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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 3210)

चतुर्विंशोऽध्यायः

भूरिश्रवाके पास उसकी पत्नियोंका विलाप, उन सबको तथा शकुनिको देखकर गान्धारीका श्रीकृष्णके सम्मुख शोकोद्गार

गान्धार्युवाच

सोमदत्तसुतं पश्य युयुधानेन पातितम् ।
वितुद्यमानं विहगैर्बहुभिर्माधवान्तिके ॥ १ ॥
गान्धारी बोलीं— माधव! देखो, सात्यकिने जिन्हें मार गिराया था, वे ही ये सोमदत्तके पुत्र भूरिश्रवा पास ही दिखायी दे रहे हैं। इन्हें बहुत-से पक्षी चोंच मार-मारकर नोच रहे हैं॥ १ ॥

पुत्रशोकाभिसंतप्तः सोमदत्तो जनार्दन ।
युयुधानं महेष्वासं गर्हयन्निव दृश्यते ॥ २ ॥
जनार्दन! उधर पुत्रशोकसे संतप्त होकर मरे हुए सोमदत्त महाधनुर्धर सात्यकिकी निन्दा करते हुए-से दिखायी दे रहे हैं॥ २ ॥

असौ हि भूरिश्रवसो माता शोकपरिप्लुता ।
आश्वासयति भर्तारं सोमदत्तमनिन्दिता ॥ ३ ॥
उधर वे शोकमें डूबी हुई भूरिश्रवाकी सती साध्वी माता अपने पतिको मानो आश्वासन देती हुई कहती हैं— ॥ ३ ॥

दिष्ट्या नैनं महाराज दारुणं भरतक्षयम् ।
कुरुसंक्रन्दनं घोरं युगान्तमनुपश्यसि ॥ ४ ॥
‘महाराज! सौभाग्यसे आपको यह भरतवंशियोंका दारुण विनाश, घोर प्रलयके समान कुरुकुलका महासंहार देखनेका अवसर नहीं मिला है॥ ४ ॥

दिष्ट्या यूपध्वजं पुत्रं वीरं भूरिसहस्रदम् ।
अनेकक्रतुयज्वानं निहतं नानुपश्यसि ॥ ५ ॥
‘जिसकी ध्वजामें यूपका चिह्न था, जो सहस्रों स्वर्ण-मुद्राओंकी भूरि-भूरि दक्षिणा दिया करता था और जिसने अनेक यज्ञोंका अनुष्ठान पूरा कर लिया था, उस वीर पुत्र भूरिश्रवाकी मृत्युका कष्ट सौभाग्यसे आप नहीं देख रहे हैं॥

दिष्ट्या स्नुषाणामाक्रन्दे घोरं विलपितं बहु ।
न शृणोषि महाराज सारसीनामिवार्णवे ॥ ६ ॥

'महाराज! समुद्रतटपर चीत्कार करनेवाली सारसियोंके समान इस युद्धस्थलमें आप अपने इन पुत्रवधुओंका अत्यन्त भयानक विलाप नहीं सुन रहे हैं, यह भाग्यकी ही बात है ॥ ६ ॥
एकवस्त्रार्धसंवीताः प्रकीर्णासितमूर्धजाः ।
स्नुषास्ते परिधावन्ति हतापत्या हतेश्वराः ॥ ७ ॥
'आपकी पुत्रवधुएँ एक वस्त्र अथवा आधे वस्त्रसे ही शरीरको ढँककर अपनी काली-काली लटें छिटकाये इस युद्धभूमिमें चारों ओर दौड़ रही हैं। इन सबके पुत्र और पति भी मारे जा चुके हैं ॥ ७ ॥
श्वापदैर्भक्ष्यमाणं त्वमहो दिष्ट्या न पश्यसि ।
छिन्नबाहुं नरव्याघ्रमर्जुनेन निपातितम् ॥ ८ ॥
शलं विनिहतं संख्ये भूरिश्रवसमेव च ।
स्नुषाश्च विविधाः सर्वा दिष्ट्या नाद्येह पश्यसि ॥ ९ ॥
'अहो! आपका बड़ा भाग्य है कि अर्जुनने जिसकी एक बाँह काट ली थी और सात्यकिने जिसे मार गिराया था, युद्धमें मारे गये उस भूरिश्रवा और शलको आप हिंसक जन्तुओंका आहार बनते नहीं देखते हैं तथा इन सब अनेक प्रकारके रूप-रंगवाली पुत्रवधुओंको भी आज यहाँ रणभूमिमें भटकती हुई नहीं देख रहे हैं ॥ ८-९ ॥
दिष्ट्या तत् काञ्चनं छत्रं यूपकेतोर्महात्मनः ।
विनिकीर्णं रथोपस्थे सौमदत्तेर्न पश्यसि ॥ १० ॥
'सौभाग्यसे अपने महामनस्वी पुत्र यूपध्वज भूरिश्रवाके रथपर खण्डित होकर गिरे हुए उसके सुवर्णमय छत्रको आप नहीं देख पा रहे हैं' ॥ १० ॥
अमूस्तु भूरिश्रवसो भार्याः सात्यकिना हतम् ।
परिवार्यानुशोचन्ति भर्तारमसितेक्षणाः ॥ ११ ॥
श्रीकृष्ण! भूरिश्रवाकी कजरारे नेत्रोंवाली वे पत्नियाँ सात्यकिद्वारा मारे गये अपने पतिको सब ओरसे घेरकर बारंबार शोकसे पीड़ित हो रही हैं ॥ ११ ॥
एता विलप्य करुणं भर्तृशोकेन कर्शिताः ।
पतन्त्यभिमुखा भूमौ कृपणं बत केशव ॥ १२ ॥
केशव! पतिशोकसे पीड़ित हुई ये अबलाएँ करुणाजनक विलाप करके पतिके सामने अत्यन्त दुःखसे पछाड़ खा-खाकर गिर रही हैं ॥ १२ ॥
बीभत्सुरतिबीभत्सं कर्मेदमकरोत् कथम् ।
प्रमत्तस्य यदच्छैत्सीद् बाहुं शूरस्य यज्वनः ॥ १३ ॥
वे कहती हैं—'अर्जुनने यह अत्यन्त घृणित कर्म कैसे किया? कि दूसरेके साथ युद्धमें लगे रहकर उनकी ओरसे असावधान हुए आप-जैसे यज्ञपरायण शूरवीरकी बाँह काट डाली ॥ १३ ॥

ततः पापतरं कर्म कृतवानपि सात्यकिः ।
यस्मात् प्रायोपविष्टस्य प्राहार्षीत् संशितात्मनः ॥ १४ ॥
‘उनसे भी बढ़कर घोर पापकर्म सात्यकिने किया है; क्योंकि उन्होंने आमरण अनशनके लिये बैठे हुए एक शुद्धात्मा साधुपुरुषके ऊपर खड्गका प्रहार किया है ।।
एको द्वाभ्यां हतः शेषे त्वमधर्मेण धार्मिक ।
किं नु वक्ष्यति वै सत्सु गोष्ठीषु च सभासु च ॥ १५ ॥
अपुण्यमयशस्यं च कर्मेदं सात्यकिः स्वयम् ।
इति यूपध्वजस्यैताः स्त्रियः क्रोशन्ति माधव ॥ १६ ॥
‘धर्मात्मा महापुरुष! तुम अकेले दो महारथियोंद्वारा अधर्मपूर्वक मारे जाकर रणभूमिमें सो रहे हो। भला, सात्यकि साधु पुरुषोंकी सभाओं और बैठकोंमें अपने लिये कलंकका टीका लगानेवाले इस पापकर्मका वर्णन स्वयं अपने ही मुखसे किस प्रकार करेंगे?’ माधव! इस प्रकार यूपध्वजकी ये स्त्रियाँ सात्यकिको कोस रही हैं ॥ १५-१६ ॥
भार्या यूपध्वजस्यैषा करसम्मितमध्यमा ।
कृत्वोत्सङ्गे भुजं भर्तुः कृपणं परिदेवति ॥ १७ ॥
श्रीकृष्ण! देखो, यूपध्वजकी यह पतली कमरवाली भार्या पतिकी कटी हुई बाँहको गोदमें लेकर बड़े दीनभावसे विलाप कर रही है ॥ १७ ॥
अयं स हन्ता शूराणां मित्राणामभयप्रदः ।
प्रदाता गोसहस्राणां क्षत्रियान्तकरः करः ॥ १८ ॥
वह कहती है—‘हाय! यह वही हाथ है, जिसने युद्धमें अनेक शूरवीरोंका वध, मित्रोंको अभयदान, सहस्रों गोदान तथा क्षत्रियोंका संहार किया है ॥ १८ ॥
अयं स रसनोत्कर्षी पीनस्तनविमर्दनः ।
नाभ्यूरूजघनस्पर्शी नीवीविस्रंसनः करः ॥ १९ ॥
‘यह वही हाथ है, जो हमारी करधनीको खींच लेता, उभरे हुए स्तनोंका मर्दन करता, नाभि, ऊरु और जघन प्रदेशको छूता और नीवीका बन्धन सरका दिया करता था ॥ १९ ॥
वासुदेवस्य सांनिध्ये पार्थेनाक्लिष्टकर्मणा ।
युध्यतः समरेऽन्येन प्रमत्तस्य निपातितः ॥ २० ॥
‘जब मेरे पति समरांगणमें दूसरेके साथ युद्धमें संलग्न हो अर्जुनकी ओरसे असावधान थे, उस समय भगवान् श्रीकृष्णके निकट अनायास ही महान् कर्म करनेवाले अर्जुनने इस हाथको काट गिराया था ॥ २० ॥
किं नु वक्ष्यसि संसत्सु कथासु च जनार्दन ।
अर्जुनस्य महत् कर्म स्वयं वा स किरीटभृत् ॥ २१ ॥
‘जनार्दन! तुम सत्पुरुषोंकी सभाओंमें, बातचीतके प्रसंगमें अर्जुनके महान् कर्मका किस तरह वर्णन करोगे? अथवा स्वयं किरीटधारी अर्जुन ही कैसे इस जघन्य कार्यकी चर्चा

