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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-६० देवता—इंद्र

सूक्त-६० देवता—इंद्र
एवा ह्यसि वीरयुरेवा शूर उत स्थिरः. एवा ते राध्यं मनः.. (१)
हे वीर एवं स्थिर इंद्र! तुम दुष्कर्म करने वाले वीरों को रोकते हो. (१)
एवा रातिस्तुवीमघ विश्वेभिर्धायि धातृभिः. अधा चिदिन्द्र मे सचा.. (२)
हे असीमित धन के स्वामी इंद्र! तुम मेरे सहायक बनो. तुम अपनी पुष्ट करने वाली
शक्ति से हम यजमानों में दान करने की शक्ति की स्थापना करो. (२)
मो षु ब्रह्मेव तन्द्रयुर्भुवो वाजानां पते. मत्वा सुतस्य गोमतः.. (३)
हे अन्नों के स्वामी इंद्र! तुम ब्रह्मा के समान आलसी मत बनो. तुम बुद्धि देने वाले तैयार
सोमरस के द्वारा अत्यधिक आनंद प्राप्त करो. (३)
एवा ह्यस्य सूनृता विरप्शी गोमती मही. पक्वा शाखा न दाशुषे.. (४)
इंद्र की भूमि गाएं प्रदान करने वाली हैं. यह हवि देने वाले यजमान के लिए पकी हुई
शाखा के समान बने. (४)
एवा हि ते विभूतय ऊतय इन्द्र मावते. सद्यश्चित् सन्ति दाशुषे.. (५)
हे इंद्र! जो यजमान तुम्हें हवि प्रदान करता है, उस के लिए तुम्हारे रक्षा के साधन शीघ्र
प्राप्त हो जाते हैं. (५)
एवा ह्यस्य काम्या स्तोम उक्थं च शंस्या. इन्द्राय सोमपीतये.. (६)
सोमरस का पान करते समय इंद्र को स्तोत्र, उक्थ और शस्त्र नाम की स्तुतियां बहुत
प्रिय लगती हैं. (६)
सूक्त-६१ देवता—इंद्र
तं ते मदं गृणीमसि वृषणं पृत्सु सासहिम्. उ लोककृत्नुमद्रिवो हरिश्रियम्..
(१)
हे वज्रधारी, शत्रुओं को पराजित करने वाले, अश्वों की शोभा से युक्त एवं मनचाहे
पदार्थों के वर्षक इंद्र! हम तुम्हारे हवि की पूजा करते हैं. (१)
येन ज्योतींष्यायवे मनवे च विवेदिथ. मन्दानो अस्य बर्हिषो वि राजसि..
(२)
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हे इंद्र! जिस सोमरस के प्रभाव से तुमने आयु और मन को तेज प्राप्त कराया था, उसी
सोमरस से पुष्ट हो कर तुम उस यजमान के कुशाओं से बने आसन पर बैठो. (२)
तदद्या चित्त उक्थिनो ऽ नु ष्टुवन्ति पूर्वथा. वृषपत्नीरपो जया दिवेदिवे..
(३)
हे इंद्र! उक्थ नाम के मंत्रों के ये गायक तुम्हारी महिमा का गान कर रहे हैं. तुम धर्म
कार्य करते हुए प्रत्येक अवसर पर विजय प्राप्त करो. (३)
तम्वभि प्र गायत पुरुहूतं पुरुष्टुतम्. इन्द्रं गीर्भिस्तविषमा विवासत.. (४)
बहुतों ने इन इंद्र की स्तुति की है तथा बहुत से लोगों ने इन का आह्वान किया है. हे
स्तोता! तुम इन्हीं इंद्र के यश का गान करो तथा अपनी स्तुति रूपी वाणी से उन्हें प्रतिष्ठित
करो. (४)
यस्य द्विबर्हसो बृहत् सहो दाधार रोदसी. गिरींरज्ञाँ अपः स्व वृषत्वना..
(५)
जिन इंद्र के आश्रय के कारण स्वर्ग और पृथ्वी महान बल, जल, पर्वत और वज्र को
धारण करते हैं, उन्हीं इंद्र की तुम पूजा करो. (५)
स राजसि पुरुष्टुतं एको वृत्राणि जिघ्नसे. इन्द्र जैत्रा श्रवस्या च यन्तवे..
(६)
हे इंद्र! तुम विजय प्राप्त करने वाले यश के कारण तेजस्वी बने हो तथा अकेले ही
शत्रुओं का नाश करते हो. (६)
सूक्त-६२ देवता—इंद्र
वयमु त्वामपूर्व स्थूरं न कच्चिद् भरन्तोऽवस्यवः. वाजे चित्रं हवामहे..
(१)
हे सदा नवीन रहने वाले इंद्र! अन्न प्राप्ति के अवसर पर हम तुम्हारी रक्षा की कामना
करते हैं और तुम्हें बुलाते हैं. तुम हमें विजय प्राप्त कराने के लिए हमारे समीप आओ, हमारे
विरोधियों की ओर मत जाओ. जिस प्रकार विजय की कामना से राजा योद्धाओं को बुलाता
है, उसी प्रकार हम तुम्हें बुलाते हैं. (१)
उप त्वा कर्मन्नूतये स नो युवोग्रश्चक्राम यो धृषत्.
त्वामिद्ध्वावितारं ववृमहे सखाय इन्द्र सानसिम्.. (२)
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हे इंद्र! कार्य के अवसर पर हम तुम्हारा ही आश्रय लेते हैं. तुम शत्रुओं को वश में करने
वाले, नित्य एवं अत्यधिक शक्तिशाली हो. तुम हमें सहायक के रूप में प्राप्त होओ. हम
अपनी रक्षा के लिए सखा के रूप में तुम्हारा वरण करते हैं. (२)
यो न इदमिदं पुरा प्र वस्य आनिनाय तमु व स्तुषे. सखाय इन्द्रमूतये.. (३)
हे यजमानो! तुम्हारी रक्षा के निमित्त हम इंद्र का आह्वान करते हैं. हमें पहले गौ आदि
के रूप में धन प्रदान करने वाले इंद्र मनचाहा फल देने में समर्थ हैं. हम उन्हीं इंद्र की स्तुति
करते हैं. (३)
हर्यश्वं सत्पतिं चर्षणीसहं स हि ष्मा यो अमन्दत.
आ तु नः स वयति गव्यमश्व्यं स्तोतृभ्यो मघवा शतम्.. (४)
मैं उन्हीं इंद्र की स्तुति करता हूं जो सभी मनुष्यों के रक्षक, हरे रंग के अथवा हरित नाम
वाले घोड़ों के स्वामी और सब का नियंत्रण करने वाले हैं. मैं स्तुतियों से प्रसन्न होने वाले इंद्र
की स्तुति करता हूं. वे ही इंद्र हम स्तोओं को गाएं तथा घोड़े प्रदान करें. (४)
इन्द्राय साम गायत विप्राय बृहते बृहत्. धर्मकृते विपश्चिते पनस्यवे.. (५)
हे विद्वान् एवं धर्मात्मा स्तुति कर्ताओ! तुम महान इंद्र की स्तुति सोम गान के द्वारा करो.
(५)
त्वमिन्द्राभिभूरसि त्वं सूर्यमरोचयः. विश्वकर्मा विश्वदेवो महाँ असि.. (६)
हे इंद्र! सूर्य को तुम ने ही आकाश में प्रकाशित किया है. तुम शत्रुओं का तिरस्कार करने
वाले, विश्वे देव और महान विश्वकर्मा हो. (६)
विभ्राजं ज्योतिषा स्व १ रगच्छो रोचनं दिवः. देवास्त इन्द्र सख्याय येमिरे..
(७)
हे इंद्र! सभी देवता तुम्हारे मित्र हैं. जो सूर्य स्वर्ग में प्रकाश करते हैं, वे तुम्हारे द्वारा ही
ज्योतिमान है. (७)
तम्वभि प्र गायत पुरुहूतं पुरुष्टुतम्. इन्द्रं गीर्भिस्तविषमा विवासत.. (८)
हे स्तोताओ! इंद्र को अनेक स्तोता बुला चुके हैं तथा बहुत से स्तोताओं ने इंद्र की स्तुति
की है. उन्हीं पराक्रमी इंद्र को तुम भी अपनी स्तुतियों के द्वारा सुशोभित करो. (८)
यस्य द्विबर्हसो बृहत् सहो दाधार रोदसी. गिरीरँजाँ अपः स्वर्ष्षत्वना..
(९)
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जो इंद्र अपनी महिमा से आकाश, पृथ्वी, जल, पर्वतों, वज्र, बल तथा स्वर्ग को धारण
करते हैं, तुम उन्हीं इंद्र का पूजन करो. (९)
स राजसि पुरुष्टुतँ एको वृत्राणि जिघ्नसे. इन्द्र जैत्रा श्रवस्या च यन्तवे..
