अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-६१ देवता—रुद्र
संपूर्ण जगत् के धारणकर्ता विधाता ने इस पृथ्वी को धारण किया है. उसी ने द्युलोक को
भी धारण किया है. धाता ही इस पति की कामना करने वाली कन्या को पति दें, क्योंकि वह
जगत् का नियंत्रण करते हैं. (३)
सूक्त-६१ देवता—रुद्र
मह्यमापो मधुमदेरयन्तां मह्यं सूरो अभरज्ज्योतिषे कम्.
मह्यं देवा उत विश्वे तपोजा मह्यं देवः सविता व्यचो धात्.. (१)
जल के अधिष्ठाता देव अपना मधुर रस मेरे लिए लाएं. सभी के प्रेरक सूर्य ने मेरे लिए
अपना सुखकारी और प्रकाशित तेज दिया है. ब्रह्म के तप से उत्पन्न सभी देव मुझे मनचाहा
फल दें. (१)
अहं विवेच पृथिवीमुत द्यामह्मृतूंरजनयं सप्त साकम्.
अहं सत्यमनृतं यद् वदाम्यहं दैवीं परि वाचं विशश्व.. (२)
मंत्र द्रष्टा अपने सर्वगत ब्रह्म भाव की खोज करता हुआ कहता है कि मैं ने विस्तृत धरती
और आकाश को पृथक् किया है. मैं ने सात ऋतुओं को जन्म दिया है. सात ऋतुओं का
तात्पर्य वसंत आदि छः ऋतुओं और एक अधिक मास से है. सत्य और असत्य के रूप में जो
लोक प्रसिद्ध वाक्य हैं, उन्हें मैं ही बोलता हूं. दैवीय वाणी को मैं ने ही प्राप्त किया है. (२)
अहं जजान पृथिवीमुत द्यामह्मृतूंरजनयं सप्त सिन्धून्.
अहं सत्यमनृतं यद् वदामि यो अग्नीषोमावजुषे सखाया.. (३)
मैं ने धरती और आकाश को उत्पन्न किया है. मैं ने ही छः ऋतुओं और गंगा आदि सात
नदियों और सात सागरों का निर्माण किया है. मैं अग्नि और सोम को सागर के निर्माण में
सहयोग के रूप में प्राप्त करता हूं. (३)
सूक्त-६२ देवता—वैश्वानर आदि
वैश्वानरो रश्मिभिर्नः पुनातु वातः प्राणेनेषिरो नभोभिः.
द्यावापृथिवी पयसा पयस्वती ऋतावरी यज्ञिये नः पुनीताम्.. (१)
सभी प्राणियों में जठराग्नि के रूप में वर्तमान अग्नि देव मुझे पवित्र करें. शरीर के मध्य
विचरण करते हुए वायु देव मुझे श्वासोच्छ्वास के द्वारा पवित्र करें. वे ही वायु देव अंतरिक्ष में
गमन करते हुए मुझे नव प्रदेशों के द्वारा पवित्र करें. जल के सार रस के द्वारा सार वाले, यज्ञ
पूर्ण कराने में समर्थ तथा सत्य से पूर्ण द्यावा पृथ्वी मुझे पवित्र करें. (१)
वैश्वानरीं सूनृतामा रभध्वं यस्या आशास्तन्वो वीतपृष्ठाः.
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तया गृणन्तः सधमादेषु वयं स्याम पतयो रयीणाम्.. (२)
हे मनुष्यो! वैश्वानर अग्नि से संबंधित तथा प्रिय तत्त्व से पूर्ण स्तुति को आरंभ करो. उस
वाणी का शरीर बने हुए ऊपर के भाग विस्तृत हैं. उस वैश्वानर अग्नि की स्तुति करते हुए हम
संग्रामों में धन के स्वामी बनें. (२)
वैश्वानरीं वर्चस आ रभध्वं शुद्धा भवन्तः शुचयः पावकाः.
इहेडया सधमादं मदन्तो ज्योक् पश्येम सूर्यमुच्चरन्तम्.. (३)
हे मनुष्यो! तेज पाने के लिए वैश्वानर अग्नि की स्तुति आरंभ करो. हम वैश्वानर अग्नि
की कृपा से शुद्ध तथा ब्रह्मवर्चस्व के द्वारा दीप्त हो कर दूसरों को भी पवित्र करें. हम अन्न से
पुष्ट हो कर परस्पर प्रसन्नता के हेतु बनें तथा इस लोक में स्थित रह कर उदय होते हुए सूर्य के
दर्शन करें. (३)
सूक्त-६३ देवता—निर्ऋति
यत् ते देवी निर्ऋतिराबबन्ध दाम ग्रीवास्वविमोक्यं यत्.
तत् ते वि ष्याम्यायुषे वर्चसे बलायादोमदमन्नमद्धि प्रसूतः.. (१)
हे पुरुष! अनिष्टकारिणी देवी ने तेरे सभी अंगों में पाप रूपी फंदा डाला है और तेरी
गर्दन में ऐसी रस्सी बांधी है, जिस से छूटना असंभव है. मैं उस निर्ऋति रूपी फंदे से तुझे
चिर काल तक जीवित रहने के लिए, बल के लिए एवं तेज के लिए छुड़ाता हूं. मेरे द्वारा
छुड़ाया हुआ तू मेरी प्रेरणा से सदा अन्न का भक्षण कर. (१)
नमो ऽ स्तु ते निर्ऋते तिग्मतेजो ऽ यस्मयान् वि चृता बन्धपाशान्.
यमो मह्यं पुनरित् त्वां ददाति तस्मै यमाय नमो अस्तु मृत्यवे.. (२)
हे तीक्ष्ण दीप्ति वाली एवं अनिष्टकारिणी देवी निर्ऋति! तुझे नमस्कार है. नमस्कार से
प्रसन्न हो कर तू लोहे के बने बंधन के फंदों से हमें छुड़ा. हे साधक पुरुष! पाप से मुक्त होने
पर यम ने तुम्हें इसी लोक को दे दिया है. मृत्यु के देव उन यम को नमस्कार है. (२)
अयस्मये द्रुपदे बेधिष इहाभिहितो मृत्युभिर्ये सहस्रम्.
यमेन त्वं पितृभिः संविदान उत्तमं नाकमधि रोहयेमम्.. (३)
हे निर्ऋति! लोहे की श्रृंखलाओं में अथवा लकड़ी के बने चरण बंधन में जब तुम किसी
पुरुष को बांधती हो, तब वह इस लोक में मृत्यु के द्वारा बंधा हो जाता है. प्रसिद्ध ज्वर आदि
रोग और राक्षस, पिशाच आदि मृत्यु के हजारों कारण हैं. हे निर्ऋति! तुम मृत्यु देव यम से
और देवता, पितर आदि से तालमेल कर के इस पुरुष को उत्तम सुख प्रदान करो. (३)
संसमिद् युवसे वृषन्नग्ने विश्वान्यर्य आ.
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