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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,063 pages

About this granth

The Atharvaveda (अथर्ववेद) is one of the four Vedas. Besides ritual hymns it contains many verses concerned with everyday life: protection from disease, healing plants, the welfare of house and family, defence against enemies, marriage, kingship and praise of the earth, including the well-known Prithvi Sukta.

The introduction to this edition notes that Patanjali, author of the Mahabhashya, knew nine branches of the Atharvaveda, of which only a few, such as the Paippalada and Shaunaka, survive. The translation follows the Shaunaka recension, which the introduction describes as having 20 kandas, 731 suktas and 5,987 mantras. Each sukta is headed by its deity, for example the waters, Brihaspati, the rivers, plants, Brahmanaspati, the jangida amulet, Indra, the apamarga herb, and the house and its guardian, so the subject of each hymn is clear at a glance.

The Sanskrit mantras are accompanied by a simple Hindi rendering by Dr. Ganga Sahay Sharma. This is the 2015 edition of Sanskrit Sahitya Prakashan, New Delhi, part of its set of the four Vedas, and runs to 1063 pages.

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अव मा पाप्मन्त्सृज वशी सन् मृडयासि नः.
आ मा भद्रस्य लोके पाप्मन् धेह्यविह्रतम्.. (१)
हे पाप के अभिमानी देव! मुझे छोड़ दो. तुम सब को वश में करने वाले हो. तुम मुझे
सुख दो. हे पाप्मा! पीड़ारहित मुझ को पुण्य के फल के रूप में प्राप्त होने वाले लोक में
स्थापित करो. (१)
यो नः पाप्मन् न जहासि तमु त्वा जाहिमो वयम्.
पथामनु व्यावर्तनेऽन्यं पाप्मानु पद्यताम्.. (२)
हे पाप्मा! यदि मुझे नहीं छोड़ोगे तो मैं इस अनुष्ठान द्वारा तुम्हें बलपूर्वक चार मार्गों के
संगम रूप चौराहे पर छोडूंगा. वहां छोड़ा हुआ पाप हमारे शत्रुओं में प्रवेश करे. (२)
अन्यत्रास्मन्न्युच्यतु सहस्राक्षो अमर्त्यः.
यं द्वेषाम तमृच्छतु यमु द्विष्मस्तमिज्जहि.. (३)
इंद्र के समान अमर रहने वाला एवं बली पाप उसी को प्राप्त हो, जिस से हम द्वेष करते
हैं. हे पाप! जो हमारा शत्रु है, तू उसी के पास जा. (३)
सूक्त-२७ देवता—यम
देवाः कपोत इषितो यदिच्छन् दूतो निर्ऋत्या इदमाजगाम.
तस्मा अर्चाम कृणवाम निष्कृतिं शं नो अस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे.. (१)
हे देवो! पाप देवता द्वारा भेजा गया दूत कबूतर हम को पीड़ित करने की इच्छा करता
हुआ हमारे घर आया है. उसे लौटाने के लिए हम हवि के द्वारा तुम्हारी अर्चना करते हैं. हमारे
दुपायों अर्थात् उत्तराधिकारियों और चौपायों अर्थात् पशुओं का कल्याण हो. (१)
शिवः कपोत इषितो नो अस्त्वनागा देवाः शकुनो गृहं नः.
अग्निर्हिं विप्रो जुषतां हविर्नः परि हेतिः पक्षिणी नो वृणक्तु.. (२)
हे देवो! पाप देवता द्वारा भेजा हुआ कबूतर हमारे लिए सुखकारी हो तथा घरों को
पीड़ित न करे, क्योंकि यह अनपराधक है. इस के लिए मेधावी अग्नि हमारे हवि को स्वीकार
करें. उस की कृपा से पंखों वाला कबूतर नाम का आयुध हमें छोड़ दे. (२)
हेतिः पक्षिणी न दभात्यस्मानाष्ट्री पदं कृणुते अग्निधाने.
शिवो गोभ्य उत पुरुषेभ्यो नो अस्तु मा नो देवा इह हिंसीत् कपोतः.. (३)
पंखों वाला आयुध अर्थात् कबूतर हमें न मारे. वह दावाग्नि से व्याप्त वन में चला जाए.
हे देवो! वह कबूतर हमारी गायों और पुरुषों को सुख देने वाला हो. वह कबूतर हमारी हिंसा
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सूक्त-२८ देवता—यम

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न करे. (३)
सूक्त-२८ देवता—यम
ऋचा कपोतं नुदत प्रणोदमिषं मदन्तः परि गां नयामः.
संलोभयन्तो दुरिता पदानि हित्वा न ऊर्जं प्र पदात् पथिष्ठः.. (१)
हे देवो! इस मंत्र के द्वारा कबूतर को हमारे घर से दूर जाने के लिए प्रेरित करो. हम अन्न
को पा कर तृप्त होते हुए धरती पर गायों को सभी ओर चराएं. हम कबूतर के पंजों के चिह्नों
को भली प्रकार धोएं और वह कबूतर हमारी पाकशाला के अन्न को त्याग कर पक्षियों में श्रेष्ठ
हो तथा उड़ जाए. (१)
परीमे ३ ग्निमर्षत परीमे गामनेषत.
देवेष्वक्रत श्रवः क इमां आ दधर्षति.. (२)
हे ऋत्विज्! लोग कबूतर के प्रवेश के दोष की शांति के लिए अग्नि को मेरे घर में ले
आए हैं और घर में गाय को सभी ओर घुमा रहे हैं. इन्होंने अग्नि आदि देवों को हवि रूप में
अर्पित किया है. अब हमारे पुरुषों को कौन पराजित कर सकता है. (२)
यः प्रथमः प्रवतमाससाद बहुभ्यः पन्थामनुपस्पशानः.
यो ३ स्येशे द्विपदो यश्चतुष्पदस्तस्मै यमाय नमो अस्तु मृत्यवे.. (३)
यह आज मरने योग्य है, यह कल मरने योग्य है, इस प्रकार की गणना करते हुए देवों में
मुख्य यमराज ने उत्तम मार्ग प्राप्त किया है. वे यम इस यजमान के दो पैरों वाले मनुष्यों और
चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं. मृत्यु को प्रेरित करने वाले उन यम को नमस्कार है. (३)
सूक्त-२९ देवता—यम
अमून् हेतिः पतत्रिणी न्येकतु यदुलूको वदति मोघमेतत्.
यद् वा कपोतः पदमग्नौ कृणोति.. (१)
यह पंखों वाला आयुध हमारे दूरस्थ शत्रुओं के पास जाए. यह उल्लू जो कहता है, वह
असत्य हो. कबूतर ने अशुभ की सूचना के लिए जो हमारे चूल्हे की अग्नि के समीप पंजे का
चिह्न बनाया है, वह भी प्रभावहीन हो जाए. (१)
यौ ते दूतौ निर्ऋत इदमतो ऽ प्रहितौ प्रहितौ वा गृहं नः.
कपोतोल्लूकाभ्यामपदं तदस्तु.. (२)
हे पाप देवता निर्ऋति! तेरे द्वारा भेजे हुए जो कबूतर और उल्लू हैं. वे मेरे घर में आ कर
भी आश्रय न पा सकें. (२)
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अवैरहत्यायेदमा पपत्यात् सुवीरताया इदमा ससद्यात्.
पराडेव परा वद पराचीमनु संवतम्.
