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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

About this granth

The Madhava Nidana (माधव निदान), also called the Rugvinishchaya, is Madhavakara's treatise on the diagnosis of disease in Ayurveda. He gathered the diagnostic material scattered through the works of Charaka, Sushruta and Vagbhata into one ordered text, which became the standard Ayurvedic work on identifying illness. Each disease is examined through the five aspects of diagnosis: cause, early signs, symptoms, response to trial treatment and pathogenesis.

This scan is the July 2007 (Samvat 2064) edition of Khemraj Shrikrishnadas, Bombay, giving the Sanskrit verses with the Hindi commentary of Dattaram, son of Shrikrishnalal. The preface discusses the place of diagnosis, the patient, the physician and medicine in Ayurveda.

The detailed contents show the range of the work: fevers and their forms in the tissues, sannipata, diarrhoea, grahani, the varieties of breathing disorders, the effects of alcohol, epilepsy, defects of semen and impotence, among many others, with passages cited from Sushruta and others.

( २२६ ) माधवनिदान ।

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( २२६ ) माधवनिदान ।
अथ व्रणनिदानम् ।
एकदेशोत्थितः शोथो व्रणानां पूर्वरक्षणम् ।
षड्विधः स्यात्पृथक् सर्वैरक्तागन्तुनिमित्तजः ॥ १ ॥
शोथाः षडेते विज्ञेयाः प्रागुक्तैः शोथलक्षणैः ।
विशेषः कथ्यते तेषां पक्वापक्वविनिश्चये ॥ २ ॥
एक ठिकानेपर सूजन उत्पन्न होनेसे जाने कि, इसके व्रण ( फोडा ) होगा सो
व्रणरोग पृथक् दोषोंसे ३, सन्निपातसे १, रुधिरसे १ और आगंतुज १ ऐसे मिल-
कर छः प्रकारका है, इन छहों व्रणोंमें जो प्रथम सूजन होय उसके लक्षण शोथरोग-
लक्षणके समान जानने । इनमें पक्व ( पकने ) अपक्व ( न पकने ) के विषयमें
जो विशेषता है उसको इस जगह कहते हैं ॥
वातादिभेदसे व्रणके पाक ।
विषमं पच्यते वातात्पित्तोत्थश्चाचिराच्चिरम् ।
कफजः पित्तवच्छोफो रक्तागंतुसमुद्भवः ॥ ३ ॥
बादीसे विषम पाक होय अर्थात् कहीं पके, कहीं नहीं पके, पित्तसे बहुत जल्दी
पके, कफका फोडा देरमें पके और रुधिरका तथा आगन्तुज फोडेका पकना पित्तके
समान अर्थात् जल्दी पके है ॥
कच्चे फोडेका लक्षण ।
मन्दोष्मताऽल्पशोथत्वं काठिन्यं त्वक्सवर्णता ।
मन्दवेदनता चैव शोथानामामलक्षणम् ॥ ४ ॥
सूजन हाथके छूनेसे थोडी गरम लगे, थोडी सूजन होय, फोडेका स्थान करडा
होय तथा देहके रंग समान उसका रंग होय और उसमें पीडा मन्द होय ये कच्ची
सूजनके लक्षण हैं ॥
पच्यमानव्रणके लक्षण ।
दह्यते दहनेनेव क्षारेणेव च पच्यते ।
पिपीलिकागणेनेव दश्यते छिद्यते तथा ॥ ५ ॥
भिद्यते चैव शस्त्रेण दंडेनेव च ताड्यते ।
पीड्यते पाणिनेवान्तः सूचीभिरिव तुद्यते ॥ ६ ॥
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आसने शयने स्थाने शांतिं वृश्चिकविद्धवत् ॥ ७ ॥

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भाषाटीकासमेत । ( २२७ )
शोषश्चोषो विवर्णः स्यादंगुल्येवावपाट्यते ।
आसने शयने स्थाने शांतिं वृश्चिकविद्धवत् ॥ ७ ॥
न गच्छेदाततः शोथो भवेदाध्मातवस्तिवत् ।
ज्वरस्तृष्णाऽरुचिश्चैव पच्यमानस्य लक्षणम् ॥ ८ ॥
जिस समय व्रण पकनेको होय उस समय ये लक्षण होते हैं-फोडेके स्थानमें
अग्निसे जलेहुएके समान जलन होय, खार लगानेकासा चिनमिनावे, चेंटी
काटनेकीसी पीडा होय, वह दो टूक करनेके समान तथा शस्त्रसे फाडनेके समान,
दण्ड आदिके मारनेके समान तथा हाथसे मीडनेके समान तथा भीतर सूईसे
छेदनेके समान पीडा और उसमें अत्यन्त दाह होय, अग्निसे सेकनेके समान उसमें
वेदना होय, उस फोडेका रंग बदल जाय, उंगलीके लगानेसे उखारनेकीसी पीडा
होय, बैठनेमें सोनेमें खडे रहनेमें वीछू काटनेकीसी घोर पीडा होय, वो पीडा कभी
शांत नहीं होय, वो सूजन फूली हुई बस्ती ( मूत्रस्थान ) के सदृश तनीसी होय,
उसमें ज्वर, प्यास, अरुचि ये लक्षण होते हैं ॥
पक्वव्रणके लक्षण ।
वेदनोपशमः शोथो लोहितोऽल्पो न चोन्नतः ।
प्रादुर्भावो वलीनां च तोदः कण्डूर्मुहुर्मुहुः ॥ ९ ॥
उपद्रवाणां प्रशमो निम्नता स्फुटनं त्वचाम् ।
बस्ताविवाम्बुसंचारः स्याच्छोथेऽङ्गुलिपीडिते ॥ १० ॥
पूयस्य पीडयत्येकमन्तमन्ते च पीडिते ।
भक्ताकांक्षा भवेच्चैव शोथानां पक्वलक्षणम् ॥ ११ ॥
व्रण पकनेसे पीडा शांत हो जाय, उसकी सूजन तांबेके रंगकी होय और थोडी
होय, ऊंची न होय, उसमें गुलझट पडे, सुई चुभानेकीसी पीडा होय, बारंबार
खुजली चले, पित्तके कोपसे दाहादि उपद्रवोंकी शांति हो, स्वभावसे ही व्रणकी जगह
गढेला होजाय, त्वचायें फटजाँय, सूजन, अंगुलिसे दबानेसे जैसे बस्तिमें पानी इधर
उधर होय उसी प्रकार शोथमें राध इधर उधर होय, व्रणके अन्त अवयवके दबाने-
पर राध एक देशको पीडित करती है अर्थात राध एक जगहसे निकलने लगती है,
अन्नमें इच्छा हो ये पक्वव्रणके लक्षण हैं ॥

