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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-८ देवता—बृहस्पति

दूर भगाओ. (६)
त्वमग्ने यातुधानानुपबद्धाँ इहा वह.
अथैषामिन्द्रो वज्रेणापि शीर्षाणि वृश्चतु.. (७)
हे अग्नि! तुम रस्सी आदि से राक्षसों के हाथपैर बांध कर उन्हें यहां ले आओ. इस के
पश्चात इंद्र अपने वज्र से उन के सिर काट दें. (७)
सूक्त-८ देवता—बृहस्पति
इदं हविर्यातुधानान् नदी फेनमिव वहत्.
यं इदं स्त्री पुमानकरिह स स्तुवतां जनः.. (१)
मेरे द्वारा अग्नि आदि देवों को दिया हुआ घृत आदि हवि दुष्ट राक्षसों को यहां से उसी
प्रकार दूर हटा दे, जिस प्रकार नदी की धारा फेन को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती
है. मेरे प्रति अभिचार, जादू, टोना, टोटका करने वाले स्त्रीपुरुष अपने मनोरथ में असफल हो
कर यहां मेरी शरण में आएं और मेरी स्तुति करें. (१)
अयं स्तुवान आगमदिमं स्म प्रति हर्यत.
बृहस्पते वशे लब्ध्वाग्नीषोमा वि विध्यतम्.. (२)
हे बृहस्पति आदि देवो! आप की स्तुति करता हुआ जो यह मनुष्य आप की शरण में
आया है, यह हमारा विरोधी शत्रु है. हे बृहस्पति, अग्नि एवं सोम! इन उपद्रवकारियों को वश
में कर के अनेक प्रकार से दंडित करो. (२)
यातुधानस्य सोमप जहि प्रजां नयस्व च.
नि स्तुवानस्य पातय परमक्ष्युतावरम्.. (३)
हे सोमरस पीने वाले अग्नि देव! तुम राक्षसों की संतानों के समीप पहुंच कर उन्हें
समाप्त कर दो और हमारी संतान की रक्षा करो. हमारे जो शत्रु तुम से भयभीत हो कर
तुम्हारी प्रार्थना करते हैं, तुम उन की दाईं और बाईं दोनों आंखें बाहर निकाल लो. (३)
यत्रैषामग्ने जनिमानि वेत्थ गुहा सतामत्रिणां जातवेदः.
तांस्त्वं ब्रह्मणा वावृधानो जह्येषां शततर्हमग्ने.. (४)
हे सब के विषय में जानने वाले अग्नि! तुम गुहा में निवास करने वाले राक्षसों को जानते
हो. हे मंत्र द्वारा वृद्धि पाते हुए अग्नि! इन राक्षसों द्वारा सैकड़ों प्रकार की हिंसा को रोको एवं
संतान सहित इन का विनाश करो. (४)
सूक्त-९ देवता—वसु
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अस्मिन् वसु वसवो धारयन्त्विन्द्रः पूषा वरुणो मित्रो अग्निः.
इममादित्या उत विश्वे च देवा उत्तरस्मिन् यन्ज्योतिषि धारयन्तु.. (१)
भांतिभांति की धन संपत्ति की कामना करने वाले इस पुरुष को वसु, इंद्र, पूषा, वरुण,
मित्र, अग्नि एवं विश्वे देव धन प्रदान करें तथा ये देव इसे उत्तम ज्योति संपन्न बनाएं. (१)
अस्य देवाः प्रदिशि ज्योतिरस्तु सूर्यो अग्निरुत वा हिरण्यम्.
सपत्ना अस्मदधरे भवन्तूत्तमं नाकमधि रोहयेमम्.. (२)
हे इंद्रादि देवो! ग्रामादि सुखों के इच्छुक इस पुरुष के अधिकार में सूर्य, अग्नि, चंद्र,
स्वर्ग आदि की ज्योति पूर्ण रूप से रहे. इस के कारण शत्रु हमारे अधिकार में रहें. तुम हमें
सभी प्रकार के दुःखों से हीन स्वर्ग में पहुंचाओ. (२)
येनेन्द्राय समभरः पयांस्युत्तमेन ब्रह्मणा जातवेदः.