यथा यमस्य त्वा गृहे ऽ रसं प्रतिचाकशानाभूकं प्रतिचाकशान्.. (३)
कबूतर और उल्लू के आने का जो अपशकुन है, वह हमारे वीरों की हिंसा न करे तथा
हमारे वीरों के सद्भाव के निमित्त वह अपशकुन दूर चला जाए. हे यम के दूत कबूतर! तेरे
स्वामी के घर में प्राणी जिस प्रकार तुझे प्रभावहीन समझते हैं, उसी प्रकार तुझे हम भी देखें.
(३)
सूक्त-३० देवता—शमी
देवा इमं मधुना संयुतं यवं सरस्वत्यामधि मणावचर्कृषुः.
इन्द्र आसीत् सीरपतिः शतक्रतुः कीनाशा आसन् मरुतः सुदानवः.. (१)
देवों ने सरस्वती नदी के समीप मनुष्यों को शहद से युक्त जौ दिए. उस समय जोतने से
भूमि में अन्न उत्पन्न करने के लिए इंद्र हल के स्वामी और शोभन दान वाले मरुत् किसान बने
थे. (१)
यस्ते मदो ऽ वकेशो विकेशो येनाभिहस्यं पुरुषं कृणोषि.
आरात् त्वदन्या वनानि वृक्षि त्वं शमि शतवल्शा वि रोह.. (२)
हे शमी नामक वृक्ष! तेरा जो मद मन चाहे केशों को उत्पन्न करने वाला और वृद्धि करने
वाला है तथा जिस के द्वारा तुम पुरुष को सभी प्रकार प्रसन्न करते हो, मैं भी तुम से दूर स्थित
वनों को काटता हूं. हे शमी! तू सौ शाखाओं वाला हो कर बढ़े. (२)
बृहत्पलाशे सुभगे वर्षवृद्ध ऋतावरि.
मातेव पुत्रेभ्यो मृड केशेभ्यः शमि.. (३)
हे बड़ेबड़े पत्तों वाली, केवल वर्षा के जल से बढ़ने वाली एवं सौभाग्य सूचक शमी!
माता जिस प्रकार पुत्रों को बढ़ाती है, तू उसी प्रकार हमारे केशों की वृद्धि कर. (३)
सूक्त-३१ देवता—गौ
आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः. पितरं च प्रयन्त्स्वः.. (१)
ये अगमनशील और तेजस्वी सूर्य उदयाचल पर पहुंच कर पूर्व दिशा में दिखाई दे रहे हैं
और अपनी किरणों से सभी प्राणियों की माता भूमि को व्याप्त कर रहे हैं. इन्होंने स्वर्ग और
अंतरिक्ष को ढक लिया है. ये सूर्य वर्षा का जल देने के कारण गौ कहे जाते हैं. (१)
अन्तश्चरति रोचना अस्य प्राणादपानतः. व्यख्यन्महिषः स्वः.. (२)
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प्राण वायु ग्रहण करने के पश्चात अपान वायु छोड़ते हुए इस प्राणिसमूह के शरीर में सूर्य
की प्रभा वर्तमान है. वह महान सूर्य स्वर्ग तथा सभी ऊपर वाले लोकों को प्रकाशित करता है.
(२)
त्रिंशद् धामा वि राजति वाक् पतङ्गो अशिश्रियत्. प्रति वस्तोरहर्द्युभिः..
(३)
दिवस एवं रात के अवयव तीस मुहूर्त तेज के स्थान हैं और इस सूर्य की चमक से
विराजमान रहते हैं. तीनों वेदों के रूप वाली वाणी भी सूर्य के आश्रय में ही रहती है. (३)
सूक्त-३२ देवता—अग्नि
अन्तर्दावे जुहुता स्वे ३ तद् यातुधानक्षयणं घृतेन.
आराद् रक्षांसि प्रति दह त्वमग्ने न नो गृहाणामुप तीतपासि.. (१)
हे ऋत्विजो! राक्षसों का विनाश करने वाले इस हवि को घी के साथ अग्नि में हवन
करो. हे अग्नि! उपद्रव करने वाले इन राक्षसों को भस्म करो तथा हमारे घरों को संताप युक्त
मत करो. (१)
रुद्रो वो ग्रीवा अशरैत् पिशाचाः पृष्टीर्वो ऽ पि शृणातु यातुधानाः.
वीरुद् वो विश्वतोवीर्या यमेन समजीगमत्.. (२)
हे पिशाचो! तुम्हारी गरदन को रुद्र देव काटें. हे यातुधानो! तुम्हारी पीठ की हड्डियों
का ही विनाश करें. सभी प्रकार की शक्ति वाली ओषधि तुम यातुधानों को मृत्यु से मिला दे.
(२)
अभयं मित्रावरुणाविहास्तु नो ऽ र्चिषात्रिणो नुदतं प्रतीचः.
मा ज्ञातारं मा प्रतिष्ठां विदन्त मिथो विघ्नाना उप यन्तु मृत्युम्.. (३)
हे मित्र और वरुण! इस देश में हमें भय नहीं रहे. तुम अपने तेज से मानव भक्षी राक्षसों
को हम से पराङ्मुख करो. दूर भागे हुए वे मुझ ज्ञानी को प्राप्त न करें तथा मेरी आवास भूमि
को प्राप्त न कर सकें. वे एक दूसरे पर प्रहार करते हुए मृत्यु को प्राप्त करें. (३)
सूक्त-३३ देवता—इंद्र
यस्येदमा रजो युजस्तुजे जना वनं स्वः. इन्द्रस्य रन्त्यं बृहत्.. (१)
हे मनुष्यो! जिस इंद्र का प्रसन्नताकारक प्रकाश शत्रु विनाश के लिए तत्पर करता है,
उस इंद्र के रमणीय एवं सेवा के योग्य तेज को तुम ग्रहण करो. (१)
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नाधृष आ दधृषते धृषाणो धृषितः शवः.
पुरा यथा व्यथिः श्रव इन्द्रस्य नाधृषे शवः.. (२)
वह इंद्र दूसरों से तिरस्कृत नहीं होते तथा अपना तिरस्कार करने वाले की शक्ति को
पराजित करते हैं. प्राचीन काल में वृत्रासुर के वध के समय इंद्र के बल को कोई पराजित नहीं
कर सका, उसी प्रकार अब भी उन का बल पराजित न हो. (२)
स नो ददातु तां रयिमुरुं पिशङ्गसंदृशम्. इन्द्रः पतिस्तुविष्टमो जनेष्वा.. (३)
हे इंद्र! हमें पीले रंग का धन अर्थात् स्वर्ण अधिक मात्रा में प्रदान करो. इंद्र सभी मनुष्यों
के स्वामी तथा सभी प्रकार के उत्कर्ष वाले हैं. (३)
सूक्त-३४ देवता—अग्नि
प्राग्नये वाचमीरय वृषभाय क्षितीनाम्. स नः पर्षदति द्विषः.. (१)
हे स्तोता! मनुष्यों की कामनाएं पूरी करने वाले तथा राक्षसों के हंता अग्नि की स्तुति
करो. वे अग्नि हमें राक्षस, पिशाच आदि से छुड़ाएं. (१)
यो रक्षांसि निजूर्वत्यग्निस्तिग्मेन शोचिषा. स नः पर्षदति द्विषः.. (२)
जो अग्नि, अपने तीक्ष्ण तेज से राक्षसों का विनाश करते हैं, वह अग्नि हमें राक्षस,
पिशाच आदि से बचाएं. (२)
यः परस्याः परावतस्तिरो धन्वातिरोचते. स नः पर्षदति द्विषः.. (३)
जो अग्नि अत्यंत दूर देश से जल रहित मरु भूमि में छिप जाते हैं और बहुत सुंदर लगते
हैं, वह अग्नि हमें राक्षस, पिशाच आदि से छुड़ाएं. (३)
यो विश्वाभि विपश्यति भुवना सं च पश्यति. स नः पर्षदति द्विषः.. (४)
जो अग्नि सभी भुवनों को संपूर्ण रूप से देखते हैं और सूर्य रूपी एक साधन से
प्रकाशित करते हैं, वह हमें राक्षस, पिशाच आदि से बचाएं. (४)
यो अस्य पारे रजसः शुक्नो अग्निरजायत. स नः पर्षदति द्विषः.. (५)
इस भूलोक के ऊपर जो अंतरिक्ष है, उस में जो निर्मल सूर्य रूपी अग्नि उत्पन्न हुई थी,
वह हमें शत्रुओं से बचाए. (५)
सूक्त-३५ देवता—वैश्वानर
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वैश्वानरो न ऊतय आ प्र यातु परावतः.
