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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

जपनेयोग्य मन्त्र और सबेरे-शाम कीर्तन करनेयोग्य देवता, ऋषियों और राजाओंके मंगलमय नामोंका कीर्तन-माहात्म्य तथा गायत्रीजपका फल

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पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

जपनेयोग्य मन्त्र और सबेरे-शाम कीर्तन करनेयोग्य देवता, ऋषियों और राजाओंके मंगलमय नामोंका कीर्तन-माहात्म्य तथा गायत्रीजपका फल

युधिष्ठिर उवाच

पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
किं जप्यं जपतो नित्यं भवेद् धर्मफलं महत् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! आप महाज्ञानी और सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशेषज्ञ हैं। अतः मैं पूछता हूँ कि प्रतिदिन किस स्तोत्र या मन्त्रका जप करनेसे धर्मके महान् फलकी प्राप्ति हो सकती है? ॥ १ ॥

प्रस्थाने वा प्रवेशे वा प्रवृत्ते वापि कर्मणि ।
दैवे वा श्राद्धकाले वा किं जप्यं कर्मसाधनम् ॥ २ ॥
यात्रा, गृहप्रवेश अथवा किसी कर्मका आरम्भ करते समय, देवयज्ञमें या श्राद्धके समय किस मन्त्रका जप करनेसे कर्मकी पूर्ति हो जाती है? ॥ २ ॥

शान्तिकं पौष्टिकं रक्षा शत्रुघ्नं भयनाशनम् ।
जप्यं यद् ब्रह्मसमितं तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ ३ ॥
शान्ति, पुष्टि, रक्षा, शत्रुनाश तथा भय-निवारण करनेवाला कौन-सा ऐसा जपनीय मन्त्र है, जो वेदके समान माननीय है? आप उसे बतानेकी कृपा करें ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच

व्यासप्रोक्तमिमं मन्त्रं शृणुष्वैकमना नृप ।
सावित्र्या विहितं दिव्यं सद्यः पापविमोचनम् ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! महर्षि वेदव्यासका बताया हुआ यह एक मन्त्र है, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो। सावित्री देवीने इस दिव्यमन्त्रकी सृष्टि की है तथा यह तत्काल ही पापसे छुटकारा दिलानेवाला है ॥ ४ ॥

शृणु मन्त्रविधिं कृत्स्नं प्रोच्यमानं मयानघ ।
यं श्रुत्वा पाण्डवश्रेष्ठ सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५ ॥
अनघ! पाण्डवश्रेष्ठ! मैं इस मन्त्रकी सम्पूर्ण विधि बताता हूँ, सुनो। उसे सुनकर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ५ ॥

रात्रावहनि धर्मज्ञ जपन् पापैर्न लिप्यते ।
तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकमना नृप ॥ ६ ॥

धर्मज्ञ नरेश्वर! जो रात-दिन इस मन्त्रका जप करता है, वह पापोंसे लिप्त नहीं होता। वही मन्त्र मैं तुम्हें बता रहा हूँ, एकचित्त होकर सुनो ॥ ६ ॥
आयुष्मान् भवते चैव यं श्रुत्वा पार्थिवात्मज ।
पुरुषस्तु सुसिद्धार्थः प्रेत्य चेह च मोदते ॥ ७ ॥
राजकुमार! जो इस मन्त्रको सुनता है, वह पुरुष दीर्घजीवी तथा सफलमनोरथ होता है, इहलोक और परलोकमें भी आनन्द भोगता है ॥ ७ ॥
सेवितं सततं राजन् पुरा राजर्षिसत्तमैः ।
क्षत्रधर्मपरैर्नित्यं सत्यव्रतपरायणैः ॥ ८ ॥
राजन्! प्राचीनकालमें क्षत्रियधर्मका पालन करनेवाले और सदा सत्य व्रतके आचरणमें संलग्न रहनेवाले राजर्षिशिरोमणि इस मन्त्रका सदा ही जप किया करते थे ॥ ८ ॥
इदमाह्निकमव्यग्रं कुर्वद्भिर्नियतैः सदा ।
नृपैर्भरतशार्दूल प्राप्यते श्रीरनुत्तमा ॥ ९ ॥
भरतसिंह! जो राजा मन और इन्द्रियोंको वशमें करके शान्तिपूर्वक प्रतिदिन इस मन्त्रका जप करते हैं, उन्हें सर्वोत्तम सम्पत्ति प्राप्त होती है ॥ ९ ॥
नमो वसिष्ठाय महाव्रताय
पराशरं वेदनिधिं नमस्ये ।
नमोऽस्त्वनन्ताय महोरगाय
नमोऽस्तु सिद्धेभ्य इहाक्षयेभ्यः ॥ १० ॥
नमोऽस्त्वृषिभ्यः परमं परेषां
देवेषु देवं वरदं वराणाम् ।
सहस्रशीर्षाय नमः शिवाय
सहस्रनामाय जनार्दनाय ॥ ११ ॥
(यह मन्त्र इस प्रकार है—) महान् व्रतधारी वसिष्ठको नमस्कार है, वेदनिधि पराशरको नमस्कार है, विशाल सर्परूपधारी अनन्त (शेषनाग)-को नमस्कार है, अक्षय सिद्धगणको नमस्कार है, ऋषिवृन्दको नमस्कार है तथा परात्पर, देवाधिदेव, वरदाता परमेश्वरको नमस्कार है एवं सहस्र मस्तकवाले शिवको और सहस्रों नाम धारण करनेवाले भगवान् जनार्दनको नमस्कार है ॥ १०-११ ॥
अजैकपादहिर्बुध्न्यः पिनाकी चापराजितः ।
ऋतश्च पितृरूपश्च त्र्यम्बकश्च महेश्वरः ॥ १२ ॥
वृषाकपिश्च शम्भुश्च हवनोऽथेश्वरस्तथा ।
एकादशैते प्रथिता रुद्रास्त्रिभुवनेश्वराः ॥ १३ ॥
अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, पिनाकी, अपराजित, ऋत, पितृरूप त्र्यम्बक, महेश्वर, वृषाकपि, शम्भु, हवन और ईश्वर—ये ग्यारह रुद्र विख्यात हैं; जो तीनों लोकोंके स्वामी

हैं ।। १२-१३ ।।
शतमेतत् समाम्नातं शतरुद्रे महात्मनाम् ।
अंशो भगश्च मित्रश्च वरुणश्च जलेश्वरः ।। १४ ।।
तथा धातार्यमा चैव जयन्तो भास्करस्तथा ।
त्वष्टा पूषा तथैवेन्द्रो द्वादशो विष्णुरुच्यते ।। १५ ।।
इत्येते द्वादशादित्याः काश्यपेया इति श्रुतिः ।
वेदके शतरुद्रिय प्रकरणमें महात्मा रुद्रके सैकड़ों नाम बताये गये हैं। अंश, भग, मित्र, जलेश्वर, वरुण, धाता, अर्यमा, जयन्त, भास्कर, त्वष्टा, पूषा, इन्द्र तथा विष्णु—ये बारह आदित्य कहलाते हैं। ये सब-के-सब कश्यपके पुत्र हैं ।। १४-१५ १/२ ।।
धरो ध्रुवश्च सोमश्च सावित्रोऽथानिलोऽनलः ।। १६ ।।
प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः ।
धर, ध्रुव, सोम, सावित्र, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास—ये आठ वसु कहे गये हैं ।। १६ १/२ ।।
नासत्यश्चापि दस्रश्च स्मृतौ द्वावश्विनावपि ।। १७ ।।
मार्तण्डस्यात्मजावेतौ संज्ञानासाविनिर्गतौ ।
नासत्य और दस्र—ये दोनों अश्विनीकुमारके नामसे प्रसिद्ध हैं। इनकी उत्पत्ति भगवान् सूर्यके वीर्यसे हुई है। ये अश्वरूपधारिणी संज्ञा देवीके नाकसे प्रकट हुए थे (ये सब मिलाकर तैंतीस देवता हैं) ।। १७ १/२ ।।
अतः परं प्रवक्ष्यामि लोकानां कर्मसाक्षिणः ।। १८ ।।
अपि यज्ञस्य वेत्तारो दत्तस्य सुकृतस्य च ।
अदृश्याः सर्वभूतेषु पश्यन्ति त्रिदशेश्वराः ।। १९ ।।
शुभाशुभानि कर्माणि मृत्युः कालश्च सर्वशः ।
विश्वेदेवाः पितृगणा मूर्तिमन्तस्तपोधनाः ।। २० ।।
मुनयश्चैव सिद्धाश्च तपोमोक्षपरायणाः ।
शुचिस्मिताः कीर्त्यतां प्रयच्छन्ति शुभं नृणाम् ।। २१ ।।
अब मैं जगत्‌के कर्मपर दृष्टि रखनेवाले तथा यज्ञ, दान और सुकृतको जाननेवाले देवताओंका परिचय देता हूँ। ये देवगण स्वयं अदृश्य रहकर समस्त प्राणियोंके शुभाशुभकर्मोंको देखते रहते हैं। इनके नाम ये हैं—मृत्यु, काल, विश्वेदेव और मूर्तिमान् पितृगण। इनके सिवा तपस्वी मुनि तथा तप एवं मोक्षमें संलग्न सिद्ध महर्षि भी सम्पूर्ण जगत्‌पर हितकी दृष्टि रखते हैं। ये सब अपना नाम-कीर्तन करनेवाले मनुष्योंको शुभ फल देते हैं ।। १८—२१ ।।
प्रजापतिकृतानेताँल्लोकान् दिव्येन तेजसा ।
वसन्ति सर्वलोकेषु प्रयताः सर्वकर्मसु ।। २२ ।।

प्रजापति ब्रह्माजीने जिन लोकोंकी रचना की है, उन सबमें ये अपने दिव्य तेजसे निवास करते हैं तथा शुद्धभावसे सबके कर्मोंका निरीक्षण करते हैं ॥ २२ ॥

प्राणानामीश्वरानेतान् कीर्तयन् प्रयतो नरः ।
धर्मार्थकामैर्विपुलैर्युज्यते सह नित्यशः ॥ २३ ॥
ये सबके प्राणोंके स्वामी हैं। जो मनुष्य शुद्धभावसे नित्य इनका कीर्तन करता है, उसे प्रचुरमात्रामें धर्म, अर्थ और कामकी प्राप्ति होती है ॥ २३ ॥

लोकांश्च लभते पुण्यान् विश्वेश्वरकृतान् शुभान् ।
एते देवास्त्रयस्त्रिंशत् सर्वभूतगणेश्वराः ॥ २४ ॥
वह लोकनाथ ब्रह्माजीके रचे हुए मंगलमय पवित्र लोकोंमें जाता है। ऊपर बताये हुए तैंतीस देवता सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी हैं ॥ २४ ॥

नन्दीश्वरो महाकायो ग्रामणीर्वृषभध्वजः ।
ईश्वराः सर्वलोकानां गणेश्वरविनायकाः ॥ २५ ॥
सौम्या रौद्रा गणाश्चैव योगभूतगणास्तथा ।
ज्योतींषि सरितो व्योम सुपर्णः पतगेश्वरः ॥ २६ ॥
पृथिव्यां तपसा सिद्धाः स्थावराश्च चराश्च ह ।
हिमवान् गिरयः सर्वे चत्वारश्च महार्णवाः ॥ २७ ॥
भवस्यानुचराश्चैव हरतुल्यपराक्रमाः ।
विष्णुर्देवोऽथ जिष्णुश्च स्कन्दश्चाम्बिकया सह ॥ २८ ॥
कीर्तयन् प्रयतः सर्वान् सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
इसी प्रकार नन्दीश्वर, महाकाय, ग्रामणी, वृषभध्वज, सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी गणेश, विनायक, सौम्यगण, रुद्रगण, योगगण, भूतगण, नक्षत्र, नदियाँ, आकाश, पक्षिराज गरुड़, पृथ्वीपर तपसे सिद्ध हुए महात्मा, स्थावर, जंगम, हिमालय, समस्त पर्वत, चारों समुद्र, भगवान् शंकरके तुल्य पराक्रमवाले उनके अनुचरगण, विष्णुदेव, जिष्णु, स्कन्द और अम्बिका—इन सबके नामोंका शुद्धभावसे कीर्तन करनेवाले मनुष्यके सब पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ २५—२८ १/२ ॥

अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि मानवानृषिसत्तमान् ॥ २९ ॥
यवक्रीतश्च रैभ्यश्च अर्वावसुपरावसू ।
औशिजश्चैव कक्षीवान् बलश्चाङ्गिरसः सुतः ॥ ३० ॥
ऋषिर्मेधातिथेः पुत्रः कण्वो बर्हिषदस्तथा ।
ब्रह्मतेजोमयाः सर्वे कीर्तिता लोकभावनाः ॥ ३१ ॥
अब श्रेष्ठ महर्षियोंके नाम बता रहा हूँ—यवक्रीत, रैभ्य, अर्वावसु, परावसु, उशिजके पुत्र कक्षीवान्, अंगिरानन्दन बल, मेधातिथिके पुत्र कण्व ऋषि और बर्हिषद—ये सब ऋषि ब्रह्मतेजसे सम्पन्न और लोकस्रष्टा बतलाये गये हैं ॥ २९—३१ ॥

