अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-५२ देवता—इंद्र
आ कर मेरी स्तुति सुनें. नारियों का जो ऋतु काल है, उस समय देव पत्नियां हमारी हवि को
स्वीकार करें. (२)
सूक्त-५२ देवता—इंद्र
यथा वृक्षमशनिर्विश्वाहा हन्त्यप्रति. एवाहमद्य कितवानक्षैर्बध्यासमप्रति..
(१)
बिजली की आग अद्वितीय है तथा वह जिस प्रकार वृक्षों का विनाश करती है, उसी
प्रकार मैं भी अद्वितीय हो कर आज जुआरी पुरुषों का वध करूं. मैं जुआरियों का वध पासों
से करूंगा अर्थात् उन्हें पासों से हराऊंगा, पराजित करूंगा. (१)
तुराणामतुराणां विशामवर्जुषीणाम्. समैतु विश्वतो भगो अन्तर्हस्तं कृतं
मम.. (२)
जुआ खेलने में चाहे जुआरी शीघ्रता करे अथवा देरी करे, मैं ही उस से जुए में जीतूंगा.
जो जुआरी हार जाने पर भी इस आशा से जुआ खेलना बंद नहीं करता कि मैं ही जीतूंगा,
ऐसे जुआरी लोगों का धन सभी ओर से मेरे ही पास आए. जुए के पासे मेरे ही हाथ में रहें.
(२)
ईडे अग्निं स्वावसुं नमोभिरिह प्रसक्तो वि चयत् कृतं नः.
रथैरिव प्र भरे वाजयद्भिः प्रदक्षिणं मरुतां स्तोममृध्याम्.. (३)
जो अग्नि देव अपना धन अपने स्तुतिकर्ताओं को देते हैं, मैं उन की स्तुति करता हूं. इस
द्यूत कर्म के अधिपति अग्नि देव हम जुआरियों के लाभ के लिए कृपा करें. अग्नि देव रथों के
समान स्थित पासों से प्रहार करें. इस के पश्चात मैं सभी देवों की क्रम से स्तुति प्रारंभ करूं.
(३)
वयं जयेम त्वया युजा वृतमस्माकमंशमुदवा भरेभरे.
अस्मभ्यमिन्द्र वरीयः सुगं कृधि प्र शत्रूणां मघवन् वृष्ण्या रुज.. (४)
हे इंद्र! तुम्हारी सहायता से हम अपने विरोधी जुआरी को जीत लें. तुम प्रत्येक द्यूत
क्रीड़ा में हम जीत के इच्छुकों का अंश सुरक्षित करो. इस के अतिरिक्त तुम हमें अत्यधिक
धन प्राप्त कराओ. हे धनवान इंद्र! तुम मेरे विरोधी जुआरियों को जीतने की शक्ति को समाप्त
कर दो. (४)
अजैषं त्वा संलिखितमजैषमुत संरुधम्.
अविं वृको यथा मथदेवा मथ्नामि ते कृतम्.. (५)
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विरोधी जुआरी को संबोधन कर के कहा जा रहा है—हे जुआरी! तूने अपने पैरों में
अंकों को ठीक से लिख लिया है. फिर भी मैं तुझे जीतूंगा. मैं तुझे ऐसे स्थान में जीत लूंगा,
जहां अंक रोके जाते हैं. भेड़िया जिस प्रकार भेड़ को मसल डालता है, उसी प्रकार मैं तेरे
दांव को नष्ट कर दूंगा. (५)
उत प्रहामतिदीवा जयति कृतमिव श्वघ्नी वि चिनोति काले.
यो देवकामो न धनं रुणद्धि समित् तं रायः सृजति स्वधाभिः.. (६)
अधिक जुआ खेलता हुआ पुरुष अपने विरोधी जुआरी को जीत लेता है, क्योंकि दूसरे
का धन हरण करने वाला जुआरी पासे फेंकने से पहले ही उस के अंकों का निश्चय कर लेता
है. देवों की कामना करता हुआ जो जुआरी जीत में प्राप्त धन को देव संबंधी कार्यों में लगाता
है, उसे इंद्र धनों और अन्नों से युक्त करते हैं. (६)
गोभिष्टरेमाममतिं दुरेवां यवेन वा क्षुधं पुरुहूत विश्वे.
वयं राजसु प्रथमा धनान्यरिष्टासो वृजनीभिर्जयेम.. (७)
हे इंद्र! दरिद्रता के कारण आई हुई दुर्बुद्धि को मैं पशुओं के द्वारा पार करूं. हे बहुतों
द्वारा बुलाए गए इंद्र! हम सभी जौ आदि अन्नों की सहायता से भूख का निवारण करें. विरोधी
जुआरियों से पराजित न होते हुए हम मुख्य धनों को जुआघर से जीत कर ले जाएं. (७)
कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः.
गोजिद् भूयासमश्वजिद् धनंजयो हिरण्यजित्.. (८)
मेरे दाहिने हाथ में लाभ का कारण कृत अर्थात् जुए की महान विजय तथा बाएं हाथ में
ऐसी विजय है, जो जुए का साध्य है. इस प्रकार मैं दूसरों की गायों को जीतने वाला, घोड़ों
को जीतने वाला, धन को जीतने वाला और स्वर्ण जीतने वाला बनूं. (८)
अक्षाः फलवतीं ध्रुवं दत्त गां क्षीरिणीमिव.
सं मा कृतस्य धारया धनुः स्नाव्नेव नह्यत.. (९)
विजय के लिए पासों से प्रार्थना की जा रही है—हे पासो! तुम इस जुए के खेल को मेरे
लिए इस प्रकार फल देने वाला बनाओ, जिस प्रकार दूध देने वाली गाय होती है. धनुष जिस
प्रकार तांत से बनी डोरी के द्वारा बाण को दूर फेंकता है, उसी प्रकार पासे चार संख्या वाले
दावों के लिए मुझे विजय से जोड़ें. (९)
सूक्त-५३ देवता—इंद्र, बृहस्पति
बृहस्पतिर्नः परि पातु पश्चादुतोत्तरस्मादधरादघायोः.
इन्द्रः पुरस्तादुत मध्यतो नः सखा सखिभ्यो वरीयः कृणोतु.. (१)
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