अग्निर्नः सुष्टुतीरुप.. (१)
सभी मनुष्यों के हितकारी अग्नि हमारी रक्षा के लिए दूर देश से आएं. वह अग्नि हमारी
सुंदर स्तुतियों को ग्रहण करें. (१)
वैश्वानरो न आगमदिमं यज्ञं सजूरुप.
अग्निरुक्थेष्वंहसु.. (२)
सभी मनुष्यों के हितकारी अग्नि हमारे समीप आएं और आ कर हमारे द्वारा की जाती
हुई स्तुतियों से प्रसन्न होते हुए इस यज्ञ को स्वीकार करें. (२)
वैश्वानरो ऽ ङ्गिरसां स्तोममुक्थं च चाकॢपत्.
ऐषु द्युम्नं स्वर्यमत्.. (३)
वैश्वानर अग्नि ने महर्षियों द्वारा किए गए स्तोत्रों और शस्त्रों को समर्थ बनाया है तथा
प्रसिद्ध यश एवं अन्न प्राप्त कराया है अथवा इन्हें स्वर्ग प्राप्त कराया है. (३)
सूक्त-३६ देवता—अग्नि
ऋतावानं वैश्वानरमृतस्य ज्योतिषस्पतिम्.
अजस्रं घर्ममीमहे.. (१)
हम यज्ञात्मक ज्योति के स्वामी एवं सतत दीप्तिशाली वैश्वानर अग्नि की आराधना
करते हैं. हम उन से उत्तम फल की याचना करते हैं. (१)
स विश्वा प्रति चाकॢप ऋतून्रूतून् सृजते वशी.
यज्ञस्य वय उत्तिरन्.. (२)
वैश्वानर अग्नि सभी प्रजाओं को सभी फल देने में समर्थ हैं. स्वतंत्र अग्नि सूर्य के रूप में
वसंत आदि ऋतुओं का निर्माण करते हैं. वे यज्ञ का अन्न देवों को प्राप्त कराते हैं. (२)
अग्निः परेषु धामसु कामो भूतस्य भव्यस्य.
सम्राडेको वि राजति.. (३)
उत्तम स्थानों में अग्नि सम्राट्, भूत और भविष्यत काल में कामनापूर्ण करने वाला हो
कर विराजता है. (३)
सूक्त-३७ देवता—चंद्रमा
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उप प्रागात् सहस्राक्षो युक्त्वा शपथ्यो रथम्.
शप्तारमन्विच्छन् मम वृक इवाविमतो गृहम्.. (१)
हजार आंखों वाले इंद्र शाप क्रिया के कर्ता होते हुए अपने रथ में घोड़े जोड़ कर हमारे
समीप आएं. जिस प्रकार भेड़ों के स्वामी के घर में भेड़िया जाता है, उसी प्रकार वह मुझे
शाप देने वाले शत्रु को मारें. (१)
परि णो वृङ्ग्धि शपथ हृदमग्निरिवा दहन्.
शप्तारमत्र नो जहि दिवो वृक्षमिवाशनिः.. (२)
हे शपथ! तू हमारा वध मत कर. तू अग्नि के समान हमारे शत्रुओं के कुल को जला.
आकाश से गिरा हुआ वज्र जिस प्रकार वृक्ष को नष्ट कर देता है, उसी प्रकार तू इस देश में
हमें शाप देने वाले शत्रु का विनाश कर. (२)
यो नः शपादशपतः शपतो यश्च नः शपात्.
शुने पेष्ट्रमिवावक्षां तं प्रत्यस्यामि मृत्यवे.. (३)
जो शत्रु हम शाप न देने वालों को कठोर वचनों के द्वारा शाप दे तथा जो हम शाप देने
वालों को शाप दे, उन दोनों को हम इस प्रकार मृत्यु के आगे फेंकते हैं, जैसे कुत्ते के आगे
रोटी डाली जाती है. (३)
सूक्त-३८ देवता—बृहस्पति
सिंहे व्याघ्र उत या पृदाकौ त्विषिरग्नौ ब्राह्मणे सूर्ये या.
इन्द्रं या देवी सुभगा जजान सा न ऐतु वर्चसा संविदाना.. (१)
सिंह, बाघ और सर्प में जो आक्रमण के रूप में तेज है, अग्नि में दाह के रूप में, ब्राह्मण
में शाप के रूप में और सूर्य में ताप के रूप में जो तेज है, उसी सौभाग्यशाली तेज ने इंद्र को
जन्म दिया है. वह तेजस्वरुप देवी हमारे तेज से एक होती हुई हमारे समीप आए. (१)
या हस्तिनि द्वीपिनि या हिरण्ये त्विषिरप्सु गोषु या पुरुषेषु.
इन्द्रं या देवी सुभगा जजान सा न ऐतु वर्चसा संविदाना.. (२)
जो तेज गजेंद्र में बल की अधिकता के रूप में, चीते में हिंसा के रूप में तथा सोने में
आह्लाद के रूप में है, जलों में, गायों में और मनुष्यों में जो तेज है, उसी सौभाग्यशाली तेज ने
इंद्र को जन्म दिया है. वह तेजस्वरूपा देवी हमारे तेज से एक होती हुई हमारे समीप आए.
(२)
रथे अक्षेष्वृषभस्य वाजे वाते पर्जन्ये वरुणस्य शुष्मे.
इन्द्रं या देवी सुभगा जजान सा न ऐतु वर्चसा संविदाना.. (३)
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गमन के साधन रथ में, उस के पहियों में, गर्भाधान करने में समर्थ बैल के शीघ्र गमन में,
वायु में, वर्षा करने वाले जल में एवं वरुण के बल में जो तेज है, उसी सौभाग्यशाली तेज ने
इंद्र को जन्म दिया है. वह तेजरूपा देवी हमारे तेज से एक होती हुई हमारे समीप आए. (३)
राजन्ये दुन्दुभावायतायामश्वस्य वाजे पुरुषस्य मायौ.
इन्द्रं या देवी सुभगा जजान सा न ऐतु वर्चसा संविदाना.. (४)
राजकुमार में, बजाई जाती हुई दुंदुभी में, घोड़े के शीघ्र गमन में एवं पुरुष की उच्च
घोषणा में जो तेज है, उसी सौभाग्यशाली तेज ने इंद्र को जन्म दिया है. वह तेज रूपी देवी
हमारे तेज से एक होती हुई हमारे समीप आए. (४)
सूक्त-३९ देवता—बृहस्पति
यशो हविर्वर्धतामिन्द्रजूतं सहस्रवीर्यं सुभृतं सहस्कृतम्.
प्रस्र्षणमनु दीर्घाय चक्षसे हविष्मन्तं मा वर्धय ज्येष्ठतातये.. (१)
हमारे द्वारा इंद्र के उद्देश्य से दी हुई अपरिमित सामर्थ्य से युक्त, भलीभांति वर्तमान एवं
हजारों को पराजित करने वाले बल को देने वाली हवि की वृद्धि हो. हे इंद्र! उस हवि की वृद्धि
के पश्चात मुझ हवि देने वाले यजमान को चिरकाल तक होने वाले दर्शन और श्रेष्ठता के लिए
बढ़ाओ. (१)
अच्छा न इन्द्रं यशसं यशोभिर्यशस्विनं नमसाना विधेम.
स नो रास्व राष्ट्रमिन्द्रजूतं तस्य ते रातौ यशसः स्याम.. (२)
सामने वर्तमान, यश देने वाले एवं अधिक यशस्वी इंद्र को हम नमस्कार आदि के द्वारा
पूजते हुए उन की सेवा करते हैं. हे इंद्र! तुम हमें अपने द्वारा प्रेरित राज्य प्रदान करो. तुम्हारे
उस दान से हम यशस्वी बनें. (२)
यशा इन्द्रो यशा अग्निर्यशाः सोमो अजायत.
यशा विश्वस्य भूतस्याहमस्मि यशस्तमः.. (३)
इंद्र, अग्नि और सोम यश की इच्छा करते हुए उत्पन्न हुए. यश का इच्छुक मैं भी समस्त
प्राणियों की अपेक्षा अतिशय यशस्वी बनूं. (३)
सूक्त—४० देवता—इंद्र
अभयं द्यावापृथिवी इहास्तु नो ऽ भयं सोमः सविता नः कृणोतु.
अभयं नो ऽ स्तूर्व १ न्तरिक्षं सप्तऋषीणां च हविषाभयं नो अस्तु.. (१)
हे द्यावा पृथ्वी! तुम्हारी कृपा से हम निर्भय हैं. चंद्रमा एवं सूर्य हमें निर्भय करें. द्यावा
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और पृथ्वी के मध्य में वर्तमान अंतरिक्ष हमारे लिए अभय करे. हमारे द्वारा सप्त ऋषियों को
दिया जाता हुआ हवि हमें अभय देने वाला हो. (१)
अस्मै ग्रामाय प्रदिशश्चतस्र ऊर्जं सुभूतं स्वस्ति सविता नः कृणोतु.
अशत्र्विन्द्रो अभयं नः कृणोत्वन्यत्र राज्ञामभि यातु मन्युः.. (२)
सूर्य देव हमारे निवास के गांव में और उस की चारों दिशाओं में अन्न उत्पन्न करें एवं
कुशल प्रदान करें. हमारे मित्र इंद्र हमें अभय प्रदान करें तथा राजा का क्रोध हमें त्याग कर
हम से दूर चला जाए. (२)
अनमित्रं नो अधरादनमित्रं न उत्तरात्.
इन्द्रानमित्रं नः पश्चादनमित्रं पुरस्कृधि.. (३)
हे इंद्र! हमारी दक्षिण दिशा को शत्रुरहित करो. हमारी उत्तर दिशा को शत्रुविहीन
बनाओ. हमारी पश्चिम और पूर्व दिशाओं को भी शत्रुहीन बनाओ. (३)
सूक्त-४१ देवता—मन
मनसे चेतसे धिय आकूतय उत चित्तये.
मत्यै श्रुताय चक्षसे विधेम हविषा वयम्.. (१)
हे पुरुष! सुख का अनुभव कराने वाले मन के लिए, ज्ञान के साधन चित्त के लिए, ध्यान
के साधन बुद्धि के लिए, स्मृति के साधन संकल्प के लिए, ज्ञान के साधन चेतना के लिए,
अतीत की स्मृति के कारण मति के लिए, सुनने से उत्पन्न ज्ञान के लिए एवं चक्षु से उत्पन्न
ज्ञान के लिए हम आज्य से सेवा करते हैं. (१)
अपानाय व्यानाय प्राणाय भूरिधायसे.
सरस्वत्या उरुव्यचे विधेम हविषा वयम्.. (२)
अपान वायु को, व्यान वायु को, प्राण वायु को, प्राणापान व्यान वायुओं को धारण करने
वाले प्राणियों की, अत्यधिक व्याप्ति वाली सरस्वती की हम आज्य आदि के द्वारा सेवा करते
हैं. (२)
मा नो हासिषुर्ऋषयो दैव्या ये तनूपा ये नस्तन्वस्तनूजाः.
अमर्त्या मर्त्याँभि नः सचध्वमायुर्धत्त प्रतरं जीवसे नः.. (३)
प्राण के अधिष्ठाता देव एवं दिव्य गुणों वाले सप्त ऋषि हमें नहीं त्यागें. शरीरों के रक्षक
ऋषि हमें सभी ओर से प्राप्त हों. वे हमें जीवन के लिए अत्यधिक आयु प्रदान करें. (३)
सूक्त-४२ देवता—मन्यु
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अव ज्यामिव धन्वनो मन्युं तनोमि ते हृदः.
यथा संमनसौ भूत्वा सखायाविव सचावहै.. (१)
हे पुरुष! धनुर्धारी जिस प्रकार धनुष पर चढ़ी हुई डोरी को उतारता है, उसी प्रकार मैं
तेरे हृदय से क्रोध को दूर करता हूं. (१)
सखायाविव सचावहा अव मन्युं तनोमि ते.
अधस्ते अश्मनो मन्युमुपास्यामसि यो गुरु.. (२)
मित्रों के समान हम एकमत हो कर रक्षा कार्य करें. हे क्रुद्ध पुरुष! मैं तेरे क्रोध को भारी
पत्थर के नीचे दबाता हूं. (२)
अभि तिष्ठामि ते मन्युं पाष्ण्यां प्रपदेन च.
यथावशो न वादिषो मम चित्तमुपायसि.. (३)
हे वृद्ध पुरुष! मैं तेरे क्रोध को अपने अधीन करने के लिए पैरों के ऊपर और नीचे के
भागों से खड़ा होता हूं. जिस प्रकार तुम परवश हो कर मेरा विरोध करने में समर्थ न बनो
तथा जिस प्रकार तुम मेरे मन के अनुकूल बनो, मैं वैसा ही उपाय करता हूं. (३)
सूक्त-४३ देवता—मन्युशमन
अयं दर्भो विमन्युकः स्वाय चारणाय च.
मन्योर्विमन्युकस्यायं मन्युशमन उच्यते.. (१)
यह दर्भ अर्थात् कुश अपनी जातियों और शत्रुओं के क्रोध के विनाश का कारण है. यह
क्रोध करने वाले शत्रु तथा परमार्थ रूप से क्रोधाविष्ट आत्मीय का क्रोध शांत करने का उपाय
कहा जाता है. (१)
अयं यो भूरिमूलः समुद्रमवतिष्ठति.
दर्भः पृथिव्या उत्थितो मन्युशमन उच्यते.. (२)
अधिक जड़ों वाला यह कुश अधिक जल वाले भाग में स्थित है. पृथ्वी पर ऊपर की
ओर उठा हुआ कुश क्रोध शांत करने वाला बताया जाता है. (२)
वि ते हनव्यां शरणिं वि ते मुख्यां नयामसि.
यथावशो न वादिषो मम चित्तमुपायसि.. (३)
हे पुरुष! हम तेरी उस ध्वनि को नम्र बनाते हैं, जो क्रोध व्यक्त करने वाली है. हम तेरे
मुख की उस ध्वनि को भी शांत बनाते हैं जो क्रोध को उत्पन्न करती है. तात्पर्य यह है कि हम
तेरा क्रोध शांत करते हैं. तू हमारे विरोध में बोलने में समर्थ न हो. इस प्रकार हम तेरा मन
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अपने मन में मिलाते हैं. (३)
सूक्त-४४ देवता—मंत्र में उक्त
अस्थाद् द्यौरस्थात् पृथिव्यस्थाद् विश्वमिदं जगत्.