लभन्ते हि शुभं सर्वे रुद्रानलवसुप्रभाः ।
भुवि कृत्वा शुभं कर्म मोदन्ते दिवि दैवतैः ॥ ३२ ॥
इनका तेज रुद्र, अग्नि तथा वसुओंके समान है। ये पृथ्वीपर शुभकर्म करके अब स्वर्गमें देवताओंके साथ आनन्दपूर्वक रहते हैं और शुभफलका उपभोग करते हैं ॥ ३२ ॥
महेन्द्रगुरवः सप्त प्राचीं वै दिशमाश्रिताः ।
प्रयतः कीर्तयेदेतान् शक्रलोके महीयते ॥ ३३ ॥
महेन्द्रके गुरु सातों महर्षि पूर्व दिशामें निवास करते हैं। जो पुरुष शुद्धचित्तसे इनका नाम लेता है, वह इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ३३ ॥
उन्मुचुःप्रमुचुश्चैव स्वस्त्यात्रेयश्च वीर्यवान् ।
दृढव्यश्चोर्ध्वबाहुश्च तृणसोमाङ्गिरास्तथा ॥ ३४ ॥
मित्रावरुणयोः पुत्रस्तथागस्त्यः प्रतापवान् ।
धर्मराजर्त्विजः सप्त दक्षिणां दिशमाश्रिताः ॥ ३५ ॥
उन्मुचु, प्रमुचु, शक्तिशाली स्वस्त्यात्रेय, दृढव्य, ऊर्ध्वबाहु, तृणसोमांगिरा और मित्रावरुणके पुत्र महाप्रतापी अगस्त्य मुनि—ये सात धर्मराज (यम)-के ऋत्विज् हैं और दक्षिण दिशामें निवास करते हैं ॥ ३४-३५ ॥
दृढेयुश्च ऋतेयुश्च परिव्याधश्च कीर्तिमान् ।
एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चादित्यसंनिभाः ॥ ३६ ॥
अत्रेः पुत्रश्च धर्मात्मा ऋषिः सारस्वतस्तथा ।
वरुणस्यर्त्विजः सप्त पश्चिमां दिशमाश्रिताः ॥ ३७ ॥
दृढेयु, ऋतेयु, कीर्तिमान् परिव्याध, सूर्यके सदृश तेजस्वी एकत, द्वित, त्रित तथा धर्मात्मा अत्रिके पुत्र सारस्वत मुनि—ये सात वरुणके ऋत्विज् हैं और पश्चिम दिशामें इनका निवास है ॥ ३६-३७ ॥
अत्रिर्वसिष्ठो भगवान् कश्यपश्व महानृषिः ।
गौतमश्च भरद्वाजो विश्वामित्रोऽथ कौशिकः ॥ ३८ ॥
ऋचीकतनयश्चोग्रो जमदग्निः प्रतापवान् ।
धनेश्वरस्य गुरवः सप्तैते उत्तराश्रिताः ॥ ३९ ॥
अत्रि, भगवान् वसिष्ठ, महर्षि कश्यप, गौतम, भरद्वाज, कुशिकवंशी विश्वामित्र और ऋचीकनन्दन प्रतापवान् उग्रस्वभाववाले जमदग्नि—ये सात उत्तर दिशामें रहनेवाले और कुबेरके गुरु (ऋत्विज्) हैं ॥ ३८-३९ ॥
अपरे मुनयः सप्त दिक्षु सर्वासवधिष्ठिताः ।
कीर्तिस्वस्तिकरा नृणां कीर्तिता लोकभावनाः ॥ ४० ॥
इनके सिवा सात महर्षि और हैं जो सम्पूर्ण दिशाओंमें निवास करते हैं। वे जगत्‌को उत्पन्न करनेवाले हैं। उपर्युक्त महर्षियोंका यदि नाम लिया जाय तो वे मनुष्योंकी कीर्ति