तेन त्वमग्न इह वर्धयेमं सजातानां श्रैष्ठ्य आ धेह्येनम्.. (३)
हे सब कुछ जानने वाले अग्नि! आप ने जिन उत्तम मंत्रों द्वारा इंद्र के लिए दुग्ध, घृत
आदि रस हवि के रूप में प्राप्त कराए, हे अग्नि! उन्हीं मंत्रों के द्वारा इस पुरुष की वृद्धि करो
एवं इसे अपनी जाति वालों में श्रेष्ठ बनाओ. (३)
एषां यज्ञमुत वर्चो ददे ऽ हं रायस्पोषमुत चित्तान्यग्ने.
सपत्ना अस्मदधरे भवन्तूत्तमं नाकमधि रोहयेमम्.. (४)
हे अग्नि! तुम्हारी कृपा से मैं इन शत्रुओं के स्वर्ग आदि लोकों के साधक यज्ञ, कर्म, तेज,
धन एवं चित्त का हरण करता हूं. मेरे शत्रु मुझ से निम्न स्थिति में रहें. आप मुझ यजमान को
सभी दुःखों से रहित एवं उत्तम स्वर्ग में पहुंचा दो. (४)
सूक्त-१० देवता—वरुण
अयं देवानामसुरो वि राजति वशा हि सत्या वरुणस्य राज्ञः.
ततस्परि ब्रह्मणा शाशदान उग्रस्य मन्योरुदिमं नयामि.. (१)
इंद्रादि देवों में वरुण पापियों को दंड देने वाले हैं. इस प्रकार के यह वरुण सब से उत्कृष्ट
हैं. सभी पदार्थ तेजस्वी वरुण देव के वश में हैं. इसलिए मैं वरुण की स्तुति संबंधी मंत्रों से
शक्ति प्राप्त कर के वरुण देव के प्रचंड कोप के कारण उत्पन्न जलोदर रोग वाले इस पुरुष को
रोगमुक्त करता हूं. (१)
नमस्ते राजन् वरुणास्तु मन्यवे विश्वं ह्युग्र निचिकेषि दृग्धम्.
सहस्रमन्यान् प्र सुवामि साकं शतं जीवाति शरदस्तव्तायम्.. (२)

हे तेजस्वी वरुण! तुम्हारे क्रोध के लिए नमस्कार है. तुम सभी प्राणियों द्वारा किए गए
अपराधों को जानते हो. मैं हजारों अपराधी पुरुषों को तुम्हारी सेवा में भेज रहा हूं. ये मनुष्य
आप के प्रति निष्ठा वाले बन कर सौ वर्ष तक जीवित रहें. (२)
यदुवक्थानृतं जिह्वया वृजिनं बहु.
राज्ञस्तवा सत्यधर्मणो मुञ्चामि वरुणादहम्.. (३)
हे जलोदर रोग से ग्रसित पुरुष! अपनी जिह्वा से तूने पाप का साधन असत्य भाषण
अधिक किया है. मैं सत्य धर्म वाले एवं तेजस्वी वरुण के कोप से तेरी रक्षा करता हूं. (३)
मुञ्चामि त्वा वैश्वानरादर्णवान् महतस्परि.
सजातानुग्रहा वद ब्रह्म चाप चिकीहि न:.. (४)
हे पुरुष! मैं तुझे जठराग्नि को मंद करने वाले महान जलोदर रोग से छुड़ाता हूं. हे परम
शक्तिशाली वरुण! आप अपने सहचरों, भटों अर्थात् अपने सेवकों से कहिए कि वे बारबार
आ कर इस मनुष्य को पीड़ा न दें. आप हमारे द्वारा दिए गए हवि रूप अन्न और स्तुति से
प्रसन्न हो कर हमारे भय का विनाश कीजिए. (४)
सूक्त-११ देवता—पूषा आदि
वषट् ते पूषन्नस्मिन्त्सूतावर्यमा होता कृणोतु वेधा:.
सिस्रतां नार्यृतप्रजाता वि पर्वाणि जिहतां सूतवा उ.. (१)
हे पूषा देव! सुख उत्पन्न करने वाले इस यज्ञ कर्म में प्राणि समूह के प्रेरक देव अर्यमा
होता बन कर आप को हवि प्रदान करें. संपूर्ण जगत् के निर्माता वेधा देव आप को वषट्कार
के द्वारा हवि प्रदान करें. आप की कृपा से यह गर्भिणी नारी प्रसव संबंधी कष्ट से छुटकारा पा
कर जीवित संतान को जन्म दे. सुखपूर्वक प्रसव के लिए इस के संधि बंध शिथिल हो जाएं.
(१)
चतस्रो दिवः प्रदिशश्चतस्रो भूम्या उत.
देवा गर्भं समैरयन् तं व्यूर्णुवन्तु सूतवे.. (२)
द्युलोक से संबंधित प्राची आदि चार दिशाओं एवं भूलोक की आग्नेयी आदि चार
दिशाओं ने एवं इन दिशाओं के अधिष्ठाता इंद्र आदि देवों ने पहले गर्भ को पूर्ण किया था. वे
सभी देव इस समय गर्भ को गर्भाशय से बाहर निकालें एवं जरायु के आच्छादन से मुक्त करें.
(२)
सूषा व्यूर्णोतु वि योनिं हापयामसि.
श्रथया सूषणे त्वमव त्वं बिष्कले सृज.. (३)
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प्रसव की देवता पूषा गर्भ को जरायु के बंधन से अलग करें. हम भी सुखपूर्वक प्रसव के
लिए योनि मार्ग को खोल रहे हैं. तुम भी सुखपूर्वक प्रसव के लिए योनि मार्ग को शिथिल
करो. हे सूतिमारुत देव! आप भी गर्भ का मुख नीचे को कर के उसे बाहर निकलने हेतु प्रेरित
करो. (३)
नेव मांसे न पीवसि नेव मज्जस्वाहतम्.
अवैतु पृश्नि शेवलं शुने जरायुक्त्तवे ऽ व जरायु पद्यताम्.. (४)
हे प्रसव करने वाली नाड़ी! तू इस उदरगत जरायु से पुष्ट नहीं होगी, क्योंकि इस का
संबंध मांस, मज्जा आदि से नहीं है. इसलिए उजले रंग की यह जरायु दोनों के ऊपर तैरने
वाली काई के समान नीचे गिर जाए. इसे कुत्ते के खाने के लिए नीचे गिर जाने दें. (४)
वि ते भिनद्मि मेहनं वि योनिं वि गवीनिके.
वि मातरं च पुत्रं च वि कुमारं जरायुणाव जरायु पद्यताम्.. (५)
हे गर्भिणी! मैं गर्भस्थ बालक को बाहर निकालने के लिए मूत्रमार्ग को फैलाता हूं तथा
योनि के आसपास की नाड़ियों को भी फैलाता हूं. क्योंकि ये प्रसव में बाधा डालती हैं. मैं
माता और पुत्र को अलगअलग करता हूं. इस के बाद मैं पुत्र को जरायु से अलग करता हूं.
जरायु गर्भाशय से नीचे गिर जाए. (५)
यथा वातो यथा मनो यथा पतन्ति पक्षिण:.
एवा त्वं दशमास्य साकं जरायुणा पताव जरायु पद्यताम्.. (६)
हे दशमास गर्भस्थ शिशु! जिस प्रकार वायु, मन एवं आकाश में उड़ने वाले पक्षी
आकाश में बिना रोकटोक के विचरण करते हैं, उसी प्रकार तू जरायु के साथ गर्भ से बाहर
आ. जरायु गर्भाशय से नीचे गिरे. (६)
सूक्त-१२ देवता—यक्ष्मानाशन
जरायुज: प्रथम उस्रिया वृषा वाताभ्रजा स्तनयन्नेति वृष्ट्या.
स नो मृडाति तन्व ऋजुगो रुजन् य एकमोजस्त्रेधा विचक्रमे.. (१)
नक्षत्रों को पराजित कर के प्रकट होने वाले, संसार में सब से प्रथम उत्पन्न एवं वायु के
समान शीघ्रगामी सूर्य बादलों को गर्जन करने के लिए प्रेरित करते हुए वर्षा के साथ आते हैं.
वे सूर्य त्रिदोष से उत्पन्न रोग आदि का विनाश करते हुए हमारी रक्षा करें. सीधे चलने वाले जो
सूर्य एक हो कर भी अपने तेज को तीन प्रकार से प्रकाशित करते हैं, वे हमें सुख प्रदान करें.
(१)
अङ्गेअङ्गे शोचिषा शिश्रियाणं नमस्यन्तस्त्वा हविषा विधेम.
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अङ्कान्त्समङ्कान् हविषा विधेम यो अग्रभीत् पर्वास्या ग्रभीता.. (२)
हे प्राणियों के प्रत्येक अंग में अपनी दीप्ति से वर्तमान सूर्य! हम तुम्हें नमस्कार करते हुए
चरु आदि से तुम्हारी उपासना करते हैं. हम तुम्हारे अनुचर एवं परिवार रूप देवों की भी हवि
से सेवा करते हैं. जिस ज्वर आदि रोग ने इस पुरुष के शरीर के अवयवों को जकड़ रखा है,
हम उस की निवृत्ति के लिए हवि द्वारा तुम्हारी पूजा करते हैं. (२)
मुञ्च शीर्षक्त्या उत कास एनं परुष्परूराविवेशा यो अस्य.
यो अभ्रजा वातजा यश्च शुष्मो वनस्पतीन्त्सचतां पर्वतांश्च.. (३)
हे सूर्य! इस पुरुष को सिर के रोग से छुटकारा दिलाओ. जो खांसी का रोग इस के
जोड़जोड़ में प्रवेश कर गया है, उस से भी इसे मुक्त कराओ. वर्षा एवं जल से उत्पन्न जो पित्त
के विकार से जनित आदि रोग हैं, उन से इस पुरुष को मुक्त कराइए. ये रोग इस पुरुष को
छोड़ कर वनस्पति और पर्वतों में चले जाएं. (३)
शं मे परस्मै गात्राय शमस्त्ववराय मे.
शं मे चतुर्भ्यो अङ्गेभ्यः शमस्तु तन्वे ३ मम.. (४)
मेरे शरीर के अवयव सिर का रोग शांति के रूप में कल्याणकारी हो. मेरे चरण आदि
निम्न अंगों को सुख मिले. मेरे दोनों हाथों और दोनों चरणों को सुख प्राप्त हो. मेरे शरीर के
मध्य भाग को नीरोगता प्राप्त हो. (४)
सूक्त-१३ देवता—विद्युत्
नमस्ते अस्तु विद्युते नमस्ते स्तनयित्नवे.
नमस्ते अस्त्वश्मने येना दूडाशे अस्यसि.. (१)
हे पर्जन्य! विद्युत को मेरा नमस्कार हो. गर्जन करते हुए वज्र को मेरा नमस्कार हो.
आप आततायियों को दूर फेंक देते हैं. (१)
नमस्ते प्रवतो नपाद् यतस्तपः समूहसि.
मृडया नस्तनूभ्यो मयस्तोकेभ्यस्कृधि.. (२)
हे पर्जन्य! आप सत्पुरुषों की रक्षा करते हैं. आप को नमस्कार है. आप जल को भीतर
धारण किए रहते हैं और समय से पहले नीचे नहीं गिरने देते हैं. आप पाप विनाशक तप को
एकत्र करते हैं एवं पापियों पर अपना वज्र फेंकते हैं. आप हमारे शरीर को सुख दें और हमारे
पुत्र, पौत्र आदि का कल्याण करें. (२)
प्रवतो नपान्नम एवास्तु तुभ्यं नमस्ते हेतये तपुषे च कृण्मः.
विद्म ते धाम परमं गुहा यत् समुद्रे अन्तर्निहितासि नाभिः.. (३)
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हे ऊंचाई से नीचे की ओर गिरने वाले पर्जन्य! तुम्हारे लिए नमस्कार है. तुम्हारे
संतापकारी आयुध वज्र को नमस्कार है. हम आप के गुफा के समान अगम्य एवं उत्तम
निवास स्थान को जानते हैं. जिस प्रकार शरीर में नाभि मध्यस्थ है, उसी प्रकार तुम अंतरिक्ष
के केंद्र सागर में स्थित हो. (३)
यां त्वा देवा असृजन्त विश्व इषुं कृण्वाना असनाय धृष्णुम्.
सा नो मृड विदथे गृणाना तस्यै ते नमो अस्तु देवि.. (४)
हे अग्नि! सभी देवों के अप्रिय पुरुषों पर गिराने के लिए एवं शत्रुओं पर बाण के रूप में
फेंकने के लिए तुम्हारी रचना की गई है. यज्ञ में तुम्हारी स्तुति भी की जाती है. तुम हमारी
रक्षा करो. हे आकाश में चमकती हुई अग्नि! तुम्हारे लिए नमस्कार हो. (४)
सूक्त-१४ देवता—यम
भगमस्या वर्च आदिष्यधि वृक्षादिव स्रजम्.
महाबुध्न इव पर्वतो ज्योक् पितृष्वास्ताम्.. (१)
मनुष्य जिस प्रकार वृक्ष से माला बनाने हेतु फूल तोड़ता है, उसी प्रकार मैं इस स्त्री के
भाग्य और तेज को स्वीकार करता हूं. धरती में भीतर तक धंसा हुआ पर्वत जिस प्रकार स्थिर
रहता है, उसी प्रकार यह बुरे भाग्य वाली स्त्री चिरकाल तक पिता के घर रहे अर्थात् यह कभी
पति का मुख न देखे. (१)
एषा ते राजन् कन्या वधूर्नि धूयतां यम.
सा मातुर्बध्यतां गृहे ऽ थो भ्रातुरथो पितुः.. (२)
हे सुशोभित सोम! यह कन्या आप की पत्नी है, क्योंकि इस ने पहले आप को स्वीकार
किया है, इसलिए यह पतिगृह से निकाल दी जानी चाहिए. यह कन्या चिरकाल तक अपने
पिता एवं भाई के घर पड़ी रहे. (२)
एषा ते कुलपा राजन् तामु ते परि दद्मसि.
ज्योक् पितृष्वासाता आ शीर्षः शमोप्यात्.. (३)
हे सुशोभित सोम! यह स्त्री पतिव्रता होने के कारण आप के कुल का पालन करने वाली
है, इसलिए हम इसे रक्षा के लिए आप को देते हैं. यह तब तक अपने पिता के घर पर रहे. यह
धरती पर सिर गिरने तक अर्थात् मरण पर्यंत अपने पिता के घर रहे. (३)
असितस्य ते ब्रह्मणा कश्यपस्य गयस्य च.
अन्तःकोशमिव जामयो ऽ पि नह्यामि ते भगम्.. (४)
हे स्त्री! मैं तेरे भाग्य को असित, ब्रह्मा, कश्यप एवं गय ऋषियों के मंत्रों से इस प्रकार
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