महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
[कपिला गौमें देवताओंके निवासस्थानका तथा उसके माहात्म्यका, अयोग्य ब्राह्मणका, नरकमें ले जानेवाले पापोंका तथा स्वर्गमें ले जानेवाले पुण्योंका वर्णन]
[कपिला गौमें देवताओंके निवासस्थानका तथा उसके माहात्म्यका, अयोग्य ब्राह्मणका, नरकमें ले जानेवाले पापोंका तथा स्वर्गमें ले जानेवाले पुण्योंका वर्णन]
वैशम्पायन उवाच
एवं श्रुत्वा परं पुण्यं कपिलादानमुत्तमम् ।
धर्मपुत्रः प्रहृष्टात्मा केशवं पुनरब्रवीत् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार परम पुण्यमय कपिला गौके उत्तम दानका वर्णन सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिरका मन बहुत प्रसन्न हुआ और उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णसे पुनः इस प्रकार प्रश्न किया— ।।
देवदेवेश कपिला यदा विप्राय दीयते ।
कथं सर्वेषु चाङ्गेषु तस्यास्तिष्ठन्ति देवताः ॥
‘देवदेवेश्वर! जो कपिला गौ ब्राह्मणको दानमें दी जाती है, उसके सम्पूर्ण अंगोंमें देवता किस प्रकार रहते हैं? ।।
याश्चैताः कपिलाः प्रोक्ता दश चैव त्वया मम ।
तासां कति सुरश्रेष्ठ कपिलाः पुण्यलक्षणाः ॥
‘सुरश्रेष्ठ! आपने जो दस प्रकारकी कपिला गौएँ बतलायी हैं, उनमेंसे कितनी कपिलाएँ पुण्यमयी मानी जाती हैं’? ।।
युधिष्ठिरेणैवमुक्तः केशवः सत्यवाक् तदा ।
गुह्यानां परमं गुह्यं प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥
शृणु राजन् पवित्रं वै रहस्यं धर्ममुत्तमम् ॥
युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर उस समय सत्यवादी भगवान् श्रीकृष्ण गोपनीयसे भी अत्यन्त गोपनीय कथा कहने लगे—‘राजन्! मैं परम पवित्र, गोपनीय एवं उत्तम धर्मका वर्णन करता हूँ, सुनो ।।
इदं पठति यः पुण्यं कपिलादानमुत्तमम् ।
प्रातरुत्थाय मद्भक्त्या तस्य पुण्यफलं शृणु ॥
‘जो मनुष्य सबेरे उठकर मुझमें भक्ति रखते हुए इस परम पुण्यमय उत्तम कपिला-दानके माहात्म्यका पाठ करता है, उसके पुण्यका फल सुनो ।।
मनसा कर्मणा वाचा मतिपूर्वं युधिष्ठिर ।
पापं रात्रिकृतं हन्यादस्याध्यायस्य पाठकः ॥
‘युधिष्ठिर! इस अध्यायका पाठ करनेवाला मनुष्य रात्रिमें मन, वाणी अथवा क्रियाद्वारा जान-बूझकर किये हुए सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ।।
इदमावर्तमानस्तु श्राद्धे यस्तर्पयेद् द्विजान् ।
तस्याप्यमृतमश्नन्ति पितरोऽत्यन्तहर्षिताः ॥
‘जो श्राद्धकालमें इस अध्यायका पाठ करते हुए ब्राह्मणोंको भोजन आदिसे तृप्त करता है, उसके पितर अत्यन्त प्रसन्न होकर अमृत भोजन करते हैं ।।
यश्चेदं शृणुयाद् भक्त्या मद्गतेनान्तरात्मना ।
तस्य रात्रिकृतं सर्वं पापमाशु प्रणश्यति ।।