बढ़ाते और उनका कल्याण करते हैं॥ ४०॥
धर्मः कामश्च कालश्च वसुर्वासुकिरेव च।
अनन्तः कपिलश्चैव सप्तैते धरणीधराः ॥ ४१ ॥
धर्म, काम, काल, वसु, वासुकि, अनन्त और कपिल—ये सात पृथ्वीको धारण करनेवाले हैं॥ ४१ ॥
रामो व्यासस्तथा द्रौणिरश्वत्थामा च लोमशः।
इत्येते मुनयो दिव्या एकैकः सप्त सप्तधा ॥ ४२ ॥
परशुराम, व्यास, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा और लोमश—ये चारों दिव्य मुनि हैं। इनमेंसे एक-एक सात-सात ऋषियोंके समान हैं॥ ४२ ॥
शान्तिस्वस्तिकरा लोके दिशांपालाः प्रकीर्तिताः।
यस्यां यस्यां दिशि ह्येते तन्मुखः शरणं व्रजेत् ॥ ४३ ॥
ये सब ऋषि इस जगत्में शान्ति और कल्याणका विस्तार करनेवाले तथा दिशाओंके पालक कहे जाते हैं। ये जिस-जिस दिशामें निवास करें, उस-उस दिशाकी ओर मुँह करके इनकी शरण लेनी चाहिये॥ ४३॥
स्रष्टारः सर्वभूतानां कीर्तिता लोकपावनाः।
संवर्तो मेरुसावर्णी मार्कण्डेयश्च धार्मिकः ॥ ४४ ॥
सांख्ययोगौ नारदश्च दुर्वासाश्च महर्षिः।
अत्यन्ततपसो दान्तास्त्रिषु लोकेषु विश्रुताः ॥ ४५ ॥
ये सम्पूर्ण भूतोंके स्रष्टा और लोकपावन बताये गये हैं। संवर्त, मेरुसावर्णि, धर्मात्मा मार्कण्डेय, सांख्य, योग, नारद, महर्षि दुर्वासा—ये सात ऋषि अत्यन्त तपस्वी, जितेन्द्रिय और तीनों लोकोंमें विख्यात हैं॥ ४४-४५॥
अपरे रुद्रसंकाशाः कीर्तिता ब्रह्मलौकिकाः।
अपुत्रो लभते पुत्रं दरिद्रो लभते धनम् ॥ ४६ ॥
इन सब ऋषियोंके अतिरिक्त बहुत-से महर्षि रुद्रके समान प्रभावशाली हैं। इनका कीर्तन करनेसे ये ब्रह्मलोककी प्राप्ति करानेवाले होते हैं। उनके कीर्तनसे पुत्रहीनको पुत्र मिलता है और दरिद्रको धन॥ ४६॥
तथा धर्मार्थकामेषु सिद्धिं च लभते नरः।
पृथुं वैन्यं नृपवरं पृथ्वी यस्याभवत् सुता ॥ ४७ ॥
प्रजापतिं सार्वभौमं कीर्तयेद् वसुधाधिपम्।
इनका नाम लेनेवाले मनुष्यके धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धि होती है। वेनकुमार नृपश्रेष्ठ पृथुका, जिनकी यह पृथ्वी पुत्री हो गयी थी तथा जो प्रजापति एवं सार्वभौम सम्राट् थे, कीर्तन करना चाहिये॥ ४७ १/२॥
आदित्यवंशप्रभवं महेन्द्रसमविक्रमम् ॥ ४८ ॥

पुरूरवसमैलं च त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।

बुधस्य दयितं पुत्रं कीर्तयेद् वसुधाधिपम् ।। ४९ ।।

सूर्यवंशमें उत्पन्न और देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी इला और बुधके प्रिय पुत्र

त्रिभुवनविख्यात राजा पुरूरवाका नाम कीर्तन करें ।। ४८-४९ ।।

त्रिलोकविश्रुतं वीरं भरतं च प्रकीर्तयेत् ।

गवामयेन यज्ञेन येनेष्टं वै कृते युगे ।। ५० ।।

रन्तिदेवं महादेवं कीर्तयेत् परमद्युतिम् ।

विश्वजित्तपसोपेतं लक्षण्यं लोकपूजितम् ।। ५१ ।।

त्रिलोकीके विख्यात वीर भरतका नामोच्चारण करे, जिन्होंने सत्ययुगमें गवामय यज्ञका

अनुष्ठान किया था। उन विश्वविजयिनी तपस्यासे युक्त, शुभ लक्षणसम्पन्न एवं लोकपूजित

परम तेजस्वी महाराज रन्तिदेवका भी कीर्तन करें ।। ५०-५१ ।।

तथा श्वेतं च राजर्षिं कीर्तयेत् परमद्युतिम् ।

सगरस्यात्मजा येन प्लावितास्तारितास्तथा ।। ५२ ।।

महातेजस्वी राजर्षि श्वेतका तथा जिन्होंने सगरपुत्रोंको गंगाजलसे आप्लावित करके

उनका उद्धार किया था, उन महाराज भगीरथका भी कीर्तन एवं स्मरण करे ।। ५२ ।।

हुताशनसमानेतान् महारूपान् महौजसः ।

उग्रकायान् महासत्त्वान् कीर्तयेत् कीर्तिवर्धनान् ।। ५३ ।।

वे सभी राजा अग्निके समान तेजस्वी, अत्यन्त रूपवान्, महान् बलसम्पन्न,

उग्रशरीरवाले परम धीर और अपने कीर्तिको बढ़ानेवाले थे। इन सबका कीर्तन करना

चाहिये ।। ५३ ।।

देवानृषिगणांश्चैव नृपांश्च जगतीश्वरान् ।

सांख्यं योगं च परमं हव्यं कव्यं तथैव च ।। ५४ ।।

कीर्तितं परमं ब्रह्म सर्वश्रुतिपरायणम् ।

मङ्गल्यं सर्वभूतानां पवित्रं बहुकीर्तितम् ।। ५५ ।।

व्याधिप्रशमनं श्रेष्ठं पौष्टिकं सर्वकर्मणाम् ।

प्रयतः कीर्तयेच्चैतान् कल्यं सायं च भारत ।। ५६ ।।

देवताओं, ऋषियों तथा पृथ्वीपर शासन करनेवाले राजाओंका कीर्तन करना चाहिये।

सांख्ययोग, उत्तम हव्य-कव्य तथा समस्त श्रुतियोंके आधारभूत परब्रह्म परमात्माका कीर्तन

सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये मंगलमय परम पावन है। इनके बारंबार कीर्तनसे रोगोंका नाश होता

है। इससे सब कर्मोंमें उत्तम पुष्टि प्राप्त होती है। भारत! मनुष्यको प्रतिदिन सबेरे और

शामके समय शुद्धचित्त होकर भगवत्-कीर्तनके साथ ही उपर्युक्त देवताओं, ऋषियों और

राजाओंके भी नाम लेने चाहिये ।। ५४–५६ ।।

एते वै पान्ति वर्षन्ति भान्ति वान्ति सृजन्ति च।

एते विनायकाः श्रेष्ठा दक्षाः शान्ता जितेन्द्रियाः ।। ५७ ।।
ये देवता आदि जगत्की रक्षा करते, पानी बरसाते, प्रकाश और हवा देते तथा प्रजाकी सृष्टि करते हैं। ये ही विघ्नोंके राजा विनायक, श्रेष्ठ, दक्ष, क्षमाशील और जितेन्द्रिय हैं ।। ५७ ।।
नराणामशुभं सर्वे व्यपोहन्ति प्रकीर्तिताः ।
साक्षिभूता महात्मानः पापस्य सुकृतस्य च ।। ५८ ।।
ये महात्मा सब मनुष्योंके पाप-पुण्यके साक्षी हैं। इनका नाम लेनेपर ये सब लोग मानवोंके अमंगलका नाश करते हैं ।। ५८ ।।
एतान् वै कल्यमुत्थाय कीर्तयन् शुभमश्रुते ।
नाग्निचौरभयं तस्य न मार्गप्रतिरोधनम् ।। ५९ ।।
जो सबेरे उठकर इनके नाम और गुणोंका उच्चारण करता है, उसे शुभ कर्मोंके भोग प्राप्त होते हैं। उसके यहाँ आग और चोरका भय नहीं रहता तथा उसका मार्ग कभी रोका नहीं जाता ।। ५९ ।।
एतान् कीर्तयतां नित्यं दुःस्वप्नो नश्यते नृणाम् ।
मुच्यते सर्वपापेभ्यः स्वस्तिमांश्च गृहान् व्रजेत् ।। ६० ।।
प्रतिदिन इन देवताओंका कीर्तन करनेसे मनुष्योंका दुःस्वप्न नष्ट हो जाता है। वह सब पापोंसे मुक्त होता है और कुशलपूर्वक घर लौटता है ।। ६० ।।
दीक्षाकालेषु सर्वेषु यः पठेन्नियतो द्विजः ।
न्यायवानात्मनिरतः क्षान्तो दान्तोऽनसूयकः ।। ६१ ।।
जो द्विज दीक्षाके सभी अवसरोंपर नियमपूर्वक इन नामोंका पाठ करता है, वह न्यायशील, आत्मनिष्ठ, क्षमावान्, जितेन्द्रिय तथा दोष-दृष्टिसे रहित होता है ।। ६१ ।।
रोगार्तो व्याधियुक्तो वा पठन् पापात् प्रमुच्यते ।
वास्तुमध्ये तु पठतः कुले स्वस्त्ययनं भवेत् ।। ६२ ।।
रणे-व्याधिसे ग्रस्त मनुष्य इसका पाठ करनेपर पापमुक्त एवं नीरोग हो जाता है। जो अपने घरके भीतर इन नामोंका पाठ करता है, उसके कुलका कल्याण होता है ।। ६२ ।।
क्षेत्रमध्ये तु पठतः सर्वं सस्यं प्ररोहति ।
गच्छतः क्षेममध्वानं ग्रामान्तरगतः पठन् ।। ६३ ।।
खेतमें इस नाममालाको पढ़नेवाले मनुष्यकी सारी खेती जमती और उपजती है। जो गाँवके भीतर रहकर इस नामावलीका पाठ करता है, यात्रा करते समय उसका मार्ग सकुशल समाप्त होता है ।। ६३ ।।
आत्मनश्च सुतानां च दाराणां च धनस्य च ।
बीजानामोषधीनां च रक्षामेतां प्रयोजयेत् ।। ६४ ।।

अपनी, पुत्रोंकी, पत्नीकी, धनकी तथा बीजों और ओषधियोंकी भी रक्षाके लिये इस नामावलीका प्रयोग करे ॥ ६४ ॥