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( २२८ ) माधवनिदान ।

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( २२८ ) माधवनिदान ।
एक दोषसे सूजन उत्पन्न होय उसमें पकनेके समय तीनोंका सम्बन्ध होय है ।
नर्त्तेऽनिलाद्रुङ्न बिना न पित्तं पाकः कफं वापि बिना न पूयः ।
तस्माद्धि सर्वे परिपाककाले पचन्ति शोथास्त्रिभिरेव दोषैः ॥ १२ ॥
बादीके बिना पीडा नहीं होय, पित्तके विना पाक नहीं होय और कफके विना
राध नहीं होय अर्थात् पकनेके समय तीनों दोषोंके मिलनेसे सब प्रकारकी सूजन
पकती है । रक्तपाकलक्षण ग्रन्थांतरोंमें कहे हैं, यथा—“ कफजेषु च शोथेषु
गम्भीरं पाकमेत्यसृक् । पक्वं स्निग्धं ततः स्पष्टं यत्र स्यात्क्लिन्नशोफता ॥ त्वक्सावर्ण्य
रुजोऽल्पत्वं घनस्पर्शित्वमश्मवत् । रक्तपाकमिति ब्रूयात्तं प्राज्ञो मुक्तसंशयः ॥”
राध न निकालनेसे जो परिणाम होय है उसको दृष्टांत देकर कहते हैं-
कक्षं समासाद्य यथैव वह्निर्वाय्वीरितः संदहति प्रसह्य ।
तथैव पूयोऽप्यविनिःसृतो हि मांसं शिराः स्नायु च खादतीह ॥१३॥
फूँसके गंजमें लगीहुई आग पवनकी सहायता पाकर जैसे वह फूँसको जलाकर
खाक करदे उसी प्रकार व्रणमें राध न निकालनेसे वह राध मांस, शिरा और स्नायु
इनको खाय लेती है ॥
आमादि लक्षणज्ञानसे वैद्यके गुणदोष दिखाते हैं—
आमं विदह्यमानं च सम्यक् पक्वं च यो भिषक् ।
जानीयात्स भवेद्वैद्यः शेषास्तस्करवृत्तयः ॥ १४ ॥
आम ( कच्चा ) पच्यमान और जो अच्छी रीतिसे पकगया हो ऐसे व्रणके लक्षण
जो वैद्य जाने है, उसीको वैद्य जानना चाहिये, बाकी सब चोर हैं ॥
अपक्वका छेदन और पकेकी उपेक्षा करनेमें दोष ।
यश्छिनत्त्याममज्ञानाद्यश्च पक्वमुपेक्षते ।
श्वपचाविव मन्तव्यौ तावनिश्चितकारिणौ ॥ १५ ॥
जो अज्ञानसे कच्चे फोडेको पका समझकर फोडे और जो पके फोडेको कच्चा
समझकर चीरे नहीं ये दोनों अविचारवान् वैद्य चांडालके समान जानने ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्धदीपिकामाथुरी-
भाषाटीकायां व्रणशोथनिदानं समाप्तम् ॥

अथ शारीरव्रणनिदानम् ।

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भाषाटीकासमेत । (२२९)
अथ शारीरव्रणनिदानम् ।
द्विधा व्रणः स विज्ञेयः शारीरागन्तुभेदतः ।
दोषैराद्यस्तयोरन्यः शस्त्रादिक्षतसंभवः ॥ १ ॥
शारीर और आगन्तुक इन भेदोंसे वह व्रण दो प्रकारका है, पहिला शारीर दोषोंके
कोपसे होय है और दूसरा शस्त्रादि करके घावके होनेसे होता है ॥
वातिकव्रण ।
स्तब्धः कठिनसंस्पर्शो मन्दस्रावो महारुजः ।
तुद्यते स्फुरति श्यावो व्रणो मारुतसंभवः ॥ २ ॥
बादीसे प्रगट व्रणमें जकडना तथा हाथके छूनेसे कठिन मालूम होय, उसमेंसे
थोडा स्राव होय तथा पीडा बहुत होय सुईके चुभनेकीसी पीडा होय तथा फडकना
होय और उसका रंग नीला होय ॥
पित्तव्रणके लक्षण ।
तृष्णामोहज्वरक्लेददाहदुष्ट्यवदारणैः ।
व्रणं पित्तकृतं विद्याद्गन्धैः स्रावैश्च पूतिकैः ॥ ३ ॥
प्यास, मोह, ज्वर, क्लेद, दाह, सडना चिदासा होय, बास आवै, दुर्गन्धयुक्त स्राव
होय, ये पित्तव्रणके लक्षण हैं ॥
कफव्रणके लक्षण ।
बहुपिच्छो गुरुः स्निग्धः स्तिमितो मन्दवेदनः ।
पाण्डुवर्णोऽल्पसंक्लेदी चिरपाकी कफोद्भवः ॥ ४ ॥
कफका स्राव अत्यन्त गाढा, भारी, चिकना, निश्चल, मन्द पीडा, पीला रंग,
थोडा स्रवनेवाला और बहुत कालमें पके ॥
रक्तजद्वन्द्वजव्रण ।
रक्तो रक्तस्रुती रक्ताद्वित्रिजः स्यात्तदन्वयैः ॥ ५ ॥
जो रक्तके कोपसे व्रण होय वह रक्तवर्ण, उसमेंसे रुधिर स्रवे । एक दोष और
रुधिरके सम्बन्धसे जो होय वह द्वन्द्व और दो दोष अथवा तीन दोष तथा रुधिर
१ “ व्रण गात्रविचूर्णने ” इत्यस्माद्धातोर्व्रणस्य साधुत्वम् । व्रणनिरुक्तिश्च सुश्रुते-“व्रणोति
यस्माद्रूढेऽपि व्रणवस्तु न नश्यति । आदेहधारणाज्जन्तोर्व्रणस्तस्मान्निरुच्यते ॥ ” इति ॥

( २३० ) माधवनिदान ।

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( २३० ) माधवनिदान ।
इनके मिलनेसे सन्निपातका व्रण जानना इस प्रकार तीनों दोषोंमें रुधिरके सम्ब-
न्धकी कल्पना करनी चाहिये ॥
सुखव्रणके लक्षण ।
त्वङ्मांसजः सुखे देशे तरुणस्यानुपद्रवः ।
धीमतोऽभिनवः काले सुखसाध्यः सुखव्रणः ॥ ६ ॥
जो व्रण त्वचा और मांस तथा मर्मरहित स्थानमें उपद्रवरहित होय और जो
तरुण तथा हिताहित जाननेवाला पुरुषके हेमन्त शिशिरकालमें नवीन प्रगट होय
उसको सुखव्रण कहते हैं, वह सुखसाध्य है ॥
कृच्छ्रसाध्य और असाध्य लक्षण ।
गुणैरन्यतमैर्हीनस्ततः कृच्छ्रो व्रणः स्मृतः ।
सर्वैर्विहीनो विज्ञेयः सोऽसाध्यो निरुपक्रमः ॥ ७ ॥
जो पूर्व श्लोकमें लक्षण कह आये उनमेंसे कुछ लक्षण थोडे होनेसे व्रण कृच्छ्र-
साध्य होय है और सब गुणरहित होय, बहुत उपद्रवयुक्त होय, वह असाध्य है ।
उसकी चिकित्सा न करनी चाहिये ॥
दुष्टव्रणके लक्षण ।
पूतिपूयातिदुष्टासृक्स्राव्युत्सङ्गी चिरस्थितिः ।
दुष्टो व्रणोऽतिगन्धादिः शुद्धलिङ्गविपर्ययः ॥ ८ ॥
जिसमेंसे दुर्गन्धयुक्त राध और अत्यन्त सडा भया रुधिर बहे, जो ऊपरसे उठा
हुआ हो, बहुत दिन रहनेवाला हो, अत्यन्त दुर्गन्ध दुर्वर्ण स्राव पीडायुक्त होय उसको
दुष्टव्रण कहते हैं । वह वक्ष्यमाण शुद्धलिंगसे विपरीत होता है ॥
शुद्धव्रणके लक्षण ।
जिह्वातलाभोऽतिमृदुः श्लक्ष्णः स्निग्धोऽल्पवेदनः ।
सुव्यवस्थो निरास्रावः शुद्धो व्रण इति स्मृतः ॥ ९ ॥
जो व्रण जीभके नीचे भागके समान अत्यन्त नरम होय, स्वच्छ, चिकना, थोडी
पीडायुक्त, भले प्रकारका कहिये ऊंचा आदि जो दुष्ट व्रणादिकमें लक्षण कहे हैं वे
न होय, दोषकृत रक्तादिस्रावरहित होय उसको शुद्धव्रण जानना ॥
भरनेवाले व्रणके लक्षण ।
कपोतवर्णप्रतिमो यस्यान्तः क्लेदवर्जितः ।
स्थिराश्च पिडिकावन्तो रोहतीति तमादिशेत् ॥ १० ॥