‘जो मुझमें चित्त लगाकर इस प्रसंगको भक्तिपूर्वक सुनता है, उसके एक रातके सारे पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं ।।
अतः परं विशेषं तु कपिलानां ब्रवीमि ते ।
यश्चैताः कपिलाः प्रोक्ता दश राजन् मया तव ।
तासां चतस्रः प्रवराः पुण्याः पापविनाशनाः ।।
‘अब मैं कपिला गौके सम्बन्धमें विशेष बातें बतला रहा हूँ। राजन्! पहले जो मैंने तुम्हें दस प्रकारकी कपिला गौएँ बतलायी हैं, उनमें चार कपिलाएँ अत्यन्त श्रेष्ठ, पुण्य प्रदान करनेवाली तथा पाप नष्ट करनेवाली हैं ।।
सुवर्णकपिला पुण्यास्तथा रक्ताक्षपिङ्गला ।
पिङ्गलाक्षी च या गौश्च स्यात् पिङ्गलपिङ्गला ।।
एताश्चतस्रः प्रवराः पवित्राः पापनाशनाः ।
नमस्कृता वा दृष्टा वा घ्नन्ति पापं नरस्य तु ।।
‘सुवर्णकपिला, रक्ताक्षपिंगला, पिंगलाक्षी और पिंगलपिंगला—ये चार प्रकारकी कपिलाएँ श्रेष्ठ, पवित्र और पाप दूर करनेवाली हैं। इनके दर्शन और नमस्कारसे भी मनुष्यके पाप नष्ट हो जाते हैं ।।
यस्यैताः कपिलाः सन्ति गृहे पापप्रणाशनाः ।
तत्र श्रीर्विजयः कीर्तिः स्फीता नित्यं युधिष्ठिर ।।
‘युधिष्ठिर! ये पापनाशिनी कपिला गौएँ जिसके घरमें मौजूद रहती हैं वहाँ श्री, विजय और विशाल कीर्तिका नित्य निवास होता है ।।
एतासां प्रीतिमायाति क्षीरेण तु वृषध्वजः ।
दध्ना च त्रिदशाः सर्वे घृतेन तु हुताशनः ।।
‘इनके दूधसे भगवान् शंकर, दहीसे सम्पूर्ण देवता और घीसे अग्निदेव तृप्त होते हैं ।।
कपिलाया घृतं क्षीरं दधि पायसमेव वा ।
श्रोत्रियेभ्यः सकृद् दत्त्वा नरः पापैः प्रमुच्यते ।।
‘कपिला गौके घी, दूध, दही अथवा खीरका एक बार भी श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको दान करके मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है ।।
उपवासं तु यः कृत्वाप्यहोरात्रं जितेन्द्रियः ।
कपिलापञ्चगव्यं तु पीत्वा चान्द्रायणात् परम् ।।
'जो जितेन्द्रिय रहकर एक दिन-रात उपवास करके कपिला गौका पञ्चगव्य पान करता है, उसे चान्द्रायणसे बढ़कर उत्तम फलकी प्राप्ति होती है॥
सौम्ये मुहूर्ते तत् प्राश्य शुद्धात्मा शुद्धमानसः।
क्रोधानृतविनिर्मुक्तो मद्गतेनान्तरात्मना॥
'जो क्रोध और असत्यका त्याग करके मुझमें चित्त लगाकर शुभ मुहूर्तमें कपिला गौके पंचगव्यका आचमन करता है, उसका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है॥
कपिलापञ्चगव्येन समन्त्रेण पृथक् पृथक्।
यो मत्प्रतिकृतिं वापि शङ्कराकृतिमेव वा।
स्नापयेद् विषुवे यस्तु सोऽश्वमेधफलं लभेत्॥
'जो विषुवयोगमें पृथक्-पृथक् मन्त्र पढ़कर कपिलाके पञ्चगव्यसे मेरी या शंकरकी प्रतिमाको स्नान कराता है, उसे अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है॥
स मुक्तपापः शुद्धात्मा यानेनाम्बरशोभिना।
मम लोकं व्रजेन्मुक्तो रुद्रलोकमथापि वा॥
'वह मुक्त, निष्पाप एवं शुद्धचित्त होकर आकाशकी शोभा बढ़ानेवाले विमानके द्वारा मेरे अथवा रुद्रके लोकमें गमन करता है॥
तस्मात् तु कपिला देया परत्र हितमिच्छता॥
यदा च दीयते राजन् कपिला ह्यग्निहोत्रिणे।
तदा च शृङ्गयोस्तस्या विष्णुरिन्द्रश्च तिष्ठतः।
'राजन्! इसलिये परलोकमें हित चाहनेवाले पुरुषको कपिला गौका दान अवश्य करना चाहिये। जिस समय अग्निहोत्री ब्राह्मणको कपिला गौ दानमें दी जाती है, उस समय उसके सींगोंके ऊपरी भागमें विष्णु और इन्द्र निवास करते हैं॥
चन्द्रवज्रधरौ चापि तिष्ठतः शृङ्गमूलयोः।
शृङ्गमध्ये तथा ब्रह्मा ललाटे गोर्वृषध्वजः॥
'सींगोंकी जड़में चन्द्रमा और वज्रधारी इन्द्र रहते हैं। सींगोंके बीचमें ब्रह्मा तथा ललाटमें भगवान् शंकरका निवास होता है॥'
कर्णयोरश्विनौ देवौ चक्षुषी शशिभास्करौ।
दन्तेषु मरुतो देवा जिह्वायां वाक् सरस्वती॥
रोमकूपेषु मुनयश्चर्मण्येव प्रजापतिः।
निःश्वासेषु स्थिता वेदाः सषडङ्गपदक्रमाः॥
'दोनों कानोंमें अश्विनीकुमार, नेत्रोंमें चन्द्रमा और सूर्य, दाँतोंमें मरुद्गण, जिह्वामें सरस्वती, रोमकूपोंमें मुनि, चमड़ेमें प्रजापति एवं श्वासोंमें षडंग, पद और क्रमसहित चारों वेदोंका निवास है॥
नासापुटे स्थिता गन्धाः पुष्पाणि सुरभीणि च।
अधरे वसवः सर्वे मुखे चाग्निः प्रतिष्ठितः ॥
‘नासिका-छिद्रोंमें गन्ध और सुगन्धित पुष्प, नीचेके ओठमें सब वसुगण तथा मुखमें अग्नि निवास करते हैं ।।
साध्या देवाः स्थिताः कक्षे ग्रीवायां पार्वती स्थिता ।
पृष्ठे च नक्षत्रगणाः ककुद्देशे नभःस्थलम् ॥
अपाने सर्वतीर्थानि गोमूत्रे जाह्नवी स्वयम् ।
अष्टैश्वर्यमयी लक्ष्मीर्गोमये वसते सदा ।।
‘कक्षमें साध्य-देवता, गरदनमें पार्वती, पीठपर नक्षत्रगण, ककुद्के स्थानमें आकाश, अपानमें सारे तीर्थ, मूत्रमें साक्षात् गंगाजी तथा गोबरमें आठ ऐश्वर्योंसे सम्पन्न लक्ष्मीजी रहती हैं ।।
नासिकायां सदा देवी ज्येष्ठा वसति भामिनी ।
श्रोणीतटस्थाः पितरो रमा लाङ्गूलमाश्रिता ॥
‘नासिकामें परम सुन्दरी ज्येष्ठादेवी, नितम्बोंमें पितर एवं पूँछमें भगवती रमा रहती हैं ।।
पार्श्वयोरुभयोः सर्वे विश्वेदेवाः प्रतिष्ठिताः ।
तिष्ठत्युरसि तासां तु प्रीतः शक्तिधरो गुहः ॥
‘दोनों पसलियोंमें सब विश्वेदेव स्थित हैं और छातीमें प्रसन्नचित्त शक्तिधारी कार्तिकेय रहते हैं ।।
जानुजङ्घोरुदेशेषु पञ्च तिष्ठन्ति वायवः ।
खुरमध्येषु गन्धर्वाः खुराग्रेषु च पन्नगाः ॥
‘घुटनों और ऊरुओंमें पाँच वायु रहते हैं, खुरोंके मध्यमें गन्धर्व और खुरोंके अग्रभागमें सर्प निवास करते हैं ।।
चत्वारः सागराः पूर्णास्तस्या एव पयोधराः ।
रतिर्मेधा क्षमा स्वाहा श्रद्धा शान्तिर्धृतिः स्मृतिः ।
कीर्तिर्दीप्तिः क्रिया कान्तिस्तुष्टिः पुष्टिश्श्व संततिः ।
दिशश्च प्रदिशश्चैव सेवन्ते कपिलां सदा ॥