अस्थुर्वृक्षा ऊर्ध्वस्वप्रास्तिष्ठाद् रोगो अयं तव.. (१)
हे रोगी पुरुष! जिस प्रकार गृह नक्षत्रों से युक्त द्युलोक में स्थित है, जिस प्रकार सब की
आधार बनी हुई पृथ्वी स्थित है, जिस प्रकार यह दिखाई देता हुआ जगत् स्थित है, जिस
प्रकार खड़े एवं सोने वाले वृक्ष ऊपर की ओर स्थित हैं, उसी प्रकार तेरा यह रक्त बहने का
रोग स्थित हो, अर्थात् तेरा रक्त प्रवाह रुक जाए. (१)
शतं या भेषजानि ते सहस्रं संगतानि च.
श्रेष्मास्रावभेषजं वसिष्ठं रोगनाशनम्.. (२)
हे रोगी पुरुष! जो सैकड़ों अथवा हजारों संख्या वाली ओषधियां रोग शांत करती हैं,
यह कर्म उन सब में श्रेष्ठ एवं रक्तस्राव दूर करने वाला है. (२)
रुद्रस्य मूत्रमस्यमृतस्य नाभिः.
विषाणका नाम वा असि पितॄणां मूलादुत्थिता वातीकृतनाशनी.. (३)
हे गाय के सींग से निकले हुए जल! तू रुद्र का मूत्र तथा अमृत का बंधक है. हे गाय के
सींग! तू विषाण नाम के रोग को शांति की सूचना देता है. तू पितरों के मूल से उत्पन्न तथा
रक्तस्राव के आधार पाप का नाश करने वाला है. (३)
सूक्त-४५ देवता—दुःस्वप्न विनाश
परो ऽ पेहि मनस्पाप किमशस्तानि शंससि.
परेहि न त्वा कामये वृक्षां वनानि सं चर गृहेषु गोषु मे मनः.. (१)
हे पापमय अशक्त मन! तू हम से दूर चला जा. तू अशोभन बातें मुझ तक क्यों लाता
है? तू दूर चला जा. मैं तुझे नहीं चाहता. यहां से दूर जा कर तू घने वृक्षों वाले वन में प्रवेश कर
और वहीं रह. मेरा शोभन मन पत्नी, पुत्र आदि से युक्त घर में और गौ आदि पशुओं में संलग्न
रहे. (१)
अवशसा निःशसा यत् पराशसोपारिम जाग्रतो यत् स्वप्नतः.
अग्निर्विश्वान्यप दुष्कृतान्यजुष्टान्यारे अस्मद् दधातु.. (२)
सामान्य हिंसा, अत्यधिक हिंसा तथा मुंह फेरने वालों की हिंसा के द्वारा जाग्रत अवस्था
में हम जिस बुरे स्वप्न से पीड़ित होते हैं, निद्रावस्था में भी वही बुरा स्वप्न हम को पीड़ित करता
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है. बुरे स्वप्नों के निमित्त उन सभी अशोभन पापों को अग्नि देव हम से दूर करें. (२)
यदिन्द्र ब्रह्मणस्पते ऽ पि मृषा चरामसि.
प्रचेता न आङ्गिरसो दुरितात् पात्वंहसः.. (३)
हे इंद्र और ब्रह्मणस्पति! दुःख के निमित्त जिस पाप के कारण हम स्वप्न में अत्यधिक
निंदनीय आचरण करते हैं, उस दुःख देने वाले पाप के आंगिरस मंत्रों के अधिष्ठाता देव वरुण
हमारी रक्षा करें. (३)
सूक्त-४६ देवता—दुःस्वप्न विनाश
यो न जीवो ऽ सि न मृतो देवानामामृतगर्भो ऽ सि स्वप्न.
वरुणानी ते माता यमः पिताररुर्नामासि.. (१)
हे स्वप्न! न तुम जीवित हो, न मृत हो. तुम इंद्रियों के अधिष्ठाता अग्नि आदि देवों के
अमृत से पूर्ण हो. वरुण की पत्नी तेरी माता और यम तेरे पिता हैं. तेरा नाम दुःख देने वाला
अशुभ अररु है. (१)
विद्म ते स्वप्न जनित्रं देवजामीनां पुत्रो ऽ सि यमस्य करणः.
अन्तको ऽ सि मृत्युरसि. तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स नः स्वप्न दुष्षप्न्यात्
पाहि.. (२)
हे स्वप्न के अभिमानी देव! हम तुम्हारे जन्म को जानते हैं. तुम वरुणानी आदि देव
पत्नियों के पुत्र एवं यम के साधन हो, इसलिए तुम अंतक और मृत्यु हो. हे स्वप्न! हम तुझे
उसी प्रकार जानते हैं. तू बुरे स्वप्न से उत्पन्न दुःख से हमारी रक्षा कर. (२)
यथा कलां यथा शफं यथर्णं संनयन्ति.
एवा दुष्षप्न्यं सर्वं द्विषते सं नयामसि.. (३)
जैसे गाय के खुर आदि दूषित अंगों को काट कर दूर कर देते हैं, जैसे ऋणी मनुष्य
साहूकार को धन देता है, उसी प्रकार बुरे स्वप्न से उत्पन्न सभी भयों को मैं उस मनुष्य को देता
हूं जो मुझ से द्वेष करता है. (३)
सूक्त-४७ देवता—अग्नि
अग्निः प्रातःसवने पात्वस्मान् वैश्वानरो विश्वकृद् विश्वशंभूः.
स नः पावको द्रविणे दधात्वायुष्मन्तः सहभक्षाः स्याम.. (१)
सभी प्राणियों का हित करने वाले, जगत् के कर्ता एवं सब को सुख देने वाले अग्नि
प्रातःसवन नामक सोम यज्ञ में हमारी रक्षा करें. सब को पवित्र करने वाले अग्नि देव हमें यज्ञ
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के फलस्वरूप धन में स्थापित करें. अग्नि देव की कृपा से हम अपने पुत्र, पौत्र आदि के साथ
भोजन करने वाले बनें. (१)
विश्वे देवा मरुत् इन्द्रो अस्मानस्मिन् द्वितीये सवने न जह्युः.
आयुष्मन्तः प्रियमेषां वदन्तो वयं देवानां सुमतौ स्याम .. (२)
सभी देश, दान आदि गुण वाले उनचास मरुत् और उन के स्वामी इंद्र मध्याह्न सवन
नामक सोमयाग में हम ऋत्विजों को न छोड़ें. हम उन देवों को प्रसन्न करने वाली स्तुतियां
बोलते हुए देवों की अनुग्रह बुद्धि में स्थित हों. (२)
इदं तृतीयं सवनं कवीनामृतेन ये चमसमैरयन्त.
ते सौधन्वनाः स्व रानशानाः स्विष्टिं नो अभि वस्यो नयन्तु.. (३)
तृतीय सवन नाम का यह सोम याग उन ऋभुओं का है, जिन्होंने अपने शिल्प कर्म से
चमस की रचना की थी. आंगिरस के पुत्र वे सुधन्वा रथ, चमस आदि बनाने के कारण देवत्व
को प्राप्त हुए हैं. वे ऋभु उत्तम फल का ध्यान कर के हम को यज्ञ पूर्ति का अधिकारी बनाएं.
(३)
सूक्त-४८ देवता—मंत्र में बताए गए
श्येनो ऽ सि गायत्रच्छन्दा अनु त्वा रभे.
