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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

About this granth

The Madhava Nidana (माधव निदान), also called the Rugvinishchaya, is Madhavakara's treatise on the diagnosis of disease in Ayurveda. He gathered the diagnostic material scattered through the works of Charaka, Sushruta and Vagbhata into one ordered text, which became the standard Ayurvedic work on identifying illness. Each disease is examined through the five aspects of diagnosis: cause, early signs, symptoms, response to trial treatment and pathogenesis.

This scan is the July 2007 (Samvat 2064) edition of Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, giving the Sanskrit verses with the Hindi commentary of Dattaram, son of Shrikrishnalal. The preface discusses the place of diagnosis, the patient, the physician and medicine in Ayurveda.

The detailed contents show the range of the work: fevers and their forms in the tissues, sannipata, diarrhoea, grahani, the varieties of breathing disorders, the effects of alcohol, epilepsy, defects of semen and impotence, among many others, with passages cited from Sushruta and others.

( २० ) माधवनिदान ।

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( २० ) माधवनिदान ।
मतम् ॥ ८ ॥ शिरोरुग्वेपथुः श्वासः प्रलापच्छर्द्यरोचकाः ।
हीनपित्ते मध्यकफे लिङ्गं वाताधिके मतम् ॥ ९ ॥
हीन वायु पित्त मध्यम और कफकी अधिकतामें जुकाम वमन आलस्य तन्द्रा
अरुचि मन्दाग्नि होती है ॥ ७ ॥ हीन वात कफ मध्यम पित्त अधिक होवे तो पीला
मूत्र और नेत्रमें पीलापन जलन प्यास भ्रम अरुचि ये लक्षण होते हैं ॥ ८ ॥ हीन
पित्त और कफ मध्यम और वातकी अधिकतामें शिरमें पीडा कांपना श्वास
बड़बड़ाना वमन अरुचि होती है ॥ ९ ॥
शीतकं गौरवं तन्द्रा प्रलापोऽस्थिशिरोऽतिरुक् । हीनपित्ते
वातमध्ये लिङ्गं श्लेष्माधिके विदुः ॥१०॥ वर्चोभेदोऽग्निदौर्बल्यं
तृष्णा दाहोऽरुचिर्भ्रमः । कफहीने वातमध्ये लिङ्गं पित्ताधिके
विदुः ॥ ११ ॥ श्वासः कासप्रतिश्यायौ मुखशोषोऽति पार्श्वरुक् ।
कफहीने पित्तमध्ये लिङ्गं वाताधिके मतम् ॥ १२ ॥
हीन पित्त और वात मध्यम कफकी अधिकतामें शीत शरीरका भारीपन तन्द्रा
बड़बड़ाना हड्डी और शिरमें अत्यन्त पीडा होती है ॥ १० ॥ हीन कफ वात मध्यम
पित्तकी अधिकतामें दस्त पतला अग्नि मन्द प्यास दाह अरुचि भ्रम ये लक्षण होतें
हैं ॥ ११॥ हीन पित्त मध्यम वात कफ अधिक हो तो श्वास खांसी जुकाम मुखका
सूखना पसवाडेमें अत्यन्त पीडा होती है ॥ १२ ॥
ये उल्बणादि भेद चरकके मतसे कहे हैं परन्तु भालुकि आचार्यने अपने ग्रन्थमें
उल्बणादिलक्षण और ही प्रकारसे कहे हैं, यथा-
वातपित्ताधिको यस्य सन्निपातः प्रकुप्यति । तस्य ज्वरोऽङ्ग-
मर्दस्तृट्तालुशोषप्रमीलकाः ॥ १३ ॥ आध्मानतन्द्रावरुचि-
श्वासकासभ्रमश्रमाः । पित्तश्लेष्माधिको यस्य सन्निपातः प्रकुप्यति
॥ १४ ॥ अन्तर्दाहो बहिः शीतस्तस्य तन्द्रा विवर्द्धते । तुद्यते
दक्षिणं पार्श्वमुरःशीर्षगलग्रहाः ॥ १५ ॥
जिस पुरुषके वात पित्त अधिक हैं जिसमें ऐसा सन्निपात कोपको प्राप्त होता है
उस पुरुषके ज्वर, सब शरीरमें दर्द, प्यास, तलुवा सूखना, नेत्र मिचना, अफारा,
तन्द्रा, अरुचि, श्वास, कास, भ्रम, थकावत होती है। पित्तश्लेष्म अधिकवाला सन्नि-
पात कुपित हो तो भीतर जलन बाहर ठंडा और तन्द्रा अधिक बढती है। दायें
पसवाडेमें सुईसी चुभती है, हृदय शिर गला पकड़ा हुआ मालूम होता है॥१३-१५॥
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भाषाटीकासमेत । ( २१ )
निष्ठीवेत्कफपित्तं च तृष्णा कण्ठश्च दूयते ।
विड्भेदश्वासहिक्काश्च बाध्यन्ते सप्रमीलकाः ॥ १६ ॥
कफ और पित्तको थूकता है, प्यास लगती है, कण्ठ दुखता है अथवा प्यासकी
अधिकतासे कण्ठ दुखता है । दस्त पतला सांस और हिचकीसे पीडित होता है,
आंखें मिच जाती हैं ॥ १६ ॥
[ विधुफल्गू ] च तौ नाम्ना सन्निपातावुदाहृतौ । श्लेष्मानिला-
धिको यस्य सन्निपातः प्रकुप्यति ॥ १७ ॥ तस्य शीतज्वरो
निद्रा क्षुत्तृष्णा पार्श्वसंग्रहः । शिरोगौरवमालस्यं मन्यास्तम्भ-
प्रमीलकाः ॥ १८ ॥ उदरं तुद्यते चास्य कटी वस्तिश्च दूयते ।
सन्निपातः स विज्ञेयो [ मकरीति ] सुदारुणः ॥ १९ ॥
विधु और फल्गुनामसे दोनों सन्निपात कहे हैं अर्थात् वातपित्ताधिकवाला (विधु)
और पित्तश्लेष्माधिकवाला ( फल्गु) कहा है । कफ और वात अधिक होकर सन्निपात
जिसके कुपित होता है उसके शीतज्वर, नींद, क्षुधा, प्यास, पसवाडोंका जकडना,
शिरका भारीपन, आलकस, मन्या ( नाडीकी दोनों नस ) का जकडना, नेत्र
मिचना, पेटमें सुईसी चुभना, मुख कमर बस्ति इनमें दर्द होना ये सब लक्षण होते हैं.
यह अतिभयंकर (मकरी ) इस नामवाला सन्निपात जानना चाहिये ॥ १७-१९ ॥
वातोल्वणः सन्निपातो यस्य जन्तोः प्रकुप्यति । तस्य तृष्णा-
ज्वरग्लानिपाश्र्वरुग्दृष्टिसंक्षयाः ॥ २० ॥ पिण्डिकोद्वेष्टनं दाह
ऊरुसादो बलक्षयः । सरक्तं चास्य विण्मूत्रं शूलं निद्राविपर्ययः
॥ २१ ॥ निर्भिद्यते गुदं चास्य वस्तिश्च परिकृष्यति ।
आयम्यते भिद्यते च हिक्कते विलपत्यपि। मूर्च्छति स्फार्यते
रौति नाम्ना [ विस्फूरकः ] स्मृतः ॥ २२ ॥
वात अधिक है जिसमें ऐसा सन्निपात जिस पुरुषके कुपित हुआ हो उसके
प्यास, ज्वर, ग्लानि, पसवाडेमें दर्द, नेत्रसे न दीखना, पीडियोंका ऐंठना, जलन,
जंघामें पीडा, बलनाश, रक्तसहित विष्ठा और मूत्रका निकलना, शूल, निद्राविपर्यय
( दिनमें सोना रात्रिमें जागना ), गुदाका फटना और वस्तिका खिंचना ( सिकु-
डना ) फूटनी होनी, हिचकी लेना, बडबडाना, मूर्छा होना, नेत्रोंका फटना, रोना
ये सब लक्षण होते हैं यह (विस्फूरक ) कहा है ॥ २०-२२ ॥

