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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 38 of 404

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Page 38

( २० ) माधवनिदान ।
मतम् ॥ ८ ॥ शिरोरुग्वेपथुः श्वासः प्रलापच्छर्द्यरोचकाः ।
हीनपित्ते मध्यकफे लिङ्गं वाताधिके मतम् ॥ ९ ॥
हीन वायु पित्त मध्यम और कफकी अधिकतामें जुकाम वमन आलस्य तन्द्रा
अरुचि मन्दाग्नि होती है ॥ ७ ॥ हीन वात कफ मध्यम पित्त अधिक होवे तो पीला
मूत्र और नेत्रमें पीलापन जलन प्यास भ्रम अरुचि ये लक्षण होते हैं ॥ ८ ॥ हीन
पित्त और कफ मध्यम और वातकी अधिकतामें शिरमें पीडा कांपना श्वास
बड़बड़ाना वमन अरुचि होती है ॥ ९ ॥
शीतकं गौरवं तन्द्रा प्रलापोऽस्थिशिरोऽतिरुक् । हीनपित्ते
वातमध्ये लिङ्गं श्लेष्माधिके विदुः ॥१०॥ वर्चोभेदोऽग्निदौर्बल्यं
तृष्णा दाहोऽरुचिर्भ्रमः । कफहीने वातमध्ये लिङ्गं पित्ताधिके
विदुः ॥ ११ ॥ श्वासः कासप्रतिश्यायौ मुखशोषोऽति पार्श्वरुक् ।
कफहीने पित्तमध्ये लिङ्गं वाताधिके मतम् ॥ १२ ॥
हीन पित्त और वात मध्यम कफकी अधिकतामें शीत शरीरका भारीपन तन्द्रा
बड़बड़ाना हड्डी और शिरमें अत्यन्त पीडा होती है ॥ १० ॥ हीन कफ वात मध्यम
पित्तकी अधिकतामें दस्त पतला अग्नि मन्द प्यास दाह अरुचि भ्रम ये लक्षण होतें
हैं ॥ ११॥ हीन पित्त मध्यम वात कफ अधिक हो तो श्वास खांसी जुकाम मुखका
सूखना पसवाडेमें अत्यन्त पीडा होती है ॥ १२ ॥
ये उल्बणादि भेद चरकके मतसे कहे हैं परन्तु भालुकि आचार्यने अपने ग्रन्थमें
उल्बणादिलक्षण और ही प्रकारसे कहे हैं, यथा-
वातपित्ताधिको यस्य सन्निपातः प्रकुप्यति । तस्य ज्वरोऽङ्ग-
मर्दस्तृट्तालुशोषप्रमीलकाः ॥ १३ ॥ आध्मानतन्द्रावरुचि-
श्वासकासभ्रमश्रमाः । पित्तश्लेष्माधिको यस्य सन्निपातः प्रकुप्यति
॥ १४ ॥ अन्तर्दाहो बहिः शीतस्तस्य तन्द्रा विवर्द्धते । तुद्यते
दक्षिणं पार्श्वमुरःशीर्षगलग्रहाः ॥ १५ ॥
जिस पुरुषके वात पित्त अधिक हैं जिसमें ऐसा सन्निपात कोपको प्राप्त होता है
उस पुरुषके ज्वर, सब शरीरमें दर्द, प्यास, तलुवा सूखना, नेत्र मिचना, अफारा,
तन्द्रा, अरुचि, श्वास, कास, भ्रम, थकावत होती है। पित्तश्लेष्म अधिकवाला सन्नि-
पात कुपित हो तो भीतर जलन बाहर ठंडा और तन्द्रा अधिक बढती है। दायें
पसवाडेमें सुईसी चुभती है, हृदय शिर गला पकड़ा हुआ मालूम होता है॥१३-१५॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA