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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,063 pages

About this granth

The Atharvaveda (अथर्ववेद) is one of the four Vedas. Besides ritual hymns it contains many verses concerned with everyday life: protection from disease, healing plants, the welfare of house and family, defence against enemies, marriage, kingship and praise of the earth, including the well-known Prithvi Sukta.

The introduction to this edition notes that Patanjali, author of the Mahabhashya, knew nine branches of the Atharvaveda, of which only a few, such as the Paippalada and Shaunaka, survive. The translation follows the Shaunaka recension, which the introduction describes as having 20 kandas, 731 suktas and 5,987 mantras. Each sukta is headed by its deity, for example the waters, Brihaspati, the rivers, plants, Brahmanaspati, the jangida amulet, Indra, the apamarga herb, and the house and its guardian, so the subject of each hymn is clear at a glance.

The Sanskrit mantras are accompanied by a simple Hindi rendering by Dr. Ganga Sahay Sharma. This is the 2015 edition of Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, part of its set of the four Vedas, and runs to 1063 pages.

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इस वर्तमान सृष्टि के पहले परमेश्वर के मन में काम भलीभांति व्याप्त हो गया. माया में
विलीन अंतःकरण में वही काम बीज बना. हे काम! सारे संसार का निर्माण करने के लिए
उत्पन्न किए गए तुम महान परमेश्वर के द्वारा समान कारण बने. हे काम! तुम यजमान को
धन की अधिकता प्रदान करो. (१)
त्वं काम सहसासि प्रतिष्ठितो विभुर्विभावा सख आ सखीयते.
त्वमुग्रः पृतनासु सासहिः सह ओजो यजमानाय धेहि.. (२)
हे काम! तुम अपने सामर्थ्य से प्रतिष्ठित हो. हे व्यापक एवं विशेष दीप्ति वाले! तुम
हमारे प्रति मित्र के समान आचरण करते हो. हे काम! तुम क्रोधित होने पर शत्रु सेनाओं को
सहन करते हो. तुम यजमान को ऐसा बल प्रदान करो जो शत्रु को पराजित करने में समर्थ
हो. (२)
दूराच्चकमानाय प्रतिपाणायाक्षये.
आस्मा अशृण्वन्नाशाः कामेनाजनयन्त्स्वः.. (३)
अति दुर्लभ फल की इच्छा करने वाले मुझ को सभी ओर से रक्षा करने के लिए तथा
अनिष्ट के निवारण के लिए सभी दिशाएं काम के सहयोग से सुख उत्पन्न करें. (३)
कामेन मा काम आगन् हृदयाद् हृदयं परि.
यदमीषामदो मनस्तदैतूप मामिह.. (४)
फल विषयक इच्छा से काम मेरे समीप आए. ब्राह्मणों का फल प्राप्त करने वाला मन
भी मुझे प्राप्त हो. (४)
यत्काम कामयमाना इदं कृण्मसि ते हविः.
तन्नः सर्वं समृध्यतामथैतस्य हविषो वीहि स्वाहा.. (५)
हे काम! जिस फल की इच्छा करते हुए हम तेरे लिए हवि प्रदान करते हैं, उस हवि का
तुम भक्षण करो. यह हवि तुम्हें भलीभांति प्राप्त हो. हम ने जो कामना की है, यह सभी प्रकार
से पूर्ण हो. (५)
सूक्त—५३ देवता—काल
कालो अश्वो वहति सप्तरश्मिः सहस्राक्षो अजरो भूरिरेताः.
तमा रोहन्ति कवयो विपश्चितस्तस्य चक्रा भुवनानि विश्वा.. (१)
सात किरणों अथवा रस्सियों वाला, हजार नेत्रों वाला, वृद्धावस्था रहित तथा अत्यधिक
वीर्य से युक्त कालरूपी घोड़ा रथ को खींचता है. सभी लोक उस के चक्र अर्थात् पहिए हैं.
विद्वान् पुरुष उस रथ पर सवार होते हैं. (१)
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सप्त चक्रान् वहति काल एष सप्तास्य नाभीरमृतं न्वक्षः.
स इमा विश्वा भुवनान्यज्जत् कालः स ईयते प्रथमो नु देवः.. (२)
यह काल रूप परमात्मा क्रम से पहियों के समान सात ऋतुओं को धारण करता है. इस
संवत्सर रूप काल की सात नाभियां हैं और इस के अक्ष अर्थात् अरे नष्ट न होने वाले हैं. वह
संवत्सर रूप काल उन सात भुवनों तथा इन में रहने वाले प्राणियों को व्यक्त करता हुआ सब
से पहले उत्पन्न एवं दिव्य है. (२)
पूर्णः कुम्भो ऽ धि काल आहितस्तं वै पश्यामो बहुधा नु सन्तम्ः.
स इमा विश्वा भुवनानि प्रत्यङ् कालं तमाहुः परमे व्योमन्.. (३)
यह ब्रह्मांड रूप भरा हुआ कुंभ अर्थात् घड़ा संवत्सर रूपी काल पर रखा हुआ है. संत
अर्थात् ज्ञानी पुरुष उस काल के दिवस, रात्रि आदि अनेक रूपों को देखते हैं. यह काल रूप
परमात्मा सभी उपस्थित प्राणियों के सामने प्रकट होता है तथा उन्हें अपने में मिला लेता है.
इस काल को आकाश के समान निर्लेप कहा जाता है. (३)
स एव सं भुवनान्याभरत् स एव सं भुवनानि पर्यैत्.
पिता सन्नभवत् पुत्र एषां तस्माद् वै नान्यत् परमस्ति तेजः.. (४)
वही काल सब भुवनों को उत्पन्न करता है. वही काल सब भुवनों में व्याप्त होता है. वही
काल इन भुवनों को उत्पन्न करने वाला पिता होता हुआ पुत्र भी होता है. उस काल के
अतिरिक्त कोई भी तेज महान नहीं है. (४)
कालोऽमूं दिवमजनयत् काल इमाः पृथिवीरुत.
काले ह भूतं भव्यं चेषितं ह वि तिष्ठते.. (५)
काल रूप परमात्मा ने इस द्युलोक अर्थात स्वर्ग को जन्म दिया. काल ने उन पृथ्वियों
को उत्पन्न किया. काल में ही यह भूत, भविष्य एवं वर्तमान विश्व चेष्टा करता है. (५)
कालो भूतिमसृजत काले तपति सूर्यः.
काले ह विश्वा भूतानि काले चक्षुर्वि पश्यति.. (६)
काल ने भवनों वाले संसार को उत्पन्न किया है. काल की प्रेरणा से ही सूर्य संसार को
प्रकाशित करता है. सभी प्राणी काल में ही वर्तमान रहते हैं. चक्षु आदि इंद्रियां अपना काम
करती हैं. (६)
काले मनः काले प्राणः काले नाम समाहितम्.
कालेन सर्वा नन्दन्त्यागतेन प्रजा इमाः.. (७)
काल में मन, प्राण तथा नाम व्याप्त हैं. ये सब प्रजाएं वसंत आदि रूप काल के कारण
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प्रसन्न रहती है. (७)
काले तपः काले ज्येष्ठं काले ब्रह्म समाहितम्.
कालो ह सर्वस्येश्वरो यः पितासीत् प्रजापतेः.. (८)
काल में तप, काल में संसार का कारण हिरण्य गर्भ व्याप्त है. काल में ही अंगों सहित
वेद व्याप्त था. काल ही सब का स्वामी है. काल ही प्रजाओं का ईश्वर और पिता था. (८)
तेनेषितं तेन जातं तदु तस्मिन् प्रतिष्ठितम्.
कालो ह बह्म भूत्वा बिभर्ति परमेष्ठिनम्.. (९)
काल ने इस संसार को बनाने की इच्छा की. काल से उत्पन्न जगत् काल में ही प्रतिष्ठित
हुआ. काल ही बल बन कर परमेष्ठी ब्रह्म को धारण करता है. (९)
कालः प्रजा असृजत कालो अग्रे प्रजापतिम्.
स्वयम्भूः कश्यपः कालात् तपः कालादजायत.. (१०)
काल ने प्रजाओं को उत्पन्न किया. काल ने सृष्टि के आरंभ में प्रजापति को उत्पन्न
किया. काल से ही स्वयं भू ब्रह्मा और कश्यप ऋषि उत्पन्न हुए. तेज भी काल से ही उत्पन्न
हुआ. (१०)
सूक्त—५४ देवता—काल
कालादापः समभवत् कालाद् ब्रह्म तपो दिशः.
कालेनोदेति सूर्यः काले नि विशते पुनः.. (१)
काल से जलों की उत्पत्ति हुई. काल से ब्रह्म अर्थात् यज्ञ आदि कर्म, चांद्रायण आदि तप
तथा पूर्व आदि दिशाएं उत्पन्न हुईं. काल के कारण ही सूर्य उदय होता है तथा काल में ही
अस्त हो जाता है. (१)
कालेन वातः पवते कालेन पृथिवी मही. द्यौर्मही काल आहिता.. (२)
काल के कारण वायु चलती है. काल के कारण पृथ्वी महिमामयी है. द्युलोक काल से
महिमामय है तथा काल के आश्रित है. (२)
कालो ह भूतं भव्यं च पुत्रो अजनयत् पुरा.
कालादृचः समभवन् यजुः कालादजायत.. (३)
पहले काल से भूत, भविष्य, पुत्र तथा ऋचाएं उत्पन्न हुईं. काल से ही यजुर्वेद का जन्म
हुआ. (३)
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कालो यज्ञं समैरयद्देवेभ्यो भागमक्षितम्.
काले गन्धर्वाप्सरसः काले लोकाः प्रतिष्ठिताः.. (४)
काल ने यज्ञ को देवताओं के भाग के रूप में प्रकट किया. काल में गंधर्व, अप्सराएं एवं
सब लोक प्रतिष्ठित हैं. (४)
काले ऽ यमङ्गिरा देवो ऽ थर्वा चाधि तिष्ठतः.
इमं च लोकं परमं च लोकं पुण्यांश्च लोकान् विधृतीश्च पुण्याः.
सर्वांल्लोकानभिजित्य ब्रह्मणा कालःस ईयते परमो नु देवः.. (५)
ये अंगिरा देव और अथर्वा ऋषि अधिष्ठित हैं. इस लोक को, परलोक को, पुण्यलोकों
को, दुःखरहित लोकधारकों को, सभी कहे गए और बिना कहे गए लोकों को यह ब्रह्म रूप
काल व्याप्त कर के उत्तम काल देव सभी स्थावर और जंगम जगत् को उत्पन्न करता है. (५)
सूक्त—५५ देवता—अग्नि
रात्रिंरात्रिम्प्रयातं भरन्तो ऽ श्वायेव तिष्ठते घासमस्मै.
रायस्पोषेण समिषा मदन्तो मा ते अग्ने प्रतिवेशा रिषाम (१)
हे अग्नि देव! तुम यज्ञ के साधन के रूप में गार्हपत्य आदि यज्ञशालाओं में वर्तमान हो.
जिस प्रकार घोड़े को घास दी जाती है, उसी प्रकार तुम्हारे लिए हम यह खाने योग्य हवि
रातदिन प्रदान करते हुए अन्न और धन से प्रसन्न होते हुए तुम्हारा सामीप्य प्राप्त करें तथा हमें
नाश की प्राप्ति न हो. (१)
या ते वसोर्वात इषुः सा त एषा तया नो मृड.
रासस्पोषेण समिषा मदन्तो मा ते अग्ने प्रतिवेशा रिषाम.. (२)
हे निवास करने वाले अग्नि देव! तुम्हारी तथा अन्य देवों की जो कृपामयी बुद्धि है,
अपनी इस बुद्धि से हमारी रक्षा करो. धन और अन्न से प्रसन्न होते हुए हम तुम्हारा सामीप्य
प्राप्त करें और हम नाश को प्राप्त न हों. (२)
सायंसायं गृहपतिर्नो अग्निः प्रातःप्रातः सौमनसस्य दाता.
वसोर्वसोर्वसुदान एधि वयं त्वेन्धानास्तन्वं पुषेम.. (३)
गृहपति द्वारा आधान की गई अग्नि सायं और प्रातः तथा सभी कालों में सुख को देने
वाली हो. हे अग्नि! तुम सभी प्रकार के धनों को देने वाली बनो. तुम्हें हवि के द्वारा प्रदीप्त
करते हुए हम पुत्र, मित्र आदि सभी के शरीरों को पुष्ट करें. (३)
प्रातःप्रातर्गृहपतिर्नो अग्निः सायंसायं सौमनसस्य दाता.
वसोर्वसोर्वसुदान एधीन्धानास्त्वा शतंहिमा ऋधेम.. (४)
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हे गृहपति द्वारा आधान की गई अग्नि! तुम सायं और प्रातः हमें सुख देने वाली बनो. हे
धन प्रदान करने वाली अग्नि! तुम वृद्धि प्रदान करो. हम तुम्हें हवि द्वारा दीप्त करते हुए सौ
वर्ष तक जीवित रहें. (४)
अपश्चा दग्धान्नस्य भूयासम्.
अन्नादायान्नपतये रुद्राय नमो अग्नये.
सभ्यः सभां मे पाहि ये च सभ्याः सभासदः.. (५)
बटलोई के निचले भाग में जले हुए भोजन को प्राप्त करने वाला मैं न बनूं. तात्पर्य यह
है कि मैं अधिक भोजन प्राप्त करूं. अन्न प्रदान करने वाले अग्नि और अन्न के स्वामी रुद्र के
लिए नमस्कार है. हे सभा के योग्य अग्नि! तुम मेरी सभा अर्थात् पुत्र, मित्र, पशु आदि के
समूह की रक्षा करो. जो उस समूह में स्थित रहने वाले हैं, हे अग्नि देव! उन की रक्षा करो.
(५)
त्वमिन्द्रा पुरुहूत विश्वमायुर्व्य श्रवत्.
अहरहर्बलिमित्ते हरन्तो ऽ श्वायेव तिष्ठते घासमग्ने.. (६)
हे बहुतों के द्वारा आह्वान किए गए इंद्र और ऐश्वर्य वाले अग्नि! तुम हमें संपूर्ण अन्न
और जीवन प्राप्त कराओ. बंधे हुए घोड़े को जिस प्रकार घास प्राप्त कराई जाती है, उसी
प्रकार तुम्हें प्रतिदिन हवि प्रदान करते हुए हम पूर्ण आयु प्राप्त करें. (६)
सूक्त—५६ देवता—दुःस्वप्न नाशन
यमस्य लोकादध्या बभूविथ प्रमदा मर्त्यान् प्र युनक्षि धीरः.
एकाकिना सरथं यासि विद्वान्त्स्वप्नं मिमानो असुरस्य योनौ.. (१)
हे बुरे स्वप्न के अभिमानी क्रूर पिशाच! तू यमलोक से धरती पर आया है. तू निर्भय हो
कर स्त्रियों और पुरुषों के समीप पहुंच जाता है. शरीरधारियों की आयु की वृद्धि और हानि
जानता हुआ तू प्राण के आत्मीय स्थान हृदय में स्वप्न के कष्ट का निर्माण करता हुआ
सहायक हीन रथ के द्वारा यमलोक प्राप्त कराता है. (१)
बन्धस्त्वाग्रे विश्वचया अपश्यत् पुरा रात्र्या जनितोरेके अह्नि.
ततः स्वप्नेदमध्या बभूविथ भिषग्भ्यो रूपमपगूहमानः.. (२)
हे दुःस्वप्न के अभिमानी! सब के स्रष्टा और विधाता ने तुझे सृष्टि से पहले देखा था.
मानस, स्थापत्य आदि ने तुझे दिवस और रात्रि के जन्म से पूर्व देखा था. हे स्वप्न! तुम इस
जगत् को व्याप्त कर रहे हो. तुम चिकित्सकों से अपना रूप छिपाए रहते हो. तात्पर्य यह है
कि चिकित्सक तुम्हारा प्रभाव समाप्त नहीं कर पाते. (२)
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बृहद्गावासुरेभ्यो ऽ धि देवानुपावर्तत महिमानमिच्छन्.
तस्मै स्वप्नाय दधुराधिपत्यं त्रयस्त्रिंशासः स्व रानशाना.. (३)
सब को व्याप्त करने वाला स्वप्न असुरों के पास से चल कर देवों को प्राप्त हुआ था.
स्वप्न देवों के पास महत्त्व प्राप्त करने के लिए गया था. तैंतीस देवताओं ने उस स्वप्न को
अनिष्ट करने की शक्ति प्रदान की. (३)
नैतां विदुः पितरो नोत देवा येषां जल्लिश्वरत्यन्तरेदम्.
त्रिते स्वप्नमदधुराप्त्ये नर आदित्यासो वरुणेनानुशिष्टाः.. (४)
देवों के द्वारा स्वप्न को जो अनिष्ट कारक शक्ति प्रदान की गई थी, उसे न पिता जानते हैं
और न देव जानते हैं. आदित्यों ने दुःस्वप्न से बचने का उपाय वरुण से पूछा. वरुण ने
आदित्यों को स्वप्न से बचने का उपाय बताया. आदित्यों ने जलों के पुत्र मित्र नामक ऋषि पर
अनिष्ट फल सूचक स्वप्न को स्थापित कर दिया. (४)
यस्य क्रूरमभजन्त दुष्कृतो ऽ स्वप्नेन सुकृतः पुण्यमायुः.
स्वर्मदसि परमेण बन्धुना तप्यमानस्य मनसो ऽ धि जज्ञिषे.. (५)
पापी पुरुष उस दुःस्वप्न का भयंकर फल प्राप्त करते हैं. उत्तम कर्म करने वाले दुःस्वप्न न
देख कर पुण्य कर्म करने के लिए आयु प्राप्त करते हैं. हे बुरे स्वप्न! तुम स्वर्गलोक में सर्वश्रेष्ठ
विधाता के साथ प्रसन्न रहते हो तथा मृत्यु के पास से संतप्त बुरे कर्म करने वाले पुरुष के मन
में मृत्यु की सूचना देने के लिए उत्पन्न होते हो. (५)
विद्म ते सर्वाः परिजाः पुरस्ताद् विद्म स्वप्न यो अधिपा इहा ते.
यशस्विनो नो यशसेह पाह्याराद् द्विषेभिरप याहि दूरम्.. (६)
हे स्वप्न! हम तेरे सभी परिजनों को जानते हैं तथा इस समय तेरा जो स्वामी है, उसे भी
जानते हैं. तेरे परिजनों तथा स्वामी को जानने वाले हम यशस्वीजनों की इस प्रसंग में यज्ञ
अथवा अन्न के लिए रक्षा करो. जो लोग हम से द्वेष करते हैं, तुम उन के साथ दूर देश में चले
जाओ. (६)
सूक्त—५७ देवता—दुःस्वप्ननाशन
यथा कलां यथा शफं यथर्णं संनयन्ति.
एवा दुष्ष्वप्न्यं सर्वमप्रिये सं नयामसि.. (१)
जैसे ऋत्विज् मारे गए बलि पशु को काट कर टुकड़े योग्य अंगों का संस्कार करते हुए
खुर आदि प्रयोग में न आने वाले अंगों को साथ ले कर अन्यत्र जाते हैं तथा जिस प्रकार ऋण
देने वाले को मूल धन और ब्याज लौटाते हैं, उसी प्रकार बुरे स्वप्न के कारण जितने भी अनर्थ

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हैं, उन्हें हम जलों के मध्य त्रित नाम के महर्षि पर धारण करते हैं. (१)
सं राजानो अगुः समृणान्यगुः सं कुष्ठा अगुः सं कला अगुः.
समस्मासु यद् दुष्वप्न्यं निर्द्विषते दुष्वप्न्यं सुवाम.. (२)
जिस प्रकार राजा लोग दूसरे के राष्ट्र का विनाश करने के लिए एकत्र हो जाते हैं, जिस
प्रकार एक ऋण के न चुकाने पर बहुत से ऋण हो जाते हैं, जिस प्रकार कुष्ठ रोग होने पर
बहुत से रोग हो जाते हैं, जैसे पशुओं के खुर आदि अनुपयोगी अंग फेंकने से गड्ढे अथवा
पुराने कुएं में एकत्र हो जाते हैं, उसी प्रकार हम अपने दुःस्वप्न को उस के पास भेजते हैं जो
हम से द्वेष करता है. (२)
देवानां पत्नीनां गर्भ यमस्य कर यो भद्रः स्वप्न. स मम यः पापस्तद् द्विषते
प्र हिण्मः.
मा तृष्ठानामसि कृष्णशकुनेर्मुखम्.. (३)
हे स्वप्न! तुम अप्सराओं के गर्भ हो, यमराज के हाथ हो. तुम्हारा जो मंगलकारी अंश है,
वह मुझे प्राप्त हो. तुम्हारा जो क्रूर अंश है, उसे मैं उस के पास में भेजता हूं जो मुझ से द्वेष
करता है. हे कौए के मुख से उत्पन्न दुःस्वप्न! तुम मेरे लिए बाधक मत बनो. (३)
तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स त्वं स्वप्नाश्व इव कायमध्व इव नीनाहम्.
अनास्माकं देवपीयुं पियारूं वप यदस्मासु दुष्वप्न्यं यद् गोषु यच्च नो गृहे..
(४)
हे स्वप्न! तुम किस लिए उत्पन्न हुए हो, यह सब हम जानते हैं. घोड़ा जिस प्रकार अपने
धूलि धूसरित अंगों को कंपित करता है और अपनी काठी आदि को दूर फेंक देता है, उसी
प्रकार मैं तुम्हें अपने शत्रु के पास तथा देवों के यज्ञों में बाधा डालने वाले के पास फेंकता हूं.
हमारे शरीर में, हमारी गायों में और हमारे घरों में जो दुःस्वप्न का फल है, वह हमारे शत्रु और
देव शत्रु अर्थात् यज्ञ कर्म में बाधा डालने वाले पर पहुंचे. (४)
अनास्माकस्तद् देवपीयुः पियारूर्निष्कमिव प्रति मुञ्चताम्.
नवारत्नीनपमया अस्माकं ततः परि.
दुष्वप्न्यं सर्वं द्विषते निर्दयामसि.. (५)
हे स्वप्न! तेरे अनिष्ट फल को हमारा तथा देवों का शत्रु अपने शरीर पर स्वर्ण के
आभूषण के समान धारण करे. हमारे दुःस्वप्न का जो फल है, वह हम से नौ मुट्ठी दूर हट
जाए. हम दुःस्वप्न के बुरे प्रभाव को अपने शत्रु की ओर भेजते हैं. (५)
सूक्त—५८ देवता—मंत्रों में बताए गए
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घृतस्य जूतिः समना सदेवा संवत्सरं हविषा वर्धयन्ती.
श्रोत्रं चक्षुः प्राणो ऽ च्छिन्नो नो अस्त्वच्छिन्ना वयमायुषो वर्चसः.. (१)
परमात्मा के स्वरूप के विषय में जो ज्ञान है, वह सभी प्राणियों के हृदयों तथा सभी
प्राणियों की इंद्रियों में स्थित है. परमात्मा से संबंधित ज्ञान परमात्मा को हवि के द्वारा बढ़ाता
हुआ हमारे कानों और आंखों को स्वस्थ करे. हम जीवन के तेज से युक्त रहें. (१)
उपास्मान् प्राणो ह्वयतामुप वयं प्राणं हवामहे.
वर्चो जग्राह पृथिव्य १ न्तरिक्षं वर्चः सोमो बृहस्पतिर्विधत्ता.. (२)
शरीर को धारण करने वाली प्राण वायु मानस यज्ञ करने वाले हम को दीर्घ जीवन की
अनुमति प्रदान करे. हम प्राण वायु को अपने शरीर में चिरकाल तक स्थित रहने के लिए
बुलाते हैं. पृथ्वी और अंतरिक्ष ने हमें देने के लिए ही तेज ग्रहण किया है. हे सोम! बृहस्पति
एवं अग्नि अथवा सूर्य हमें देने के लिए तेज ग्रहण करें. (२)
वर्चसो द्यावापृथिवी संग्रहणी बभूवभुर्वर्चो गृहीत्वा पृथिवीमनु सं चरेम.
यशसं गावो गोपतिमुप तिष्ठन्त्यायतीर्यशो गृहीत्वा पृथिवीमनु सं चरेम..
(३)
हे आकाश और पृथ्वी! तुम हमें तेज प्रदान करने वाली बनो. हम तेज ग्रहण कर के
पृथ्वी पर संचरण करें. गायों के स्वामी मेरे अधिकार में अन्न और गाएं स्थित हैं. हम आती हुई
गायों को ग्रहण कर के पृथ्वी पर संचरण करें. (३)
व्रजं कृणुध्वं स हि वो नृपाणो वर्मा सीव्यध्वं बहुला पृथूनि.
पुरः कृणुध्वमायसीरधृष्टा मा वः सुस्रोच्चमसो दृंहता तम्.. (४)
हे इंद्रियो! तुम शरीर में स्थान बनाओ, क्योंकि यह शरीर अपनेअपने विषयों में तुम्हारा
रक्षक है. तुम अपने विस्तृत विषयों को अधिकार में करो. यह शरीर तुम्हारा चमस अर्थात्
तुम्हारे भोग का साधन है. इस का विनाश न हो. तुम इस शरीर को दृढ़ करो. (४)
यज्ञस्य चक्षुः प्रभृतिर्मुखं च वाचा श्रोत्रेण मनसा जुहोमि.
इमं यज्ञं विततं विश्वकर्मणा देवा यन्तु सुमनस्यमानाः.. (५)
चक्षु आदि इंद्रियों को मैं मानस यज्ञ में हवन करता हूं. यह यज्ञ विश्वकर्मा देव ने विस्तृत
किया है. उत्तम हृदय वाले देव इस मानस यज्ञ को प्राप्त करें. (५)
ये देवानामृत्विजो ये च यज्ञिया येभ्यो हव्यं क्रियते भागधेयम्.
इमं यज्ञं सह पत्नीभिरेत्य यावन्तो देवास्तविषा मादयन्ताम्.. (६)
देवताओं में जो समय-समय पर यज्ञ करने वाले अर्थात् ऋत्विज् हैं तथा जो यज्ञ के
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सूक्त—५९ देवता—अग्नि

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योग्य हैं, इन दोनों के भाग के रूप में हवि प्रदान किया जाता है. जितने महान देव हैं, वे
अपनीअपनी पत्नियों, इंद्राणी आदि के साथ इस यज्ञ में आ कर हवि प्राप्त करें तथा तृप्त हों.
(६)
सूक्त—५९ देवता—अग्नि
त्वमग्ने व्रतपा असि देव आ मर्त्येष्वा. त्वं यज्ञेष्वीड्यः.. (१)
हे अग्नि! तुम यज्ञकर्मों का पालन करने वाली हो. तुम मनुष्यों में जठराग्नि के रूप में
सभी ओर व्याप्त हो. तुम दर्श, पौर्णमास आदि यज्ञों की स्तुति के योग्य हो. (१)
यद् वो वयं प्रमिनाम व्रतानि विदुषां देवा अविदुष्टारासः.
अग्निष्टद् विश्वादा पृणातु विद्वान्त्सोमस्य यो ब्राह्मणाँ आविवेश.. (२)
हे देवो! अपने व्रतों को न जानने वाले हम जानने वालों को नष्ट करते हैं. उस लुप्त कर्म
को जानती हुई अग्नि पूर्ण करे. वह अग्नि सोम के संबंध से ब्राह्मणों के सम्मुख जाती है. (२)
आ देवानामपि पन्थामगन्म यच्छक्नवाम तदनुप्रवोढुम्.
अग्निर्विद्वान्त्स यजात् स इद्धोता सो ऽ ध्वरान्त्स ऋतून् कल्पयाति.. (३)
जिस मार्ग पर चल कर देवों को प्राप्त किया जाता है, हम उस मार्ग पर चलें. हम जो
अनुष्ठान कर सकते हैं, उसे करने के हेतु देवों के मार्ग पर गमन करें. जानने वाली अग्नि उस
मार्ग को देवों को प्राप्त कराएं. वही अग्नि देवों और मनुष्यों का आह्वान करने वाली है. अग्नि
यज्ञों तथा ऋतुओं को सुरक्षित करें. (३)
सूक्त—६० देवता—याग आदि
वाङ्म आसन्नसोः प्राणश्चक्षुरक्ष्णोः श्रोत्रं कर्णयोः.
अपलिताः केशा अशोणा दन्ता बहु बाह्वोर्बलम्.. (१)
मेरे मुख में वाणी हो. मेरी नासिका में प्राण रहें. मेरी आंखों में देखने की शक्ति रहे. मेरे
कानों में सुनने की शक्ति हो. मेरे केश श्वेत न हों. मेरे दांत कभी न टूटें. मेरी भुजाओं में
अधिक बल रहे. (१)
ऊर्वोरोजो जङ्घयोर्जवः पादयोः.
प्रतिष्ठा अरिष्टानि मे सर्वात्मानिभृष्टः.. (२)
मेरे उरुओं में ओज रहे, जंघाओं में वेग रहे तथा चरणों में चलने की शक्ति रहे. मेरी
आत्मा अहिंसित रहे तथा मेरे सभी अंग पाप रहित हों. (२)
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सूक्त—६१ देवता—ब्रह्मणस्पति
तनूस्तन्वा मे सहे दतः सर्वमायुरशीय.
स्योनं मे सीद पुरुः पृणस्व पवमानः स्वर्गे.. (१)
मैं जीवनभर अपने दांतों से खाता रहूं. मैं शत्रुओं को अपने शरीर से दबाने में समर्थ रहूं.
हे अग्नि! तुम मेरे घर में सुख से प्रतिष्ठित रहो. तुम स्वर्ग में भी मुझे सुख से संपन्न बनाओ.
(१)
सूक्त—६२ देवता—ब्रह्मणस्पति
प्रियं मा कृणु देवेषु प्रियं राजसु मा कृणु.
प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शूद्र उतार्ये.. (१)
हे अग्नि! तुम मुझे देवों का प्रिय बनाओ. मुझे राजाओं का भी प्रिय करो. मैं सभी देखने
वालों का, शूद्रों का और आर्यों का प्रिय बनूं. अर्थात् सब का प्रिय बनूं. (१)
सूक्त—६३ देवता—ब्रह्मणस्पति
उत् तिष्ठ ब्रह्मणस्पते देवान् यज्ञेन बोधय.
आयुः प्राणं प्रजां पशून् कीर्तिं यजमानं च वर्धय.. (१)
हे ब्रह्मणस्पति! उठो और देवों को मेरे यज्ञों का ज्ञान कराओ. तुम इस यजमान की
आयु, प्राण, प्रजा, पशु तथा कीर्ति को बढ़ाओ. तुम इस यजमान की वृद्धि करो. (१)
सूक्त—६४ देवता—अग्नि
अग्ने समिधमाहार्षं बृहते जातवेदसे.
स मे श्रद्धां च मेधां च जातवेदाः प्र यच्छतु.. (१)
मैं महान और जातवेद अग्नि के लिए प्रज्वलित होने का साधन समिधाएं लाया हूं.
समिधाओं से वृद्धि को प्राप्त जातवेद अग्नि मुझे श्रद्धा और बुद्धि प्रदान करें. (१)
इध्मेन त्वा जातवेदः समिधा वर्धयामसि.
तथा त्वमस्मान् वर्धय प्रजया च धनेन च.. (२)
हे जातवेद अग्नि! हम प्रज्वलित होने के साधन समिधाओं के द्वारा तुम्हें बढ़ाते हैं. तुम
हमें प्रजा और धन से बढ़ाओ. (२)
यदग्ने यानि कानि चिदा ते दारूणि दध्मसि.
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सर्वं तदस्तु मे शिवं तज्जुषस्व यविष्ठ्य.. (३)
हे अग्नि! मैं तुम्हारे लिए जो यज्ञ के योग्य और यज्ञ के अयोग्य काष्ठ (लकड़ी) प्रदान
करता हूं, वह सब मेरे लिए कल्याणकारी हो अर्थात् उन से मेरा कल्याण हो. हे अतिशय युवा
अग्नि! तुम मेरे द्वारा दिए गए काष्ठ (लकड़ी) को स्वीकार करो. (३)
एतास्ते अग्ने समिधस्त्वमिद्धः समिद् भव.
आयुरस्मासु धेह्यामृतत्वमाचार्याय.. (४)
हे अग्नि! मैं तुम्हारे लिए ये समिधाएं लाया हूं. उन समिधाओं के द्वारा तुम प्रज्वलित
होओ. तुम हम सब में आयु और जीवन का आधान करो. तुम हमारे उपाध्याय के लिए अमृत
प्रदान करो. (४)
सूक्त—६५ देवता—सूर्य, जातवेद, वज्र
हरिः सुपर्णो दिवमारुहो ऽ र्चिषा ये त्वा दिप्सन्ति दिवमुत्पतन्तम्.
अव तां जहि हरसा जातवेदो ऽ बिभ्यदुग्रो ऽ र्चिसा दिवमा रोह सूर्य.. (१)
हे सूर्य! तुम अंधकार का नाश करने वाले तथा उत्तम पालन वाले हो. तुम अपने तेज से
द्युलोक अर्थात् आकाश पर बढ़ते हो. आकाश पर चढ़ते हुए तुम को जो शत्रु तिरस्कृत करना
चाहते हैं, हे जातवेद सूर्य! उन्हें तुम अपने शत्रु विनाशक तेज से नष्ट करो. इस के पश्चात
शत्रुओं से भयभीत न होते हुए तुम अपने तेज से आकाश में स्थित बनो. (१)
सूक्त—६६ देवता—सूर्य, जातवेद
अयोजाला असुरा मायिनो ऽ यस्मयैः पाशैरङ्किनो ये चरन्ति.
तांस्ते रन्धयामि हरसा जातवेदः सहस्रऋष्टिः सपत्नान् प्रमृणन् पाहि
वज्रः.. (१)
हे जातवेद सूर्य! जो मायावी असुर लोहे का जाल ले कर तथा लोहे के बने फंदे हाथ में
ले कर उत्तम कर्म करने वालों को मारने के लिए घूमते हैं, उन्हें मैं तुम्हारे तेज के द्वारा अपने
वश में करता हूं. हे हजार संख्या वाले आयुधों से युक्त तथा वज्रधारी! तुम शत्रुओं को अधिक
मात्रा में नष्ट करो तथा हमारा पालन करो. (१)
सूक्त—६७ देवता—सूर्य
पश्येम शरदः शतम्.. (१)
हे सूर्य! हम सौ वर्षों तक देखते रहें. (१)
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जीवेम शरदः शतम्.. (२)
हे सूर्य! हम सौ वर्षों तक जीवित रहें. (२)
बुध्येम शरदः शतम्.. (३)
हे सूर्य! हम सौ वर्षों तक बुद्धि युक्त रहें. (३)
रोहेम शरदः शतम्.. (४)
हे सूर्य! हम सौ वर्षों तक वृद्धि करते रहें. (४)
पूषेम शरदः शतम्.. (५)
हे सूर्य! हम सौ वर्षों तक पुष्ट रहें. (५)
भवेम शरदः शतम्.. (६)
हे सूर्य! हम सौ वर्षों तक पुत्र आदि से युक्त रहें. (६)
भूयेम शरदः शतम्.. (७)
हे सूर्य! हम सौ वर्षों तक संतान वाले रहें. (७)
भूयसीः शरदः शतात्.. (८)
हे सूर्य देव! हम सौ वर्षों से भी अधिक समय तक जीवित रहें. (८)
सूक्त—६८ देवता—मंत्र में बताए गए
अव्यसश्च व्यचसश्च बिलं वि ष्यामि मायया.
ताभ्यामुद्धृत्य वेदमथ कर्माणि कृण्महे.. (१)
मैं सभी के शरीरों में व्याप्त व्यान वायु और व्यक्तिगत रूप से व्याप्त प्राण वायु के मूल
आधार को कर्म के द्वारा विस्तृत करता हूं. हम उन व्यान और प्राण वायु के द्वारा अक्षरात्मक
वेद को परा, पश्यंती और वैखरी वाणियों के क्रम से प्रत्यक्ष कर के यज्ञ कर्म करते हैं. (१)
सूक्त—६९ देवता—आप अर्थात् जल
जीवा स्थ जीव्यासं सर्वमायुर्जीव्यासम्.. (१)
हे देवगण! आप आयु वाले हैं. आप की कृपा से मैं भी आयु वाला बनूं. मैं पूर्ण आयु
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अर्थात् सौ वर्ष तक जीवित रहूं. (१)
उपजीवा स्थोप जीव्यासं सर्वमायुर्जीव्यासम्.. (२)
हे देवगण! आप अधिक जीवन वाले हैं. आप की कृपा से मैं भी अधिक जीवन वाला
बनूं. मैं सौ वर्ष तक जीवित रहूं. (२)
संजीवा स्थ सं जीव्यासं सर्वमायुर्जीव्यासम्.. (३)
हे देवगण! आप जीवन का एक क्षण भी व्यर्थ नहीं करते हैं. मैं भी आप की कृपा से
जीवन का एक क्षण भी व्यर्थ न करूं. मैं सौ वर्ष तक जीवित रहूं. (३)
जीवला स्थ जीव्यासं सर्वमायुर्जीव्यासम्.. (४)
हे इंद्र! तुम सभी ऐश्वर्यों के प्रकाशक हो. मैं भी तुम्हारी कृपा से पूर्ण ऐश्वर्य का प्रकाशक
बनूं. मैं सौ वर्ष तक जीवित रहूं. (४)
सूक्त—७० देवता—मंत्र में कथित इंद्र
आदि
इन्द्र जीव सूर्य जीव देवा जीवा जीव्यासमहम्. सर्वमायुर्जीव्यासम्.. (१)
हे इंद्र! तुम जीवित रहो. हे सूर्य! तुम जीवित रहो. हे इंद्र आदि देवो! तुम जीवित रहो. मैं
भी आप की कृपा से जीवित रहूं. मैं पूर्ण आयु अर्थात् सौ वर्ष तक जीवित रहूं. (१)
सूक्त—७१ देवता—गायत्री
स्तुता मया वरदा वेदमाता प्र चोदयन्तां पावमानी द्विजानाम्.
आयुः प्राणं प्रजां पशुं कीर्तिं द्रविणं ब्रह्मवर्चसम्.
मह्यं दत्त्वा व्रजत ब्रह्मलोकम्.. (१)
वेद का अध्ययन करने वाले अथवा गायत्री का जप करने वाले मैं ने इच्छाओं को पूर्ण
करने वाली, पापों से छुड़ाने वाली एवं वेदों की माता सावित्री की स्तुति की है. ब्राह्मणों को
पवित्र करने वाली सावित्री हमें प्रेरित करे. वह सावित्री देवी मुझे आयु, प्राण, प्रजा, पशु,
कीर्ति और ब्रह्म तेज दे कर ब्रह्म लोक को गमन करे. (१)
सूक्त—७२ देवता—परमात्मा और देव
यस्मात् कोशादुदभराम वेदं तस्मिन्नन्तरव दध्म एनम्.
कृतमिष्टं ब्रह्मणो वीर्येण तेन मा देवास्तपसावतेह.. (१)
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हम ने मूल आधार रूप कोश से वेदों का उद्धार किया है, हम ने वेदों का उद्धार यज्ञ
कार्य के हेतु किया है. हम वेदों को उसी स्थान पर स्थापित करते हैं. परमात्मा की शक्ति रूप
वेदों से हम ने जो यज्ञादि कर्म किए हैं, हे देवो! उस मन चाहे कर्म के फल के द्वारा तुम मेरा
पालन करो. (१)

सूक्त—१ देवता—यज्ञ

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बीसवां कांड
सूक्त—१ देवता—यज्ञ
इन्द्र त्वा वृषभं वयं सुते सोमे हवामहे. स पाहि मध्वो अन्धसः.. (१)
हे कामनाओं की वर्षा करने वाले इंद्र! हम यजमान निचोड़े हुए सोम को पीने के लिए
तुम्हें बुलाते हैं. तुम मधुर सोम का पान करो. (१)
मरुतो यस्य हि क्षये पाथा दिवो विमहसः.. स सुगोपातमो जनः.. (२)
हे अतिशय तेज युक्त मरुतो! तुम आकाश से आ कर जिस यजमान की यज्ञशाला में
सोमपान करते हो, उस गृह का स्वामी यजमान अपने आश्रितों की रक्षा वालों में श्रेष्ठ बन
जाता है. (२)
उक्षान्नाय वशान्नाय सोमपृष्ठाय वेधसे. स्तोमैर्विधेमाग्नये.. (३)
गर्भधारण करने में समर्थ बैल और बांझ बकरी जिस का भोजन है तथा सोम जिस के
ऊपर स्थित है, ऐसे अग्नि देव की हम वेद मंत्रों द्वारा स्तुति करते हैं. (३)
सूक्त—२ देवता—मरुत्, अग्नि, इंद्र,
द्रविणोदा
मरुतः पोत्रात् सुष्टुभः स्वर्कादृतुना सोमं पिबन्तु.. (१)
मरुद्गण होता के सुंदर स्तोत्रों वाले तथा सुंदर मंत्रों से युक्त यज्ञ कर्म में संस्कार किए
गए अर्थात् कूटे और निचोड़े गए सोम का पान करें. (१)
अग्निराग्नीध्रात् सुष्टुभः स्वर्कादृतुना सोमं पिबतु.. (२)
अग्नि देव! अग्नि को प्रज्वलित करने वाले ऋत्विज् के कर्म से प्रसन्न होते हुए सोम रस
का पान करें. यह कर्म सुंदर स्तोत्रों और सुंदर मंत्रों वाला है. (२)
इन्द्रो ब्रह्मा ब्राह्मणात् सुष्टुभः स्वर्कादृतुना सोमं पिबतु.. (३)
ब्रह्मात्मा इंद्र! ब्राह्मण नाम के ऋत्विज् की सुंदर स्तुतियों से पूर्ण यज्ञ कर्म में संस्कार
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सूक्त—३ देवता—इंद्र

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किए गए अर्थात् निचोड़े गए सोम का पान करो. (३)
देवो द्रविणोदाः पोत्रात् सुष्टुभः स्वर्कदृतुना सोमं पिबतु.. (४)
द्रविणोदा अर्थात् धन देने वाले देव होता के सुंदर स्तोत्रों तथा सुंदर मंत्रों वाले यज्ञ कर्म
में संस्कार किए गए अर्थात् निचोड़े गए सोम का पान करें. (४)
सूक्त—३ देवता—इंद्र
आ याहि सुषुमा हि त इन्द्र सोमं पिबा इमम्. एदं बर्हिः सदो मम.. (१)
हे इंद्र! आओ. तुम्हारे निमित्त सोम निचोड़ा गया है, इस का पान करो तथा मेरे द्वारा
बिछाए गए कुशों पर बैठो. (१)
आ त्वा ब्रह्मयुजा हरी वहतामिन्द्र केशिना. उप ब्रह्माणि नः शृणु.. (२)
हे इंद्र! मंत्रों के द्वारा रथ में जुड़ने वाले तथा अभीष्ट स्थान पर पहुंचने वाले हरि नाम के
घोड़े तुम्हें हमारे समीप लाएं. तुम्हारे घोड़े लंबे बालों वाले हैं. तुम हमारे यज्ञ में आ कर हमारी
स्तुतियों को सुनो. (२)
ब्रह्माणस्त्वा वयं युजा सोमपामिन्द्र सोमिनः. सुतावन्तो हवामहे.. (३)
हे इंद्र! हम यजमान तुम को तुम्हारे योग्य स्तोत्रों के द्वारा बुलाते हैं. हे इंद्र! तुम सोम को
पीने वाले हो. हम सोमरस तैयार करने वाले हैं तथा हम ने सोम रस को निचोड़ा है. (३)
सूक्त—४ देवता—इंद्र
आ नो याहि सुतावतो ऽ स्माकं सुष्टुतीरुप. पिबा सु शिप्रिन्नन्धसः.. (१)
हे इंद्र! सोम को निचोड़ने वाले हम यजमानों के समीप आओ. हम शोभन स्तुतियों वाले
हैं. हे सुंदर ठोड़ी वाले इंद्र! सोमरस का पान करो. (१)
आ ते सिञ्चामि कुक्ष्योरनु गात्रा वि धावतु. गृभाय जिह्वया मधु.. (२)
हे इंद्र! मैं तुम्हारी दोनों कोखों को सोमरस से भरता हूं. यह सोमरस तुम्हारी नाड़ियों में
बहे. तुम मधु वाले सोमरस को अपनी जीभ से ग्रहण करो. (२)
स्वादुष्टे अस्तु संसुदे मधुमान् तन्वे ३ तव. सोमः शमस्तु ते हृदे.. (३)
हे उत्तम दान करने वाले इंद्र! मेरे द्वारा दिया हुआ सोम तुम्हारे लिए स्वादिष्ट हो. इस के
बाद यह सोम तुम्हारे शरीर के लिए सुख देने वाला हो. (३)
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सूक्त—५ देवता—इंद्र

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सूक्त—५ देवता—इंद्र
अयमु त्वा विचर्षणे जनीरिवाभि संवृतः. प्र सोम इन्द्र सर्पतु.. (१)
हे विशेष द्रष्टा इंद्र! संतान वाली स्त्रियां जिस प्रकार पुत्र आदि से सभी ओर से घिरी
रहती हैं, उसी प्रकार यह सोम अध्वर्यु आदि से घिरा हुआ रखा है. यह सोम तुम्हें प्राप्त हो.
(१)
तुविग्रीवो वपोदरः सुबाहुरन्धसो मदे. इन्द्रो वृत्राणि जिघ्नते.. (२)
सोमपान करने से इंद्र के कंधे बैल के समान मोटे हो जाते हैं. सोमपान से इंद्र का उदर
विशाल और भुजाएं दृढ़ हो जाती हैं. इस प्रकार सोम पान के कारण शक्तिशाली बने इंद्र वृत्र
असुर के समान आक्रामक शत्रुओं का विनाश करते हैं. (२)
इन्द्र प्रेहि पुरस्त्वं विश्वस्येशान ओजसा. वृत्राणि वृत्रहंजहि.. (३)
हे इंद्र! तुम सभी के स्वामी हो. तुम हमारी सेना के आगे चलो. हे वृत्र नाम के असुर के
हंता इंद्र! तुम हमारे शत्रुओं का विनाश करो. (३)
दीर्घस्ते अस्त्वङ्कुशो येना वसु प्रयच्छसि. यजमानाय सुन्वते.. (४)
हे इंद्र! अंकुश के समान झुकी हुई उंगलियों वाला तुम्हारा हाथ विशाल है. उस हाथ से
तुम सोम निचोड़ने वाले यजमान को धन देते हो. (४)
अयं त इन्द्र सोमो निपूतो अधि बर्हिषि. एहीमस्य द्रवा पिब.. (५)
हे इंद्र! भलीभांति छान कर स्वच्छ किया हुआ यह सोम बिछे हुए कुशों पर रखा है. तुम
यहां शीघ्र आ कर उस सोम का पान करो. (५)
शाचिगो शाचिपूजनायं रणाय ते सुतः. आखण्डल प्र हूयसे.. (६)
हे पणियों द्वारा अपहृत गायों को वापस लाने में समर्थ इंद्र! ये स्तोत्र तुम्हारे गुणों को
प्रकाशित करने वाले हैं. यह सोम तुम्हारी प्रसन्नता के लिए निचोड़ा गया है. हे शत्रुओं का
विनाश करने वाले इंद्र! हम तुम्हें यह सोम पीने के लिए बुलाते हैं. (६)
यस्ते शृङ्गवृषो नपात् प्रणपात् कुण्डपाय्यः. न्य स्मिन् दध्र आ मनः.. (७)
हे इंद्र! तुम सींगों के समान ऊपर की ओर उठने वाली किरणों से संपन्न सूर्य को गिरने
नहीं देते हो. हमारा यज्ञ कुंडों में भरे सोमरस को पीने से संबंधित है. तुम इस यज्ञ में आने के
लिए अपना मन बनाओ. (७)
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सूक्त—६ देवत—इंद्र

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सूक्त—६ देवत—इंद्र
इन्द्र त्वा वृषभं वयं सुते सोमे हवामहे. स पाहि मध्वो अन्धसः.. (१)
हे कामनाओं की वर्षा करने वाले इंद्र! हम यजमान निचोड़े हुए सोम को पीने के लिए
तुम्हें बुलाते हैं. तुम मधुर सोम का पान करो. (१)
इन्द्र क्रतुविदं सुतं सोमं हर्य पुरुष्टुत. पिबा वृषस्व तातृपिम्.. (२)
हे अनेक यजमानों द्वारा स्तुति किए गए इंद्र! यज्ञ को पूर्ण करने वाला यह सोम निचोड़ा
गया है. तुम तृप्त करने वाले इस सोमरस का दान करो. तुम इस सोम को पेट भर कर पियो.
(२)
इन्द्र प्र णो धितावानं यज्ञं विश्वेभिर्देवैभिः. तिर स्तवान विश्पते.. (३)
हे स्तुति किए गए एवं मरुतों के स्वामी इंद्र! तुम सब देवों के साथ हमारे इस सोममय
यज्ञ में आ कर हवि ग्रहण करो तथा हमारे यज्ञ की वृद्धि करो. (३)
इन्द्र सोमाः सुता इमे तव प्र यन्ति सत्पते. क्षयं चन्द्रास इन्दवः.. (४)
हे यजमानों का पालन करने वाले इंद्र! निचोड़ा गया और चंद्रमा की किरणों के समान
सुख देने वाला यह सोम तुम्हारे पेट में जाता है. (४)
दधिष्वा जठरे सुतं सोममिन्द्र वरेण्यम्. तव द्युक्षास इन्दवः.. (५)
हे इंद्र! वरण करने योग्य एवं निचोड़े गए इस सोम को अपने पेट में धारण करो. दीप्ति
वाले सोम तुम्हारे विशेष भाग हैं. (५)
गिर्वणः पाहि नः सुतं मधोर्धाराभिरज्यसे. इन्द्र त्वादातमित् यशः.. (६)
हे स्तुतियों द्वारा पूजन करने योग्य इंद्र! तुम हमारे द्वारा निचोड़े गए सोम को पियो. तुम
मधुर सोम की धाराओं के द्वारा भिगोए जाते हो. हे इंद्र! यह सोम तुम्हारे यश का रूप है. (६)
अभि द्युम्नानि वनिन इन्द्रं सचन्ते अक्षिता. पीत्वी सोमस्य वावृधे.. (७)
यजमान का उज्ज्वल सोम इंद्र को भी सभी ओर से प्राप्त हो रहा है. इस सोम का पान
करते हुए इंद्र वृद्धि प्राप्त करें. (७)
अर्वावतो न आ गहि परावतश्च वृत्रहन्. इमा जुषस्व नो गिरः.. (८)
हे वृत्र असुर के हंता इंद्र! तुम समीपवर्ती देश से तथा दूरवर्ती देश से हम यजमानों के
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सूक्त—७ देवता—इंद्र

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समीप आओ और आ कर हमारी इन स्तुतियों को स्वीकार करो. (८)
यदन्तरा परावतमर्वावतं च हूयसे. इन्द्रेह तत आ गहि.. (९)
हे इंद्र! तुम दूर देश में अथवा समीपवर्ती देश में जहां भी हो. वहां से बुलाए जा रहे हो.
हे इंद्र! तुम इस यज्ञ में शीघ्र आओ. (९)
सूक्त—७ देवता—इंद्र
उद् घेदभि श्रुतामघं वृषभं नर्यापसम्. अस्तारमेषि सूर्य.. (१)
हे सूर्य! यज्ञ करने वालों अथवा स्तुति करने वालों के लिए इंद्र के द्वारा धन दिया जाना
प्रसिद्ध है. इंद्र अभीष्ट फलों की वर्षा करने वाले हैं. उन के कर्म मनुष्यों के लिए हितकारी हैं.
अनिष्टों को दूर करने तथा शत्रुओं को दबाने के कार्य को ध्यान में रख कर तुम उदित होते हो.
(१)
नव यो नवतिं पुरो बिभेद बाह्वो जसा. अहिं च वृत्रहावधीत्.. (२)
जिन इंद्र ने शंबर असुर की माया के लिए निन्यानवे नगरों को अपने बाहुबल से तोड़
डाला था, उन्हीं इंद्र ने वृत्रासुर का वध किया था. (२)
स न इन्द्रः शिवः सखाश्वावद् गोमद् यवमत्. उरुधारेव दोहते. (३)
इंद्र हमारे लिए कल्याणकारी तथा हमारे मित्र हैं. वे हमें घोड़े, गाएं और जौ नाम का
अन्न प्रदान करें. इंद्र अधिक दूध देने वाली गाय के समान धन देते हैं. (३)
इन्द्र क्रतुविदं सुतं सोमं हर्य पुरुष्टुत. पिबा वृषस्व तात्पिम्.. (४)
हे बहुतों के द्वारा प्रशंसित इंद्र! यज्ञ के साधक और निचोड़े गए सोम को पीने की इच्छा
करो. तुम इस सोम को अपने उदर में भर लो. (४)
सूक्त—८ देवता—इंद्र
एवा पाहि प्रत्नथा मन्दतु त्वा श्रुधि ब्रह्म वावृध्वस्वोत गीर्भिः.
आविः सूर्यं कृणुहि पीपिहीषो जहि शत्रूँरभि गा इन्द्र तृन्धि.. (१)
हे इंद्र! तुम ने जिस प्रकार प्राचीन काल में अंगिरा आदि ऋषियों के यज्ञों में सोमपान
किया था, उसी प्रकार हमारे इस यज्ञ में भी करो. पिया हुआ सोम तुम्हें प्रसन्न करे. तुम हमारे
मंत्र रूप स्तोत्रों को सुनो. तुम हमारी स्तुतियों के द्वारा वृद्धि को प्राप्त करो. तुम सूर्य को
प्रकाशित करो. तुम अन्नों को हमारे उपभोग का साधन बनाओ तथा हमारे शत्रुओं का विनाश
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करो. हे इंद्र! पणियों द्वारा चुराई गई हमारी गायों को हमें लाकर दो. (१)
अर्वाङेहि सोमकामं त्वाहुरयं सुतस्तस्य पिबा मदाय.
उरुव्यचा जठर आ वृषस्व पितेव नः शृणुहि हूयमानः (२)
हे इंद्र! तुम्हें सोम की इच्छा करने वाला कहा जाता है, तुम हमारे सामने आओ. यह
निचोड़ा हुआ सोम तुम अपनी प्रसन्नता के लिए पियो. तुम विशाल कोखों वाले अपने उदर
को इस सोम से भर लो. हे इंद्र! पिता जिस प्रकार पुत्र का वचन सुनता है, उसी प्रकार तुम
हमारे आह्वान को सुनो. (२)
आपूर्णो अस्य कलशः स्वाहा सेक्तेव कोशं सिसिचे पिबध्यै.
समु प्रिया आववृत्रन् मदाय प्रदक्षिणिनद्भि सोमास इन्द्रम्.. (३)
इंद्र के लिए यह पूर्ण कलश सोम रस से भरा हुआ है. जिस प्रकार जल छिड़कने वाला
मशक को जल से भरता है, उसी प्रकार अध्वर्यु इंद्र के पीने के लिए सोमरस निचोड़ता है. ये
सोम इंद्र की प्रसन्नता के लिए इंद्र की ओर जाते हैं. (३)
सूक्त—९ देवता—इंद्र
तं वो दस्ममृतीषहं वसोर्मन्दानमन्धसः.
अभि वत्सं न स्वसरेषु धेनव इन्द्रं गीर्भिर्नवामहे.. (१)
हे यजमानो! तुम्हारे यज्ञ की पूर्णता तथा तुम्हारे अभीष्ट फल की प्राप्ति के लिए हम
स्तुतियों के द्वारा इंद्र से प्रार्थना करते हैं. इंद्र दर्शनीय और दुःख विनाशक हैं. इंद्र सोम पीने के
हर्ष से पूर्ण रहते हैं. गाएं सायं और प्रातःकाल रंभाती हुईं जिस प्रकार अपने बछड़ों के पास
जाती हैं, उसी प्रकार हम भी स्तुति करते हुए इंद्र की ओर जाते हैं. (१)
द्युक्षं सुदानुं तविषीभिरावृतं गिरिं न पुरुभोजसम्.
क्षुमन्तं वाजं शतिनं सहस्रिणं मक्षू गोमन्तम्रीमहे.. (२)
जिस प्रकार दुर्भिक्ष पड़ने पर लोग कंद, मूल, फल आदि से संपन्न पर्वत की प्रार्थना
करते हैं, उसी प्रकार हम सुंदर दान वाले, प्रजाओं के पोषक, दीप्ति युक्त, स्तुति करने योग्य
एवं गाय आदि से संपन्न धन की प्रार्थना करते हैं. (२)
तत् त्वा यामि सुवीर्यं तद् ब्रह्म पूर्वचित्तये.
येना यतिभ्यो भृगवे धने हिते येन प्रस्कण्वमाविथ.. (३)
हे इंद्र! मैं तुम से शोभन बल युक्त एवं उत्तम अन्न की याचना करता हूं. तुम ने जो धन
यज्ञ कर्म न करने वालों से छीन कर भृगु ऋषि को शांति प्रदान की थी और जिस धन से तुम
ने कण्व के पुत्र प्रस्कण्व का पालन किया, वही धन हम तुम से मांगते हैं. (३)
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