( २२ ) माधवनिदान ।

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( २२ ) माधवनिदान ।
पित्तोल्वणः सन्निपातो यस्य जन्तोः प्रकुप्यति ॥ २३ ॥
तस्य दाहज्वरो घोरो बहिरन्तश्च वर्धते । शीतं च सेवमानस्य
कुप्यतः कफमारुतौ ॥ २४ ॥ ततश्चैनं प्रधावन्ते हिक्काश्वास-
प्रमीलकाः । विसूचिका पर्वभेदः प्रलापो गौरवं क्लमः ॥२५॥
नाभिपाश्र्वरुजा तस्य स्विन्नस्याशु विवर्द्धते । स्विद्यमानस्य
रक्तं च स्रोतोभ्यः संप्रपद्यते ॥ २६ ॥ शूलेन पीड्यमानस्य
तृष्णा दाहश्च वर्द्धते । असाध्यसन्निपातोऽयं [ शीघ्रकारीति]
कथ्यते । नहि जीवत्यहोरात्रमेतेनाविष्टविग्रहः ॥ २७ ॥
पित्त अधिक है जिसमें ऐसा सन्निपात जिसके कुपित हुआ है ॥ २३ ॥
उस पुरुषके घोर दाह और ज्वर भीतर और बाहर बढता है उस समय शीतका
सेवन करनेसे पुरुषके कफ और वायु कुपित होते हैं, तदनन्तर हिचकी, सांस और
आंखोंका मिचना बाधा करते हैं । विसूचिका ( दस्त और उलटी ), पर्वोंमें फूटन,
बडबडाना, शरीरका भारी होना, खेद होना, नाडी और पसवाडेमें दर्द, स्वेदन
देनेसे शीघ्र बढना और उस स्विन्न पुरुषके स्रोतोंसे रक्त झरने लगना और शूलसे
पीडित पुरुषके प्यास और दाहका बढना यह असाध्य सन्निपात होता है, उसको
( शीघ्रकारी ) नामसे बोलते हैं । इस सन्निपातसे ग्रसित शरीरवाला पुरुष एक
दिन रात भी नहीं जीता ॥ २४-२७॥
कफोल्वणः सन्निपातो यस्य जन्तोः प्रकुप्यति ॥२८॥ तस्य
शीतज्वरस्वप्नगौरवालस्यतन्द्रिकाः । छर्दिमूर्च्छाकृषादाह-
तृणारोचकहृद्ग्रहाः ॥ २९ ॥ ष्ठीवनं मुखमाधुर्यं श्रोत्रवाग्-
दृष्टिनिग्रहः । श्लेष्मणो निग्रहं चास्य यदा प्रकुरुते भिषक्
॥३०॥ तदा तस्य भृशं पित्तं कुर्यात्सोपद्रवं ज्वरम् । निगृहीते
तु पित्ते च भृशं वायुः प्रकुप्यति ॥३१॥ निराहारस्य सोऽत्यर्थं
मेदो मज्जास्थि बाधते । तथाऽत्र स्नाति भुंक्ते वा त्रिरात्रं नहि
जीवति । मेदोगतः सन्निपातः [ कप्फणः ] स उदाहृतः ॥३२ ॥
कफ अधिक है जिसमें ऐसा सन्निपात जिसके कुपित हो उस पुरुषके शीतज्वर,
स्वप्न, शरीरका भारीपन, आलस्य, तन्द्रा, वमन, मूर्च्छा, दाह, प्यास, अरुचि,
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भाषाटीकासमेत । ( २३ )
हृदयका जकडना, थूकना, मुखमें मीठापन, कानोंसे सुनना वाणीसे बोलना
दृष्टिसे देखना बन्द होजाय, यदि इस पुरुषके कफको वैद्य रोके तो अत्यंत कुपित
हुआ पित्त उपद्रव सहित ज्वरको पैदा करे और यदि पित्तको रोकाजाय तो वात
अत्यन्त कुपित होता है और कुपित हुआ वात निराहार पुरुषकी मेदा मज्जा और
हड्डियोंको पीडित करता है। इसमें स्नान करता है और खाता भी है लेकिन तीन
रात नहीं जीता है अर्थात् तीन रातके अन्दर ही मर जाता है यह मेदोगत सन्निपात
(कफण) नामसे कहा है ॥ २८-३२ ॥
मतान्तरभेद ।
कुम्भीपाकः प्रौर्णुनावः प्रलापी ह्यन्तर्दाहो दण्डपातोऽन्तकश्च ।
एणीदाहश्चाथ हारिद्रसंज्ञो भेदा एते सन्निपातज्वरस्य ॥ १ ॥
अजघोषभूतहासौ यन्त्रापीडश्च संन्यासः ।
संशोषी च विशेषास्तस्यैवोक्तास्त्रयोदशान्यत्र ॥ २ ॥
१ कुम्भीपाक, २ प्रौर्णुनाव, ३ प्रलापी, ४ अन्तर्दाह, ५ दण्डपात, ६ अन्तक,
७ एणीदाह, ८ हारिद्रसंज्ञक, ९ अजघोष, १० भूतहास, ११ यन्त्रापीड, १२ संन्यास,
१३ संशोषी ये तेरह प्रकारके संनिपात हैं ॥
इन तेरहोंके क्रमसे लक्षण लिखते हैं-
कुम्भीपाक १ ।
घोणाविवरगलद्बहुशोणासितलोहितं सार्त्ति ।
विलुठनमस्तकमभितः कुम्भीपाकेन पीडितं विद्यात् ॥ १ ॥
जिस पुरुषके नासिकाके छिद्रसे पीला काला लाल गाढा जल बहुत झरता हो
और शिरको चारों तरफ पटकता हो उस पुरुषको कुम्भीपाकसे पीडित जानना चाहिये॥
प्रौर्णुनाव २ ।
उत्क्षिप्य यः स्वमङ्गं क्षिपत्यधस्तान्नितान्तमुच्छ्वसिति ।
तं प्रौर्णुनावजुष्टं विचित्रकष्टं विजानीयात् ॥ २ ॥
जो पुरुष अपने अंगको उठाकर नीचे पटकता है और बहुत जल्दी २ श्वास लेता
है, अनेक प्रकारसे दुःखी उस पुरुषको प्रौर्णुनाव सन्निपातसे ग्रसित जानना चाहिये॥
प्रलापी ३ ।
स्वेदभ्रमाङ्गमर्दाः कम्पो दवथुर्वमिर्व्यथा कण्ठे ।
गात्रं च गुर्वतीव प्रलापिजुष्टस्य जायते लिङ्गम् ॥ ३ ॥
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( २४ ) माधवनिदान ।

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( २४ ) माधवनिदान ।
प्रलापीसन्निपातसे ग्रसित मनुष्यके पसीना भ्रम सब शरीरमें दर्द कंप दाह वमन
कण्ठमें पीडा और शरीरमें भारीपन ये लक्षण होते हैं ॥
अन्तर्दाह ४ ।
अन्तर्दाहः शैत्यं बहिः श्वयथुररतिरपि तथा श्वासः ।
अङ्गमपि दग्धकल्पं सोऽन्तर्दाहार्दितः कथितः ॥ ४ ॥
भीतर दाह और बाहर शरीर ठंडा शरीरमें सूजन पीडा श्वास शरीरभी जले हुएके
सदृश ये लक्षण जिसमें हों उसको अन्तर्दाह सन्निपातसे पीडित कहा है ॥
दण्डपात ५ ।
नक्तं दिवा न निद्रामुपैति गृह्णाति मूढधीर्नभसः ।
उत्थाय दण्डपाते भ्रमातुरः सर्वतो भ्रमति ॥ ५ ॥
दण्डपात सन्निपातमें मनुष्य रात्रिमें और दिनमें कभी सोता नहीं है और बेव-
कूफ हुआ आकाशसे कोई चीज लेनेके लिये हाथ फैलाता है । भ्रमसे पीडित हुआ
उठकर सब जगह भ्रमता है ॥
अन्तक ६ ।
संपूर्यते शरीरं ग्रन्थिभिरभितस्तथोदरं मरुता ।
श्वासातुरस्य सततं विचेतनस्यान्तकार्तस्य ॥ ६ ॥
निरन्तर श्वासोंसे पीडित चेतणारहित अन्तक सन्निपातसे पीडित मनुष्यको शरीर
गांठोंसे भर जाता है और वायुसे उदर चारों तरफसे भरजाता है ॥
एणीदाह ७ ।
परिधावतीव गात्रे रुक्पात्रे भुजगपतंगहरिणगणः ।
वेपथुमतः सदाहस्यैणीदाहज्वरार्त्तस्य ॥ ७ ॥
कम्पयुक्त दाहयुक्त एणीदाह सन्निपातसे पीडित मनुष्यको अपने शरीरमें सर्प
पतंग मृगोंका समुदाय दौडताहुआ मालम होता है ॥
हारिद्र ८ ।
यस्यातिपीतमङ्गं नयने सुतरां मलं ततोऽप्यधिकम् ।
दाहोऽतिशीतता बहिरस्य स हारिद्रको ज्ञेयः ॥ ८ ॥
जिस पुरुषका शरीर अत्यन्त पीला और नेत्र भी पीले और विष्ठा मूत्र सबसे
भी अधिक पीले हों, भीतर दाह और बाहिरसे शरीर ठंडा हो तो उस पुरुषको हारिद्र-
सन्निपातसे पीडित जानना ॥

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भाषाटीकासमेत । ( २६ )
अजघोष ९ ।
छगलकशरीरगन्धः स्कन्धरुजावान्निरुद्धगलरन्ध्रः ।
अजघोषसन्निपातादाताम्राक्षः पुमान्भवति ॥ ९ ॥
अजजोष सन्निपातसे बकरेकी गंधके समान शरीरमें गंध आती है, कन्धेमें पीडा
और गलेका छिद्र रुक जाता है लाल नेत्र हो जाते हैं इन लक्षणोंयुक्त पुरुष होता है ॥
भूतहास १० ।
शब्दादीनधिगच्छति न स्वान्विषयान् यदिन्द्रियग्रामैः ।
हसति प्रलपति परुषं स ज्ञेयो भूतहासार्त्तः ॥ १० ॥
जो इन्द्रियसमुदायसे अपने शब्दादि विषयोंको न समझता हो अर्थात् श्रोत्रे-
न्द्रियसे शब्द न सुनता हो, त्वगिन्द्रियसे स्पर्श न जानता हो इत्यादि, हँसता
होवे कठोर बडबडाता हो उसको भूतहासार्त सन्निपातसे पीडित जानना ॥
यंत्रापीड ११ ।
येन मुहुर्ज्वरवेगाद्यन्त्रेणेवावपीड्यते गात्रम् ।
रक्तं पीतं च वमेद्यन्त्रापीडः स विज्ञेयः ॥ ११ ॥
बारम्बार ज्वरके वेगसे यंत्रके सदृश जिसका शरीर पीडित किया जाय और
लाल पीला वमन करे उस मनुष्यको यन्त्रापीडसे पीडित जानना चाहिये ॥
संन्यास १२ ।
अतिसरति वमति कूजति गात्राण्यभिताश्चिरं नरः क्षिपति ।
संन्याससन्निपाते प्रलपति भुग्नाक्षिमण्डलो भवति ॥ १२ ॥
संन्याससन्निपातमें मनुष्यके दस्त होते हैं, वमन करता है, कुन २ शब्द . करता
है, चारों तरफ बहुत कालतक शरीरको फेंकता है, प्रलाप करता है और उस पुरु-
षकी आंखोंकी पुतली टेढी हो जाती है ॥
संशोषी १३ ।
मेचकवपुरतिमेचकलोचनयुगलो मलोत्सर्गात् ।
संशोषिणि सितपिटकामण्डलयुक्तो ज्वरो भवति ॥ १३ ॥
संशोषी सन्निपातमें मलके त्याग होनेसे काला शरीर और अत्यन्त काले दोनों
नेत्र हो जाते हैं और सफेद फुनसियोंके मण्डलसे युक्त पुरुष होता है ॥
इति कुम्भीपाकादीनां त्रयोदशानां लक्षणानि ।

( २६ ) माधवनिदान ।

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( २६ ) माधवनिदान ।
सन्निपातके विस्फारकादि १६ भेदोंको कहते हैं-१ विस्फारक २ शीघ्र-
कारी ३ कम्पन ४ बभ्र ५ विद्दारख्य ६ शर्कराख्य ७ भल्ल ८ कूटपालक ९ सम्मोहक
१० पाकल ११ याम्य १२ संग्राम १३ क्रकच १४ कर्कोटक १५ दारिक १६ व्याल-
कृति इन १६ सन्निपातोंके लक्षण ग्रन्थ बढनेके भयसे हमने नहीं लिखे ।
अब प्रसंगवशसे सम्पूर्ण सन्निपातोंकी उत्पत्ति और सम्प्राप्ति ग्रन्थान्तरोंसे लिखते हैं-
अम्लास्निग्धोष्णतीक्ष्णैः कटुमधुरसुरातापसेवाकषायैः
कामक्रोधातिरूक्षैर्गुरुतरपिशिताहारनीहारशीतैः ।
शोकव्यायामचिंताग्रहगणवनितात्यन्तसङ्गप्रसङ्गैः
प्रायः कुप्यन्ति पुंसां मधुसमयशरद्वर्षणे सन्निपाताः ॥ १ ॥
खट्टा चिकना गरम तीखा कडुआ मीठा मद्य, सूर्यके घामसे आदि ले तापका
सेवन, कसेला, काम क्रोध रूक्ष भारी मांस आदि पदार्थोंका सेवन, नीहार काल
शीत शोक दंड कसरत आदि श्रम, चिंता भूतपिशाचकी बाधा, अत्यन्त स्त्रीसंग
इन कारणोंसे और चैत्र वैशाख आश्विन कार्त्तिक श्रावण भाद्रपद इन महीनोंमें
मनुष्योंके प्रायः सन्निपातोंका कोप होता है ॥
आमो ह्याहारदोषात्प्रथममुपचितो हंति वह्निं शरीरे
श्लेष्मत्वं याति भुक्तं सकलमपि ततोऽसौ कफो वायुदुष्टः ।
स्रोतांस्यापूर्य्य रुंध्यादनिलमथ मरुत्कोपयेत्पित्तमन्तः
संमूर्च्छार्यान्योन्यमेते प्रबलमिति नृणां कुर्वते सन्निपातम् ॥ २ ॥
आहारके दोषसे प्रथम संगृहीत जो आम सो देहकी अग्निको शान्त करे और
मनुष्य जो कुछ खाया सो सब कफ होजाय और फिर इस कफको वायु दूषित
करे तब ये पवनके बहनेवाली नाडियोंके मार्गमें प्राप्त हो उनको रोक दे तब पवन
पित्तको कुपित करे ऐसे तीनों दोष अन्योन्य कुपित हों मनुष्योंके प्रबल सन्निपात
रोग प्रगट करते हैं ॥
अब संधिकादि तेरह सन्निपातोंके नाम पृथक् २ लिखते हैं-
संधिकश्चान्तकश्चैव रुग्दाहाश्चित्तविभ्रमः । शीतांगस्तंद्रिकः प्रोक्तः
कण्ठकुब्जश्च कर्णकः ॥ ३ ॥ विख्यातो भुग्ननेत्रश्च रक्तष्ठीवी
प्रलापकः । जिह्वकश्चेत्यभिन्यासः सन्निपातास्त्रयोदश ॥ ४ ॥