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भाषाटीकासमेत । ( २३१ )
जिसका घाव कबूतरके रंगसदृश होय और जिसमें क्लेद न बहता होय और
घाव स्थिर हो, जिसमें फुन्सीसी मालूम हों उसको वैद्य जाने कि, यह व्रण ( घाव )
स्थिर भरनेवाला है ॥
जो व्रण भरगया हो उसके लक्षण ।
रूढवर्त्मानमग्रंथिमशूनमरुजं व्रणम् ।
त्वक्सवर्णं समतलं सम्यग्रूढं तमादिशेत् ॥ ११ ॥
जिसका मार्ग भरगया होय, गांठ रहित होय, सूजन और पीडा जिसमें नहीं
होय, त्वचाके समान वर्ण होगया हो, घावका गढेला भरकर बराबर हो गया हो वह
व्रण उत्तम भरा जानना ॥
व्याधिविशेषकरके व्रण कृच्छ्रसाध्य होता है सो कहते हैं-
कुष्ठिनां विषजुष्टानां शोषिणां मधुमेहिनाम् ।
व्रणाः कृच्छ्रेण सिध्यन्ति येषां चापि व्रणे व्रणाः ॥ १२ ॥
कोढी पुरुष, विषवाला पुरुष, क्षयीरोगवाला, मधुमेही पुरुष ऐसोंका व्रण बड़े
कष्टसे साध्य होता है और जिसके पहले व्रणमें व्रण प्रगट होय, उसके ये व्रण
कष्टसाध्य होते हैं ॥
साध्यासाध्य लक्षण ।
वसां मेदोऽथ मज्जानं मस्तुलुङ्गं च यः स्रवेत् ।
आगन्तुजो व्रणः सिध्येन्न सिध्येद्दोषसंभवः ॥ १३ ॥
जिस व्रणमेंसे चर्बी, मेद, मज्जा और बस्तिस्नेह ये बहें वह व्रण आगन्तुज होय
तो साध्य है और दोषकृत होय तो साध्य नहीं होय ॥
असाध्यव्रणके लक्षण ।
मद्यागुर्वाज्यसुमनःपद्मचन्दनचम्पकैः ।
सुगन्धा दिव्यगन्धाश्च मुमूर्षूणां व्रणाः स्मृताः ॥ १४ ॥
मद्य, अगर, घृत, फूल, कमल, चन्दन और चम्पाके फूलके समान अथवा
चमत्कारी पारिजात आदि फूलकीसी गन्ध जिस व्रणमेंसे आवे यह व्रण मरनेवाले
रोगीके जानना ॥
दूसरे असाध्य लक्षण ।
ये च मर्मस्वसंभूता भवन्त्यत्यर्थवेदनाः ।
दह्यन्ते चान्तरत्यर्थं बहिःशीताश्च ये व्रणाः ॥ १५ ॥
दह्यन्ते बहिरत्यर्थं भवन्त्यंतश्च शीतलाः ।

( २३२ ) माधवनिदान ।

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( २३२ ) माधवनिदान ।
प्राणमांसक्षयश्वासकासारोचकपीडिताः ॥ १६ ॥
प्रवृद्धपूयरुधिरा व्रणा येषां च मर्मसु ।
क्रियाभिः सम्यगारब्धा न सिध्यन्ति च ये व्रणाः ।
वर्जयेदेव तान्वैद्यः संरक्षन्नात्मनो यशः ॥ १७ ॥
जो व्रण मर्मस्थानमें प्रगट हुए हों और उनमेंसे अत्यन्त पीडा होय वे तथा
जिस व्रणके भीतर दाह होय और बाहर शीतल होय वे अथवा बाहर दाह होय
और भीतर शीतलता होय वे तथा जिनमें बल मांस इनका क्षय होय, श्वास, खांसी,
अरुचि इनसे अत्यन्त पीडित होय ऐसे अथवा जो व्रण मर्मस्थानमें प्रगट भये हों
उनमेंसे राध, रुधिर बहुत बहे वे अथवा जिन व्रणोंकी अच्छी चिकित्सा करनेसे
भी अच्छे न होयं ऐसे व्रणोंको अपने यशकी रक्षा करनेवाला वैद्य त्याग दे ॥
व्रणरोगमें अपथ्य ।
व्रणे श्वयथुरायासात्स च रागश्च जागरात् ।
तौ च रुक् च दिवास्वापात्तांश्च मृत्युश्च मैथुनात् ॥ १८ ॥
परिश्रम करनेसे व्रणमें सूजन होती है और जागनेसे ललोही होती है और
दिनमें सोनेसे सूजनपर लाली आकर पीडा होती है और मैथुन करनेसे सूजन
लाली पीडा मृत्यु होय ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकायां माधुरीभाषाटीकायां
शारीरव्रणनिदानं समाप्तम् ॥

अथागन्तुजव्रणनिदानम् ।
नानाधारामुखैः शस्त्रैर्नानास्थाननिपातितैः ।
भवंति नानाकृतयो व्रणास्तांस्तान्निबोध मे ॥ १ ॥
अनेक प्रकारकी धारवाले तथा मुखवाले शस्त्र अनेक ठिकानेपर लगानेसे अनेक
प्रकारकी आकृति (स्वरूप) के व्रण होते हैं उनको कहता हूं ॥
व्रणकी संख्या और सम्प्राप्ति ।
छिन्नं भिन्नं तथा विद्धं क्षतं पिच्चितमेव च ।
घृष्टमाहुस्तथा षष्ठं तेषां वक्ष्यामि लक्षणम् ॥ २ ॥
छिन्न, भिन्न, विद्ध, क्षत, पिच्चित और छठा घृष्ट ऐसे आगन्तुज व्रण छः प्रकारके
होते हैं उनके लक्षण कहता हूं ॥

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भाषाटीकासमेत । ( २३३ )
छिन्नके लक्षण ।
तिर्यक्छिन्न ऋजुर्वापि यो व्रणस्त्वायतो भवेत् ।
गात्रस्य पातनं तद्धि छिन्नमित्यभिधीयते ॥ ३ ॥
जो व्रण तिरछा छिद्रयुक्त, सरल ( सीधा ) अथवा लम्बा होय शरीरके अवयवके
एकदेशको गिरानेवाला होय उसको छिन्न व्रण कहते हैं ॥
भिन्नके लक्षण ।
शक्तिकुंतेषुखड्गाग्रविषाणैराशयो हतः ।
यत्किंचित्स्रवते तद्धि भिन्नलक्षणमुच्यते ॥ ४ ॥
बर्छी, भाला, बाण, तरवारके अग्रभाग, विषाण ( दांत सींग ) इनसे आशय
(धात्वाशय और मलाशय ) को वेधकर थोडासा स्राव होय अर्थात् रुधिर मूत्रादि
आशयोंमेसे जो आशय भिन्न हुआ हो उससे उसका स्राव हो, जैसे बस्तिके भिन्न
होनेपर मूत्र निकले उसको भिन्न कहते हैं ॥
कोष्ठके लक्षण ।
स्थानान्यामाग्निपक्वानां मूत्रस्य रुधिरस्य च ।
हृदुण्डुकः फुप्फुसश्च कोष्ठ इत्यभिधीयते ॥ ५ ॥
आमाशय, अग्न्याशय, पक्वाशय, रक्ताशय ( यकृत् प्लीहा ) हृदय, मलाशय
और फुप्फुस इन स्थानोंकी कोष्ठसंज्ञा है ॥
कोष्ठके भेदोंके लक्षण ।
तस्मिन्भिन्ने रक्तपूर्णे ज्वरो दाहश्च जायते ।
मूत्रमार्गगुदास्येभ्यो रक्तं घ्राणाच्च गच्छति ॥ ६ ॥
मूर्च्छा श्वासतृषाध्मानमभक्तच्छन्द एव च ।
विण्मूत्रवातसङ्गश्च स्वेदास्रावोऽक्षिरक्तता ॥ ७ ॥
लोहगंधित्वमास्यस्य गात्रदौर्गन्ध्यमेव च ।
हृच्छूलं पार्श्वयोश्चापि विशेषं चात्र मे शृणु ॥ ८ ॥
वह कोष्ठ भिन्न होकर रुधिरसे भरजावे तब ज्वर दाह होय है, मूत्रमार्ग, गुदा,
मुख और नाक इनमेंसे रुधिर बहै, मूर्च्छा, श्वास, प्यास पेटका फूलना, अन्नमें अरुचि,
मल, मूत्र, अधोवायु इनका अवरोध, पसीना बहुत आवे, नेत्रोंमें लाली, मुखमें
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( २३४ ) माधवनिदान ।

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( २३४ ) माधवनिदान ।
लोहेकीसी वास आवे, अंगोंमें दुर्गंध, हृदय और पसवाडोंमें शूल ये लक्षण होते हैं।
इनसे जो विशेष लक्षण हैं उनको मुझसे सुन ॥
आमाशयस्थित रक्तके लक्षण ।
आमाशयस्थे रुधिरे रुधिरं छर्दयत्यपि ।
आध्मानमतिमात्रं च शूलं च भृशदारुणम् ॥ ९ ॥
आमाशयमें रुधिरका संचय होनेसे रुधिरकी वमन, पेट बहुत फूले और अत्यन्त
भयंकर शूल होय ॥
पक्वाशयस्थके लक्षण ।
पक्वाशयगते चापि रुजा गौरवमेव च ।
अधःकाये विशेषेण शीतता च भवेदिह ॥ १० ॥
पक्वाशयमें रुधिरका सञ्चय होनेसे शूल, देहमें भारीपना और कमरसे लेकर
नीचेके भागमें शीतलता होय है ॥
विद्धव्रणके लक्षण ।
सूक्ष्मास्यशल्याभिहतं यदङ्गं त्वाशयं विना ।
उत्तुंडितं निर्गतं वा तद्विद्धमिति निर्दिशेत् ॥ ११ ॥
बारीक अग्रभागवाले सुई आदि शल्यसे आमादि आशय विना जो अंग है
उनमें वेध होनेसे 'तुंडित' कहिये उनमेंसे वह शल्य न निकला होय, 'निर्गत' कहिये
शल्य निकल गया हो उसको विद्धव्रण कहते हैं ॥
क्षतके लक्षण ।
नातिच्छिन्नं नातिभिन्नमुभयोर्लक्षणान्वितम् ।
विषमं व्रणमंगेषु तत्क्षतं त्वभिनिर्दिशेत् ॥ १२ ॥
जिसमें अंग अतिछिन्न तथा अतिभिन्न न भया हो और दोनोंके लक्षण मिलते
हों तथा व्रण तिरछा बाँका होय, उसको क्षतव्रण कहते हैं ॥
पिच्चितके लक्षण ।
प्रहारपीडनाभ्यां तु यदङ्गं पृथुतां गतम् ।
सास्थि तत्पिच्चितं विद्यान्मज्जारक्तपरिप्लुतम् ॥ १३ ॥
१ शल्यं नाम–विविधतृणकाष्ठपांसुलोष्टारिष्टवालनखपूयास्रावान्तर्गर्भादयः ।

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भाषाटीकासमेत । ( २३५ )
जो अंग हाडसहित प्रहार कहिये मुद्गर आदिकी चोट अथवा किंवाड आदिके
दबना इत्यादि योगसे पिच जाय, मज्जा रुधिर करके युक्त होय, घाव न होय
उसको पिच्चितव्रण कहते हैं ॥
घृष्टके लक्षण ।
घर्षणादभिघाताद्वा यदंगं विगतत्वचम् ।
उषास्रावान्वितं तद्धि घृष्टमित्यभिनिर्दिशेत् ॥ १४ ॥
कठिन वस्त्र आदिके घर्षण (घिसने) से, चोटके लगनेसे जिस अंगके ऊपरकी
त्वचा जाती रहे तथा आगके समान गरम रुधिर चुचाय उसको घृष्ट कहते हैं॥
सशल्‍यव्रणके लक्षण ।
श्यावं सशोथं पिटिकान्वितं च मुहुर्मुहुः शोणितवाहिनं च ।
मृदूद्गतं बुद्बुदतुल्यमांसं व्रणं सशल्यं सरुजं वदंति ॥ १५ ॥
जो व्रण नीला, सूजनयुक्त, मरोडिनसे व्याप्त अथवा बारंबार उनमेंसे रुधिर
बहै और नरम होकर ऊपर बबूलेके समान उठा हुआ जिसका मांस होय उस
व्रणको सशल्य जानना चाहिये ॥
कोष्ठभेदके लक्षण ।
त्वचोऽतीत्य शिरादीनि भित्त्वा वा परिहृत्य वा ।
कोष्ठे प्रतिष्ठितं शल्यं कुर्यादुक्तानुपद्रवान् ॥ १६ ॥
सप्त त्वचाओंमें व्याप्त होकर शिरा, नस, हड्डी इनकी सन्धियोंको वेधकर अथवा
सिरा आदिको छोड जो शल्य कोष्ठमें रहा है, उससे आगे कहे हुए लक्षण होते हैं ॥
असाध्यकोष्ठभेद ।
तत्रांतर्लोहितं पांडु शीतपादकराननम् ।
शीतोच्छ्वासं रक्तनेत्रमानद्धं परिवर्जयेत् ॥ १७ ॥
जिसका रुधिर आंतोंमें संचित होय अर्थात् बाहर नहीं बहे और जो पीला वर्ण,
जिसके हाथ पैर शीतल होय और जो शीतल श्वासको छोडे, जिसके लाल नेत्र होयँ
तथा आनाह कहिये पेट फूलना ऐसे रोगीको वैद्य त्याग देय ॥
मांस, शिरा, स्नायु, अस्थि और सन्धि इन मर्मोंमें चोट लगनेके सामान्य लक्षण ।
भ्रमः प्रलापः पतनं प्रमोहो विचेष्टनं ग्लानिरथोष्णता च ।
स्रस्तांगता मूर्छनमूर्ध्ववातस्तीव्रा रुजो वातकृताश्च तास्ताः ॥ १८॥
मांसोदकाभं रुधिरं च गच्छेद्सर्वैन्द्रियार्थोपरमस्तथैव ।
दशार्द्धसंख्‍येष्वथ विक्षतेषु सामान्यतो मर्मसु लिङ्‌गमुक्तम् ॥ १९ ॥

( २३६ ) माधवनिदान ।

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( २३६ ) माधवनिदान ।
भ्रम, अनर्थभाषण, गिरना, इन्द्रिय और मन इनको मोह, हाथ पैरका फैलाना,
ग्लानि, उष्णता, अंगोंमें शिथिलता, मूर्च्छा, श्वासका चढना, वातजन्य तीव्र पीडा,
मांसका धोया हुआ पानी ऐसा रुधिर बहे, सर्व इन्द्रिय विकल होयँ अर्थात् सब इन्द्रि-
योंका व्यापार बन्द हो जाय ये लक्षण मांस आदि पाच मर्मविद्ध होनेसे होते हैं ॥
मर्मरहितशिराविद्धके लक्षण ।
सुरेन्द्रगोपप्रतिमं प्रभूतं रक्तं स्रवेत्तत्क्षणजश्च वायुः ।
करोति रोगान्विविधान्यथोक्ताञ्छिरासु विद्धास्वथवा क्षतासु ॥२०॥
शिरा कहिये ( नाडी ) बिंध जाय, अथवा शिरामें घाव हो जाय उसमेंसे इन्द्र-
गोप ( वीरबहूटी कीडों ) के समान लाल तथा पुष्कल रुधिर स्रवे तथा रक्तक्षय
होनेसे वायु कुपित होकर अनेक प्रकारके ( आक्षेपकादि ) रोग उत्पन्न करे है ॥
स्नायुविद्धके लक्षण ।
कौब्ज्यं शरीरावयवावसादः क्रियास्वशक्तिस्तुमुला रुजश्च ।
चिराद्व्रणो रोहति यस्य चापि तं स्नायुविद्धं पुरुषं व्यवस्येत् ॥ २१ ॥
कुबडापना, शरीरके अवयवोंका गिरना, काम करनेसे असमर्थपना, बहुत पीडा
और जिसका व्रण बहुत दिनमें भरे, उसकी स्नायु विद्धभई ऐसे जाने ॥
सन्धिविद्धके लक्षण ।
शोथाभिवृद्धिस्तुमुला रुजश्च बलक्षयः पर्वसु भेदशोथौ ।
क्षतेषु संधिष्वचलाचलेषु स्यात्सर्वकर्मोपरमश्च लिङ्गम् ॥ २२ ॥
चल अथवा अचल संधिका वेध होनेसे सूजन बढे, पीडा बहुत होय, शक्तिका
नाश होय, संधिमें भेदके समान पीडा होय, सूजन होय, कुछ कार्य करे परन्तु उसमें
उपराम होय ॥
हड्डी विंधगई हो उसके लक्षण ।
घोरा रुजो यस्य निशादिनेषु सर्वास्ववस्थासु च नैति शांतिम् ।
भिषग्विपाश्चिद्वितार्थसूत्रस्तमस्थिविद्धं पुरुषं व्यवस्येत् ॥ २३ ॥
जिस पुरुषके रातदिन घोर पीडा होय, जाग्रदादि तीनों अवस्थासे शांति नहीं
होय उसके अस्थि ( हड्डी ) विंधी है ऐसे श्रेष्ठ वैद्य जाने ॥
मर्मरहितशिरादिकोंके विद्धलक्षण कहके शिरादिमर्मविद्ध लक्षणोंका हवाला देते हैं-
यथास्वमेतानि विभावयेत्तु लिङ्गानि मर्मस्वभिताडितेषु ।
मर्मके ठिकाने चोटके लगनेसे ये पूर्वोक्त लक्षण जानने चाहिये । तुशब्दसे लक्षण
और सामान्य लक्षण होते हैं ऐसे जानना ॥
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भाषाटीकासमेत । ( २३७ )
मांसमर्मके लक्षण नहीं कहे उनको कहते हैं—
पांडुर्विवर्णः स्पृशितं न वेत्ति यो मांसमर्मस्वभिताडितः स्यात्॥२४॥
जो पुरुष मांसमर्मके ठिकाने विद्ध होता है, उसका पीला वर्ण, देहका विवर्ण होय
और स्पर्शका ज्ञान न होय ॥
सर्व व्रणके उपद्रव ।
विसर्पः पक्षघातश्च शिरास्तम्भोऽपतानकः ।
मोहोन्मादव्रणरुजाज्वरतृष्णा हनुग्रहः ॥ २५ ॥
कासश्छर्दिरतीसारो हिक्का श्वासः सवेपथुः ।
षोडशोपद्रवाः प्रोक्ता व्रणानां व्रणचिन्तकैः ॥ २६ ॥
बिसर्प, पक्षाघात, शिरास्तम्भ, अपतानक, मोह, उन्माद, ज्वर, व्रणकी पीडा,
प्यास, हनुग्रह, खांसी, वमन, अतिसार, हिचकी, श्वास और कंप ये व्रणरोगके सोलह
उपद्रव व्रणरोगके जाननेवालोंने कहे हैं ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां
आगन्तुव्रण ( सद्योव्रण ) निदानं समाप्तम् ॥
अथ भग्ननिदानम् ।
भग्न दो प्रकारका है एक सव्रण और दूसरा व्रणरहित, इनमें सव्रणको
कहकर व्रणरहितको कहते हैं—
भग्नं समासाद्द्विविधं हुताश काण्डे च संधौ च हि तत्र संधौ ।
हे अग्निवेश ! कांडभंग और संधिभंग मिलकर संक्षेपसे भग्नरोग दो प्रकारका है ॥
संधिभंगके लक्षण ।
उत्पिष्टविश्लिष्टविवर्तितं च तिर्यक्च विक्षिप्तमधश्च षोढा ॥ १ ॥
तहां संधिस्थानका भग्नरोग छः प्रकारका है । उनके नाम कहते हैं—उत्पिष्ट,
विश्लिष्ट, विवर्तित, तिर्यक्, विक्षिप्त और अधःक्षिप्त । भग्ननाम टूटनेका है ॥
संधिभंगके सामान्य लक्षण ।
प्रसारणाकुंचनवर्तनोय्रा रुक्स्पर्शविद्वेषणमेतदुक्तम् ।
सामान्यतः सन्धिगतस्य लिङ्गं-
१ “कांडमस्थिकांडः” काण्डेन नलक्कपालवलयतरुणरुचकानां ग्रहणम् । २ द्वयोरस्थ्नोः
संधानं संधिः ॥

( २३८ ) माधवनिदान ।

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( २३८ ) माधवनिदान ।
फैलाते समय, सकोरनेके समय, नीचे करनेसे घोर पीडा होय और स्पर्श सहा न
जाय ये संधिभग्नके सामान्य लक्षण हैं ॥
-उत्पिष्टसन्धोः श्वयथुः समन्तात् ।
विशेषतो रात्रिभवा रुजा च-
उत्पिष्टमें संधिके चारों ओर सूजन होय और रात्रिमें पीडा बहुत होय, संधिके
हाड दोनों आपसमें घिसे उसको उत्पिष्ट ऐसे कहते हैं ॥
विश्लिष्टे तौ च रुजा च नित्यम् ॥ २ ॥
विश्लिष्ट संधियोंमें सूजन और रात्रिमें पीडा ये होकर सर्व कालमें अत्यन्त पीडा
होय और उत्पिष्टकी अपेक्षा इतने लक्षण विश्लिष्टमें विशेष होते हैं अर्थात् संधि
शिथिलमात्र होय इसमें हाडके हटनेसे बीचमें गलेटा हो जाय ॥
विवर्तिते पार्श्वरुजश्च तीव्राः-
विवर्तित संधिमें दोनों तरफके हाड संधिसे पलटजायँ तब अत्यन्त पीडा होय इस
संधिमें हाड दोनों तरफ फिरा करें ॥
तिर्यग्गते तीव्ररुजो भवन्ति ।
हड्डीके तिरछे हटनेसे पीडा बहुत हो और एक हड्डी संधिस्थान छोडकर
टेढी होजाय ॥
क्षिप्तेऽतिशूलं विषमा रुगस्थ्नोः-
संधिहड्डी एक उपरको हटजाय तो अत्यन्त पीडा होय और हाडोंमें कम ज्यादा
पीडा होय, इस जगह हड्डीकी क्रियासे अथवा दोनों हड्डियोंकी क्रियाकरके दोनों
हाड परस्पर समीपसे दूर होजाय ॥
-क्षिप्ते त्वधो रुग्विघटश्च सन्धेः ॥ ३ ॥
संधिकी हड्डी एक नीचेको हटजाय तो पीडा होय और संधिकी विरुद्ध चेष्टा
होय, इसमें संधिके हाड परस्पर दूर होयँ परन्तु किंचित् नीचेको गमन करे ॥
अब कांडभग्नको कहते हैं-
काण्डे त्वतः कर्कटकाश्वकर्णविचूर्णितं पिच्चितमस्थिच्छालिका ।
काण्डेषु भग्नं त्वतिपातितं च मज्जागतं च स्फुटितं च वक्रम् ॥ ४ ॥
छिन्नं द्विधा द्वादशधापि काण्डे-
कांडभग्न बारह प्रकारके हैं-१ कर्कटक, २ अश्वकर्ण, ३ विचूर्णित, ४ पिच्चित,
५ अस्थिच्छालिका, ६ कांडभग्न, ७ अतिपातित, ८ मज्जागत, ९ स्फुटित,

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१० वक्र और दो प्रकारके छिन्न । १ कर्कटक-अर्थात् हाड दोनों ओरसे दबकर
बीचमें ऊंचासा होय । २ अश्वकर्ण-घोडेके कानके समान जो हाड हो जाय ।
३-विचूर्णित चुरकट होगया हो, वह शब्दसे अथवा स्पर्शसे जाना जाय । ४ पिच्चित-
पिचा भया हाड । ५ अस्थिछल्लिका-हाडका कोई भाग छिलकेके समान उखड
कर रहा है सो । ६ कांडभग्न-हड्डीका कांड टूटना । ७ अतिपात-सब हाड टूटे सो ।
८ मज्जागत--हड्डीके अवयव मज्जामें प्रवेश कर मज्जाको बाहर निकाले । ९ स्फुटित--
जिस हड्डीके बहुत टुकटे होजायँ । १० वक्र-हड्डी तिरछी होजाय वह भी भग्नमें
गिनी जाती है । ११-१२ छिन्न-१ बारीक बारीक बहुतसे टुकडे होजायँ सो और
दूसरा एक ओरसे टूटकर दूसरी तरफ निकले है ॥
कांडभग्नके सामान्य लक्षण ।
-स्रस्तांगता शोथरुजातिवृद्धिः ।
सम्पीड्यमाने भवतीह शब्दः स्पर्शासहस्पंदनतोदशूलाः ॥ ५ ॥
सर्वास्ववस्थासु न शर्मलाभो भग्नस्य काण्डे खलु चिह्नमेतत् ।
अंगोंमें शिथिलता, सूजन, घोर पीडा, जिस स्थानकी हड्डी टूटी होय उसजगह
पीडाके साथ शब्द होय, हाथके लगानेसे सहा न जाय, हड्डी फडके, सुई छेदने-
कीसी पीडा होय और शूल होय, कभी चैन न पडे । ‘कांड’ इस शब्दसे, नलक,
कपाल, वलय, तरुण और रुचक इन पांच प्रकारकी हड्डियोंका संग्रह होय है ॥
कांड भग्नके ( १२ ) बारह भेदोंसे अधिक भेद होते हैं उतको कहते हैं ।
भग्नं तु कांडे बहुधा प्रयाति समासतो नामभिरेव तुल्यम् ॥ ६ ॥
कांडोंमें अनेक प्रकारके भंग होते हैं, सो जिस ठिकाने जैसी आकृतिका होय
उसका उसी प्रकारका नाम कहना चाहिये ॥
कष्टसाध्यके लक्षण ।
अल्पाशिनोऽनात्मवतो जन्तोर्वातात्मकस्य च ।
उपद्रवैर्वा जुष्टस्य भग्नं कृच्छ्रेण सिध्यति ॥ ७ ॥
थोडा खानेवाला और जिसकी इन्द्रिय स्वाधीन न होय वात प्रकृतिवालेकी
ज्वरादि उपद्रवसंयुक्त ऐसे पुरुषकी हड्डी टूटनेसे बडे कष्टसे साध्य होती है ॥
असाध्य लक्षण ।
भिन्नं कपालं कट्यां तु संधिमुक्तं तथा च्युतम् ।
जघनं प्रतिपिष्टं च वर्जयेत्तु विचक्षणः ॥ ८ ॥

( २४० ) माधवनिदान ।

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( २४० ) माधवनिदान ।
कमरकी कपाल हड्डी टूटगई हो अथवा संधिके पासकी हड्डी हटगई हो अथवा
स्थानसे छूटगई हो, जंघाकी हड्डीका चूर होगया हो ऐसे रोगीको वैद्य त्याग दे ॥
असंश्लिष्टकपालं च ललाटे चूर्णितं च यत् ।
भग्नं स्तनान्तरे पृष्ठे शंखे मूर्ध्नि च वर्जयेत् ॥ ९ ॥
ललाटकी हड्डी टुकडे टुकडे हो परस्पर दूर हो जाय, जुडनेके कामके न रहे,
अथवा स्तनके बीचकी अथवा पीठकी अथवा शंख (कनपटी) की हड्डी, मस्तककी
हड्डी टूट गई हो उसको वैद्य त्याग दे ॥
सावधानता न करनस असाध्यता दिखाते हैं-
सम्यक्संधितमप्यस्थि दुर्निक्षेपनिबंधनात् ।
संक्षोभाद्वापि यद्गच्छेत्क्रियां तच्च वर्जयेत् ॥ १० ॥
हड्डी भली प्रकार जुड भी गई हो उसको अच्छी रीतिसे न राखे अथवा अच्छी
रीतिसे बांधे नहीं, उसमें किसीका धक्का लगनेसे फिर जैसेका तैसा हो जाता है और
यह साध्य नहीं होय इसको वैद्य त्याग दे ॥
अस्थिविशेष करके भग्नविशेष कहते हैं-
तरुणास्थीनि नम्यन्ते भिद्यन्ते नलकानि च ।
कपालानि विभज्यन्ते स्फुटन्ति रुचकानि च ॥ ११ ॥
तरुण हड्डी नम जाती है या टेढी हो जाती है, नलक हड्डी चिर जाती है।
कपालास्थि फूट टूक कर टूक हो जाय, रुचकास्थि (दन्तादिक) हड्डी टुकडा
होकर गिरपडे ॥
इति श्रीपंडितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां
भग्ननिदानं समाप्तम् ॥
१ सुश्रुते-जानुनितंबांसगण्डतालुशंखवंक्षणशिरःसु कपालानीति ।

