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सर्वकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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पृष्ठ 135

४२. सू० ] अनुमानपरीक्षाप्रकरणम् ११७
यद्यतीतानागता वितरेतरापेक्षौ सिद्ध्येताम्, प्रतिपद्येमहि वर्त्तमानविलोपम् ।
नातीतापेक्षाऽनागतसिद्धिः, नाप्यनागतापेक्षाऽतीतसिद्धिः । कया युक्त्या ? केन
कल्पेनातीतः कथमतीतापेक्षाऽनागतसिद्धिः, केन च कल्पेनानागतः कथमनागता-
पेक्षातीतसिद्धिरिति नैतच्छक्यं निर्वक्तुम्, अव्याकरणीयमेतद्वर्त्तमानलोप इति ।
यच्च मन्येत—'ह्रस्वदीर्घयोः, स्थलनिम्नयोः, छायाऽऽतपयोश्च यथेतरेतरा-
पेक्षया सिद्धिरेवमतीतानागतयोः' इति ? तन्नोपपद्यते, विशेषहेत्वभावात् । दृष्टा-
न्तवत् प्रतिदृष्टान्तोऽपि प्रसज्यते, यथा—रूपस्पर्शौ गन्धरसौ नेतरेतरापेक्षौ
सिध्यतः; एवमतीतानागताविति, नेतरेतरापेक्षा कस्यचित्सिद्धिरिति । यस्मादे-
काभावेऽन्यतराभावादुभयाभावः । यद्येकस्यान्यतरापेक्षा सिद्धिरन्यतरस्येदानीं
किमपेक्षा ? यद्यन्यतरस्यैकापेक्षा सिद्धिरेकस्येदानीं किमपेक्षा ? एवमेकस्याभावे
अन्यतरन्न सिध्यतीत्युभयाभावः प्रसज्यते ॥ ४२ ॥
अर्थसद्भावव्यङ्ग्यश्चायं वर्त्तमानः कालः—'विद्यते द्रव्यम्, विद्यते गुणः,
विद्यते कर्म' इति । यस्य चायं नास्ति, तस्य—

यदि अतीत व अनागत काल एक दूसरे के आश्रय से सिद्ध हो सकें तो हम भी
वर्तमानकाल को न मानें; परन्तु न भूत की अपेक्षा रखकर भविष्यत् की सिद्धि की जा
सकती है, न भविष्यत् की अपेक्षा रखकर भूत की । किस तर्क से ? किस समर्थ प्रमाण
से वह अतीत है तथा उसपर आश्रित अनागत की सिद्धि हो पायेगी ! अथ च, किस समर्थ
प्रमाण से अनागत है तथा तदपेक्ष अतीत की सिद्धि हो पायेगी ! —इसका आप निर्वचन
नहीं कर सकते, अतः वर्तमान का न मानना भी सभी को निर्वचन में बाधक होगा !
जो यह मानता है कि—'जैसे ह्रस्व-दीर्घ की, उच्च-नीच स्थल की, छाया-आतप
की इतरेतरापेक्षया सिद्धि होती है, उसी तरह अतीत-अनागत की भी मान लें' ? यह
नहीं मान सकते; क्योंकि ऐसा मानने में कोई विशेष हेतु नहीं है । दृष्टान्त की तरह
प्रतिदृष्टान्त ( विपरीत दृष्टान्त ) भी प्रसक्त होता है; जैसे रूप तथा स्पर्श, गन्ध तथा
रस इतरेतरापेक्षया सिद्ध नहीं किये जा सकते, इसी प्रकार अतीत अनागत में समझना
चाहिये । और इतरेतरापेक्षया किसी की भी सिद्धि नहीं होती; क्योंकि एक का अभाव
होने पर दूसरे का अभाव ( अन्यतराभाव ) होने से दोनों का ही अभाव (उभयाभाव)
हो जायेगा । यदि एक की दूसरे की अपेक्षा से सिद्धि मानें तो बाकी बचे दूसरे की
किसकी अपेक्षा से सिद्धि होगी ? यदि अन्यतर की एकापेक्षया सिद्धि मानें तो उस एक
की अब किसकी अपेक्षा से सिद्धि होगी ? इस प्रकार एक का अभाव होने पर दूसरा भी
सिद्ध नहीं हो पायेगा, अतः दोनों का ही असिद्धि-प्रसङ्ग आ पड़ेगा ॥ ४२ ॥
यह वर्त्तमानकाल न केवल पतनादि क्रिया से, अपितु अर्थ-सत्ता से भी व्यक्त होता
है, जैसे—'यह द्रव्य वर्तमान है', 'यह गुण वर्तमान है', 'यह कर्म विद्यमान है'—आदि।
जिस अर्थ की सत्ता नहीं होती, उसके—