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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 256 of 404

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Page 256

( २३८ ) माधवनिदान ।
फैलाते समय, सकोरनेके समय, नीचे करनेसे घोर पीडा होय और स्पर्श सहा न
जाय ये संधिभग्नके सामान्य लक्षण हैं ॥
-उत्पिष्टसन्धोः श्वयथुः समन्तात् ।
विशेषतो रात्रिभवा रुजा च-
उत्पिष्टमें संधिके चारों ओर सूजन होय और रात्रिमें पीडा बहुत होय, संधिके
हाड दोनों आपसमें घिसे उसको उत्पिष्ट ऐसे कहते हैं ॥
विश्लिष्टे तौ च रुजा च नित्यम् ॥ २ ॥
विश्लिष्ट संधियोंमें सूजन और रात्रिमें पीडा ये होकर सर्व कालमें अत्यन्त पीडा
होय और उत्पिष्टकी अपेक्षा इतने लक्षण विश्लिष्टमें विशेष होते हैं अर्थात् संधि
शिथिलमात्र होय इसमें हाडके हटनेसे बीचमें गलेटा हो जाय ॥
विवर्तिते पार्श्वरुजश्च तीव्राः-
विवर्तित संधिमें दोनों तरफके हाड संधिसे पलटजायँ तब अत्यन्त पीडा होय इस
संधिमें हाड दोनों तरफ फिरा करें ॥
तिर्यग्गते तीव्ररुजो भवन्ति ।
हड्डीके तिरछे हटनेसे पीडा बहुत हो और एक हड्डी संधिस्थान छोडकर
टेढी होजाय ॥
क्षिप्तेऽतिशूलं विषमा रुगस्थ्नोः-
संधिहड्डी एक उपरको हटजाय तो अत्यन्त पीडा होय और हाडोंमें कम ज्यादा
पीडा होय, इस जगह हड्डीकी क्रियासे अथवा दोनों हड्डियोंकी क्रियाकरके दोनों
हाड परस्पर समीपसे दूर होजाय ॥
-क्षिप्ते त्वधो रुग्विघटश्च सन्धेः ॥ ३ ॥
संधिकी हड्डी एक नीचेको हटजाय तो पीडा होय और संधिकी विरुद्ध चेष्टा
होय, इसमें संधिके हाड परस्पर दूर होयँ परन्तु किंचित् नीचेको गमन करे ॥
अब कांडभग्नको कहते हैं-
काण्डे त्वतः कर्कटकाश्वकर्णविचूर्णितं पिच्चितमस्थिच्छालिका ।
काण्डेषु भग्नं त्वतिपातितं च मज्जागतं च स्फुटितं च वक्रम् ॥ ४ ॥
छिन्नं द्विधा द्वादशधापि काण्डे-
कांडभग्न बारह प्रकारके हैं-१ कर्कटक, २ अश्वकर्ण, ३ विचूर्णित, ४ पिच्चित,
५ अस्थिच्छालिका, ६ कांडभग्न, ७ अतिपातित, ८ मज्जागत, ९ स्फुटित,