न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
१३. सू० ] अवयविप्रकरणम् ३२३
१३. सू० ] अवयविप्रकरणम् ३२३
वयविनो नैकदेशेन वृत्तिरन्यावयवाभावादित्यहेतुः । वृत्तिः कथमिति चेत् ?
एकस्यानेकत्राश्रयाश्रितसम्बन्धलक्षणा प्राप्तिः । आश्रयाश्रितभावः कथमिति
चेत् ? यस्य यतोऽन्यत्रात्मलाभानुपपत्तिः स आश्रयः । न कारणद्रव्येभ्योऽन्यत्र
कार्यद्रव्यमात्मानं लभते, विपर्ययस्तु कारणद्रव्येष्विति । नित्येषु कथमिति चेत् ?
अनित्येषु दर्शनात् सिद्धम् । नित्येषु द्रव्येषु कथमाश्रयाश्रयिभाव इति चेत् ?
अनित्येषु द्रव्यगुणेषु दर्शनादाश्रयाश्रितभावस्य, नित्येषु सिद्धिरिति । तस्माद-
वयव्यभिमानः प्रतिषिद्ध्यते निःश्रेयसकामस्य, नावयवी; यथा-रूपादिषु मिथ्या-
सङ्कल्पः, न रूपादय इति ॥ १२ ॥
सर्वाग्रहणमवयव्यसिद्धेः ( २.१.३५ ) इति प्रत्यवस्थितोऽप्येतदाह—
केशसमूहे तैमिरिकोपलब्धिवत् तदुपलब्धिः ? ॥ १३ ॥
यथैकैकः केशस्तैमिरिकेण नोपलभ्यते, केशसमूहस्तूपलभ्यते, तथैकैकोऽणुर्नो-
पलभ्यते, अणुसञ्चयस्तूपलभ्यते । तदिदमणुसमूहविषयं ग्रहणमिति ? ॥ १३ ॥
होता' यह अहेतु ही है ! अवयवों में यह अवयवी की वृत्ति कैसे है ? एक ( अवयवी )
की अनेक ( अवयवों ) में आश्रयाश्रित सम्बन्ध ( समवायसम्बन्ध ) से प्राप्तिवृत्ति ।
आश्रयाश्रित सम्बन्ध क्या है ? जिसकी जिससे अन्यत्र सत्ता न मिल पाये वह 'आश्रय'
है । कारणद्रव्यों से अन्यत्र कार्यद्रव्य की सत्ता नहीं मिलती, अतः कारण कार्यद्रव्य का
आश्रय है । इसके विपरीत, कारणद्रव्य ( मृत्तिकादि ) कार्यद्रव्य के अतिरिक्त कुम्भकार
के घर में भी मिल सकता है, अतः वह कार्यद्रव्य का आश्रित नहीं । नित्य पदार्थों में यह
व्यवस्था कैसे बैठाओगे ? अनित्य ( द्रव्यगुणों ) में यह आश्रयाश्रितभाव देखा जाने से
नित्यों में भी उसका अनुमान कर लेंगे । अतः मुमुक्षु के लिये अवयव्यभिमान निषिद्ध
बताया है, अवयवी नहीं; जैसे रूपादि में मिथ्यासङ्कल्प निषिद्ध किया है, न कि
रूपादि ॥ १२ ॥
‘अवयवी को न मानोगे तो समग्र द्रव्य का ग्रहण न होगा'—( २.१.३५ ) इस प्रक-
रण में हम इस शून्यवादी की युक्तियाँ निरस्त कर चुके हैं, अब फिर बात आ पड़ी तो
घुमा फिरा कर वह वही युक्तियाँ दे रहा है—
तिमिररोगग्रस्त रोगी को केशसमूह की उपलब्धि के समान ही यह उप-
लब्धि है ? १३ ॥
जैसे तिमिरोग ( आन्ध्य = मोतियाबिन्द ) ग्रस्त को एक-एक केश नहीं दिखायी
देता, परन्तु केशसमूह ( केशों का गुच्छा ) को वह देख लेता है, उसी तरह अवयव
( अणु ) न दिखायी दे पाने पर भी अवयवसमूह ( अणुसमूह = द्रव्य ) दिखायी दे जाता
है—यह मान लेने से काम चल सकता है तो अवयवी ( द्रव्यान्तर ) मानने से क्या
लाभ ? ॥ १३ ॥
३२४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [४. अ० २. आ०
स्वविषयानतिक्रमेणेन्द्रियस्य पटुमन्दभावाद्विषयग्रहणस्य
तथाभावो नाविषये प्रवृत्तिः ॥ १४ ॥
यथाविषयमिन्द्रियाणां पटुमन्दभावाद्विषयग्रहणानां पटुमन्दभावो भवति ।
चक्षुः खलु प्रकृष्यमाणं नाविषयं गन्धं गृह्णाति, निकृष्यमाणं च न स्वविषयात्
प्रच्यवते । सोऽयं तैमिरिकः कश्चिच्चक्षुर्विषयं केशं न गृह्णाति, कश्चिद् गृह्णाति
केशसमूहम्; उभयं ह्यतैमिरिकेण चक्षुषा गृह्यते । परमाणवस्त्वतीन्द्रिया इन्द्रिया-
विषयभूता न केनचिदिन्द्रियेण गृह्यन्ते, समुदितास्तु गृह्यन्ते—इत्यविषये
प्रवृत्तिरिन्द्रियस्य प्रसज्येत । न जात्वर्थान्तरमणुभ्यो गृह्यते इति । ते खल्विमे
परमाणवः सन्निहिता गृह्यमाणा अतीन्द्रियत्वं जहति, वियुक्ताश्चागृह्यमाणा
इन्द्रियविषयत्वं न लभन्ते इति । सोऽयं द्रव्यान्तरानुत्पत्तावतिमहान् व्याघातः ।
इत्युपपद्यते द्रव्यान्तरं यद् ग्रहणस्य विषय इति ।
सञ्चयमात्रं विषय इति चेद् ? न; सञ्चयस्य संयोगाभावात् तस्य चातीन्द्रि-
यस्याग्रहणादयुक्तम् । सञ्चयः खल्वनेकस्य संयोगः, स च गृह्यमाणाश्रयो गृह्यते
स्वविषय (रूपरसादि) के अनतिक्रम से इन्द्रियों के तीव्र मन्द भाव से विषयज्ञान में
तीव्रता-मन्दता आ जाती है, अपने से अविषयों में उनकी प्रवृत्ति नहीं हुआ करती ॥१४॥
स्व-स्व विषय के अनुसार, इन्द्रियों की पटुता-मन्दता से विषयज्ञान में पटुता-मन्दता
आ जाती हैं । चक्षु पर कितना भी दबाव डाला जाये वह अपने अविषय गन्ध का ग्रहण
नहीं कर पाती । या उस पर कितना भी नियन्त्रण रखा जाये वह स्वविषय (रूप) से
प्रच्युत भी नहीं होती । यहाँ कोई तिमिररोगी चक्षुर्विषय केश को नहीं देख पाता, कोई
केशसमूह को देख लेता है; परन्तु स्वस्थनेत्र पुरुष केश तथा केशसमूह—दोनों को देख
सकता है। परन्तु परमाणु तो अतीन्द्रिय होने से इन्द्रिय के अविषय हैं वे किसी भी चक्षु
से देखे नहीं जा सकते, हाँ वे समुदित हों तो देखे जा सकते हैं। तात्पर्य यह निकला कि
इन्द्रिय की प्रवृत्ति अविषय में नहीं होगी। यदि ऐसा कहा जाय कि वहाँ परमाणु से
अतिरिक्त गृहीत नहीं होता । इसका अर्थ यह हुआ कि परमाणु जब इकट्ठे होते हैं तो
अपने अतीन्द्रियत्व को छोड़ देते हैं, पर जब अलग अलग होते हैं तो इन्द्रिय-विषय नहीं
बनते । तो जो परमाणु अतीन्द्रिय है वही इन्द्रियविषय भी बन जाता है, यह बात द्रव्या-
न्तरानुत्पत्ति में विरुद्ध पड़ रही है । अतः आपके कथन से ही सिद्ध हो जाता है कि जो
इन्द्रिय-विषय है वह द्रव्यान्तर (अवयवी) है ।
परमाणुओं का सञ्चय ही इन्द्रिय का विषय बन जाता है, वह सञ्चय द्रव्यान्तर नहीं
है ? ऐसा भी नहीं कह सकते; क्योंकि सञ्चय संयोगसम्बन्ध से अतिरिक्त नहीं है और वह
अतीन्द्रिय है-उसका ग्रहण कैसे होगा ! तात्पर्य यह है कि 'सञ्चय' कहते हैं अनेक के