महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2171, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसब नरकगामी होते हैं ।।
क्षान्तान् दान्तान् कृशान् प्राज्ञान् दीर्घकालं सहोषितान् ।
त्यजन्ति कृतकृत्या ये ते वै निरयगामिनः ॥
जो मनुष्य चिरकालतक अपने साथ रहे हुए सहनशील, जितेन्द्रिय, दुर्बल और बुद्धिमान् मनुष्योंको भी काम निकल जानेपर त्याग देते हैं, वे नरकगामी होते हैं ।।
बालानामपि वृद्धानां श्रान्तानां चापि ये नराः ।
अदत्त्वाश्नन्ति मृष्टान्नं ते वै निरयगामिनः ॥
जो बच्चों, बूढ़ों तथा थके हुए मनुष्योंको कुछ न देकर अकेले ही मिठाई खाते हैं, उन्हें भी नरकमें गिरना पड़ता है ।।
एते पूर्वर्षिभिः प्रोक्ता नरा निरयगामिनः ।
ये स्वर्गं समनुप्राप्तास्तान् शृणुष्व युधिष्ठिर ॥
प्राचीन कालके ऋषियोंने इस प्रकार नरकगामी मनुष्योंका वर्णन किया है। युधिष्ठिर! अब स्वर्गमें जानेवालोंका वर्णन सुनो ।।
दानेन तपसा चैव सत्येन च दमेन च ।
ये धर्ममनुवर्तन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ॥
जो दान, तपस्या, सत्य-भाषण और इन्द्रियसंयमके द्वारा निरन्तर धर्माचरणमें लगे रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।
शुश्रूषयाप्युपाध्यायाच्छ्रुतमादाय पाण्डव ।
ये प्रतिग्रहनिस्नेहास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥
पाण्डुनन्दन! जो उपाध्यायकी सेवा करके उनसे वेद पढ़ते तथा प्रतिग्रहमें आसक्ति नहीं रखते, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।
मधुमांसासवेभ्यस्तु निवृत्ता व्रतिनस्तु ये ।
परदारनिवृत्ता ये ते नराः स्वर्गगामिनः ॥
जो मधु, मांस, आसव (मदिरा)-से निवृत्त होकर उत्तम व्रतका पालन करते हैं और परस्त्रीके संसर्गसे बचे रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गको जाते हैं ।।
मातरं पितरं चैव शुश्रूषन्ति च ये नराः ।
भ्रातृणामपि सस्नेहास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥
जो मनुष्य माता-पिताकी सेवा करते हैं तथा भाइयोंके प्रति स्नेह रखते हैं, वे मनुष्य स्वर्गको जाते हैं ।।
ये तु भोजनकाले तु निर्याताश्चातिथिप्रियाः ।
द्वाररोधं न कुर्वन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ॥
जो भोजनके समय घरसे बाहर निकलकर अतिथि-सेवा करते हैं, अतिथियोंसे प्रेम रखते हैं और उनके लिये कभी अपना दरवाजा बंद नहीं करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते