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सर्वकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1460, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1460

अपनी, पुत्रोंकी, पत्नीकी, धनकी तथा बीजों और ओषधियोंकी भी रक्षाके लिये इस नामावलीका प्रयोग करे ॥ ६४ ॥

एतान् संग्रामकाले तु पठतः क्षत्रियस्य तु ।
व्रजन्ति रिपवो नाशं क्षेमं च परिवर्तते ॥ ६५ ॥
युद्धकालमें इन नामोंका पाठ करनेवाले क्षत्रियके शत्रु भाग जाते हैं और उसका सब ओरसे कल्याण होता है ॥ ६५ ॥

एतान् दैवे च पित्र्ये च पठतः पुरुषस्य हि ।
भुञ्जते पितरः कव्यं हव्यं च त्रिदिवौकसः ॥ ६६ ॥
जो देवयज्ञ और श्राद्धके समय उपर्युक्त नामोंका पाठ करता है, उस पुरुषके हव्यको देवता और कव्यको पितर सहर्ष स्वीकार करते हैं ॥ ६६ ॥

न व्याधिश्चापदभयं न द्विपान्न हि तस्करात् ।
कश्मलं लघुतां याति पाप्मना च प्रमुच्यते ॥ ६७ ॥
उसके यहाँ रोग या हिंसक जन्तुओंका भय नहीं रहता। हाथी अथवा चोरसे भी कोई बाधा नहीं आती। शोक कम हो जाता है और पापसे छुटकारा मिल जाता है ॥ ६७ ॥

यानपात्रे च याने च प्रवासे राजवेश्मनि ।
परां सिद्धिमवाप्नोति सावित्रीं ह्युत्तमां पठन् ॥ ६८ ॥
जो मनुष्य जहाजमें या किसी सवारीमें बैठनेपर, विदेशमें अथवा राजदरबारमें जानेपर मन-ही-मन उत्तम गायत्री-मन्त्रका जप करता है, वह परम सिद्धिको प्राप्त होता है ॥ ६८ ॥

न च राजभयं तेषां न पिशाचान्न राक्षसात् ।
नाग्न्यम्बुपवनव्यालाद् भयं तस्योपजायते ॥ ६९ ॥
गायत्रीका जप करनेसे द्विजको राजा, पिशाच, राक्षस, आग, पानी, हवा और साँप आदिका भय नहीं होता ॥ ६९ ॥

चतुर्णामपि वर्णानामाश्रमस्य विशेषतः ।
करोति सततं शान्तिं सावित्रीमुत्तमां पठन् ॥ ७० ॥
जो उत्तम गायत्री-मन्त्रका जप करता है, वह पुरुष चारों वर्णों और विशेषतः चारों आश्रमोंमें सदा शान्ति स्थापन करता है ॥ ७० ॥

नाग्निर्दहति काष्ठानि सावित्री यत्र पठ्यते ।
न तत्र बालो म्रियते न च तिष्ठन्ति पन्नगाः ॥ ७१ ॥
जहाँ गायत्रीका जप किया जाता है, उस घरके काठके किवाड़ोंमें आग नहीं लगती। वहाँ बालककी मृत्यु नहीं होती तथा उस घरमें साँप नहीं टिकते हैं ॥ ७१ ॥

न तेषां विद्यते दुःखं गच्छन्ति परमां गतिम् ।
ये शृण्वन्ति महद् ब्रह्म सावित्रीगुणकीर्तनम् ॥ ७२ ॥