स्वस्ति मा सं वहास्य यज्ञस्योदृचि स्वाहा.. (१)
हे बाज के समान शीघ्र गति वाले प्रातःसवन नामक यज्ञ! तेरे स्तोत्र में गायत्री छंद है. मैं
तुझे डंडे के समान आधार रूप में ग्रहण करता हूं, इसीलिए तू इस यज्ञ की समाप्ति को मेरे
पास ला. मेरा यह हवि उत्तम आहुतियों वाला हो. (१)
ऋभुरसि जगच्छन्दा अनु त्वा रभे.
स्वस्ति मा सं वहास्य यज्ञस्योदृचि स्वाहा.. (२)
हे तृतीय सवन वाले यम! तेरी स्तुतियों में जगती छंद का अधिक प्रयोग होने से तेरा
नाम जगच्छंद है तथा तू आंगिरस के पुत्र सुधन्वा को प्रसन्न करने के कारण ऋभु कहलाता है.
मैं ने तुझे डंडे के समान आधार रूप में ग्रहण किया है, इसलिए तू इस यज्ञ की समाप्ति को
मेरे समीप ला. मेरा यह हवि उत्तम आहुतियों वाला हो. (२)
वृषासि त्रिष्टुप्छन्दा अनु त्वा रभे.
स्वस्ति मा सं वहास्य यज्ञस्योदृचि स्वाहा.. (३)
हे मध्याह्न सवन! तू सेचन समर्थ इंद्र ही है. तेरी स्तुतियों में त्रिष्टुप् छंद की अधिकता है,
इसीलिए तू त्रिष्टुप् छंद कहलाता है. मैं तुझे डंडे के समान आधार रूप में ग्रहण करता हूं,
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इसीलिए तू इस यज्ञ की समाप्ति को मेरे समीप ला. मेरा यह हवि उत्तम आहुतियों वाला हो.
(३)
सूक्त-४९ देवता—अग्नि
नहि ते अग्ने तन्वः क्रूरमानंश मर्त्यः.
कपिर्बभस्ति तेजनं स्वं जरायु गौरिव.. (१)
हे अग्नि! तुम्हारे ज्वाला रूप शरीर के तीक्ष्ण तेज को मरणधर्मा पुरुष प्राप्त नहीं कर
सकता. ये बंदर के समान चंचल स्वभाव वाली और शरीर के जल को पीने वाली तुम्हारी
ज्वालाएं इस देह को उसी प्रकार भस्म कर देती हैं, जिस प्रकार पहली बार बच्चा देने वाली
गाय अपनी जेर को खा जाती है. (१)
मेष इव वै सं च वि चोर्वच्यसे यदुत्तरद्रावुपरश्च खादतः.
शीर्ष्णा शिरो ऽ प्ससाप्सो अर्दयन्नंशून् बभस्ति हरितेभिरासभिः.. (२)
हे अग्नि! मेढ़ा जिस प्रकार अधिक घास वाले स्थान पर जाता है और घास चरने के
पश्चात उस स्थान से अन्यत्र चला जाता है, उसी प्रकार तुम पहले जलाने योग्य पुरुष शरीर के
अंगों से मिलते हो और बाद में उसे जलाने के बाद अन्यत्र चले जाते हो. वन को जलाने वाली
दावाग्नि और शव को जलाने वाली शवाग्नि-ये दोनों अग्नियां वृक्ष अथवा शव को भस्म
करती हुई अपनी ज्वालाओं से लता आदि को भी जला देती हैं. (२)
सुपर्णा वाचमक्रतोप द्यव्याखरे कृष्णा इषिरा अनर्तिषुः.
नि यनियन्त्युपरस्य निष्कृतिं पुरू रेतो दधिरे सूर्यश्रितः.. (३)
हे अग्नि! तुम्हारी ज्वालाएं बाज पक्षी के समान शीघ्र व्यापक होने वाली हैं. काला
हरिण जिस प्रकार अपने निवास स्थान में गति करता है, उसी प्रकार तुम्हारी ज्वालाएं समीप
आ कर नृत्य करती है. धुआं उत्पन्न करने के कारण तुम्हारी ज्वालाएं मेघ का निर्माण करती
हैं. हे अग्नि! तुम्हारी दीप्तियां सूर्य मंडल को पा कर सभी प्राणियों के जीवन के आधार जल
को उत्पन्न करती हैं. (३)
सूक्त-५० देवता—अश्विनीकुमार
हतं तर्दं समङ्कमाखुमश्विना छिन्तं शिरो अपि पृष्टीः शृणीतम्.
यवान्नेददानपि नह्यतं मुखमथाभयं कृणुतं धान्याय.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! हिंसक एवं बिल में प्रवेश करने वाले चूहे का विनाश करो. उस का
सिर काट डालो तथा उस की पीठ की हड्डी चूरचूर कर दो. चूहा हमारे जौ नहीं खा पाए,
इसलिए उस का मुंह बंद कर दो. ऐसा कर के तुम धान्य के लिए अभय करो. (१)
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तर्द है पतङ्ग हे जभ्य हा उपक्वस.
ब्रह्मेवासंस्थितं हविरनदन्त इमान् यवानहिंसन्तो अपोदित.. (२)
हे हिंसक चूहो तथा हे पतंगो! तुम उपद्रव करते हो, इसीलिए तुम्हारे विनाश के निमित्त
दी गई हवि ब्रह्म के समान प्रभावशील हो. तुम हमारे जौ आदि अन्नों का विनाश न करते हुए
इस स्थान से भाग जाओ. (२)
तर्दापते वघापते तृष्टजम्भा आ शृणोत मे.
य आरण्या व्यद्वरा ये के च स्थ व्यद्वरास्तान्त्सर्वान्जम्भयामसि.. (३)
हे हिंसक चूहों एवं पतंगों आदि के स्वामी! तुम तीखे दांतों वाले हो. तुम मेरे इस वचन
को सुनो. तुम चाहे जंगल में रहने वाले हो अथवा ग्राम में निवास करने वाले हो, हम अपने
इस अनुष्ठान द्वारा तुम्हारा विनाश करते हैं. (३)
सूक्त-५१ देवता—सोम
वायोः पूतः पवित्रेण प्रत्यङ् सोमो अति द्रुतः. इन्द्रस्य युज्यः सखा.. (१)
वायु से संबंधित दशापवित्र के द्वारा शोधित सोमरस मुख से चल कर नाभि देश में
पहुंचता है. वह इंद्र का योग्य मित्र है. (१)
आपो अस्मान् मातरः सूदयन्तु घृतेन नो घृतप्वः पुनन्तु.
विश्वं हि रिप्रं प्रवहन्ति देवीरुदिदाभ्यः शुचिरा पूत एमि.. (२)
संसार की माता जलदेवी हमें शुद्ध करे तथा अपने द्रव रूप रस से हमें पवित्र करे,
क्योंकि देवता रूप जल स्नान, आचमन एवं प्रक्षेपण आदि करने वाले के सभी पापों को धोते
हैं, इसीलिए ऐसे जलों में स्नान कर के मैं पवित्र हो कर यज्ञ कर्म के हेतु उपस्थित होता हूं.
(२)
यत् किं चेदं वरुण दैव्ये जने ऽ भिद्रोहं मनुष्या ३ श्वरन्ति.
अचित्त्या चेत् तव धर्मा युयोपिम मा नस्तस्मादेनसो देव रीरिषः.. (३)
हे जलों के स्वामी वरुण देव! मनुष्यगण जो पाप करते हैं तथा हम सब भी अज्ञान के
कारण तुम से संबंधित धर्मों के विपरीत जो कार्य करते हैं, उस अज्ञान जनित पाप के कारण
हमारी हिंसा मत करो. (३)
सूक्त-५२ देवता—सूर्य, गाएं
उद् सूर्यो दिव एति पुरो रक्षांसि निजूर्वन्.
आदित्यः पर्वतेभ्यो विश्वदृष्टो अदृष्टहा.. (१)
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के हंता आदित्य उदयाचल पर्वत से उदय होते हैं. (१)

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सूर्य देव हमारे प्रति उपद्रव करने वाले राक्षस, पिशाच आदि का विनाश करते हुए पूर्व
दिशा में उदय होते हैं. सभी प्राणियों के द्वारा देखे गए और हमारे द्वारा अदृश्य राक्षसों आदि
के हंता आदित्य उदयाचल पर्वत से उदय होते हैं. (१)
नि गावो गोष्ठे असदन् नि मृगासो अविक्षत.
न्यू ३ र्मयो नदीनां न्य १ दृष्टा अलिप्तत.. (२)
सूर्योदय के कारण राक्षसों के विनाश से इस समय हमारी गाएं निर्भय हो कर गोशाला में
बैठी हैं तथा वन के पशु भी अपनेअपने स्थान पर निर्भय स्थित हैं. नदियों की तरंग सुख से
उठ रही है. रात्रि में न दिखाई देने वाली प्रजाएं सूर्य के प्रकाश में पूर्णतया देखी जा सकती हैं.
(२)
आयुर्ददं विपश्चितं श्रुतां कण्वस्य वीरुधम्.
आभारिषं विश्वभेषजीमस्यादृष्टान् नि शमयत्.. (३)
सौ वर्ष की आयु देने वाली, रोगशांति के उपाय जानने वाली, महर्षि कण्व द्वारा बताई
गई ओषधि तथा सभी रोगों का विनाश करने वाली शमी को मैं इस रोगी का रोग मिटाने के
लिए ले आया हूं. यह शमी रूप ओषधि दिखाई न देने वाले शरीर के मध्यवर्ती रोगों और
राक्षस आदि को शांत करे. (३)
सूक्त-५३ देवता—पृथ्वी आदि
द्यौश्च म इदं पृथिवी च प्रचेतसौ शुक्नो बृहन् दक्षिणया पिपर्तु.
अनु स्वधा चिकितां सोमो अग्निवायुर्नः पातु सविता भगश्च.. (१)
पृथ्वी और आकाश मेरे प्रति अनुग्रह वाले बन कर मुझे मनचाहा फल दें. दीप्तिशाली
और महान सूर्य दक्षिण दिशा से मेरी रक्षा करें. पितरों से संबंधित एवं स्वधा की अधिष्ठात्री
देवी मुझ पर अनुग्रह करें. सोम, अग्नि, वायु सविता और भग मेरी रक्षा करें. (१)
पुनः प्राणः पुनरात्मा न ऐतु पुनश्चक्षुः पुनरसूर्न ऐतु.
वैश्वानरो नो अदब्धस्तनूपा अन्तस्तिष्ठाति दुरितानि विश्वा.. (२)
मुख और नासिका द्वारा शरीर में प्रवेश करने वाला प्राण वायु तथा जीवात्मा हमें पुनः
प्राप्त हो. चक्षु और जीवन हमें पुनः प्राप्त हों. संसारभर के मनुष्यों के हितैषी, रोग आदि से
पराजित न होने वाले एवं शरीर के पालक अग्नि हमारे शरीर में स्थित रहते हैं. वे रोग के
कारण होने वाले सभी पापों का विनाश करें. (२)
सं वर्चसा पयसा सं तनूभिर्गन्महि मनसा सं शिवेन.
त्वष्टा नो अत्र वरीयः कृणोत्वनु नो मार्ष्टु तन्वो ३ यद् विरिष्टम्.. (३)
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सूक्त-५४ देवता—अग्नि, सोम

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हम दीप्ति से तथा देह की स्थिति के आधार रस से युक्त हों. हम शरीर के अंगों —
हाथ, पैर आदि से युक्त हों तथा शोभन मन से युक्त हों. त्वष्टा देव हमारे शरीर को शक्ति युक्त
बनाएं तथा हमारे शरीर का जो रोग वाला भाग हैं, उसे अपने हाथ से शुद्ध करें. (३)
सूक्त-५४ देवता—अग्नि, सोम
इदं तद् युज उत्तरमिन्द्रं शुम्भाभ्यष्टये.
अस्य क्षत्रं श्रियं महीं वृष्टिरिव वर्धया तृणम्.. (१)
सभी देवों में श्रेष्ठ इंद्र को मैं अभीष्ट फल पाने के लिए स्तुति आदि से प्रसन्न करता हूं. हे
इंद्र! अधिक वर्षा जिस प्रकार घास की वृद्धि करती है, उसी प्रकार तुम अभिचार से पीड़ित
इस पुरुष के बल और पुत्र, पौत्रादि सहित धन की वृद्धि करो. (१)
अस्मै क्षत्रमग्नीषोमावस्मै धारयतं रयिम्.
इमं राष्ट्रस्याभीवर्गे कृणुतं युज उत्तरम्.. (२)
हे अग्नि और सोम! इस यजमान में बल स्थापित करो और इसे धन प्रदान करो. तुम
इस यजमान को जनपद के उच्च वर्ग का सदस्य बनाओ. इस फल को पाने के लिए मैं उत्तम
यज्ञ कर्म करता हूं. (२)
सबन्धुश्चासबन्धुश्च यो अस्माँ अभिदासति.
सर्वं तं रन्धयासि मे यजमानाय सुन्व.. (३)
हे इंद्र! मेरे समान गोत्र वाला अथवा मुझ से भिन्न गोत्र वाला जो शत्रु मेरा विनाश करना
चाहता है, इन दोनों प्रकार के शत्रुओं को सोम अभिषव करने वाले यजमान के वश में करो.
(३)
सूक्त-५५ देवता—विश्वे देव
ये पन्थानो बहवो देवयाना अन्तरा द्यावापृथिवी संचरन्ति.
तेषामज्यानिं यतमो वहाति तस्मै मा देवाः परि धत्तेह सर्वे.. (१)
जिन मार्गों से केवल देव ही जाते हैं, वे बहुत से मार्ग पृथ्वी और आकाश के मध्य
वर्तमान हैं. उन मार्गों में जो समृद्धि लाने वाला है, मुझे सभी देव उसी मार्ग पर स्थापित करें.
(१)
ग्रीष्मो हेमन्तः शिशिरो वसन्तः शरद वर्षाः स्विते नो दधात.
आ नो गोषु भजता प्रजायां निवात इद् वः शरणे स्याम.. (२)
ग्रीष्म, हेमंत, शिशिर, वसंत, शरद और वर्षा—इन छः ऋतुओं के अधिष्ठाता देव हमें
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सरलता से प्राप्त होने वाले धनों में स्थापित करें. हे ऋतुओं के अभिमानी देवो! तुम हमें गायों
एवं पुत्र, पौत्र आदि से युक्त करो. हम तुम्हारे ऐसे घर में रहें, जहां सभी दुःखों के कारणों का
अभाव हो. (२)
इदावत्सराय परिवत्सराय संवत्सराय कृणुता बृहन्नमः.
तेषां वयं सुमतौ यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम.. (३)
हे मनुष्यो! इदावत्सर, परिवत्सर और संवत्सर को बारबार नमस्कार कर के प्रसन्न करो.