(१०)
हे इंद्र! तुम विजय प्राप्त करने वाले यश के लिए तेजस्वी हुए हो. तुम अकेले ही अपने
शत्रुओं को नष्ट कर देते हो. (१०)
सूक्त-६३ देवता—इंद्र
इमा नु कं भुवना सीषधामेन्द्रश्च विश्वे च देवा:.
यज्ञं च नस्तन्वं च प्रजां चादित्यैरिन्द्रः सह चीक्लृपाति.. (१)
यह इंद्र, विश्वे देव और भुवन सुख पाने का प्रयत्न करते हैं. वे इंद्र आदित्यों सहित आ
कर हमारे यज्ञ, शरीर और संतान को शक्ति प्रदान करें. (१)
आदित्यैरिन्द्रः सगणो मरुद्भिरस्माकं भूत्वविता तनूनाम्.
हत्वाय देवा असुरान् यदायन् देवा देवत्वमभिरक्षमाणा:.. (२)
जिन देवताओं ने स्वर्ग की रक्षा के लिए राक्षसों का विनाश किया था, वे इंद्र आदित्य
और मरुत् हमारे शरीर की रक्षा के लिए हमारे यज्ञ में पधारें. (२)
प्रत्यञ्चमर्कमनयंछचीभिरादित् स्वधामिषिरां पर्यपश्यन्.
अया वाजं देवहितं सनेम मदेम शतहिमाः सुवीरा:.. (३)
जिन इंद्र ने अपनी शक्ति से सूर्य को प्रत्यक्ष किया तथा पृथ्वी को अन्न वाली बनाया,
उन्हीं इंद्र से हम देवताओं का हितकारी अन्न प्राप्त करें तथा वीरों से युक्त रहते हुए सौ वर्षों
की आयु प्राप्त करें. (३)
य एक इद् विदयते वसु मर्ताय दाशुषे. ईशानो अप्रतिष्कुत इन्द्रो अङ्ग..
(४)
इंद्र हवि देने वाले यजमान को अन्न देते हैं. इस कार्य में कोई भी इंद्र की सहायता नहीं
कर सकता. (४)
कदा मर्तमराधसं पदा क्षुम्पमिव स्फुरत्. कदा नः शुश्रवद् गिर इन्द्रो अङ्ग..
(५)
वे इंद्र यज्ञ न करने वालों पर अपने चरण का प्रहार कर के उन्हें कब ताड़ना देंगे तथा
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हम स्तोताओं की प्रार्थना कब सुनेंगे? (५)
यश्चिद्धि त्वा बहुभ्य आ सुतावाँ आविवासति.
उग्रं तत् पत्यते शव इन्द्रो अङ्ग.. (६)
हे इंद्र! जो पुरुष सोमरस ले कर अनेक स्तोत्रों द्वारा तुम्हारी प्रार्थना करता है, वह प्रचंड
बल और ऐश्वर्य प्राप्त करता है. (६)
य इन्द्र सोमपातमो मदः शविष्ठ चेतति. येना हंसि न्य १ त्रिणं तमीमहे..
(७)
हे इंद्र! तुम सोमरस अत्यधिक पीते हो. उस से बल उत्पन्न होता है. हे इंद्र! तुम अपने
जिस बल से असुरों का नाश करते हो, हम तुम से उसी बल की याचना करते हैं. (७)
येना दशग्वमधिगुं वेपयन्तं स्वर्णरम्. येना समुद्रमाविथा तमीमहे.. (८)
हे इंद्र! जिस बल से तुम ने दशग्व, अधिगु और कांपते हुए स्वर्णरथ की रक्षा की थी
तथा सागर को पुष्ट किया था, हम तुम से उसी बल की याचना करते हैं. (८)
येन सिन्धुं महीरपो रथां इव प्रचोदयः. पन्थामृतस्य यातवे तमीमहे.. (९)
हे इंद्र! जिस बल से तुम ने जलों को सागर की ओर गमनशील बनाया. हम अमृत के
मार्ग में आगे बढ़ने के लिए उसी बल की याचना करते हैं. (९)
सूक्त-६४ देवता—इंद्र
एन्द्र नो गधि प्रियः सत्राजिदगोहाः. गिरिर्न विश्वतस्पृथुः पतिर्दिवः.. (१)
हे सत्य के द्वारा विजय प्राप्त करने वाले इंद्र! तुम हमारे प्रिय हो. कोई भी तुम्हें ढक नहीं
सकता. तुम स्वर्ग के स्वामी हो और तुम्हारा विस्तार स्वर्ग के समान है. तुम हमें अपने प्रिय के
रूप में स्वीकार करो. (१)
अभि हि सत्य सोमपा उभे बभूथ रोदसी.