एतान् संग्रामकाले तु पठतः क्षत्रियस्य तु ।
व्रजन्ति रिपवो नाशं क्षेमं च परिवर्तते ॥ ६५ ॥
युद्धकालमें इन नामोंका पाठ करनेवाले क्षत्रियके शत्रु भाग जाते हैं और उसका सब ओरसे कल्याण होता है ॥ ६५ ॥

एतान् दैवे च पित्र्ये च पठतः पुरुषस्य हि ।
भुञ्जते पितरः कव्यं हव्यं च त्रिदिवौकसः ॥ ६६ ॥
जो देवयज्ञ और श्राद्धके समय उपर्युक्त नामोंका पाठ करता है, उस पुरुषके हव्यको देवता और कव्यको पितर सहर्ष स्वीकार करते हैं ॥ ६६ ॥

न व्याधिश्चापदभयं न द्विपान्न हि तस्करात् ।
कश्मलं लघुतां याति पाप्मना च प्रमुच्यते ॥ ६७ ॥
उसके यहाँ रोग या हिंसक जन्तुओंका भय नहीं रहता। हाथी अथवा चोरसे भी कोई बाधा नहीं आती। शोक कम हो जाता है और पापसे छुटकारा मिल जाता है ॥ ६७ ॥

यानपात्रे च याने च प्रवासे राजवेश्मनि ।
परां सिद्धिमवाप्नोति सावित्रीं ह्युत्तमां पठन् ॥ ६८ ॥
जो मनुष्य जहाजमें या किसी सवारीमें बैठनेपर, विदेशमें अथवा राजदरबारमें जानेपर मन-ही-मन उत्तम गायत्री-मन्त्रका जप करता है, वह परम सिद्धिको प्राप्त होता है ॥ ६८ ॥

न च राजभयं तेषां न पिशाचान्न राक्षसात् ।
नाग्न्यम्बुपवनव्यालाद् भयं तस्योपजायते ॥ ६९ ॥
गायत्रीका जप करनेसे द्विजको राजा, पिशाच, राक्षस, आग, पानी, हवा और साँप आदिका भय नहीं होता ॥ ६९ ॥

चतुर्णामपि वर्णानामाश्रमस्य विशेषतः ।
करोति सततं शान्तिं सावित्रीमुत्तमां पठन् ॥ ७० ॥
जो उत्तम गायत्री-मन्त्रका जप करता है, वह पुरुष चारों वर्णों और विशेषतः चारों आश्रमोंमें सदा शान्ति स्थापन करता है ॥ ७० ॥

नाग्निर्दहति काष्ठानि सावित्री यत्र पठ्यते ।
न तत्र बालो म्रियते न च तिष्ठन्ति पन्नगाः ॥ ७१ ॥
जहाँ गायत्रीका जप किया जाता है, उस घरके काठके किवाड़ोंमें आग नहीं लगती। वहाँ बालककी मृत्यु नहीं होती तथा उस घरमें साँप नहीं टिकते हैं ॥ ७१ ॥

न तेषां विद्यते दुःखं गच्छन्ति परमां गतिम् ।
ये शृण्वन्ति महद् ब्रह्म सावित्रीगुणकीर्तनम् ॥ ७२ ॥

उस घरके निवासी, जो परब्रह्मस्वरूप गायत्री-मन्त्रके गुणोंका कीर्तन सुनते हैं, उन्हें कभी दुःख नहीं होता है तथा वे परमगतिको प्राप्त होते हैं ॥ ७२ ॥

गवां मध्ये तु पठतो गावोऽस्य बहुवत्सलाः ।
प्रस्थाने वा प्रवासे वा सर्वावस्थां गतः पठेत् ॥ ७३ ॥
गौओंके बीचमें गायत्रीका जप करनेवाले पुरुषपर गौओंका वात्सल बहुत बढ़ जाता है। प्रस्थान-कालमें अथवा परदेशमें सभी अवस्थाओंमें मनुष्यको इसका जप करना चाहिये ॥ ७३ ॥

जपतां जुह्वतां चैव नित्यं च प्रयतात्मनाम् ।
ऋषीणां परमं जप्यं गुह्यमेतन्नराधिप ॥ ७४ ॥
नरेश्वर! सदा शुद्धचित्त होकर जप करे, होम करनेवाले ऋषियोंके लिये यह परम गोपनीय मन्त्र है ॥ ७४ ॥

याथातथ्येन सिद्धस्य इतिहासं पुरातनम् ।
पराशरमतं दिव्यं शकाय कथितं पुरा ॥ ७५ ॥
यह सिद्धिको प्राप्त हुए महर्षि वेदव्यासका कहा हुआ यथार्थ एवं प्राचीन इतिहास है। इसमें पराशर मुनिके दिव्य मतका वर्णन है। पूर्वकालमें इन्द्रको इसका उपदेश किया गया था ॥ ७५ ॥

