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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

इन्द्रियव्यतिरिक्तात्मपरीक्षाप्रकरणम् [ १-३ ]

अथ तृतीयोऽध्यायः
[ प्रथममाह्निकम् ]
इन्द्रियव्यतिरिक्तात्मपरीक्षाप्रकरणम् [ १-३ ]
परीक्षितानि प्रमाणानि, प्रमेयमिदानीं परीक्ष्यते । तच्चात्मादीत्यात्मा
विविच्यते—किं देहेन्द्रियमनोबुद्धिवेदनासङ्घातमात्रमात्मा ? आहोस्वित् तद्व्यति-
रिक्त इति ? । कुतस्ते संशयः ? व्यपदेशस्योभयथा सिद्धेः । क्रियाकरणयोः
कर्त्रा सम्बन्धस्याभिधानं व्यपदेशः । स द्विविधः—अवयवेन समुदायस्य—
मूलैर्वृक्षस्तिष्ठति, स्तम्भैः प्रासादो ध्रियते इति । अन्येनान्यस्य व्यपदेशः—
परशुना वृश्चति, प्रदीपेन पश्यति । अस्ति चायं व्यपदेशः—चक्षुषा पश्यति,
मनसा विजानाति, बुद्ध्या विचारयति, शरीरेण सुखदुःखमनुभवतीति । तत्र
नावधार्यते—किमवयवेन समुदायस्य देहादिसङ्घातस्य ? अथान्येनान्यस्य तद्व्य-
तिरिक्तस्य वेति ?
अन्येनायमन्यस्य व्यपदेशः । कस्मात् ?
दर्शनस्पर्शनाभ्यामेकार्थग्रहणात् ॥ १ ॥
प्रमाणों की परीक्षा हो चुकी, अब प्रमेयों की परीक्षा प्रारम्भ की जा रही है । उन
प्रमेयों में आत्मा प्रधान है, अतः सर्वप्रथम आत्मा के वारे में ही विवेचन किया जा रहा
है । क्या देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, वेदना—इनका समूहमात्र 'आत्मा' है ? या इनसे
भिन्न कोई आत्मा है ? यह संशय क्यों हुआ ? लोक में उक्त दोनों ही प्रकारों में
व्यपदेश ( व्यवहार ) देखा जाता है । क्रिया तथा करण से कर्त्ता के सम्बन्धकथन को
'व्यपदेश' कहते हैं । वह दो प्रकार का है—१. अवयव से समुदाय का व्यपदेश, जैसे—
'जड़ के कारण वृक्ष खड़ा है' या 'स्तम्भों के कारण महल खड़ा है' आदि; तथा २ दूसरे
से दूसरे का व्यपदेश, जैसे—'परशु द्वारा काटता है' 'दीपक द्वारा देखता है' आदि ।
इसमें समुदाय एवं समुदायि का सम्बन्ध नहीं है । कर्त्ता एवं करण पृथक् हैं । प्रकृत में
यह व्यपदेश होता है—'चक्षु से देखता है', 'मन से समझता है', 'बुद्धि से विवेचन करता
है', 'शरीर से सुख दुःख का अनुभव करता है'—आदि । यहाँ यह निश्चय नहीं हो
पाता कि अवयव से देहादिसङ्घात का व्यपदेश है, या अन्य से अन्य का व्यपदेश ?
यह अन्य से अन्य का व्यपदेश है; क्योंकि—
दर्शन, स्पर्शन द्वारा एक ही पदार्थ का ग्रहण होता है ॥ १ ॥