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भाषाटीकासमेत । ( २७ )
१ संधिक, २ अन्तक, ३ रुग्दाह, ४ चित्तविभ्रम, ५ शीतांग, ६ तन्द्रिक,
७ कण्ठकुब्ज, ८ कर्णक, ९ भुग्ननेत्र, १० रक्तष्ठीवी, ११ प्रलापक, १२ जिह्वक,
१३ अभिन्यास-ये तेरह सन्निपात कहे हैं ॥
तेरह सन्निपातोंकी मर्यादा ।
संधिके वासराः सप्त चान्तके दश वासराः । रुग्दाहे विंशतिर्ज्ञेया
वह्न्यष्टौ चित्तविभ्रमे ॥ ५ ॥ पक्षमेकं तु शीताङ्गे तन्द्रिके पञ्च-
विंशतिः । विज्ञेया वासराश्चैव कण्ठकुब्जे त्रयोदश ॥ ६ ॥
कर्णके च त्रयो मासा भुग्ननेत्रे दिनाष्टकम् । रक्तष्ठीवी दशा-
हानि चतुर्दश प्रलापके ॥ ७ ॥ जिह्वके षोडशाहानि कला-
ऽभिन्यासलक्षणे । परमायुरिति प्रोक्तं म्रियते तत्क्षणादपि ॥ ८ ॥
संधिककी ७, अन्तककी १०, रुग्दाहकी २०, चित्तविभ्रमकी २४, शीतांगकी १५,
तन्द्रिककी २५, कण्ठकुब्जकी १३, कर्णककी तीन महीना (९० दिन), भुग्ननेत्रकी, ८
रक्तष्ठीवीकी १०, प्रलापककी १४, जिह्वककी १६, अभिन्यासकी १६ दिनकी ये
सन्निपातोंकी परमायुके दिन कहे हैं परन्तु रोगी शीघ्रभी मरजाता है ॥
उक्त सन्निपातोंमें साध्यासाध्य विचार ।
सन्धिकस्तन्द्रिकश्चैव कर्णकः कण्ठकुब्जकः ।
जिह्वकश्चित्तविभ्रंशः षट् साध्याः सप्त मारकाः ॥ ९ ॥
सन्धक १ तन्द्रिक २ कर्णक ३ कण्ठकुब्ज ४ जिह्वक ५ चित्तविभ्रंश ६, ये छः
साध्य हैं बाकी बचे सात सो मारक हैं ॥
असाध्य कृच्छ्रसाध्यके लक्षण ।
दोषे विवृद्धे नष्टेऽग्नौ सर्वसम्पूर्णलक्षणः ।
सन्निपातज्वरोऽसाध्यः कृच्छ्रसाध्यस्ततोऽन्यथा ॥ १० ॥
जिसमें दोष (वात पित्त कफ) वृद्धि होकर अर्थात् सम्पूर्ण लक्षण होकर
मिलते हों और अग्नि शांत होगई हो वह सन्निपात ज्वर असाध्य है और इससे
विपरीत अर्थात् दोष बढे न हों, अल्प लक्षण हों, अग्नि थोडी दीप्त हो वह सन्नि-
पातज्वर कृच्छ्रसाध्य है ॥
जैयटने दोषशब्दका मल अर्थ करा है अर्थात् पुरीषादिक बडे । 'सते' इत्यादि
इस श्लोकका तात्पर्यार्थ यह है कि, असाध्य और कृच्छ्रसाध्य भयेपर सुखसाध्य
नहीं होता है इसीस भालुकि आचार्यने लिखा है-
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( २८ ) माधवनिदान ।

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( २८ ) माधवनिदान ।
मृत्युना सह योद्धव्यं सन्निपातं चिकित्सता ।
यस्तु तत्र भवेज्जेता स जेताऽऽमयसंकुले ॥ ११ ॥
जो वैद्य सन्निपातकी चिकित्सा करे है वह मौतके साथ संग्राम करे है, जो इस
सन्निपातको जीते अर्थात् शांत करे वह सर्व रोगके गणोंका जीतनेवाला है ॥
सन्निपातार्णवे मग्नं योऽभ्युद्धरति मानवम् ।
कस्तेन न कृतो धर्मः कां च पूजां न सोऽर्हति ॥ १२ ॥
जो वैद्य सन्निपातरूपी सागरमें डूबे मनुष्यको निकालता है उसने कौनसा धर्म
न करा अर्थात् सब धर्म कर चुका और वह कौन पूजाके योग्य नहीं है अर्थात् वह
सब पूजाओंके योग्य है ॥
संधिकादि त्रयोदश संनिपातोंके पृथक्पृथक् लक्षण।
१ संधिक ।
पूर्वरूपकृतशूलसम्भवं शोषवातबहुवेदनान्वितम् ।
श्लेष्मतापबलहानिजागरं सन्निपातामिति सन्धिकं वदेत् ॥ १ ॥
जिसके पूर्वरूपमें शूल, शोष, वातसे बहुत पीडा, कफका गिरना, सन्ताप, बल-
हानि, रात्रिमें जागरण ये लक्षण होयँ तिसको (संधिक) सन्निपात कहते हैं ॥
२ अन्तक ।
दाहं करोति परितापनमातनोति मोहं ददाति विदधाति
शिरःप्रकम्पम् । हिक्कां करोति कसनं च समाज़ुहोति
जानीहि तं विबुधवर्जितमन्तकाख्यम् ॥ २ ॥
दाह करे, संतापको बढावे, मोहको देवे, शिर कंपावे, हिचकी करे और खांसीको
बढावे, ऐसा पंडितोंकरके त्याज्य (अन्तक) सन्निपात जानना ॥
३ रुग्दाह ।
प्रलापपरितापनप्रबलमोहमान्द्यश्रमः परिश्रमरणवेदनाव्यथित-
कण्ठमन्याहनुः । निरन्तरतृषाकरश्वसनकासहिक्काकुलः स कष्ट-
तरसाधनो भवति हन्त रुग्दाहकः ॥ ३ ॥
अनर्थभाषण, सन्ताप, अतिमोह, मंदता, अनायास श्रम और पीडा, कंठ, मन्या
नाडी और ठोडी इनमें व्यथा, निरन्तर प्यास लगे, श्वास, खांसी और हिचकी इन
लक्षणोंकरके युक्त ऐसा यह (रुग्दाहनामक) सन्निपात कष्टसाध्य है ॥

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भाषाटीकासमेत । ( २९ )
४ चित्तभ्रम ।
यदि कथमपि पुंसां जायते कायपीडा भ्रममदपरितापो मोह-
वैकल्यभावः । विकलनयनहासो गीतनृत्यप्रलापी ह्यभिदधति
असाध्यं केऽपि चित्तभ्रमाख्यम् ॥ ४ ॥
जिसके कोई प्रकार करके पीडा होय तथा भ्रम ( धतूरा खाये सरीखी अवस्था )
हो, सन्ताप, मोह, विकलता, नेत्रोंमें बेकली, हँसना, गाना, नाचना, बकना यें
लक्षण होंय उसको कोई असाध्य ( चित्तभ्रम ) सन्निपात ऐसे कहते हैं ॥
५ शीतांग ।
हिमसदृशशरीरो वेपथुः श्वासहिक्का शिथिलितसकलाङ्गः
खिन्ननादोयतापः। क्लमथुदवथुकासच्छर्द्यतीसारयुक्तस्त्वरित-
मरणहेतुः शीतगात्रप्रभावात् ॥ ५ ॥
शरीर बर्फके समान शीतल हो, कम्प, श्वास, हिचकी, सर्व अंग शिथिल हों,
मन्द शब्द, देहके भीतर उग्र सन्ताप, अनायास श्रम, मनका सन्ताप, खांसी, छर्दि,
अतीसार इन लक्षणोंयुक्त सन्निपातको ( शीतांग ) कहते हैं, यह प्राणोंका शीघ्र
नाश करता है ॥
६ तन्द्रिक ।
प्रभूतातन्द्रार्तिज्वरकफपिपासाकुलतरो भवेच्छ्यामा जिह्वा
पृथुलकठिना कण्टकवृता । अतीसारः श्वासः क्लमथुपरितापः
श्रुतिरुजो भृशं कण्ठे जाड्यं शयनमनिशं तन्द्रिकगदे ॥ ६ ॥
तन्द्रा बहुत हो, शूल ज्वर कफ तृषासे रोगी बहुत पीडित हो, जीभ कालें
रंगकी मोटी कठोर और कांटेयुक्त हो और अतीसार श्वास ग्लानि सन्ताप कर्ण-
शूल कण्ठमें जडता और रातदिन निद्रा ये लक्षण ( तन्द्रिक ) सन्निपातमें होते है
यह असाध्य है ॥
७ कण्ठकुब्ज ।
शिरोऽर्तिकण्ठग्रहदाहमोहकंपज्वरा रक्तसमीरणात्तिः ।
हनुग्रहस्तापविलापमूर्च्छाः स्यात्कण्ठकुब्जः खलु कष्टसाध्यः ॥ ७ ॥
शिरमें पीडा, कण्ठमें पीडा, दाह, बेहोशी, कम्प, ज्वर, वातरक्तसम्बन्धी पीडा
हनुग्रह, सन्ताप, बकना और मूर्च्छा इन लक्षणोंसे युक्त सन्निपातको ( कंठकुब्ज )
कहते हैं, यह कष्टसाध्य है ॥
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( ३० ) माधवनिदान ।

