महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1457, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंबढ़ाते और उनका कल्याण करते हैं॥ ४०॥
धर्मः कामश्च कालश्च वसुर्वासुकिरेव च।
अनन्तः कपिलश्चैव सप्तैते धरणीधराः ॥ ४१ ॥
धर्म, काम, काल, वसु, वासुकि, अनन्त और कपिल—ये सात पृथ्वीको धारण करनेवाले हैं॥ ४१ ॥
रामो व्यासस्तथा द्रौणिरश्वत्थामा च लोमशः।
इत्येते मुनयो दिव्या एकैकः सप्त सप्तधा ॥ ४२ ॥
परशुराम, व्यास, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा और लोमश—ये चारों दिव्य मुनि हैं। इनमेंसे एक-एक सात-सात ऋषियोंके समान हैं॥ ४२ ॥
शान्तिस्वस्तिकरा लोके दिशांपालाः प्रकीर्तिताः।
यस्यां यस्यां दिशि ह्येते तन्मुखः शरणं व्रजेत् ॥ ४३ ॥
ये सब ऋषि इस जगत्में शान्ति और कल्याणका विस्तार करनेवाले तथा दिशाओंके पालक कहे जाते हैं। ये जिस-जिस दिशामें निवास करें, उस-उस दिशाकी ओर मुँह करके इनकी शरण लेनी चाहिये॥ ४३॥
स्रष्टारः सर्वभूतानां कीर्तिता लोकपावनाः।
संवर्तो मेरुसावर्णी मार्कण्डेयश्च धार्मिकः ॥ ४४ ॥
सांख्ययोगौ नारदश्च दुर्वासाश्च महर्षिः।
अत्यन्ततपसो दान्तास्त्रिषु लोकेषु विश्रुताः ॥ ४५ ॥
ये सम्पूर्ण भूतोंके स्रष्टा और लोकपावन बताये गये हैं। संवर्त, मेरुसावर्णि, धर्मात्मा मार्कण्डेय, सांख्य, योग, नारद, महर्षि दुर्वासा—ये सात ऋषि अत्यन्त तपस्वी, जितेन्द्रिय और तीनों लोकोंमें विख्यात हैं॥ ४४-४५॥
अपरे रुद्रसंकाशाः कीर्तिता ब्रह्मलौकिकाः।
अपुत्रो लभते पुत्रं दरिद्रो लभते धनम् ॥ ४६ ॥
इन सब ऋषियोंके अतिरिक्त बहुत-से महर्षि रुद्रके समान प्रभावशाली हैं। इनका कीर्तन करनेसे ये ब्रह्मलोककी प्राप्ति करानेवाले होते हैं। उनके कीर्तनसे पुत्रहीनको पुत्र मिलता है और दरिद्रको धन॥ ४६॥
तथा धर्मार्थकामेषु सिद्धिं च लभते नरः।
पृथुं वैन्यं नृपवरं पृथ्वी यस्याभवत् सुता ॥ ४७ ॥
प्रजापतिं सार्वभौमं कीर्तयेद् वसुधाधिपम्।
इनका नाम लेनेवाले मनुष्यके धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धि होती है। वेनकुमार नृपश्रेष्ठ पृथुका, जिनकी यह पृथ्वी पुत्री हो गयी थी तथा जो प्रजापति एवं सार्वभौम सम्राट् थे, कीर्तन करना चाहिये॥ ४७ १/२॥
आदित्यवंशप्रभवं महेन्द्रसमविक्रमम् ॥ ४८ ॥