हम यज्ञ के योग्य इदावत्सर आदि के अधिष्ठाता देवों की अनुग्रह बुद्धि में हों तथा उन की
कृपा का फल प्राप्त करें. (३)
सूक्त-५६ देवता—विश्वे देव, रुद्र
मा नो देवा अहिवर्धीत् सतोकान्त्सहपूरुषान्.
संयतं न वि ष्वरद् व्यात्तं न सं यमन्नमो देवजनेभ्यः.. (१)
हे विष को शांत करने वाले देवो! सांप हमें और हमारे पुत्र, पौत्र आदि की एवं सेवकों
की हिंसा न करे. हमें काटने के लिए सांप का मुंह न खुले. उस का खुला हुआ मुख मंत्र शक्ति
के कारण बंद न हो. सर्प विष शांत करने में समर्थ देवों को नमस्कार है. (१)
नमो ऽ स्वसिताय नमस्तिरश्चिराजये.
स्वजाय बभ्रवे नमो नमो देवजनेभ्यः.. (२)
असित, तिरश्चिराजी, बबेरू और स्वज नामक सर्पों को नमस्कार है. सर्प के विष को
शमन करने में समर्थ देवों को नमस्कार है. (२)
सं ते हन्मि दता दतः समु ते हन्वा हनू.
सं ते जिह्वया जिह्वां सम्वास्नाह आस्यम्.. (३)
हे सांप! मैं तेरे ऊपर वाले और नीचे वाले दांतों को मिलाता हूं. मैं तेरी कौड़ी के ऊपर
और नीचे वाले भागों को भी मिलाता हूं. मैं तेरी एक जीभ से दूसरी जीभ को मिलाता हूं. मैं
तेरे मुख के ऊपर और नीचे वाले भागों को भी मिलाता हूं. (३)
सूक्त-५७ देवता—रुद्र, भेषज
इदमद् वा उ भेषजमिदं रुद्रस्य भेषजम्.
येनेषुमेकतेजनां शतशल्यामपब्रवत्.. (१)
यही रोग की ओषधि है और यही अंतकाल में सब को रुलाने वाले रुद्र की ओषधि है.
इस एक गांठ वाली ओषधि का प्रयोग सौ कांटों वाले बांस के रूप में लक्ष्य को समीप जान
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कर किया था. (१)
जालाषेणाभि षिञ्चत जालाषेणोप सिञ्चत.
जालाषमुग्रं भेषजं तेन नो मृड जीवसे.. (२)
हे परिचय करने वालो! गोमूत्र के फेन से मिले जल से घाव को धोओ. उसी जल से घाव
के आसपास वाले भाग को धोओ. गोमूत्र का झाग अत्यधिक प्रभावशाली ओषधि है. इस के
द्वारा हमें जीवित रहने के लिए सुखी बनाओ. (२)
शं च नो मयश्च नो मा च नः किं चनाममत्.
क्षमा रपो विश्वं नो अस्तु भेषजं सर्वं नो अस्तु भेषजम्.. (३)
हे देव! हमारे रोग का शमन हो, हमें सुख प्राप्त हो तथा हमारी प्रजा, पशु आदि
रोगग्रस्त न हों. हमारे रोग का कारण जो पाप हैं. उस का विनाश हो. समस्त यज्ञात्मक कर्म
और स्थावर जंगम रूप ओषधि हमारे रोग और पाप का विनाश करने वाली हो. (३)
सूक्त-५८ देवता—इंद्र आदि
यशसं मेन्द्रो मघवान् कृणोतु यशसं द्यावापृथिवी उभे इमे.
यशसं मा देवः सविता कृणोतु प्रियो दातुर्दक्षिणाया इह स्याम.. (१)
धन के स्वामी इंद्र मुझे यशस्वी बनाएं. ये दोनों धरती और आकाश मुझे यशस्वी बनाएं.
सविता देव मुझे यशस्वी बनाएं. मैं यशस्वी बन कर ग्राम, नगर आदि में दक्षिणा देने वाले का
प्रिय बनूं. (१)
यथेन्द्रो द्यावापृथिव्योर्यशस्वान् यथाप ओषधीषु यशस्वतीः.
एवा विश्वेषु देवेषु वयं सर्वेषु यशसः स्याम.. (२)
इंद्र जिस प्रकार धरती और आकाश के मध्य वर्षा करने के कारण यशस्वी हैं, जिस
प्रकार जल धान, जौ आदि की वृद्धि के कारण यशस्वी हैं. उसी प्रकार हम समस्त देवों तथा
मनुष्यों में यशस्वी बनें. (२)
यशा इन्द्रो यशा अग्निर्यशाः सोमो अजायत.
यशा विश्वस्य भूतस्याहमस्मि यशस्तमः.. (३)
इंद्र, अग्नि और सोम यश की इच्छा करते हुए उत्पन्न हुए. यश का इच्छुक मैं भी समस्त
प्राणियों की अपेक्षा अधिक यशस्वी बनूं. (३)
सूक्त-५९ देवता—अरुंधती आदि
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अनडुद्भ्यस्त्वं प्रथमं धेनुभ्यस्त्वमरुन्धति.
अधेनवे वयसे शर्म यच्छ चतुष्पदे.. (१)
हे सहदेवी नाम की ओषधि! तुम सब से पहले गाड़ी खींचने में समर्थ मेरे बैलों को सुख
दो. इस के पश्चात तुम मेरी दुधारू गायों को सुखी बनाओ. मेरी गायों के अतिरिक्त तुम पांच
वर्ष की अवस्था वाले नए बैल, घोड़े आदि चौपायों को भी सुख प्रदान करो. (१)
शर्म यच्छत्वोषधिः सह देवीरुरुन्धती.
करत् पयस्वन्तं गोष्ठमयक्ष्माँ उत पूरुषान्.. (२)
मनचाहा फल देने वाली सहदेवी नाम की ओषधि मुझे सुख दे. वह मेरी गोशाला को
अधिक दूध वाला तथा मेरे पुत्र, सेवक आदि को रोग रहित करे. (२)
विश्वरूपां सुभगामच्छावदामि जीवलाम्.
सा नो रुद्रस्यास्तां हेतिं दूरं नयतु गोभ्यः.. (३)
नाना रूपों वाली, सौभाग्य वाली एवं जीवन देने वाली सहदेवी नाम की ओषधि के
सामने हो कर मैं प्रार्थना करता हूं. वह हमारे हिंसकों द्वारा हमारी ओर चलाई गई तलवार को
हम से और हमारी गायों से दूर ले जाए. (३)
सूक्त-६० देवता—अर्यमा
अयमा यात्यर्यमा पुरस्ताद् विषितस्तपः.
अस्या इच्छन्नग्रुवै पतिमुत जायामजानये.. (१)
जिन की किरणें विशेष रूप से उजली हैं, वह सूर्य पूर्व दिशा में उग रहे हैं. वह इस पति
रहित कन्या को पति और स्त्रीहीन पुरुष को पत्नी प्रदान करने की इच्छा से उदय हो रहे हैं.
(१)
अश्रमदियमर्यमन्नन्यासां समनं यती.
अङ्गो न्वर्यमन्नस्या अन्याः समनमायति .. (२)
हे अर्यमा देव! अन्य पतिव्रता नारियों ने पतियों को पाने के उपायों के रूप में शांति पाने
के लिए जिन कर्मों को किया था, उन्हें पति की अभिलाषा करने वाली यह कन्या कर चुकी है
तथा पति को प्राप्त न करने के कारण दुःखी है. अन्य स्त्रियां इस पतिकाम्या की शांति के
उपाय कर रही हैं. (२)
धाता दाधार पृथिवीं धाता द्यामुत सूर्यम्.
धातास्या अग्रुवै पतिं दधातु प्रतिकाम्यम्.. (३)
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