‘जलसे परिपूर्ण चारों समुद्र उसके चारों स्तन हैं। रति, मेधा, क्षमा, स्वाहा, श्रद्धा, शान्ति, धृति, स्मृति, कीर्ति, दीप्ति, क्रिया, कान्ति, तुष्टि, पुष्टि, संतति, दिशा और प्रदिशा आदि देवियाँ सदा कपिला गौका सेवन किया करती हैं ।।
देवाः पितृगणाश्चापि गन्धर्वाप्सरसां गणाः ।
लोका द्वीपार्णवाश्चैव गङ्गाद्याः सरितस्तथा ॥
देवाः पितृगणाश्चापि वेदाः साङ्गाः सहाध्वरैः ।
वेदोक्तैर्विविधैर्मन्त्रैः स्तुवन्ति हृषितास्तथा ॥
विद्याधराश्च ये सिद्धा भूतास्तारागणास्तथा ।
पुष्पवृष्टिं च वर्षन्ति प्रनृत्यन्ति च हर्षिताः ॥
‘देवता, पितर, गन्धर्व, अप्सराएँ, लोक, द्वीप, समुद्र, गंगा आदि नदियाँ तथा अंगों और यज्ञोंसहित सम्पूर्ण वेद नाना प्रकारके मन्त्रोंसे कपिला गौकी प्रसन्नतापूर्वक स्तुति किया करते हैं। विद्याधर, सिद्ध, भूतगण और तारागण—ये कपिला गौको देखकर फूलोंकी वर्षा करते और हर्षमें भरकर नाचने लगते हैं’ ॥
ब्रह्मणोत्पादिता देवी वह्निकुण्डान्महाप्रभा ।
नमस्ते कपिले पुण्ये सर्वदेवैर्नमस्कृते ॥
कपिलेऽथ महासत्त्वे सर्वतीर्थमये शुभे ।
‘वे कहते हैं—‘सम्पूर्ण देवताओंसे वन्दित पुण्यमयी कपिलादेवी! तुम्हें नमस्कार है। ब्रह्माजीने तुम्हें अग्निकुण्डसे उत्पन्न किया है। तुम्हारी प्रभा विस्तृत और शक्ति महान् है। कपिलादेवी! समस्त तीर्थ तुम्हारे ही स्वरूप हैं और तुम सबका शुभ करनेवाली हो’ ॥
अहो रत्नमिदं पुण्यं सर्वदुःखघ्नमुत्तमम् ।
अहो धर्मार्जितं शुद्धमिदमग्र्यं महाधनम् ॥
इत्याकाशस्थितास्ते तु सर्वदेवा जपन्ति च ॥
‘समस्त देवता आकाशमें खड़े होकर कहा करते हैं—‘अहो! यह कपिला गौरूपी रत्न कितना पवित्र और कितना उत्तम है! यह सब दुःखोंको दूर करनेवाला है। अहा! यह धर्मसे उपार्जित, शुद्ध, श्रेष्ठ और महान् धन है’ ॥
युधिष्ठिर उवाच
देवदेवेश दैत्यघ्न कालः को हव्यकव्ययोः ।
के तत्र पूजामर्हन्ति वर्जनीयाश्च के द्विजाः ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**दैत्योंके विनाशक देवदेवेश्वर! हव्य (यज्ञ) और कव्य (श्राद्ध)-का उत्तम समय कौन-सा है? उसमें किन ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये और किनका परित्याग? ॥
श्रीभगवानुवाच
दैवं पूर्वाह्निकं ज्ञेयं पैतृकं चापराह्निकम् ।
कालहीनं च यद् दानं तद् दानं राजसं विदुः ॥
**श्रीभगवान्ने कहा—**युधिष्ठिर! देवकर्म (यज्ञ) पूर्वाह्नकालमें करने योग्य है और पितृकर्म (श्राद्ध) अपराह्नकालमें—ऐसा समझना चाहिये। जो दान अयोग्य समयमें किया जाता है, उस दानको राजस माना गया है ॥
अवघुष्टं च यद् भुक्तमनृतेन च भारत ।
परामृष्टं शुना वापि तद् भागं राक्षसं विदुः ॥
जिसके लिये लोगोंमें ढिंढोरा पीटा गया हो, जिसमेंसे किसी असत्यवादी मनुष्यने भोजन कर लिया हो तथा जो कुत्तेसे छू गया हो, उस अन्नको राक्षसोंका भाग समझना चाहिये।।
यावन्तः पतिता विप्रा जडोन्मत्तादयोऽपि च।
दैवे च पित्र्ये ते विप्रा राजन् नार्हन्ति सत्क्रियाम्।।
राजन्! जितने पतित, जड और उन्मत्त ब्राह्मण हों, उनका देव-यज्ञ और पितृ-यज्ञमें सत्कार नहीं करना चाहिये।।
क्लीबः प्लीही च कुष्ठी च राजयक्ष्मान्वितश्च यः।
अपस्मारी च यश्चापि पित्र्ये नार्हति सत्कृतिम्।।
नपुंसक, प्लीहा रोगसे ग्रस्त, कोढ़ी और राजयक्ष्मा तथा मृगीका रोगी भी श्राद्धमें आदरके योग्य नहीं माना गया है।।
चिकित्सका देवलका मिथ्यानियमधारिणः।
सोमविक्रयिणश्चापि श्राद्धे नार्हन्ति सत्कृतिम्।।
वैद्य, पुजारी, झूठे नियम धारण करनेवाले (पाखण्डी) तथा सोमरस बेचनेवाले ब्राह्मण श्राद्धमें सत्कार पानेके अधिकारी नहीं हैं।।
गायका नर्तकाश्चैव प्लवका वादकास्तथा।
कथका यौधिकाश्चैव श्राद्धे नार्हन्ति सत्कृतिम्।।
गवैये, नाचने-कूदनेवाले, बाजा बजानेवाले, बकवादी और योद्धा श्राद्धमें सत्कारके योग्य नहीं हैं।।
अनग्नयश्च ये विप्राः शवनिर्यातकाश्च ये।
स्तेनाश्चापि विकर्मस्था राजन् नार्हन्ति सत्कृतिम्।।
राजन्! अग्निहोत्र न करनेवाले, मुर्दा ढोनेवाले, चोरी करनेवाले और शास्त्रविरुद्ध कर्मसे संलग्न रहनेवाले ब्राह्मण भी श्राद्धमें सत्कार पानेयोग्य नहीं माने जाते।।
अपरिज्ञातपूर्वाश्च गणपुत्राश्च ये द्विजाः।
पुत्रिकापुत्रकाश्चापि श्राद्धे नार्हन्ति सत्कृतिम्।।
जो अपरिचित हों, जो किसी समुदायके पुत्र हों अर्थात् जिनके पिताका निश्चित पता न हो तथा जो पुत्रिका-धर्मके अनुसार नानाके घरमें रहते हों, वे ब्राह्मण भी श्राद्धके अधिकारी नहीं हैं।।
रणकर्ता च यो विप्रो यश्च वाणिज्यको द्विजः।
प्राणिविक्रयवृत्तिश्च श्राद्धे नार्हन्ति सत्कृतिम्।।
युद्धमें लड़नेवाला, रोजगार करनेवाला तथा पशु-पक्षियोंकी बिक्रीसे जीविका चलानेवाला ब्राह्मण भी श्राद्धमें सत्कार पानेका अधिकारी नहीं है।।
चीर्णव्रतगुणैर्युक्ता नित्यं स्वाध्यायतत्पराः।
सवित्रीज्ञाः क्रियावन्तस्ते श्राद्धे सत्कृतिक्षमाः ॥
परंतु जो ब्राह्मण व्रतका आचरण करनेवाले, गुणवान्, सदा स्वाध्यायपरायण, गायत्रीमन्त्रके ज्ञाता और क्रियानिष्ठ हों, वे श्राद्धमें सत्कारके योग्य माने गये हैं ॥
श्राद्धस्य ब्राह्मणः कालः प्राप्तं दधि घृतं तथा ।
दर्भाः सुमनसः क्षेत्रं तत्काले श्राद्धदो भवेत् ॥
श्राद्धका सबसे उत्तम काल है सुपात्र ब्राह्मणका मिलना। जिस समय भी ब्राह्मण, दही, घी, कुशा, फूल और उत्तम क्षेत्र प्राप्त हो जायँ, उसी समय श्राद्धका दान आस्मभ कर देना चाहिये ॥
चारित्रनिरता राजन् कृशा ये कृशवृत्तयः ।
तपस्विनश्च ये विप्रास्तथा भैक्षचराश्च ये ॥
अर्थिनः केचिदिच्छन्ति तेषां दत्तं महत् फलम् ।