अथ नाडीव्रणनिदानम् ।

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भाषाटीकासमेत । ( २४१ )
अथ नाडीव्रणनिदानम् ।
————
नाडी व्रणकी सम्प्राप्ति ।
यः शोथममाममतिपक्वमुपेक्षतेऽज्ञो यो वा व्रणं प्रचुरपूय-
मसाधुवृत्तः । अभ्यन्तरं प्रविशति प्रविदार्य तस्य स्थानानि
पूर्वविहितानि ततः सपूयः ॥ १ ॥ तस्यातिमात्रगमनाद्गति-
रिष्यते तु नाडीव यद्वहति तेन मता तु नाडी ।
जो मूर्खमनुष्य पकेहुए फोडेको कच्चा समझकर उपेक्षा करे किंवा बहुत राध
पडे फोडेकी उपेक्षा करदे, तब वह बढीहुई राध पूर्वोक्त त्वङ्मांसादिक स्थानमें जाकर
उनको भेद कर वह बहुत भीतरही पहुँच जाय, तब एक मार्ग कर उसमें वह राध
नाडीके समान बहे इसीसे इसको नाडीव्रण ( नासूर ) कहते हैं ॥
नाडीव्रणकी संख्यारूप सम्प्राप्ति ।
दोषैस्त्रिभिर्भवति सा पृथगेकशश्च
संमूर्च्छितैरपि च शल्यनिमित्ततोऽन्या ॥ २ ॥
पृथक् पृथक् दोषोंसे ३, सन्निपातसे १ और शल्यसे १ ऐसे नाडीव्रण पांच
प्रकारका है ॥
वातज नाडीव्रणके लक्षण ।
तत्रानिलात्परुषसूक्ष्ममुखी सशूला
फेनानुविद्धमधिकं स्रवति क्षपासु ।
बादीसे नाडीव्रणका मुख रूखा तथा छोटा होय और शूल होय, उसमेंसे फेन-
युक्त स्राव होय, रात्रिमें अधिक स्रवे ॥
पित्तके नाडीव्रणके लक्षण ।
पित्तात्तु तृड्ज्वरकरी परिदाहयुक्ता
पीतं स्रवत्यधिकमुष्णमहःसु चापि ॥ ३ ॥
पित्तके नाडीव्रणमें प्यास, ज्वर और दाह होय, उसमेंसे पीले रंगका और बहुत
गरम राध स्रवे और दिनमें स्राव अधिक होय ॥
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( २४२ ) माधवनिदान ।

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( २४२ ) माधवनिदान ।
कफजनाडीव्रणके लक्षण ।
ज्ञेया कफाद्बहुघनाऽर्जुनपिच्छिलास्त्रा
स्तब्धा सकण्डूरुजा रजनीप्रवृद्धा ।
कफज नाडीव्रणमें सफेद, गाढी, चिकनी राध निकले, खुजली चले, रातमें
स्राव बहुत होय ॥
सन्निपातज नाडीव्रणके लक्षण ।
दाहज्वरश्वसनमूर्च्छनवक्त्रशोषा यस्यां भवन्ति विहितानि च
लक्षणानि । तामादिशेत्पवनपित्तकफप्रकोपाद्धोरामसुक्षय-
करीमिव कालरात्रिम् ॥ ४ ॥
जिस नाडीव्रणमें दाह, ज्वर, श्वास, मूर्च्छा, मुखका सूखना और पूर्वोक्त लक्षण
होय उसको त्रिदोषकोपजन्य नाडीव्रण जानना, इसको भयंकर प्राणनाश करनेवाले
कालरात्रिके समान जानना ॥
शल्यज नाडीव्रण ।
नष्टं कथंचिदनुमार्गमुदीरितेषु स्थानेषु शल्यमचिरेण गतिं
करोति । सा फेनिलं मथितमुष्णमसृग्विमिश्रं स्रावं करोति
सहसा सरुजं च नित्यम् ॥ ५ ॥
किसी प्रकारसे शल्य (कण्टकादि) उक्तस्थानमें पहुँचकर टूट जाय तो नाडी-
व्रणको उत्पन्न करे, उस नाडीव्रणमेंसे झाग मिला तथा रुधिरयुक्त मथेके समान
गरम नित्य राध बहे तथा पीडा होय ॥
साध्यासाध्य लक्षण ।
नाडी त्रिदोषप्रभवा न सिध्येच्छेषाश्चतस्रः खलु यत्नसाध्याः ॥ ६ ॥
त्रिदोषजन्य नाडीव्रण साध्य नहीं होय, बाकीके चार नाडीव्रण यत्न करनेसे
साध्य होते हैं ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीभाषाटीकायां
नाडीव्रणरोगनिदानं समाप्तम् ॥

