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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 253 of 404

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Page 253

भाषाटीकासमेत । ( २३५ )
जो अंग हाडसहित प्रहार कहिये मुद्गर आदिकी चोट अथवा किंवाड आदिके
दबना इत्यादि योगसे पिच जाय, मज्जा रुधिर करके युक्त होय, घाव न होय
उसको पिच्चितव्रण कहते हैं ॥
घृष्टके लक्षण ।
घर्षणादभिघाताद्वा यदंगं विगतत्वचम् ।
उषास्रावान्वितं तद्धि घृष्टमित्यभिनिर्दिशेत् ॥ १४ ॥
कठिन वस्त्र आदिके घर्षण (घिसने) से, चोटके लगनेसे जिस अंगके ऊपरकी
त्वचा जाती रहे तथा आगके समान गरम रुधिर चुचाय उसको घृष्ट कहते हैं॥
सशल्‍यव्रणके लक्षण ।
श्यावं सशोथं पिटिकान्वितं च मुहुर्मुहुः शोणितवाहिनं च ।
मृदूद्गतं बुद्बुदतुल्यमांसं व्रणं सशल्यं सरुजं वदंति ॥ १५ ॥
जो व्रण नीला, सूजनयुक्त, मरोडिनसे व्याप्त अथवा बारंबार उनमेंसे रुधिर
बहै और नरम होकर ऊपर बबूलेके समान उठा हुआ जिसका मांस होय उस
व्रणको सशल्य जानना चाहिये ॥
कोष्ठभेदके लक्षण ।
त्वचोऽतीत्य शिरादीनि भित्त्वा वा परिहृत्य वा ।
कोष्ठे प्रतिष्ठितं शल्यं कुर्यादुक्तानुपद्रवान् ॥ १६ ॥
सप्त त्वचाओंमें व्याप्त होकर शिरा, नस, हड्डी इनकी सन्धियोंको वेधकर अथवा
सिरा आदिको छोड जो शल्य कोष्ठमें रहा है, उससे आगे कहे हुए लक्षण होते हैं ॥
असाध्यकोष्ठभेद ।
तत्रांतर्लोहितं पांडु शीतपादकराननम् ।
शीतोच्छ्वासं रक्तनेत्रमानद्धं परिवर्जयेत् ॥ १७ ॥
जिसका रुधिर आंतोंमें संचित होय अर्थात् बाहर नहीं बहे और जो पीला वर्ण,
जिसके हाथ पैर शीतल होय और जो शीतल श्वासको छोडे, जिसके लाल नेत्र होयँ
तथा आनाह कहिये पेट फूलना ऐसे रोगीको वैद्य त्याग देय ॥
मांस, शिरा, स्नायु, अस्थि और सन्धि इन मर्मोंमें चोट लगनेके सामान्य लक्षण ।
भ्रमः प्रलापः पतनं प्रमोहो विचेष्टनं ग्लानिरथोष्णता च ।
स्रस्तांगता मूर्छनमूर्ध्ववातस्तीव्रा रुजो वातकृताश्च तास्ताः ॥ १८॥
मांसोदकाभं रुधिरं च गच्छेद्सर्वैन्द्रियार्थोपरमस्तथैव ।
दशार्द्धसंख्‍येष्वथ विक्षतेषु सामान्यतो मर्मसु लिङ्‌गमुक्तम् ॥ १९ ॥