तदेतत् ते समाख्यातं तथ्यं ब्रह्म सनातनम् ।
हृदयं सर्वभूतानां श्रुतिरेषा सनातनी ॥ ७६ ॥
वही यह मन्त्र तुमसे कहा गया है। यह गायत्री-मन्त्र सत्य एवं सनातन ब्रह्मरूप है। यह सम्पूर्ण भूतोंका हृदय एवं सनातन श्रुति है ॥ ७६ ॥

सोमादित्यान्वयाः सर्वे राघवाः कुरवस्तथा ।
पठन्ति शुचयो नित्यं सावित्रीं प्राणिनां गतिम् ॥ ७७ ॥
चन्द्र, सूर्य, रघु और कुरुके वंशमें उत्पन्न हुए सभी राजा पवित्र भावसे प्रतिदिन गायत्री-मन्त्रका जप करते आये हैं। गायत्री संसारके प्राणियोंकी परमगति है ॥ ७७ ॥

अभ्यासे नित्यं देवानां सप्तर्षीणां ध्रुवस्य च ।
मोक्षणं सर्वकृच्छ्राणां मोचयत्यशुभात् सदा ॥ ७८ ॥
प्रतिदिन देवताओं, सप्तर्षियों और ध्रुवका बारंबार स्मरण करनेसे समस्त संकटोंसे छुटकारा मिल जाता है। उनका कीर्तन सदा ही अशुभ अर्थात् पापके बन्धनसे मुक्त कर देता है ॥ ७८ ॥

वृद्धैः काश्यपगौतमप्रभृतिभिर्भृग्वङ्गिरोऽत्र्यादिभिः
शुक्रागस्त्यबृहस्पतिप्रभृतिभिर्ब्रह्मर्षिभिः सेवितम् ।
भारद्वाजमतमृचीकतनयैः प्राप्तं वसिष्ठात् पुनः
सावित्रीमधिगम्य शक्रवसुभिः कृत्स्ना जिता दानवाः ॥ ७९ ॥

कश्यप, गौतम, भृगु, अंगिरा, अत्रि, शुक्र, अगस्त्य और बृहस्पति आदि वृद्ध ब्रह्मर्षियोंने सदा ही गायत्री-मन्त्रका सेवन किया है। महर्षि भारद्वाजने जिसका भलीभाँति मनन किया है, उस गायत्री-मन्त्रको ऋचीकके पुत्रोंने उन्हींसे प्राप्त किया तथा इन्द्र और वसुओंने वसिष्ठजीसे सावित्री-मन्त्रको पाकर उसके प्रभावसे सम्पूर्ण दानवोंको परास्त कर दिया ।। ७९ ।।

यो गोशतं कनकश्शृङ्गमयं ददाति
विप्राय वेदविदुषे च बहुश्रुताय ।
दिव्यां च भारतकथां कथयेच्च नित्यं
तुल्यं फलं भवति तस्य च तस्य चैव ।। ८० ।।
जो मनुष्य विद्वान् और बहुश्रुत ब्राह्मणको सौ गौओंके सींगोंमें सोना मढ़ाकर दान करता है और जो केवल दिव्य महाभारत कथाका प्रतिदिन प्रवचन करता है, उन दोनोंको एक-सा पुण्य फल प्राप्त होता है ।। ८० ।।

धर्मो विवर्धति भृगोः परिकीर्तनेन
वीर्यं विवर्धति वसिष्ठनमोनतेन ।
संग्रामजिद् भवति चैव रघुं नमस्यन्
स्यादश्विनौ च परिकीर्तयतो न रोगः ।। ८१ ।।
भृगुका नाम लेनेसे धर्मकी वृद्धि होती है। वसिष्ठ मुनिको नमस्कार करनेसे वीर्य बढ़ता है। राजा रघुको प्रणाम करनेवाला क्षत्रिय संग्रामविजयी होता है तथा अश्विनीकुमारोंका नाम लेनेवाले मनुष्यको कभी रोग नहीं सताता ।। ८१ ।।

एषा ते कथिता राजन् सावित्री ब्रह्म शाश्वती ।
विवक्षुरसि यच्चान्यत् तत् ते वक्ष्यामि भारत ।। ८२ ।।
राजन्! यह सनातन ब्रह्मरूपा गायत्रीका माहात्म्य मैंने तुमसे कहा है। भारत! अब और जो कुछ भी तुम पूछना चाहते हो, वह भी तुम्हें बताऊँगा ।। ८२ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सावित्रीव्रतोपाख्याने पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १५० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें सावित्रीमन्त्रकी महिमाविषयक एक सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५० ।।