न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
२४. सू० ] कथकान्त्योक्तिनिरूप्यनिग्रहस्थानद्वयप्रकरणम् ३७९
२४. सू० ] कथकान्त्योक्तिनिरूप्यनिग्रहस्थानद्वयप्रकरणम् ३७९
कस्यचिदर्थस्य तथाभावं प्रतिज्ञाय प्रतिज्ञातार्थविपर्ययाद् अनियमात् कथां
प्रसञ्जयतोऽपसिद्धान्तो वेदितव्यः। यथा 'न सदात्मानं जहाति, न सतो विनाशः,
नासदात्मानं लभते, नासदुत्पद्यते' इति सिद्धान्तमभ्युपेत्य स्वपक्षं व्यवस्थापयति-
'एकप्रकृतीदं व्यक्तं विकाराणामन्वयदर्शनात् । मृदन्वितानां शरावादीनां
दृष्टमेकप्रकृतित्वम्, तथा चायं व्यक्तभेदः सुखदुःखमोहान्वितो दृश्यते, तस्मात्
समन्वयदर्शनात् सुखादिभिरेकप्रकृतीदं शरीरम्' इति । एवमुक्तवाननुयुज्यते-'अथ
प्रकृतिविकार इति कथं लक्षितव्यमिति' ? यस्यानवस्थितस्य धर्मान्तरनिवृत्तौ
धर्मान्तरं प्रवर्त्तते सा प्रकृतिः, यच्च धर्मान्तरं प्रवर्त्तते निवर्त्तते वा स विकार इति ।
सोऽयं प्रतिज्ञातार्थविपर्यासादनियमात् कथां प्रसञ्जयति, प्रतिज्ञातं खल्वनेन-
नासदाविर्भवति न सत्तिरोभवतीति । सदसतोश्च तिरोभावाविर्भावमन्तरेण न
कस्यचित्प्रवृत्तिः प्रवृत्त्युपरमश्च भवति । मृदि खल्ववस्थितायां भविष्यति शरा-
वादिलक्षणं धर्मान्तरमिति प्रवृत्तिर्भवति, अभूदिति च प्रवृत्त्युपरमः, तदेतन्मृद्धर्मा-
णमापि न स्यात् । एवं प्रत्यवस्थितो यदि सतश्चात्महानमसतरचात्मलाभम-
भ्युपैति तदस्यानपसिद्धान्तो निग्रहस्थानं भवति, अथ नाभ्युपैति पक्षोऽस्य न
सिध्यति ॥ २४ ॥
किसी अर्थ के तथात्व ( तद्वस्तुनिष्ठितत्व ) को प्रतिज्ञात कर उस अर्थ से विपरीत
अनियम से कथा-प्रसङ्ग करने वाले का 'अपसिद्धान्त' निग्रहस्थान समझना चाहिये । जैसे
कोई वादी 'सत् अपने स्वत्व को नहीं छोड़ता, सत् का नाश नहीं होता, असत् स्वरूप में
नहीं रहता, असत् उत्पन्न नहीं होता।' इस सिद्धान्त को स्वीकार कर स्वपक्ष स्थापित
करता हैं-'यह व्यक्त एक-प्रकृति है, विकारों में प्रकृति का सम्बन्ध देखा जाने से ।
मृत्तिकान्वित शरावादि लोक में एकप्रकृतिक देखे जाते हैं, तथा च-यह व्यक्तभेद
( शरीर ) सुखदुःखमोहान्वित देखा जाता है, अतः इस समन्वयदर्शन से यह शरीर-
सुखादि के समन्वय से एकप्रकृति है।' ऐसा कहनेवाले इस वादी को पूछना चाहिये-
'यह प्रकृति है, यह विकार है ?'-यह भेद कैसे करें ? जिसके रहते धर्मान्तर की
निवृत्ति होने पर धर्मान्तर प्रवृत्त होता है वह 'प्रकृति' होती है तथा जो धर्मान्तर प्रवृत्त
तथा निवृत्त होता रहता है, वह 'विकार' कहलाता है। यों, प्रतिज्ञातार्थ के विपर्यास
