न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
'४. सू० ] उत्कर्षसमादिजातिषट्कप्रकरणम् ३४७
'४. सू० ] उत्कर्षसमादिजातिषट्कप्रकरणम् ३४७
सा तु धर्मविशेषे नोपपद्यते, गोसाधर्म्याद् गोत्वाज्जातिविशेषाद् गौः सिद्ध्यति,
न तु सास्नादिसम्बन्धात्¹। अश्वादिवैधर्म्याद् गोत्वादेव च गौः सिद्ध्यति, न
गुणादिभेदात्। तच्चैतत् कृतव्याख्यानमवयवप्रकरणे—'प्रमाणानामभिसम्ब-
न्धाच्चैकार्थकारित्वं समानं वाक्ये' इति ( १.१.३९ ) । हेत्वाभासाश्रया खल्विय-
मव्यवस्थेति ॥ ३ ॥
उत्कर्षसमादिजातिषट्कप्रकरणम् [ ४-६ ]
साध्यदृष्टान्तयोर्धर्मविकल्पादुभयसाध्यत्वाच्चोत्कर्षापकर्षवर्ण्यवर्ण्य-
विकल्पसाध्यसमाः ॥ ४ ॥
दृष्टान्तधर्मं साध्ये समासजतः उत्कर्षसमः। यदि क्रियाहेतुगुणयोगाल्लोष्टवत्
क्रियावानात्मा, लोष्टवदेव स्पर्शवानपि प्राप्नोति। अथ न स्पर्शवान्, लोष्टवत्
क्रियावानपि न प्राप्नोति। विपर्यये वा विशेषो वक्तव्य इति।
साध्ये धर्माभावं दृष्टान्तात् प्रसजतोऽपकर्षसमः। लोष्टः खलु क्रियावान्
विभुर्दृष्टः, काममात्माऽपि क्रियावान् विभुरस्तु, विपर्यये वा विशेषो वक्तव्य इति।
ख्यापनीयो वर्ण्यः, विपर्ययादवर्ण्यः। तावेतौ साध्यदृष्टान्तधर्मौ विपर्यस्यतो
किन्तु यह अव्यवस्था धर्मविशेष ( स्वाभाविक व्याप्तिसम्बन्ध ) में नहीं बनेगी। गौ
की सिद्धि गोसाधर्म्य द्वारा गोत्वजातिविशेष से होती है, न कि केवल सास्नादि सम्बन्ध
से। इसी तरह अश्वादि वैधर्म्य द्वारा गोत्व से ही गौ सिद्ध होती है न कि गुणादिभेद से।
इन सब बातों का हम पीछे 'अवयवप्रकरण' ( १. १. ३९ ) में विस्तृत व्याख्यान कर चुके
हैं कि 'प्रमाणों के अभिसम्बन्ध से वाक्य में एकार्थकारित्व समान ही हैं'। इस जात्युद्भा-
वन से की जानेवाली अव्यवस्था का प्रयोग असत् साधनों ( हेत्वाभासों ) में करना
चाहिये, न कि सत्साधनों (हेतुओं) में ॥ ३ ॥
साध्य तथा दृष्टान्त के धर्मविकल्प से दोनों के ही सिद्ध होने से उत्कर्षसम, अप-
कर्षसम, वर्ण्यसम, अवर्ण्यसम, विकल्पसम तथा साध्यसम—ये ६ प्रतिषेध बनते हैं ॥४॥
'दृष्टान्त में अन्य दृष्ट धर्म का साध्य में वर्तमान धर्म के साथ आपादन 'उत्कर्षसम'
प्रतिषेध कहलाता है। जैसे—यदि क्रियाहेतुगुणयोग से लोष्ट की तरह आत्मा क्रियावान्
है तो वह लोष्ट की तरह स्पर्शवान् भी होना चाहिये, यदि स्पर्शवान् नहीं है तो लोष्ट
की तरह क्रियावान् भी नहीं हो सकता। विपर्यय में विशेष हेतु बतलाना होगा।
दृष्टान्त में दृष्ट धर्माभाव को साध्य में आपादन करना 'अपकर्षसम' कहलाता है;
जैसे—'लोष्ट क्रियावान् तथा अविभु देखा गया है, क्यों न आत्मा को भी ऐसा ही मान
लें, विपरीत में विशेष हेतु देना होगा।
पक्ष एवं दृष्टान्त में साधर्म्यमात्र से पक्षधर्मत्व का निर्णय करना 'वर्ण्यसम'
कहलाता है !
