् प्रायणादन्तःशरीरे वर्तमानस्य मनसः शरीराद् बहिर्ज्ञानसंस्कृतैरात्म-
प्रदेशैः संयोगो नोपपद्यत इति ॥ २६ ॥
साध्यत्वादहेतुः ? ॥ २७ ॥
विपच्यमानकर्माशयमात्रं जीवनम्, एवं च सति साध्यमन्तःशरीरवृत्तित्वं
मनस इति ॥ २७ ॥
स्मरतः शरीरधारणोपपत्तेरप्रतिषेधः ॥ २८ ॥
सुस्मूर्षया खल्वयं मनः प्रणिदधानः चिरादपि कञ्चिदर्थं स्मरति, स्मरतश्च
शरीरधारणं दृश्यते । आत्ममनःसन्निकर्षजश्च प्रयत्नो द्विविधः—धारकः, प्रेरकश्च ।
निःसृते च शरीराद् बहिर्मनसि धारकस्य प्रयत्नस्याभावाद् गुरुत्वात् पतनं स्यात्
शरीरस्य स्मरत इति ॥ २८ ॥
ज्ञानसाधन संस्कार 'ज्ञान' कहलाता है । ज्ञानसंस्कृत आत्मप्रदेशों से मन क्रमशः
सन्निकृष्ट होता है ! इस पर्यायजनित आत्ममनःसन्निकर्ष से स्मृतियाँ भी पर्याय से ही
होंगी ॥ २५ ॥
मन के अन्तःशरीरवृत्ति होने से ऐसा कहना युक्त नहीं ॥ २६ ॥
सदेह आत्मा से प्रारब्ध कर्मसहित मन का संयोग 'जीवन' कहलाता है । वहाँ,
मृत्यु से पूर्व अन्तःशरीर में ही वर्तमान मन का शरीर से बाहर के आत्मप्रदेशों से
संयोग उपपन्न नहीं होता ॥ २६ ॥
एकदेशी की शङ्का—
उक्त जीवनलक्षण स्वयं साध्य होने से हेतु नहीं बन सकता ? ॥ २७ ॥
विपच्यमान कर्माशयमात्र ही 'जीवन' है—ऐसा मानने पर मन का अन्तःशरीर-
वृत्तित्व प्रमाणों से साधनीय है, अतः वह सिद्ध नहीं है ? ॥ २७ ॥
स्मरण करनेवाले का शरीरधारणोपपादन होने से निषेध युक्त नहीं ॥ २८ ॥
स्मरण करने की इच्छा से यह मन प्रणिधान करता हुआ बहुत काल के बाद भी
किसी विषय का स्मरण कर ही लेता है, और वैसे स्मरणकर्ता को शरीरधारण किये
हुए भी देखते हैं । आत्ममनःसन्निकर्षज प्रयत्न दो प्रकार का होता है—१. शरीर का
धारक तथा २. प्रेरक । यों, शरीर से बाहर मन के निकल जाने पर धारकप्रयत्नाभाव
से स्मरण करते हुए शरीर का गुरुत्व के कारण पतन होने लगेगा ॥ २८ ॥