राजन्! जो ब्राह्मण सदाचारी, थोड़ी-सी आजीविका-पर गुजारा करनेवाले, दुर्बल, तपस्वी और भिक्षासे निर्वाह करनेवाले हों, वे यदि याचक होकर कुछ माँगने आवें तो उन्हें दिये हुए दानका महान् फल होता है ॥
एवं धर्मभृतां श्रेष्ठ ज्ञात्वा सर्वात्मना तदा ।
श्रोत्रियाय दरिद्राय प्रयच्छानुपकारिणे ॥
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! इन सब बातोंको पूर्णरूपसे जानकर धनहीन और अपना उपकार न करनेवाले वेदवेत्ता ब्राह्मणको दान करो ॥
दानं यत् ते प्रियं किंचिच्छ्रोत्रियाणां च यत् प्रियम् ।
तत् प्रयच्छस्व धर्मज्ञ यदिच्छसि तदक्षयम् ॥
धर्मज्ञ! यदि तुम अपने दानको अक्षय बनाना चाहते हो तो जो दान तुम्हें प्रिय लगता हो तथा जिसे वेदवेत्ता ब्राह्मण पसंद करते हों, वही दान करो ॥
निरयं ये च गच्छन्ति तच्छृणुष्व युधिष्ठिर ॥
युधिष्ठिर! अब नरकमें जानेवाले पुरुषोंका वर्णन सुनो ॥
परदारापहर्तारः परदाराभिमर्शकाः ।
परदारप्रयोक्तारस्ते वै निरयगामिनः ॥
जो परायी स्त्रीका अपहरण करते हैं, परस्त्रीके साथ व्यभिचार करते हैं और दूसरोंकी स्त्रियोंको दूसरे पुरुषोंसे मिलाया करते हैं, वे भी नरकमें पड़ते हैं ॥
सूचकाः संधिभेत्तारः परद्रव्योपजीविनः ।
वर्णाश्रमाणां ये बाह्याः पाखण्डाश्चैव पापिनः ।
उपासते च तानेव ते सर्वे नरकालयाः ॥
चुगलखोर, सुलहकी शर्त तोड़नेवाले, पराये धनसे जीविका चलानेवाले, वर्ण और आश्रमसे विरुद्ध आचरण करनेवाले, पाखण्डी, पापाचारी तथा जो उनकी सेवा करते हैं, वे
सब नरकगामी होते हैं ।।
क्षान्तान् दान्तान् कृशान् प्राज्ञान् दीर्घकालं सहोषितान् ।
त्यजन्ति कृतकृत्या ये ते वै निरयगामिनः ॥
जो मनुष्य चिरकालतक अपने साथ रहे हुए सहनशील, जितेन्द्रिय, दुर्बल और बुद्धिमान् मनुष्योंको भी काम निकल जानेपर त्याग देते हैं, वे नरकगामी होते हैं ।।
बालानामपि वृद्धानां श्रान्तानां चापि ये नराः ।
अदत्त्वाश्नन्ति मृष्टान्नं ते वै निरयगामिनः ॥
जो बच्चों, बूढ़ों तथा थके हुए मनुष्योंको कुछ न देकर अकेले ही मिठाई खाते हैं, उन्हें भी नरकमें गिरना पड़ता है ।।
एते पूर्वर्षिभिः प्रोक्ता नरा निरयगामिनः ।
ये स्वर्गं समनुप्राप्तास्तान् शृणुष्व युधिष्ठिर ॥
प्राचीन कालके ऋषियोंने इस प्रकार नरकगामी मनुष्योंका वर्णन किया है। युधिष्ठिर! अब स्वर्गमें जानेवालोंका वर्णन सुनो ।।
दानेन तपसा चैव सत्येन च दमेन च ।
ये धर्ममनुवर्तन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ॥
जो दान, तपस्या, सत्य-भाषण और इन्द्रियसंयमके द्वारा निरन्तर धर्माचरणमें लगे रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।
शुश्रूषयाप्युपाध्यायाच्छ्रुतमादाय पाण्डव ।
ये प्रतिग्रहनिस्नेहास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥
पाण्डुनन्दन! जो उपाध्यायकी सेवा करके उनसे वेद पढ़ते तथा प्रतिग्रहमें आसक्ति नहीं रखते, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।
मधुमांसासवेभ्यस्तु निवृत्ता व्रतिनस्तु ये ।
परदारनिवृत्ता ये ते नराः स्वर्गगामिनः ॥
जो मधु, मांस, आसव (मदिरा)-से निवृत्त होकर उत्तम व्रतका पालन करते हैं और परस्त्रीके संसर्गसे बचे रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गको जाते हैं ।।
मातरं पितरं चैव शुश्रूषन्ति च ये नराः ।
भ्रातृणामपि सस्नेहास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥
जो मनुष्य माता-पिताकी सेवा करते हैं तथा भाइयोंके प्रति स्नेह रखते हैं, वे मनुष्य स्वर्गको जाते हैं ।।
ये तु भोजनकाले तु निर्याताश्चातिथिप्रियाः ।
द्वाररोधं न कुर्वन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ॥
जो भोजनके समय घरसे बाहर निकलकर अतिथि-सेवा करते हैं, अतिथियोंसे प्रेम रखते हैं और उनके लिये कभी अपना दरवाजा बंद नहीं करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते
हैं ।।
वैवाहिकं तु कन्यानां दरिद्राणां च ये नराः ।
कारयन्ति च कुर्वन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ।।
जो दरिद्र मनुष्योंकी कन्याओंका धनियोंसे ब्याह करा देते हैं अथवा स्वयं धनी होते हुए भी दरिद्रकी कन्यासे ब्याह करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं ।।
रसानामथ बीजानामोषधीनां तथैव च ।
दातारः श्रद्धयोपेतास्ते नराः स्वर्गगामिनः ।।
जो श्रद्धापूर्वक रस, बीज और ओषधियोंका दान करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।
क्षेमाक्षेमं च मार्गेषु समानि विषमाणि च ।
अर्थिनां ये च वक्ष्यन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ।।
जो मार्गमें जिज्ञासा करनेवाले पथिकोंको अच्छे-बुरे, सुखदायक और दुःखदायक मार्गका ठीक-ठीक परिचय दे देते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।
पर्वद्वये चतुर्दश्यामष्टम्यां संध्ययोर्द्वयोः ।
आर्द्रायां जन्मनक्षत्रे विषुवे श्रवणेऽथवा ।
ये ग्राम्यधर्मविरतास्ते नराः स्वर्गगामिनः ।।
जो अमावस्या, पूर्णिमा, चतुर्दशी, अष्टमी—इन तिथियोंमें दोनों संध्याओंके समय, आर्द्रा नक्षत्रमें, जन्म-नक्षत्रमें, विषुव योगमें और श्रवण नक्षत्रमें स्त्रीसमागमसे बचे रहते हैं, वे मनुष्य भी स्वर्गमें जाते हैं ।।
हव्यकव्यविधानं च नरकस्वर्गगामिनौ ।
धर्माधर्मौ च कथितौ किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।।
राजन्! इस प्रकार हव्य-कव्यके विधानका समय बताया गया और स्वर्ग तथा नरकमें ले जानेवाले धर्म-अधर्मोंका वर्णन किया गया। अब और क्या सुनना चाहते हो ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)