इन्द्रासि सुन्वतो वृधः पतिर्दिवः.. (२)
हे इंद्र! तुम यज्ञ में सब के सामने आ कर सोमरस पीते हो तथा आकाश और पृथ्वी
दोनों में ही प्रकट होते हो. तुम स्वर्ग के स्वामी हो. जो तुम्हारे लिए सोमरस निचोड़ता है, तुम
उस की वृद्धि करते हो. (२)
त्वं हि शश्वतीनामिन्द्र दर्ता पुरामसि. हन्ता दस्योर्मनोर्वृधः पतिर्दिवः.. (३)
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हे इंद्र! तुम ने असुरों को मारा और उन के दृढ़ नगरों का विनाश किया है. तुम स्वर्ग के
स्वामी हो और मनुष्यों की वृद्धि करते हो. (३)
एदु मध्वो मदिन्तरं सिञ्च वाध्वर्यो अन्धसः.
एवा हि वीर स्तवते सदावृधः.. (४)
हे अध्वर्युजनो! शहद से भी अधिक मीठे अन्न से इंद्र को तृप्त करो. ये इंद्र सदा यजमान
की वृद्धि करते हुए स्तुतियां स्वीकार करते हैं. (४)
इन्द्र स्थातर्हरीणां नकिष्टे पूर्व्यस्तुतिम्. उदानंश शवसा न भन्दना.. (५)
हे हरे रंग के अथवा हरि नाम वाले घोड़ों पर सवार होने वाले इंद्र! तुम्हारे पूर्व कर्म के
बलों और कल्याणों की कोई समानता नहीं कर सकता. (५)
तं वो वाजानां पतिमहूमहि श्रवस्यवः. अप्रायुभिर्यज्ञेभिर्वावृधेन्यम्.. (६)
अन्न की कामना वाले हम अन्न के स्वामी इंद्र को अपने यज्ञ में बुलाते हैं. जिन यज्ञों का
अनुष्ठान विधिपूर्वक किया जाता है. उन से इंद्र की सदा वृद्धि होती है. (६)
सूक्त-६५ देवता—इंद्र
एतो न्विन्द्रं स्तवाम सखाय स्तोम्यं नरम्.
कृष्टीर्यो विश्वा अभ्यस्त्येक इत्.. (१)
हम स्तुति के योग्य एवं अपने सखा के समान इंद्र से इधर आने के लिए स्तुति करते हैं.
ये इंद्र सभी कर्मों के फल प्रदान करते हैं. (१)
अगोरुधाय गविषे द्युक्षाय दस्म्यं वचः.
घृतात् स्वादीयो मधुनश्च वोचत.. (२)
हे स्तोताओ! इन तेजस्वी, देखने योग्य वाणी रूपी अन्न वाले तथा गायों को न रोकने
वाले इंद्र के प्रति शहद और घी से भी अधिक मधुर वाणी का उच्चारण करो. (२)
यस्यामितानि वीर्या ३ न राधः पर्येतवे. ज्योतिर्न विश्वमभ्यस्ति दक्षिणा..
(३)
कार्य साधन के हेतु असीमित शक्ति वाले इंद्र दीप्तिमती दक्षिणा के रूप हैं. (३)
सूक्त-६६ देवता—इंद्र
स्तुहीन्द्रं व्यश चवदनूर्मिं वाजिनं यमम्. अर्यो गयं मंहमानं वि दाशुषे.. (१)
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हे ऋत्विजो! जो इंद्र अपने रथ से घोड़ों को खोल कर शांत भाव से यज्ञ में बैठते हैं,
उन्हीं प्रशंसा के योग्य इंद्र की स्तुति यजमान की कल्याण कामना के लिए करो. (१)
एवा नूनमुप स्तुहि वैयश्व दशमं नवम्. सुविद्वांसं चर्कृत्यं चरणीनाम्.. (२)
जो इंद्र सदा नवीन, महान और मेधावी हैं, हे यजमान! तुम उन्हीं इंद्र की पूजा करो. (२)
वेत्था हि निर्ऋतीनां वज्रहस्त परिवृजम्. अहरहः शुन्ध्युः परिपदामिव..
(३)
हे वज्रधारी इंद्र! जिस प्रकार आदित्य अपने सहयोगियों को जानते हैं, उसी प्रकार तुम
भी संतप्त करने वाले और शक्तिशाली असुरों को जानते हो. (३)
सूक्त-६७ देवता—इंद्र
वनोति हि सुन्वन् क्षयं परीणसः सुन्वानो हि ष्मा यजत्यव द्विषो देवानाभव
द्विषः सुन्वान इत् सिषासति सहस्रा वाज्यवृतः.
सुन्वानायेन्द्रो ददात्याभुवं रयिं ददात्याभुवम्.. (१)
सोमरस निचोड़ने वाला यजमान अपने शत्रुओं के साथसाथ देवताओं के शत्रुओं का भी
पराभव करता है. वह बहुत से घरों को प्राप्त करता है तथा विविध पदार्थों के दान की इच्छा
करता है. वह शत्रुओं से घिरा हुआ नहीं रहता तथा अन्न का स्वामी बनता है. इंद्र उसे पृथ्वी
संबंधी सभी धन देते हैं. (१)
मो षु वो अस्मदभि तानि पौंस्या सना भूवन् द्युम्नानि मोत जारिषुरस्मत्
पुरोत जारिषुः.
यद् वश्चित्रं युगेयुगे नव्यं घोषादमर्त्यम्.
अस्मासु तन्मरुतो यच्च दुष्टरं दिधृता यच्च दुष्टरम्.. (२)
हे मरुतो! तुम्हारा तेज संताप देने वाला है. वह हमारे सामने आ कर हमें जीर्ण न करे.
तुम अपने नवीन, चयन योग्य और अविनाशी उस बल को हम में स्थापित करो, जिसे शत्रु
कभी प्राप्त नहीं कर सकते. (२)
अग्निं होतारं मन्ये दास्वन्तं वसुं सूनुं सहसो जातवेदसं विप्रं न
जातवेदसम्.
य ऊर्ध्वया स्वध्वरो देवो देवाच्या कृपा.
घृतस्य विभ्राष्टिमनु वष्टि शोचिषाजुह्वानस्य सर्पिषः.. (३)
अग्नि देव बल देने वाले, देवों के होता, उत्पन्न हुओं के जानने वाले तथा बल के अनुज
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हैं. वे अपनी ज्वालाओं से यज्ञ को सुसज्जित करते हैं तथा होम अग्नि में डाली गई घृत की
बूंदों तथा उन की दीप्ति की कामना करते हैं. (३)
यज्ञैः संमिश्राः पृषतीभिरृष्टिभिर्यामंछुभ्रासो अञ्जिषु प्रिया उत.
आसद्या बर्हिर्भरतस्य सूनवः पोत्रादा सोमं पिबता दिवो नरः.. (४)
हे स्वर्ग के नेता मरुतो! फल देने के समान तुम अपनी पृषती नाम वाली घोड़ियों के
द्वारा यज्ञ में आते हो. तुम इन बिछी हुई कुशाओं पर विराजमान हो कर सोमरस का पान
करो. (४)
आ वक्षि देवाँ इह विप्र यक्षि चोशन् होतर्नि षदा योनिषु त्रिषु.
प्रति वीहि प्रस्थितं सोम्यं मधु पिबाग्नीध्रात् तव भागस्य तृप्णुहि.. (५)
हे अग्नि! तुम देवताओं को हमारे इस यज्ञ में ला कर उन का पूजन करो. तुम होता के
रूप में पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग तीनों—स्थानों में विराजमान होओ. तुम हवि का भाग सभी
देवों को पहुंचा कर स्वयं भी ग्रहण करो तथा मधुर सोमरस पी कर तृप्ति प्रदान करो. (५)
एष स्य ते तन्वो नृम्णवर्धनः सह ओजः प्रदिवि बाह्वोर्हितः.
तुभ्यं सुतो मघवन् तुभ्यमाभृतस्त्वमस्य ब्राह्मणादा तृपत् पिब.. (६)
हे इंद्र! यह सोमरस तुम्हारे शरीर के बल को बढ़ाने वाला है. अन्य सब को वश में करने
के लिए तुम्हारी भुजाओं में बल व्याप्त है. हे इंद्र! यह सोमरस निचोड़ा जा कर तुम्हारे पीने के
लिए पात्र में रखा है. तुम इसे तब तक पियो, जब तक ब्राह्मण संतुष्ट न हो जाएं. (६)
यमु पूर्वमहुवे तमिदं हुवे सेदु हव्यो ददिर्यो नाम पत्यते.
अध्वर्युभिः प्रस्थितं सोम्यं मधु पोत्रात् सोमं द्रविणोदः पिब ऋतुभिः.. (७)
मैं पहले के समान ही अपने यज्ञ में इंद्र का आह्वान करता हूं. हे इंद्र! तुम अध्वर्युजनों
द्वारा दिए गए इस सोमरस रूपी मधु का पान करो. (७)
सूक्त-६८ देवता—इंद्र
सुरूपकृत्नुमूतये सुदुघामिव गोदुहे. जुहूमसि द्यविद्यवि.. (१)
जिस प्रकार सरलता से गायों का दूध दुहने के लिए दोहनकर्ता को बुलाया जाता है,
उसी प्रकार रक्षा का अवसर आने पर हर बार इंद्र का आह्वान करते हैं. (१)
उप नः सवना गहि सोमस्य सोमपाः पिब. गोदा इद् रेवतो मदः.. (२)
ऐश्वर्य संपन्न इंद्र सदा प्रसन्न रहते हैं और यजमानों को गाएं देते हैं. हे इंद्र! प्रातःकाल,
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मध्याह्न और सायंकाल के तीन सवनों में आ कर सोमरस का पान करो. (२)
अथा ते अन्तमानां विद्याम सुमतीनाम्. मा नो अति ख्य आ गहि.. (३)
हे इंद्र! तुम्हारी उत्तम बुद्धियों को हम जानते हैं. तुम हमारी निंदा मत होने दो तथा हमारे
यज्ञ में आओ. (३)
परेहि विग्रमस्तृतमिन्द्रं पृच्छा विपश्चितम्. यस्ते सखिभ्य आ वरम्.. (४)
हे स्तोताओ! कोई भी इंद्र की हिंसा नहीं कर सकता. तुम मित्रों का मंगल करने वाले
इंद्र का आश्रय लो. (४)
उत ब्रुवन्तु नो निदो निरन्यतश्चिदारत. दधाना इन्द्र इद् दुवः (५)
हे स्तोताओ! तुम इंद्र का आश्रय ग्रहण करो. इस से निंदा करने वाले हमारी निंदा नहीं
कर सकेंगे. (५)
उत नः सुभगाँ अरिर्वोचेयुर्दस्म कृष्टयः. स्यामेदिन्द्रस्य शर्मणि.. (६)
हम इतने यशस्वी बनें कि शत्रु भी हमारे यश का गान करें. इंद्र के द्वारा सुख प्राप्त कर
के हम सुंदर कृषि से संपन्न बनें. (६)
एमाशुमाशवे भर यज्ञश्रियं नृमादनम्. पतयन्मन्दयत् सखम्.. (७)
हे स्तोता! ये इंद्र मनुष्यों को प्रसन्न करने वाले मित्रों को मुदित कराने वाले तथा यज्ञ की
शोभा के रूप हैं. इन इंद्र के लिए सोमरस अर्पण करो. (७)
अस्य पीत्वा शतक्रतो घनो वृत्राणामभवः. प्रावो वाजेषु वाजिनम्.. (८)
हे इंद्र! तुम सोमरस पी कर वृत्र असुर के लिए मृत्यु रूप बनो तथा युद्ध क्षेत्र में हमारे
ऐश्वर्य की रक्षा करो. (८)
तं त्वा वाजेषु वाजिनं वाजयामः शतक्रतो. धनानामिन्द्र सातये.. (९)
हे इंद्र! तुम सैकड़ों कर्म करने वाले हो! हम हवियों के द्वारा तुम्हारी पूजा करते हैं और
धन पाने के लिए तुम्हें अपने यज्ञ में बुलाते हैं. (९)
यो रायो ३वनिर्महान्त्सुपारः सुन्वतः सखा. तस्मा इन्द्राय गायत.. (१०)
इंद्र धन प्रदान करने वाले एवं धन के रक्षक हैं. इंद्र उस के लिए मित्र के समान हैं जो
सोमरस तैयार करता है. हे स्तोताओ! तुम इंद्र की स्तुति करो. (१०)
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