करेंगे?' ।। २१ ।।
इत्येवं गर्हयित्वैषा तूष्णीमास्ते वराङ्गना ।
तामेतामनुशोचन्ति सपत्न्यः स्वामिव स्नुषाम् ।। २२ ।।
इस तरह अर्जुनकी निन्दा करके यह सुन्दरी चुप हो गयी है। इसकी बड़ी सौतें इसके लिये उसी प्रकार शोक प्रकट कर रही हैं, जैसे सास अपनी बहूके लिये किया करती है ।। २२ ।।
गान्धारराजः शकुनिर्बलवान् सत्यविक्रमः ।
निहतः सहदेवेन भागिनेयेन मातुलः ।। २३ ।।
यह गान्धारदेशका राजा महाबली सत्यपराक्रमी शकुनि पड़ा हुआ है। इसे सहदेवने मारा है। भानजेने मामाके प्राण लिये हैं ।। २३ ।।
यः पुरा हेमदण्डाभ्यां व्यजनाभ्यां स्म वीज्यते ।
स एष पक्षिभिः पक्षैः शयान उपवीज्यते ।। २४ ।।
पहले सोनेके डंडोंसे विभूषित दो-दो व्यजनोंद्वारा जिसको हवा की जाती थी, वही शकुनि आज धरतीपर सो रहा है और पक्षी अपनी पाँखोंसे इसको हवा करते हैं ।।
यः स्वरूपाणि कुरुते शतशोऽथ सहस्रशः ।
तस्य मायाविनो माया दग्धाः पाण्डवतेजसा ।। २५ ।।
जो अपने सैकड़ों और हजारों रूप बना लिया करता था, उस मायावीकी सारी मायाएँ पाण्डुपुत्र सहदेवके तेजसे दग्ध हो गयीं ।। २५ ।।
मायया निकृतिप्रज्ञो जितवान् यो युधिष्ठिरम् ।
सभायां विपुलं राज्यं स पुनर्जीवितं जितः ।। २६ ।।
जो छलविद्याका पण्डित था, जिसने द्यूतसभामें मायाद्वारा युधिष्ठिर तथा उनके विशाल राज्यको जीत लिया था, वही फिर अपना जीवन भी हार गया ।। २६ ।।
शकुन्ताः शकुनिं कृष्ण समन्तात् पर्युपासते ।
कैतवं मम पुत्राणां विनाशायोपशिक्षितम् ।। २७ ।।
श्रीकृष्ण! आज शकुनि (पक्षी) ही इस शकुनिकी चारों ओरसे उपासना करते हैं। इसने मेरे पुत्रोंके विनाशके लिये ही द्यूतविद्या अथवा धूर्तविद्या सीखी थी ।। २७ ।।
एतेनैतन्महद् वैरं प्रसक्तं पाण्डवैः सह ।
वधाय मम पुत्राणामात्मनः सगणस्य च ।। २८ ।।
इसीने सगे-सम्बन्धियोंसहित अपने और मेरे पुत्रोंके वधके लिये पाण्डवोंके साथ महान् वैरकी नींव डाली थी ।। २८ ।।
यथैव मम पुत्राणां लोकाः शस्त्रजिताः प्रभो ।
एवमस्यापि दुर्बुद्धेर्लोकाः शस्त्रेण वै जिताः ।। २९ ।।

प्रभो! जैसे मेरे पुत्रोंको शस्त्रोंद्वारा जीते हुए पुण्यलोक प्राप्त हुए हैं, उसी प्रकार इस दुर्बुद्धि शकुनिको भी शस्त्रद्वारा जीते हुए उत्तम लोक प्राप्त होंगे ॥ २९ ॥
कथं च नायं तत्रापि पुत्रान्मे भ्रातृभिः सह ।
विरोधयेदृजुप्रज्ञाननृजुर्मधुसूदन ॥ ३० ॥
मधुसूदन! मेरे पुत्र सरल बुद्धिके हैं। मुझे भय है कि उन पुण्यलोकोंमें पहुँचकर यह शकुनि फिर किसी प्रकार उन सब भाइयोंमें परस्पर विरोध न उत्पन्न कर दे ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि स्त्रीविलापपर्वणि गान्धारीवाक्ये चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत स्त्रीविलापपर्वमें गान्धारीवाक्यविषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