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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 259 of 404

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Page 259

भाषाटीकासमेत । ( २४१ )
अथ नाडीव्रणनिदानम् ।
————
नाडी व्रणकी सम्प्राप्ति ।
यः शोथममाममतिपक्वमुपेक्षतेऽज्ञो यो वा व्रणं प्रचुरपूय-
मसाधुवृत्तः । अभ्यन्तरं प्रविशति प्रविदार्य तस्य स्थानानि
पूर्वविहितानि ततः सपूयः ॥ १ ॥ तस्यातिमात्रगमनाद्गति-
रिष्यते तु नाडीव यद्वहति तेन मता तु नाडी ।
जो मूर्खमनुष्य पकेहुए फोडेको कच्चा समझकर उपेक्षा करे किंवा बहुत राध
पडे फोडेकी उपेक्षा करदे, तब वह बढीहुई राध पूर्वोक्त त्वङ्मांसादिक स्थानमें जाकर
उनको भेद कर वह बहुत भीतरही पहुँच जाय, तब एक मार्ग कर उसमें वह राध
नाडीके समान बहे इसीसे इसको नाडीव्रण ( नासूर ) कहते हैं ॥
नाडीव्रणकी संख्यारूप सम्प्राप्ति ।
दोषैस्त्रिभिर्भवति सा पृथगेकशश्च
संमूर्च्छितैरपि च शल्यनिमित्ततोऽन्या ॥ २ ॥
पृथक् पृथक् दोषोंसे ३, सन्निपातसे १ और शल्यसे १ ऐसे नाडीव्रण पांच
प्रकारका है ॥
वातज नाडीव्रणके लक्षण ।
तत्रानिलात्परुषसूक्ष्ममुखी सशूला
फेनानुविद्धमधिकं स्रवति क्षपासु ।
बादीसे नाडीव्रणका मुख रूखा तथा छोटा होय और शूल होय, उसमेंसे फेन-
युक्त स्राव होय, रात्रिमें अधिक स्रवे ॥
पित्तके नाडीव्रणके लक्षण ।
पित्तात्तु तृड्ज्वरकरी परिदाहयुक्ता
पीतं स्रवत्यधिकमुष्णमहःसु चापि ॥ ३ ॥
पित्तके नाडीव्रणमें प्यास, ज्वर और दाह होय, उसमेंसे पीले रंगका और बहुत
गरम राध स्रवे और दिनमें स्राव अधिक होय ॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA