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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 52 of 404

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Page 52

( ३४ ) माधवनिदान ।
विषमज्वरकी सम्प्राप्ति ।
दोषोऽल्पोऽहितसंभूतो ज्वरोत्सृष्टस्य वा पुनः ।
धातुमन्यतमं प्राप्य करोति विषमज्वरम् ॥ २७ ॥
जिस मनुष्यके ज्वर औषधादिक सेवन करनेसे शांत होनेके पश्चात् अपथ्य
करनेसे वात पित्तादि दोष पुनः थोडे प्रकुपित हों रक्तरसादि धातुओंमेंसे किसी
धातुमें प्राप्त हो और उनको दूषित कर विषमज्वर कहिये तृतीयक चतुर्थकादिक ज्वर
उत्पन्न करे । वाशब्द करके प्रथमसे ही विषमज्वर होय है यह सूचना करी ।
यथा-“ आरम्भाद्विषमो यस्तु ” इति । अल्पशब्दसे यह दिखाया कि, यह दोष
बलहीन होनेसे कालान्तरमें बलवान् होकर ज्वर करे और जो दोष बलवान् है वह
नित्यज्वर करे है । विषमज्वरके लक्षण भालुकिने कहे हैं सो ऐसे कि, अनियत
कालमें शीत उष्णकरके विषमवेग ज्वर होय उस ज्वरको विषमज्वर ऐसे कहते हैं ।
दूसरे लक्षण ऐसे कि, “ मुक्तानुबन्धित्वं विषमत्वम् ” अर्थात् जो ज्वर छोड़ दे और
फिर आजावे उसको विषमज्वर ऐसे कहते हैं ॥
धातुगतज्वरके नाम ।
सततः संततोऽन्येद्युस्तृतीयकचतुर्थकौ ।
संततं रसरक्तस्थः सोऽन्येद्युः पिशिताश्रितः ॥ २८ ॥
मेदोगतस्तृतीयेऽह्नि ह्यस्थिमज्जगतः पुनः ।
कुर्याच्चातुर्थिकं घोरमन्तकं रोगसंकरम् ॥ २९ ॥
सन्तत सतत अन्येद्यु ( द्वयाहिक ) तृतीयक ( त्र्याहिक ) जिसको तिजारी कहते
हैं और चातुर्थिक जिसको चौथिया कहते हैं ऐसे पांच प्रकारके विषमज्वर हैं ॥
सततशब्दकरके सतत और सन्तत ये दोनों जानने अर्थात् रसस्थ दोष सन्तत ज्वर
करे हैं और रक्तस्थ दोष सतत ज्वर करे हैं इससे सन्तत और सतत ये दोनों शब्द
केवल संज्ञावाचक हैं सातत्यवाचक नहीं हैं ऐसे जानने । मांसगत अन्येद्युष्क अर्थात्
द्वयाहिक ( एकतरा ) को करे हैं और मेदगतदोष तृतीयक ( तिजारी ) ज्वर करे
हैं और वेही दोष अस्थिमज्जामें प्राप्त हुए दुःसह मृत्युका कारक अनेक रोगोंसे
व्याप्त ऐसा चातुर्थिक ज्वर प्रगट करे हैं ॥
संततज्वरके लक्षण ।
सप्ताहं वा दशाहं वा द्वादशाहमथापि वा ।
संतत्या योऽविसर्गी स्यात्संततः स निगद्यते ॥ ३० ॥
१ “ यः स्यादनियतकालाच्छीतोष्णाभ्यां तथैव च ।
वेगतश्चापि विषमो ज्वरः स विषमो मतः ” ॥