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( ३० ) माधवनिदान ।
८ कर्णक ।
प्रलापः श्रुतिह्रासकण्ठग्रहाङ्गव्यथाश्वासकासप्रसेकप्रभावम् ।
ज्वरं तापकर्णान्तयोर्गल्लपीडा बुधाः कर्णकं कष्टसाध्यं वदन्ति ॥८॥
अनर्थभाषण करे, बहरा हो जावे, कण्ठमें दर्द होय, अंगोंमें पीडा, श्वास, कास,
पसीना, लारका गिरना, ज्वर, सन्ताप, कर्णके मूल और गाल इनमें पीडा जिसमें
ये लक्षण हों उसको पण्डित कष्टसाध्य ( कर्णक ) सन्निपात कहते हैं ॥
९ भुग्ननेत्र ।
ज्वरबलापचयः स्मृतिशून्यता श्वसनभुग्नविलोचनमोहितः ।
प्रलपनभ्रमकंपनशोफगांस्त्यजति जीवितमाशु स भुग्नदृक् ॥ ९॥
ज्वर, बलका नाश, स्मृतिनाश, श्वास, टेढी दृष्टि, बेहोशी, अनर्थ भाषण, भ्रम,
कंप और सूजन ये लक्षण ( भुग्ननेत्र ) सन्निपातके हैं । यह रोगी जल्दी मरता है ॥
१० रक्तष्ठीवी ।
रक्तष्ठीवी ज्वरवमितृषामोहशूलातिसारा हिक्काध्मानभ्रमणद्-
वथुश्वाससंज्ञाप्रणाशाः । श्यामा रक्ता भवति मण्डलो-
त्थानरूपा रक्तष्ठीवी निगदित इह प्राणहन्ता प्रसिद्धः ॥१०॥
रक्तकी उलटी करे, ज्वर, वमन, तृषा, मूर्च्छा, शूल, अतीसार, हिचकी, अफरा,
भौंरेका आना, सन्ताप, श्वास, संज्ञानाश, काली और लाल जीभ, देहमें रुधिरके
विकारसे चकत्ते जिसमें ये लक्षण हों उसको ( रक्तष्ठीवी ) सन्निपात कहते हैं । यह
प्राणनाशक प्रसिद्ध है ॥
११ प्रलापक ।
कम्पप्रलापपरितापनशीर्षपीडाप्रौढप्रभावपवमानपरोऽन्यचिन्ता ।
प्रज्ञाप्रणाशविकलप्रचुरप्रवादः क्षिप्रं प्रयाति पितृपालपदं प्रलापी ११
कंप, बड़बड़ाना, सन्ताप, शिरमें पीडा इनका विशेष जोर हो, पवित्रतामें आसक्त'
दूसरेकी चिन्ता करे, बुद्धिका नाश हो, विकल और बहुत बकवाद करे ऐसा यह
( प्रलापक ) सन्निपात है । इस सन्निपातवाला रोगी यमराजके पुरको पधारे ॥
१२ जिह्वक ।
श्वसनकासपरितापविह्वलः कठिनकण्टकपरीतजिह्वकः ।
बधिरमूकबलहानिलक्षणो भवति कष्टतरसाध्यजिह्वकः ॥ १२ ॥
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भाषाटीकासमेत । ( ३१ )
श्वास, खांसी, सन्ताप, विह्वल, कठोर और कांटोंसे व्याप्त ऐसी जीभ, बहरा ,
गूंगा और बलकी हानि इन लक्षणोंसे संयुक्त ऐसा यह ( जिह्वक ) सन्निपात
कष्टसाध्य है ॥
१३ अभिन्यास ।
दोषत्रयस्निग्धमुखत्वनिद्रावैकल्यनिश्चेष्टनकष्टवाग्मी ।
बलप्रणाशः श्वसनादिनिग्रहोऽभिन्यास उक्तो ननु मृत्युकल्पः॥१३॥
त्रिदोषोंके कोपके समान मुखपर चिकनापन, निद्रा, बेकली, चेष्टाहीन हो,
कष्टसे बोले, बलनाश, श्वासादिकोंका रुकना ये लक्षण ( अभिन्यास ) सन्निपातमें
होते हैं, यह महाअसाध्य मृत्युके तुल्य है ॥
सन्निपातोपद्रव ।
सन्निपातज्वरस्यान्ते कर्णमूले सुदारुणः ।
शोथः संजायते तेन कश्चिदेव प्रमुच्यते ॥ १४ ॥
ज्वरस्य पूर्वं ज्वरमध्यतो वा ज्वरान्ततो वा श्रुतिमूलशोथः ।
क्रमादसाध्यः खलु कष्टसाध्यः सुखेन साध्यो मुनिभिः प्रदिष्टः॥१५॥
सन्निपातज्वर शांत होनेके पीछे कानकी जडमें दारुण सूजन पैदा होती है उस
सूजनसे कोई रोगी बचे है प्रायः यह मारही डाले है । यदि यह सूजन ज्वरके
पहिले होवे तो असाध्य है, ज्वरके मध्यमें होय तो कष्टसाध्य है और ज्वरके अंतमें
होय तो सुखसाध्य है ऐसा मुनीश्वरोंने कहा है ॥
सद्यस्त्रिपंचसप्ताहाद्दशाहाद्द्वादशादपि ।
एकविंशाद्दिनैः शुद्धः सन्निपाती सुजीवति ॥ १६ ॥
सन्निपात हुए पर तत्काल तीन पांच सात दश और बारह दिनमें इक्कीस दिन-
तक सन्निपातवाला रोगी शुद्ध होकर जीवे हैं ॥
त्रिदोषज्वराकी साधारण मर्यादा ।
सप्तमी द्विगुणा यावन्नवम्येकादशी तथा ।
एषा त्रिदोषमर्यादा मोक्षाय च वधाय च ॥ १७ ॥
पित्तकफानिलवृद्धया दशदिवसद्वादशाहसप्ताहात् ।
हन्ति विमुञ्चति पुरुषं त्रिदोषजो धातुमलपाकात् ॥ १८ ॥
१-सप्तमे दिवसे प्राप्ते दशमे द्वादशेऽपि वा । पुनर्घोरतरो भूत्वा प्रशमं याति हन्ति वा ॥ इति ।

( ३२ ) माधवनिदान ।

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( ३२ ) माधवनिदान ।
जबसे त्रिदोष प्रगट हो उस दिनसे लेकर ७ किंवा १४ और ९ किंवा १८ तथा
११ किंवा २२ दिनतक त्रिदोषज्वरोंकी मर्यादा है इस अवधिमें ज्वर जाता रहे अथवा,
मृत्यु होय । सात नौ और ग्यारह दिनमें मर्यादा वाताधिक पित्ताधिक और कफा-
धिक सन्निपातोंकी क्रमसे जाननी । पित्त, कफ और वात इनकी वृद्धि क्रम करकेँ
दस दिनकी बारह दिनकी और सात दिनकी है, इसमें त्रिदोषज्वर धातुपाक होनेसे
मार डाले और मलपाक होनेसे रोगी रोगमुक्त होजाय ॥
धातुपाकलक्षण ।
निद्राबलौजोरुचिवीर्यनाशो हृद्वेदना गौरवताल्पचेष्टा ।
विष्टंभता यस्य किलारतिः स्यात्स धातुपाकी मुनिभिः प्रदिष्टः॥१९
निद्रा बल तेज रुचि वीर्य इनका नाश, हृदयमें पीडा, देह भारी, हीनचेष्टा,
अफरा, मनका न लगना ये लक्षण जिसके हों उसको धातुपाकी मुनीश्वरोंने कहा है।
धातुपाक कहिये उत्तरोत्तर रोगकी वृद्धि और बलकी हानि होकर शुक्रादि धातुसहित
मूत्रादिकोंका जो पाक होय उसे धातुपाक कहते हैं ॥
मलपाकलक्षण ।
दोषप्रकृतिवत्कृत्य लघुता ज्वरदेहयोः ।
इन्द्रियाणां च वैमल्यं दोषाणां पाकलक्षणम् ॥ २० ॥
दोषोंका स्वभाव पलटजाय, ज्वरका हलका होना, देह हलकी हो, इन्द्रियोंका
निर्मल होना ये मलपाकके लक्षण जानने । धातुपाक और मलपाक होना केवल
ईश्वरपर है, इसमें दूसरा कोई हेतु नहीं है ॥
आगंतुकज्वर ।
अभिघाताभिचाराभ्यामभिषङ्गाभिशापतः ।
आगन्तुर्जायते दोषैर्यथास्वं तं विभावयेत् ॥ २१ ॥
तलवार छुरा मुक्का लकडी इत्यादि शस्त्र आदिके लगनेसे प्रगट ज्वरको अभि-
घातज कहते हैं और विपरीत मंत्रके जपनेसे लोहके छुवासे मारणार्थ सर्षपादिक
होम अथवा कृत्याका प्रयोग करनेसे उत्पन्न ज्वरको अभिषंगज कहते हैं, काम शोक
भय क्रोध भूतादिकोंके आवेशसे उत्पन्न ज्वरको अभिशापज कहते हैं ब्राह्मण गुरु
वृद्ध सिद्ध इनके शाप देनेसे प्रगट ज्वरको अभिशापज कहते हैं. ये चार प्रकारसें
आङ्गंतुकज्वर उत्पन्न होय हैं। इस ज्वरके आरम्भसे पूर्व कोई दोषका प्रकाश नहीं
हो पीछे जैसे दोष कुपित होवें तिनको उन्हीं २ दोषोंके लक्षण करके जाने, जैसें
“कामशोकभयाद्वायुः” अर्थात् काम शोक भयसे वात कुपित होती है ॥
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भाषाटीकासमेत । ( ३३ )
विषजन्य आगंतुकज्वर ।
श्यावास्यता विषकृते दाहोऽतीसार एव च ।
भक्तारुचिः पिपासा च तोदश्च सह मूर्च्छया ॥ २२ ॥
अब आगंतुकज्वरोंके हेतुभेद करके लक्षण कहते हैं—स्थावर जङ्गम विष भक्षण
करनेसे जो ज्वर होय उससे मुख श्यामवर्ण और दाह तथा दस्तोंका होना, अन्नमें
अरुचि, प्यास, सुई चुभनेकीसी पीडा और मूर्च्छा ये लक्षण होते हैं ॥
औषधगन्धजनित ज्वर ।
औषधीगन्धजे मूर्च्छा शिरोरुग्वमथुः क्षवः ।
तीक्ष्ण औषधके सूंघनेसे जो ज्वर होय उसमें मूर्च्छा, शिरमें पीडा, वमन, छींक
ये लक्षण होते हैं ॥
कामज्वरके लक्षण ।
कामजे चित्तविभ्रंशस्तन्द्रालऽस्यमभोजनम् ॥ २३ ॥
हृदये वेदना चास्य गात्रं च परिशुष्यति ।
सुन्दर स्त्रीके देखनेसे मनुष्यके मनमें घोर कामबाधाकी उत्पत्ति हो, उससे
प्रगट ज्वरके ये लक्षण हैं—चित्तकी अस्थिरता, तन्द्रा, आलस्य, भोजनमें अरुचि,
हृदयमें पीडा और शरीर सूख जावे ॥
भय शोक और कोपज्वरके लक्षण ।
भयात्प्रलापः शोकाच्च भवेत्कोपाच्च वेपथुः ॥ २४ ॥
भयसे और शोकसे उत्पन्न ज्वरमें अनर्थ बके, कोपसे प्रगट ज्वरमें कम्प हो ॥
अभिचार और अभिघातज्वरके लक्षण ।
अभिचाराभिघाताभ्यां मोहस्तृष्णा च जायते ।
अभिचार और अभिघातसे प्रगट ज्वरमें मोह और तृष्णा होवे ॥
भूताभिषंगज्वरके लक्षण ।
भूताभिषङ्गादुद्वेगो हास्यरोदनकम्पनम् ॥ २५ ॥
भूतबाधासे उत्पन्न ज्वरसे चित्तमें उद्वेग हो, हँसे रोवे और कम्प ये लक्षण होते हैं ॥
कामशोकभयाद्वायुः क्रोधात्पित्तं त्रयो मलाः ।
भूताभिषङ्गात्कुप्यन्ति भूतसामान्यलक्षणाः ॥ २६ ॥
काम शोक और भय इनसे वातकुपित होता है, क्रोधसे पित्त कुपित होता है और
भूताभिषंगसे तीनों दोष कुपित होते हैं इनमें और भी लक्षण होते हैं अर्थात् उन्माद,
निदानमें जिस जिस देवग्रहोंके लक्षण हास्य रोदन कम्पादिक कहे हैं वे लक्षण होतेहैं ॥
३

( ३४ ) माधवनिदान ।

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( ३४ ) माधवनिदान ।
विषमज्वरकी सम्प्राप्ति ।
दोषोऽल्पोऽहितसंभूतो ज्वरोत्सृष्टस्य वा पुनः ।
धातुमन्यतमं प्राप्य करोति विषमज्वरम् ॥ २७ ॥
जिस मनुष्यके ज्वर औषधादिक सेवन करनेसे शांत होनेके पश्चात् अपथ्य
करनेसे वात पित्तादि दोष पुनः थोडे प्रकुपित हों रक्तरसादि धातुओंमेंसे किसी
धातुमें प्राप्त हो और उनको दूषित कर विषमज्वर कहिये तृतीयक चतुर्थकादिक ज्वर
उत्पन्न करे । वाशब्द करके प्रथमसे ही विषमज्वर होय है यह सूचना करी ।
यथा-“ आरम्भाद्विषमो यस्तु ” इति । अल्पशब्दसे यह दिखाया कि, यह दोष
बलहीन होनेसे कालान्तरमें बलवान् होकर ज्वर करे और जो दोष बलवान् है वह
नित्यज्वर करे है । विषमज्वरके लक्षण भालुकिने कहे हैं सो ऐसे कि, अनियत
कालमें शीत उष्णकरके विषमवेग ज्वर होय उस ज्वरको विषमज्वर ऐसे कहते हैं ।
दूसरे लक्षण ऐसे कि, “ मुक्तानुबन्धित्वं विषमत्वम् ” अर्थात् जो ज्वर छोड़ दे और
फिर आजावे उसको विषमज्वर ऐसे कहते हैं ॥
धातुगतज्वरके नाम ।
सततः संततोऽन्येद्युस्तृतीयकचतुर्थकौ ।
संततं रसरक्तस्थः सोऽन्येद्युः पिशिताश्रितः ॥ २८ ॥
मेदोगतस्तृतीयेऽह्नि ह्यस्थिमज्जगतः पुनः ।
कुर्याच्चातुर्थिकं घोरमन्तकं रोगसंकरम् ॥ २९ ॥
सन्तत सतत अन्येद्यु ( द्वयाहिक ) तृतीयक ( त्र्याहिक ) जिसको तिजारी कहते
हैं और चातुर्थिक जिसको चौथिया कहते हैं ऐसे पांच प्रकारके विषमज्वर हैं ॥
सततशब्दकरके सतत और सन्तत ये दोनों जानने अर्थात् रसस्थ दोष सन्तत ज्वर
करे हैं और रक्तस्थ दोष सतत ज्वर करे हैं इससे सन्तत और सतत ये दोनों शब्द
केवल संज्ञावाचक हैं सातत्यवाचक नहीं हैं ऐसे जानने । मांसगत अन्येद्युष्क अर्थात्
द्वयाहिक ( एकतरा ) को करे हैं और मेदगतदोष तृतीयक ( तिजारी ) ज्वर करे
हैं और वेही दोष अस्थिमज्जामें प्राप्त हुए दुःसह मृत्युका कारक अनेक रोगोंसे
व्याप्त ऐसा चातुर्थिक ज्वर प्रगट करे हैं ॥
संततज्वरके लक्षण ।
सप्ताहं वा दशाहं वा द्वादशाहमथापि वा ।
संतत्या योऽविसर्गी स्यात्संततः स निगद्यते ॥ ३० ॥
१ “ यः स्यादनियतकालाच्छीतोष्णाभ्यां तथैव च ।
वेगतश्चापि विषमो ज्वरः स विषमो मतः ” ॥

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भाषाटीकासमेत । ( ३५ )
सात दिनपर्यंत किंवा दश दिनपर्यंत किंवा बारह दिनपर्यन्त एकसा जो ज्वर
निरन्तर रहे और उतरे नहीं तिसको सन्ततज्वर कहते हैं । सात दश बारह ये जो
कहे सो अनुक्रम करके वात पित्त कफ इनके उल्बणसे कहे हैं, यह संततज्वर त्रिदो-
षज है कारण इसका बारह पदार्थोंका साथ होता है । ऐसे वातादिदोष धातुके प्रमाण
मूत्र और मल इनको एक ही समय ग्रसकर सन्ततज्वर उत्पन्न करते हैं । बारह पदार्थ
ये हैं-वातादिदोष ३ सप्त धातु ७ मूत्र १ और मल १ मिलकर बारह हुए ॥
सततकादिकोंके लक्षण ।
अहोरात्रे सततको द्वौ कालाव्नुवर्त्तते । अन्येद्युष्कस्त्वहोरात्र-
मेककालं प्रवर्त्तते ॥ ३१ ॥ तृतीयकस्तृतीयेऽह्नि चतुर्थेऽह्नि
चतुर्थकः । केचिद्भूताभिपंगोत्थं वदंति विषमज्वरम् ॥ ३२ ॥
काल छः हैं-१ पूर्वाह्न, २ मध्याह्न, ३ अपराह्न, ४ प्रदोष, ५ अर्द्धरात्रि,
६ प्रत्यूष. पूर्वाह्न प्रदोष ये कफके काल हैं, मध्याह्न और अर्धरात्रि ये पित्तके काल हैं,
अपराह्न और प्रत्यूष ये वातके काल हैं । सन्ततज्वर दिनरातमें दो समय आता है,
ईशानदेव कहते हैं कि, दिनके दो वेला अर्थात् दो वार, रात्रिके दो वेला अथवा
दिनके एक वेला और रात्रिके एक वेला, एकके दो वेला अमुक वेलामें आवेगा
जैसे ज्वरके आनेका समय नहीं कहा है । अन्येद्युष्कज्वर अहोरात्रिमें एक वेलामें
आता है, तृतीयकज्वर जिस दिन आता है उसके तीसरे दिन फिर आता है और
चातुर्थिक चौथे दिन आता है और कोई आचार्य इस विषम ज्वरको भूताभिषं-
गोत्थ कहते हैं, यह मत सुश्रुताचार्यकोही मान्य है अर्थात् उसने विषमज्वरपर बलि
होमादि भूतोचित और कषायपानादिक दोषोचित ऐसी चिकित्सा कही है और
विषमज्वर ये प्रायशः आगंतुकका सम्बन्धी है यह चरकने कहा है ॥
उत्कृष्टदोषभेदकरके तृतीयक चतुर्थकोंके दूसरे लक्षण ।
कफपित्तात्त्रिकग्राही पृष्ठाद्वातकफात्मकः ।
वातपित्ताच्छिरोग्राही त्रिविधः स्यात्तृतीयकः ॥ ३३ ॥
चातुर्थिको दर्शयति प्रभावं द्विविधं ज्वरः ।
जङ्घाभ्यां श्लैष्मिकः पूर्वं शिरसोऽनिलसंभवः ॥ ३४ ॥
तृतीयक ज्वर कफ पित्तके जोरसे त्रिकस्थान ( तीन हड्डी ) में पीडा करे है
वात कफके जोरसे पीठमें पीडा करे है, वात पित्तके जोरसे मस्तकमें पीडा करे है,
ऐसे तृतीयकज्वर तीन प्रकारका है । त्रिकंग्राही जो इसका तात्पर्य यह है कि, त्रिक
१ त्रिक कहिये कमर और जंघाके मध्यकी तीन हड्डी ।

( ३६ ) माधवनिदान ।

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( ३६ ) माधवनिदान ।
वातका स्थान है उसके स्थानमें कफ पित्त दूसरेके स्थानमें पहुँचनेसे निर्बल हो जाते
हैं इससे तीसरे दिन ज्वर करते हैं । यदि कफ पित्त स्वस्थानपर स्थित होय तो
सन्ततज्वरको करते हैं यह जैज्जटका मत है। ऐसेही मस्तक कफका स्थान है और
पीठ पित्तका स्थान है इनमें दूसरे दोषोंके पहुँचनेसे दुर्बल होकर तृतीयक ज्वर करते हैं।
शंका-यदि त्रिक वातका स्थान है तो फिर आप पित्त कफका उस स्थानमें
गमन कैसे कहते हो ? उत्तर-यह स्थानका नियम प्रकृतिस्थित दोषोंका कहा है
कुपित दोषोंका नहीं कहा है क्योंकि कुपित दोषोंका सर्वत्र गमन होता है यह सुश्रु-
तका मत है। ऐसेही दोषोंका अन्यस्थानगतत्व होनेसे तथा दोषोंका निर्बलत्व होनेसे
चातुर्थिक ज्वरमें भी जानना । चातुर्थिक ज्वर दो प्रकारकी शक्ति दिखाता है सो
ऐसे-कफ अधिक जिसमें होवे वह प्रथम जंघाओंमें व्याप्त होकर पश्चात् सर्व देहमें
व्याप्त होता है और वात अधिक जिसमें होवे वह पहले मस्तकमें व्याप्त होकर पीछे
सर्व देहमें व्याप्त होता है । पांच प्रकारके विषमज्वर प्रायशः सन्निपातसे प्रगट होते
हैं यह चरकका मत है । हारीत ऋषि कहते हैं कि चातुर्थिकज्वरमें पित्त प्रधान है।
इन विषम ज्वरोंका उत्पत्तिक्रम वृद्धसुश्रुतमें इस प्रकारका लिखा है कि, कफके पांच
स्थान हैं। उनमें जिस जिस स्थानमें दोष प्राप्त होते हैं वहां उसी २ विषमज्वरकों
प्रगट करते हैं । उन पांच स्थानोंके नाम-आमाशय १, हृदय २, कण्ठ ३, शिर ४
और सन्धि ५ । तहां आमाशयमें दोष पहुँचनेसे सन्ततकज्वर दो समय आता है,
हृदय स्थित दोष आमाशयमें आनेसे एकान्तरा एक समय आता है, कण्ठमें स्थित
दोष एक दिनमें हृदयमें आता है, दूसरे दिन आमाशयमें प्राप्त हो ज्वर करे उसै
तृतीयक (तिजारी) कहते हैं, शिरमें स्थित जो दोष सो क्रमसे कण्ठ हृदय और
आमाशयमें तीन दिनमें प्राप्त हो चतुर्थ दिवस चातुर्थिक ज्वर प्रगट करते हैं और
उन दोषोंको उलटकर पुनः स्वस्थानमें पहुँचना उसी दिन होता है क्योंकि, दोष
वेगवान् होते हैं और दोष सन्धिस्थित होते हैं तब प्रलेपक ज्वर प्रगट करते हैं,'
ये विषमज्वरके समान ज्वर हैं. कारण इसका यह है कि, सन्धि आमाशयमें स्थित है
और सुश्रुतने कहा है कि प्रलेपक यह विषम ज्वर है धातुशोष रोगियोंकों
क्लेशका देनेवाला है ॥
विषमज्वरके भेद ।
विषमज्वर एवान्यश्चातुर्थिकविपर्ययः ।
स मध्येऽह्नि ज्वरयति ह्याद्यन्ते विमुञ्चति ॥ ३५ ॥
१ कुपितानां हि दोषाणां शरीरं परिधावताम् । यत्र संगः खवैगुण्याद्व्याधिस्तत्रोपजायते ॥
२ प्रायशः सन्निपातेन दृष्टः पञ्चविधो ज्वरः । सन्निपाते तु यो भूयात् स दोषः परिकीर्तितः॥