१. 'सास्नादीत्यतद्गुणसंविज्ञानो बहुव्रीहिः, तेन व्यभिचारिणः शृङ्गादयो गृह्यन्ते'
इति तात्पर्याचार्याः ।
३४८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ०
वर्ण्यावर्ण्यसमौ भवतः ।
साधनधर्मयुक्ते दृष्टान्ते धर्मान्तरविकल्पात् साध्यधर्मविकल्पं प्रसजतो
विकल्पसमः । क्रियाहेतुगुणयुक्तं किञ्चिद् गुरु यथा लोष्टः, किञ्चिल्लघु यथा
वायुः । एवं क्रियाहेतुगुणयुक्तं किञ्चित्क्रियावत् स्यात् यथा लोष्टः, किञ्चिद-
क्रियं यथा आत्मा । विशेषो वा वाच्य इति ।
हेत्वाद्यवयवसामर्थ्ययोगी धर्मः साध्यः, तं दृष्टान्ते प्रसजतः साध्यसमः ।
'यदि यथा लोष्टस्तथाऽऽत्मा'; प्राप्तस्तर्हि 'यथाऽऽत्मा तथा लोष्टः' इति । साध्य-
श्चायमात्मा क्रियावानिति कामं लोष्टोऽपि साध्यः । अथ नैवम्, न तर्हि 'यथा
लोष्टः तथाऽऽत्मा' ॥ ४ ॥
एतेषामुत्तरम्—
किञ्चित्साधर्म्यादुपसंहारसिद्धेर्वैधर्म्यादप्रतिषेधः ॥ ५ ॥
अलभ्यः सिद्धस्य निह्नवः, सिद्धं च किञ्चित्साधर्म्यादुपमानम्—'यथा
गौस्तथा गवयः' इति । तत्र न लभ्यो गोगवययोर्धर्मविकल्पश्चोदयितुम् । एवं
साधके धर्मे दृष्टान्तादिसामर्थ्ययुक्ते न लभ्यः साध्यदृष्टान्तयोर्धर्मविकल्पाद्
वैधर्म्यात् प्रतिषेधो वक्तुमिति ॥ ५ ॥
दृष्टान्त के सादृश्यमात्र से पक्ष में साध्याभाव का आपादन 'अवर्ण्यसम' कहलाता है ।
साधनधर्मयुक्त दृष्टान्त में धर्मान्तरविकल्प से साध्यधर्मविकल्प का आपादन करना
'विकल्पसम' कहलाता है। जैसे—'क्रियाहेतुगुणयुक्त कोई गुरु होता है, जैसे लोष्ट, कोई
लघु होता है जैसे वायु; इसी तरह क्रियाहेतुगुण-युक्त कोई क्रियावान् होगा, जैसे—
लोष्ट, कोई अक्रिय भी होगा जैसे—आत्मा'। अन्यथा विशेष में कोई हेतु बतावें ।
हेत्वाद्यवयवसामर्थ्ययोगी धर्म साध्य होता है, उसका दृष्टान्त में आपादन करना
'साध्यसम' कहलाता है। जैसे—'यदि जैसा लोष्ट है वैसा ही आत्मा है तो जैसा आत्मा
है वैसा ही लोष्ट भी होना चाहिये, अभी तो आत्मा साध्य है, तो लोष्ट भी वैसा ही
होना चाहिये, यदि ऐसा नहीं है तो जैसा लोष्ट है वैसा आत्मा नहीं है' ॥ ४ ॥
इन छहों जातिप्रतिषेधों का उत्तर है—
किञ्चित्साधर्म्य से उपसंहारसिद्धि द्वारा वैधर्म्य से प्रतिषेध नहीं होता ॥ ५ ॥
सिद्ध को छिपाया नहीं जा सकता, उसे जैसा है वैसा स्वीकार करना पड़ेगा ।
वे ही सिद्ध कुछ सादृश्य लेकर ही उपमान बनते हैं, जैसे—'जैसी गौ वैसा गवय होता
है'—यहाँ गौ तथा गवय के पूर्णसादृश्य ( सास्नादिमत्त्वेन ) के लिये आप आग्रह नहीं
कर सकते । कुछ न कुछ असमानता तो होगी ही । इस प्रकार साधक धर्म में दृष्टान्त के
सभी धर्म न मिलें तो साध्य तथा दृष्टान्त के धर्मविकल्प से प्रश्न तथा प्रतिषेध—दोनों
ही अनुचित हैं ॥ ५ ॥
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