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अथ भगन्दरनिदानम् ।

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भाषाटीकासमेत । (२४३)
अथ भगन्दरनिदानम् ।
❖❖❖❖❖❖❖
गुदस्य द्व्यंगुले क्षेत्रे पार्श्वतः पिटिकाऽऽर्तिकृत् ।
भिन्नो भगन्दरो ज्ञेयः स च पंचविधो मतः ॥ १ ॥
गुदाके समीप दो अंगुल ऊंची पिछाडी एक पिडिका ( फुन्सी ) हो उसमें बहुत
पीडा होय, पिडिका फूटजाय उसको भगन्दररोग कहते हैं, सुश्रुतने इसकी निरुक्ति
इस प्रकार करी है यथा-“ गुदभगवस्तिप्रदेशदारणात् भगन्दरः ” इति । भगशब्द
इस जगह गुदावाचक है । सो भोजने कहा भी है-“ भगः परिसमन्ताच्च गुदं बस्ति-
स्तथैव च । भगवदारयेद्यस्मात्तस्माज्ज्ञेयो भगन्दरः ॥ ” इति । यह भगन्दररोग
पांच प्रकारका है, यह संख्या कहना केवल रक्तज द्वन्द्वज भगन्दर सम्भावना निवा-
रणार्थ जानना ॥
इसके पूर्वरूप ग्रन्थांतरोंसे लिखते हैं-
कटीकपालनिस्तोददाहकण्डूरुजादयः ।
भवन्ति पूर्वरूपाणि भविष्यति भगन्दरे ॥ २ ॥
कमरमें, कपालास्थिमें सुईसी चुभे, दाह होय, खुजली चले, पीडा होय ये लक्षण
जब भगन्दर होनहार होय है तब होते हैं, इस जगह भी कपालास्थि पूर्वोक्त जाननी
अर्थात् जो नाडीव्रणमें कह आये हैं ॥
शतपोनकके लक्षण ।
कषायरूक्षैरतिकोपितोऽनिलस्त्वपानदेशे पिडिकां करोति याम् ।
उपेक्षणात्पाकमुपैति दारुणं रुजा च भिन्नारुणफेनवाहिनी ॥
तत्रागमो मूत्रपुरीषरेतसां व्रणैरनेकैः शतपोनकं वदेत् ॥ ३ ॥
कसैले और रूखे पदार्थ खानेसे वायु अत्यन्त कुपित होकर गुदास्थानमें जो
पिडिका ( फुन्सी ) प्रगट करे, उनकी उपेक्षा करनेसे वे फुन्सियां पकें और फूट जायँ
तब पीडा होय तथा लाल झाग मिलि राध वहे तथा उसमें अनेक छिद्र हो जायँ
उन छिद्रोंमें होकर मूत्र मल और रेत (शुक्र) बहे, चालनीकेसे अनेक छिद्र होयँ इसी
कारण इस रोगको शतपोनक कहते हैं । शतपोनक नाम संस्कृतमें चालनीका है ॥
उष्ट्रशिरोधरके लक्षण ।
प्रकोपणैः पित्तमतिप्रकोपितं करोति रक्तां पिडिकां गुदाश्रिताम् ।
तदाशुपाकाहिमपूयवाहिनीं भगंदरं तूष्ट्रशिरोधरं वदेत् ॥ ४ ॥
पित्तकारक पदार्थ खानेसे कुपितभया जो पित्त सो गुदामें लाल रंगकी पिडिका
उत्पन्न करे, वह शीघ्र पककर उनमेंसे गरम राध बहे । ये पिडिका ( फुन्सी )
ऊँटकी नाकके समान होयँ इसीसे इसको उष्ट्रशिरोधर नाम कहते हैं ॥
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( २४४ ) माधवनिदान ।

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( २४४ ) माधवनिदान ।
परिस्रावीभगन्दरके लक्षण ।
कण्डूयनो घनस्त्रावी कठिनो मंदवेदनः ।
श्वेतावभासः कफजः परिस्रावी भगंदरः ॥ ५ ॥
कफसे प्रगट भये भगन्दरमें खुजली चले तथा गाढी राध बहे, पिडिका कठिन
होयँ, पीडा थोडी होय, वर्ण सफेद होय, उसको परिस्रावी भगन्दर कहते हैं ॥
शम्बूकावर्तके लक्षण ।
बहुवर्णरुजास्त्रावाः पिडिका गोस्तनोपमाः ।
शंबूकावर्तवन्नाडी शंबूकावर्तको मतः ॥ ६ ॥
जिसमें गौके थनके समान अनेक पिडिका होयँ, उनका रंग पीला और स्राव
अनेक प्रकारका होय, व्रण शंखके आँटेके समान होय, इसको शम्बूकावर्त कहते हैं॥
उन्मार्गीभगन्दरके लक्षण ।
क्षताद्गतिः पायुगता विवर्धते ह्युपेक्षणात्स्युः कृमयो विदार्यते ।
प्रकुर्वते मार्गमनेकधामुकैर्व्रणैस्तदुन्मार्गीभगंदरं वदेत् ॥ ७ ॥
गुदामें कांटे आदिके लगनेसे क्षत ( घाव ) हो जाय, उस घावकी उपेक्षा कर-
नेसे कृमि पडजायँ, वे कृमि उस क्षतको विदारण करें ऐसे वह घाव गुदापर्यंत बढ-
कर पहुंचे तथा कृमि उसमें अनेक मुखवाले ( व्रण ) घाव करलेवें इसको उन्मार्गी-
भगन्दर कहते हैं ॥
साध्यासाध्य लक्षण ।
घोराः साधयितुं दुःखाः सर्व एव भगंदराः ।
तेष्वसाध्यस्त्रिदोषोत्थः क्षतजश्च विशेषतः ॥ ८ ॥
सब भगन्दर दुःसाध्य हैं तिनमें भी त्रिदोषका भगन्दर असाध्य है और क्षतज
विशेषकर असाध्य है ॥
असाध्यके लक्षण ।
वातमूत्रपुरीषाणि क्रिमयः शुक्रमेव च ।
भगंदरात्प्रस्रवन्ति नाशयन्ति तमातुरम् ॥ ९ ॥
जिस भगन्दरमेंसे अधोवायु, मूत्र, विष्ठा, कृमि और वीर्य बहे उस रोगीका
नाश होय ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां
भगन्दरनिदानं समाप्तम् ॥
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अथोपवंशनिदानम्।

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भाषाटीकासमेत। (२४५)
अथोपवंशनिदानम्।
उपदंशके कारण।
हस्ताभिघातान्नखदन्तघातादधावनादत्यतिसेवनाद्वा।
योनिप्रदोषाच्च भवंति शिश्ने पंचोपदंशा विविधापचारैः॥ १ ॥
हाथकी चोट लगनेसे, नख, दांतके लगनेसे, अच्छी रीतिसे न धोनेसे, अत्यन्त
स्त्रीसंगके करनेसे अथवा योनिके दोषसे अर्थात् दीर्घ कडे बाल जिसके ऊपर होयँ
अथवा खारी गरम जलके धोनेसे, ब्रह्मचर्यवाली स्त्रीसे गमन करनेसे इत्यादिक
कारणोंसे लिंगमें उपदंश (गर्मीका रोग) होय है। वह पांच प्रकारका है॥
वातोपदंशके लक्षण।
सतोदभेदस्फुरणैः सकृष्णैः स्फोटैर्व्यवस्येत्पवनोपदंशम्।
लिंगेन्द्रियके ऊपर काले फोडे उठे, उनमें चोटनेकीसी पीडा होय, तोडनेकीसी
पीडा होय और स्फुरण ये लक्षण वातोपदंशके जानने॥
पित्तोपदंश व रक्तोपदंशके लक्षण।
पीतैर्बहुक्लेदयुतैः सदाहैः पित्तेन रक्तात्पिशितावभासैः॥ २ ॥
पित्तके उपदंशकरके पीले रंगके फोडे होते हैं। उनमेंसे पानी बहुत बहै, दाह
होय, रुधिरके उपदंशसे मांसके समान लाल रंगके फोडे होयँ॥
कफोपदंशके लक्षण।
सकण्डुरैः शोथयुतैर्महद्भिः शुक्लैर्घनस्रावयुतैः कफेन।
कफके उपदंश करके सफेद मोटे फोडे होयँ, उनमें खुजली चले, सूजन होय
और गाढी राध बहै॥
सन्निपातोपदंशके लक्षण।
नानाविधस्रावरुजोपपन्नमसाध्यमाहुस्त्रिमलोपदंशम्॥ ३ ॥
जिस उपदंशमें अनेक प्रकारका स्राव होय, पीडा होय यह त्रिदोषज उपदंश
असाध्य है॥
असाध्य लक्षण।
विशीर्णमांसं कृमिभिः प्रजग्धं मुष्कावशेषं परिवर्जयेत्तु।
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