१७६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ०
दर्शनेन कश्चिदर्थो गृहीतः, स्पर्शनेनापि सोऽर्थो गृह्यते—'यमहमद्राक्षं चक्षुषा
तं स्पर्शनेनापि स्पृशामीति, यं चास्पाक्षं स्पर्शनेन तं चक्षुषा पश्यामि' इति ।
एकविषयौ चेमौ प्रत्ययावेककर्तृकौ प्रतिसन्धियेते, न च सङ्घातकर्तृकौ, नेन्द्रियेणै-
ककर्तृकौ । तद्योऽसौ चक्षुषा त्वगिन्द्रियेण चैकार्थस्य ग्रहीता भिन्ननिमित्ताव-
नन्यकर्तृकौ प्रत्ययौ समानविषयौ प्रतिसन्दधाति, सोऽर्थान्तरभूत आत्मा ।
कथं पुनर्नेन्द्रियेणैककर्तृकौ ? इन्द्रियं खलु स्वस्वविषयग्रहणमनन्यकर्तृकं
प्रतिसन्धातुमर्हति, नेन्द्रियान्तरस्य विषयान्तरग्रहणमिति । कथं न सङ्घात-
कर्तृकौ ? एकः खल्वयं भिन्ननिमित्तौ स्वात्मकर्तृकौ प्रत्ययौ प्रतिसंहितौ वेदयते,
न सङ्घातः । कस्मात् ? अनिवृत्तं हि सङ्घाते प्रत्येकं विषयान्तरग्रहणस्याप्रति-
सन्धानमिन्द्रियान्तरेणेवेति ॥ १ ॥
न, विषयव्यवस्थानात् ? ॥ २ ॥
न देहादिसङ्घातादन्यश्चेतनः । कस्मात् ? विषयव्यवस्थानात् । व्यवस्थित-
विषयाणीन्द्रियाणि—चक्षुष्यसति रूपं न गृह्यते, सति च गृह्यते । यच्च यस्मिन्न-
दर्शन ( चक्षुरिन्द्रिय ) द्वारा जो अर्थ गृहीत हुआ, वही स्पर्शन ( त्वगिन्द्रिय ) से
भी गृहीत होता है, जैसे—'जिसको मैंने पहले आंखों देखा था आज उसे मैं छू भी रहा
हूँ' या 'जिसको मैं पहले कभी छू पाया था उसे आज आँखों देख रहा हूँ'—ये दोनों ज्ञान
एकविषय तथा एककर्तृक प्रतिगृहीत होते हैं, न कि सङ्घातकर्तृक या इन्द्रियविशेष द्वारा
एककर्तृक हो सकते हैं । यह जो एक है और चक्षु एवं त्वगिन्द्रिय से एकार्थ का ग्रहण
करता है वह प्रमाता 'ये दोनों ज्ञान भिन्नेन्द्रियनिमित्तक अनन्यकर्तृक ( आत्मकर्तृक )
तथा समानविषय वाले हैं'—ऐसा प्रतिसन्धान करता है । वह अन्य अर्थ आत्मा है ।
इन्द्रियविशेष द्वारा एककर्तृक क्यों नहीं ? इन्द्रियाँ अनन्यकर्तृक स्वस्वविषयक ज्ञान
की उत्पादक हो सकती हैं, न कि इन्द्रियान्तर के विषयान्तर के ज्ञान की । सङ्घातकर्तृक
क्यों नहीं ? यह एक ही व्यक्ति भिन्न इन्द्रियों के निमित्त वाले स्वात्मकर्तृक दो ज्ञानों
का अनुसन्धान कर सकता है, यह सङ्घात नहीं हैं; क्योंकि एक सङ्घात दूसरे विषय का
ग्रहण करने में समर्थ नहीं होता, किंतु अपने-अपने विषय का ग्रहण करने में समर्थ है ।
अतः इससे भी परस्पर भिन्न इन्द्रिय की तरह से अननुसन्धान ही रहेगा ? ॥ १ ॥
शंका—
अन्य चेतन की आवश्यकता नहीं; क्योंकि इन्द्रियों के विषयनियम से ही काम चल
जायेगा ? ॥ २ ॥
देहादिसङ्घात से अन्य चेतन मानने की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि इन्द्रियों के
विषयनियम से व्यवस्था बन जायेगी । इन्द्रियाँ व्यवस्थित विषय वाली हैं—चक्षु के न
रहने पर रूप का ग्रहण नहीं होता, उसके रहने पर होता है । जो जिसके न होने पर