द्वारा वादी नियम-भङ्ग कर कथा प्रारम्भ करता है। इसने प्रतिज्ञा की थी-असत् का
आविर्भाव नहीं होता, सत् का तिरोभाव नहीं होता' । सत् असत् के तिरोभाव, आविर्भाव
के विना किसी की प्रवृत्ति तथा निवृत्ति नहीं होती ! मृत्तिका के रहने पर ही शरा-
वादिलक्षण धर्मान्तर होगा, अतः प्रवृत्ति हो जाती है, 'था' इस तरह विनाश हो जाता
है। यह स्थिति मृत्तिका के विकारों में ( उत्पाद-विनाश ) नहीं हो पायेगी। इस तरह
प्रतिषेध करने पर, यदि वादी सत् का नाश तथा असत् का उत्पाद स्वीकार करता है,
तो यह उसका 'अपसिद्धान्त' निग्रहस्थान हो जायेगा; यदि नहीं स्वीकार करता है तो
उसका पक्ष सिद्ध नहीं होगा।
सूत्रकार को कहना चाहिये था ? इसी के समाधान के लिये सूत्र में 'यथोक्त' पद दिया
३८० वात्स्यायनभाष्यसहितं न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ०
हेत्वाभासाश्च यथोक्ताः ॥ २५ ॥
हेत्वाभासाश्च निग्रहस्थानानि ।
किं पुनर्लक्षणान्तरयोगाद् हेत्वाभासा निग्रहस्थानत्वमापन्नाः, यथा प्रमाणानि
प्रमेयत्वम् ? इत्यत आह—यथोक्ता इति । हेत्वाभासलक्षणेनैव निग्रहस्थानभाव
इति ।
त इमे प्रमाणादयः पदार्था उद्दिष्टा लक्षिताः परीक्षिताश्चेति ॥ २५ ॥
योऽक्षपादमृषिं न्यायः प्रत्यभाद् वदतां वरम् ।
तस्य वात्स्यायन इदं भाष्यजातमवर्तयत् ॥
इति श्रीवात्स्यायनीये न्यायभाष्ये पञ्चमोऽध्यायः समाप्तः
✾ समाप्तं चेदं न्यायदर्शनम् ✾
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और यथोक्त हेत्वाभास भी ॥ २५ ॥
निग्रहस्थान है ।
क्या जैसे प्रमेयादि लक्षण के योग से प्रमाण कभी-कभी प्रमेय बन जाते हैं, उसी
तरह हेत्वाभास भी किसी अन्य लक्षण के योग से निग्रहस्थान बनते हैं ? तो उनका लक्षण
सूत्रकार को कहना चाहिये था ? इसी के समाधान के लिये सूत्र में 'यथोक्त' पद दिया
है । अर्थात् पूर्वोक्त हेत्वाभास-लक्षणों से ही उनमें निग्रहस्थानत्व आ जायेगा ।
इस प्रकार ये प्रमाणादि पदार्थ क्रमशः गिना दिये गये, उनका लक्षण कर दिया
गया, तथा तत्त्वजिज्ञासु जनों के हितार्थ उनकी यथातथ परीक्षा कर दी गयी ॥ २५ ॥
यह न्यायशास्त्र ऋषिश्रेष्ठ अक्षपाद (गौतम) को अलौकिक शक्ति द्वारा ज्ञानगोचर
हुआ था, उसी न्यायशास्त्र के भाष्यरूप इस व्याख्यान की वात्स्यायन ने रचना की ॥
वात्स्यायनीय न्यायभाष्य( सहित न्यायदर्शन )में पञ्चम अध्याय का
द्वितीय आह्निक समाप्त
✾ पञ्चम अध्याय भी समाप्त ✾
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✾ न्यायदर्शन समाप्त ✾