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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 55 of 404

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Page 55

भाषाटीकासमेत । ( ३७ )
चातुर्थिक ज्वरका उलटा यह दूसरा विषमज्वर है, यह प्रथम और अंतका दिन
छोड़कर बीचके दो दिन आता है जैसे यह चातुर्थिकका विपर्यय है तैसे ही तृती-
यक आदिका भी विपर्यय होता है, उनको कहते हैं-जैसे बीचके एक दिन ज्वर
आवे और आदि अन्तके दिन नहीं आवे यह तृतीयकका विपरीत और जो एक
काल छोड़कर सब दिन रात्रि ज्वर रहे वह अन्येद्युष्क इकन्तरेका विपरीत जानना ।
इनके विषयमें ग्रन्थकारोंके भिन्न भिन्न मत हैं, विस्तारके भयसे इस जगह नहीं लिखे हैं ॥
वातबलासकज्वर ।
नित्यं मन्दज्वरो रूक्षः शूनकस्तेन सीदति ।
स्तब्धाङ्गः श्लेष्मभूयिष्ठो नरो वातबलासकी ॥ ३६ ॥
वातबलासक नामक ज्वर जिस मनुष्यके हो वह उस ज्वरकरके शोथयुक्त अर्थात्
सूजन हो और मन्दज्वर सदैव बना रहे, देह रूखी हो, अंग जकड जावे, कफ विशेष
होय यह ज्वर वात और कफसे होता है इसको वातबलासकज्वर कहते हैं ॥
प्रलेपकज्वर ।
प्रलिम्पन्निव गात्राणि घर्मेण गौरवेण च ।
मन्दज्वरविलेपी च स शीतः स्यात्प्रलेपकः ॥ ३७ ॥
जिस ज्वरमें पसीनासे तथा सूर्यके घामसे अथवा देहके गौरवसे मानो देहको
लिप्त करदियासा मालूम हो इसी हेतुसे मन्दज्वर हो, शीत लगे, यह ज्वर कफपित्तसे
प्रगट होता है और राजयक्ष्मारोगमें यह होता है, कोई इसको त्रिदोषजनित कहते
हैं, इसको प्रलेपकज्वर कहते हैं ॥
विषमज्वरविशेषभेद ।
विदग्धेऽन्नरसे देहे श्लेष्मपित्ते व्यवस्थिते ।
तेनार्धं शीतलं देहमर्धमुष्णं प्रजायते ॥ ३८ ॥
अन्नका रस दुष्ट होनेसे और देहमें कफ पित्त दुष्ट होकर स्थित होनेसे ( अर्ध-
नारीश्वररूप अथवा नरसिंहरूप ) अर्धांगज्वर प्रगट करे हैं अर्थात् अर्धदेह कफसे
शीतल और अर्धदेह पित्तसे गरम होता है ॥
१ वातबलासल्लक्षणं ग्रन्थान्तरे-"बलासो वायुना युक्तः शीतादि षडहो ज्वरम् । जनये-
न्नयनस्रावं हृत्पीडां मधुरास्यताम् ॥" २ प्रलेपकस्त्वत्रविषमः प्रायः क्लेशाय शोषिणाम् । अन्ये
रात्रिञ्चरादयोऽपि विषमज्वरा बोद्धव्याः, यथोक्तम्-समौ वातकफौ यस्य क्षीणपित्तस्य
देहिनः । रात्रौ प्रायो ज्वरस्तस्य दिवा हीनकफस्य तु ॥
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