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भाषाटीकासमेत । ( ३७ )
चातुर्थिक ज्वरका उलटा यह दूसरा विषमज्वर है, यह प्रथम और अंतका दिन
छोड़कर बीचके दो दिन आता है जैसे यह चातुर्थिकका विपर्यय है तैसे ही तृती-
यक आदिका भी विपर्यय होता है, उनको कहते हैं-जैसे बीचके एक दिन ज्वर
आवे और आदि अन्तके दिन नहीं आवे यह तृतीयकका विपरीत और जो एक
काल छोड़कर सब दिन रात्रि ज्वर रहे वह अन्येद्युष्क इकन्तरेका विपरीत जानना ।
इनके विषयमें ग्रन्थकारोंके भिन्न भिन्न मत हैं, विस्तारके भयसे इस जगह नहीं लिखे हैं ॥
वातबलासकज्वर ।
नित्यं मन्दज्वरो रूक्षः शूनकस्तेन सीदति ।
स्तब्धाङ्गः श्लेष्मभूयिष्ठो नरो वातबलासकी ॥ ३६ ॥
वातबलासक नामक ज्वर जिस मनुष्यके हो वह उस ज्वरकरके शोथयुक्त अर्थात्
सूजन हो और मन्दज्वर सदैव बना रहे, देह रूखी हो, अंग जकड जावे, कफ विशेष
होय यह ज्वर वात और कफसे होता है इसको वातबलासकज्वर कहते हैं ॥
प्रलेपकज्वर ।
प्रलिम्पन्निव गात्राणि घर्मेण गौरवेण च ।
मन्दज्वरविलेपी च स शीतः स्यात्प्रलेपकः ॥ ३७ ॥
जिस ज्वरमें पसीनासे तथा सूर्यके घामसे अथवा देहके गौरवसे मानो देहको
लिप्त करदियासा मालूम हो इसी हेतुसे मन्दज्वर हो, शीत लगे, यह ज्वर कफपित्तसे
प्रगट होता है और राजयक्ष्मारोगमें यह होता है, कोई इसको त्रिदोषजनित कहते
हैं, इसको प्रलेपकज्वर कहते हैं ॥
विषमज्वरविशेषभेद ।
विदग्धेऽन्नरसे देहे श्लेष्मपित्ते व्यवस्थिते ।
तेनार्धं शीतलं देहमर्धमुष्णं प्रजायते ॥ ३८ ॥
अन्नका रस दुष्ट होनेसे और देहमें कफ पित्त दुष्ट होकर स्थित होनेसे ( अर्ध-
नारीश्वररूप अथवा नरसिंहरूप ) अर्धांगज्वर प्रगट करे हैं अर्थात् अर्धदेह कफसे
शीतल और अर्धदेह पित्तसे गरम होता है ॥
१ वातबलासल्लक्षणं ग्रन्थान्तरे-"बलासो वायुना युक्तः शीतादि षडहो ज्वरम् । जनये-
न्नयनस्रावं हृत्पीडां मधुरास्यताम् ॥" २ प्रलेपकस्त्वत्रविषमः प्रायः क्लेशाय शोषिणाम् । अन्ये
रात्रिञ्चरादयोऽपि विषमज्वरा बोद्धव्याः, यथोक्तम्-समौ वातकफौ यस्य क्षीणपित्तस्य
देहिनः । रात्रौ प्रायो ज्वरस्तस्य दिवा हीनकफस्य तु ॥
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( ३८ ) माधवनिदान ।

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( ३८ ) माधवनिदान ।
काये दुष्टं यदा पित्तं श्लेष्मा चान्ते व्यवस्थितः ।
तेनोष्णत्वं शरीरस्य शीतत्वं हस्तपादयोः ॥ ३९ ॥
जिस मनुष्यके कोठेमें पित्त दुष्ट हो और कफ हाथ पैरोंमें दुष्ट होकर स्थित
होवे तिस करके सब देह उष्ण रहे और हाथ पग शीतल रहें ॥
इन्होंका विपरीत द्वितीय ज्वर ।
काये श्लेष्मा यदा दुष्टः पित्तं चान्ते व्यवस्थितम् ।
शीतत्वं तेन गात्राणामुष्णत्वं हस्तपादयोः ॥ ४० ॥
जिस समय कोठेमें कफ दुष्ट हो और पित्त हाथ पैरोंमें दुष्ट होकर रहे तब शरीर
शीतल हो और हाथ पैर उष्ण होंयँ ॥
शीतपूर्वकज्वरके लक्षण ।
त्वक्स्थौ श्लेष्मानिलौ शीतमादौ जनयतो ज्वरम् ।
तयोः प्रशान्तयोः पित्तमन्ते दाहं करोति च ॥ ४१ ॥
कफ और वात ये दुष्ट होकर त्वचा में प्राप्त हों अर्थात् रसधातुका आश्रय कर
प्रथम शीतज्वर उत्पन्न करते हैं और जब इनका वेग शांत होता है तब पिछाडी
पित्त दाह करे है ॥
दाहपूर्वकज्वरके लक्षण ।
करोत्यादौ तथा पित्तं त्वक्स्थं दाहमतीव च ।
तस्मिन्प्रशान्ते त्वितरौ कुरुतः शीतमन्ततः ॥ ४२ ॥
द्वावेतौ दाहशीतादिज्वरौ संसर्गजौ स्मृतौ ।
दाहपूर्वस्तयोः कष्टः सुखसाध्यतमोऽपरः ॥ ४३ ॥
उसी प्रकार पहिले पित्त रसगत होकर अत्यन्त दाह करे है, पीछे उसका वेग
शांतहुएपर वात कफ ये शीत करते हैं । दाहपूर्वक और शीतपूर्वक ये दोनों ज्वर
संसर्ग अर्थात् त्रिदोषोंके सम्बन्धसे होते हैं, ऐसे ऋषियोंने कहा है उनमें दाहपूर्वक
ज्वर दुःखप्रद और कृच्छ्रसाध्य है और शीतपूर्वक ज्वर सुखसाध्य है ॥
सप्तधातुगत ज्वर । रसगतज्वरके लक्षण ।
गुरुता हृदयोत्क्लेशः सदनं छर्द्यरोचकौ ।
रसस्थे तु ज्वरे लिङ्गं दैन्यं चास्योपजायते ॥ ४४ ॥
रसधातुमें स्थित ज्वर होय तो देह भारी, दोषोंको हृदयमें स्थित होनेसे उपस्थित
वमनसी मालूम हो, ग्लानि,ओकारी,अरुचि और दैन्य कहिये मनमें खेद ये चिह्न होते हैं॥
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भाषाटीकासमेत । ( ३९ )
रक्तगत ज्वरके लक्षण ।
रक्तनिष्ठीवनं दाहो मोहश्छर्दनविभ्रमौ ।
प्रलापः पिटिका तृष्णा रक्तप्राप्ते ज्वरे नृणाम् ॥ ४५ ॥
रुधिरका गिरना, दाह, मोह, वमन, भ्रम, अनर्थ बोलना, देहमें फुन्सी, प्यास
ये लक्षण रक्तगत ज्वरके होनेसे होते हैं ॥
मांसगत ज्वरके लक्षण ।
पिण्डिकोद्वेष्टनं तृष्णा सृष्टमूत्रपुरीषता ।
ऊष्मान्तर्दाहविक्षेपौ ग्लानिः स्यान्मांसगे ज्वरे ॥ ४६ ॥
जानुके नीचे पिंडलियोंमें दण्ड आदिके लगनेकीसी पीडा, प्यास, मल मूत्रका
निकलना, गरमी, अन्तर्दाह, हाथ पैरोंका इधर उधर पटकना और ग्लानि ये लक्षण
जब मांसमें ज्वर पहुँच जाय है तब होते हैं ॥
मेदोगत ज्वरके लक्षण ।
भृशं स्वेदस्तृषा मूर्च्छा प्रलापश्छर्दिरेव च ।
दौर्गन्ध्यारोचकौ ग्लानिर्मेदस्थे चासहिष्णुता ॥ ४७ ॥
अत्यन्त पसीनेका आना, प्यास, मूर्च्छा, प्रलाप, वमन, देहमें दुर्गन्ध, अन्नमें
अरुचि, ग्लानि और वेदना न सही जाय ये लक्षण मेदोगतज्वरमें होते हैं ॥
अस्थिगत ज्वरके लक्षण ।
भेदोऽस्थां कूजनं श्वासो विरेकश्छर्दिरेव च ।
विक्षेपणं च गात्राणामेतदस्थिगते ज्वरे ॥ ४८ ॥
हाड फूटना तथा हाडोंका गूंजना, श्वास, दस्तका होना, वमन, हाथ पैरका
चलना ये अस्थिगत ज्वरके लक्षण हैं ॥
मज्जागत ज्वरके लक्षण ।
तमःप्रवेशनं हिक्का कासः शैत्यं वमिस्तथा ।
अन्तर्दाहो महाश्वासो मर्मच्छेदश्च मज्जगे ॥ ४९ ॥
अन्धेरा आना, हिचकी, खांसी, शीत लगे, वमन, अन्तर्दाह, महाश्वास अर्थात्
जो श्वासके निदानमें कहेंगे और मर्ममें पीडा यह मर्म शब्द इस जगह हृदयवाचक
है अर्थात् हृदयमें पीडा हो ये मज्जागत ज्वरके लक्षण हैं ॥
शुक्रगत ज्वरके लक्षण ।
मरणं प्राप्नुयात्तत्र शुक्रस्थानगते ज्वरे ।
शेफसः स्तब्धता मोक्षः शुक्रस्य च विशेषतः ॥ ५० ॥
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