अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-४ देवता—कुष्ठ, तक्मा-नाशन
बांधते हैं. आदित्य और रुद्र ने हमें जो राजा बना दिया है, वह सावधान करने वाला है. (१०)
अर्वाञ्चमिन्द्रममुतो हवामहे यो गोजिद् धनजिदश्वजिद् यः.
इमं नो यज्ञं विहवे शृणोत्वस्माकमभूर्हर्यश्व मेदी.. (११)
हम ऐसे इंद्र को यज्ञ में बुलाते हैं जो भूमि के विजेता, धन के विजेता और घोड़ों को
जीतने वाले हैं, वह इंद्र हमारी स्तुति सुनें. हे इंद्र! तुम हम से स्नेह करने वाले बनो. (११)
सूक्त-४ देवता—कुष्ठ, तक्मा-नाशन
यो गिरिष्वजायथा वीरुधां बलवत्तमः.
कुष्ठेहि तक्मनाशन तक्मानं नाशयन्न्नितः.. (१)
हे पर्वतों में उत्पन्न होने वाली तथा शक्तिशाली ओषधि कुष्ठ! तू कोढ़ नामक कठिन रोग
का नाश करने वाली है. तू हमें कष्ट देने वाले रोग को नष्ट करती हुई यहां आ. (१)
सुपर्णसुवने गिरौ जातं हिमवतस्परि.
धनैरभि श्रुत्वा यन्ति विदुर्हि तक्मनाशनम्.. (२)
गरुड़ को उत्पन्न करने वाले हिमवंत पर्वत के ऊपर उत्पन्न होने वाली इस ओषधि के
विषय में हम ने लोगों से सुना और अन्न ले कर वहां गए. इस प्रकार हम ने इस ओषधि को
प्राप्त किया. (२)
अश्वत्थो देवसदनस्तृतीयास्यामितो दिवि.
तत्रामृतस्य चक्षणं देवाः कुष्ठमवन्वत.. (३)
यहां तीसरे देव स्थान में अश्वत्थ अर्थात् पीपल विराजमान है. यहां देवों ने अमृत के
समान गुण वाले कूठ को जाना. (३)
हिरण्ययी नौरचरद्धिरण्यबन्धना दिवि.
तत्रामृतस्य पुष्पं देवाः कुष्ठमवन्वत.. (४)
देवों ने सोने के रस्से से बंधी हुई स्वर्ग की नौका के द्वारा अमृत के पुष्प के समान कूठ
को प्राप्त किया. (४)
हिरण्ययाः पन्थान आसन्नरित्राणि हिरण्यया.
नावो हिरण्ययीरासन् याभिः कुष्ठं निरावहन्.. (५)
सोने के बने हुए मार्ग से स्वर्ण की नाव के द्वारा कूठ को लाया गया. उन नावों की
पतवारें भी सोने की थीं. (५)
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इमं मे कुष्ठ पूरुषं तमा वह तं निष्कुरु. तमु मे अगदं कृधि.. (६)
हे कूठ! मेरे इस पुरुष को अपने समीप ले कर और इस रोग से छुटकारा दिला कर
स्वस्थ बनाओ. (६)
देवेभ्यो अधि जातो ऽ सि सोमस्यासि सखा हित:.
स प्राणाय व्यानाय चक्षुषे मे अस्मै मृड.. (७)
हे कूठ! तुम देवों के समीप उत्पन्न हुए हो तथा सोम के हितकारक मित्र हो. तुम मेरे इस
पुरुष के प्राण, व्यान एवं नेत्रों को सुख देने वाले बनो. (७)
उदङ् जातो हिमवत: स प्राच्यां नीयसे जनम्.
तत्र कुष्ठस्य नामान्युत्तमानि वि भेजिरे.. (८)
कूठ हिमालय पर्वत के उत्तरभाग में उत्पन्न हुआ है एवं मनुष्यों के द्वारा पूर्व दिशा में
लाया गया है. वहां उस के उत्तम नामों का विभाजन हुआ. (८)
उत्तमो नाम कुष्ठास्युत्तमो नाम ते पिता.
यक्ष्मं च सर्वं नाशय तक्मानं चारसं कृधि.. (९)
हे कूठ! तुम्हारी प्रसिद्धि उत्तम है तथा तुम्हारे पिता भी उत्तम थे. तुम सभी प्रकार के
राजयक्ष्मा रोगों का नाश करो तथा कुष्ठ रोग को हम से दूर भगाओ. (९)
शीर्षामयमुपहत्यामक्ष्योस्तन्वो ३ रेप:.
कुष्ठस्तत् सर्वं निष्करद् दैवं समह वृष्ण्यम्.. (१०)
सिर संबंधी रोग, नेत्र संबंधी व्याधियां एवं रोग उत्पन्न करने वाले पाप को कूठ ने दैवी
बल पा कर इन सब को नष्ट कर दिया. (१०)
सूक्त-५ देवता—लाक्षा
रात्री माता नभ: पितार्यमा ते पितामह:.
सिलाची नाम वा असि सा देवानामसि स्वसा.. (१)
हे लाख नामक ओषधि! तू चंद्रमा की किरणों से पुष्ट होती है. इसलिए रात्रि तेरी माता
है. तू वर्षा काल में उत्पन्न होती है, इसलिए आकाश तेरा पिता है. आकाश में मेघों को उत्पन्न
करने के कारण सूर्य तेरा पितामह है. तेरा नाम सिलाची है और तू देवों की बहन है. (१)
यस्त्वा पिबति जीवति त्रायसे पुरुषं त्वम्.
भर्त्री हि शश्वतामसि जनानां च न्यञ्चनी.. (२)
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जो तुझे पीता है, वह जीवित रहता है. तू पुरुष की रक्षा करती है, तू मनुष्यों का
भरणपोषण करने वाली एवं उन्नत बनाने वाली है. (२)
वृक्षंवृक्षमा रोहसि वृषण्यन्तीव कन्यला.
जयन्ती प्रत्यातिष्ठन्तीस्परणी नाम वा असि.. (३)
तू बैल की इच्छा करने वाली गाय के समान प्रत्येक वृक्ष पर चढ़ती है. तू विजय प्राप्त
करती है एवं स्थित रहती है, इसलिए तेरा नाम स्मरणी है. (३)
यद् दण्डेन यदिष्वा यद् वारुर्हरसा कृतम्.
तस्य त्वमसि निष्कृतिः सेमं निष्कृधि पूरुषम्.. (४)
हे लाख! जो डंडे से चोट खाया है और जो धारदार शस्त्र से घायल है, तू उन के घावों
को ठीक करने का उपाय है, इसलिए तू इस पुरुष को घावविहीन बना. (४)
भद्रात् प्लक्षान्निस्तिष्ठस्यश्वत्थात् खदिराद् धवात्.
भद्रान्न्यग्रोधात् पर्णात् सा न एह्यरुन्धति.. (५)
हे लाख! तू कदंब, पाकड़, पीपल, खैर, धौ, भद्र, न्यग्रोध एवं पर्ण नामक वृक्षों से उत्पन्न
होती है. हे घाव को शुद्ध करने वाली एवं भरने वाली ओषधि लाख! तू हमें प्राप्त हो. (५)
हिरण्यवर्णे सुभगे सूर्यवर्णे वपुष्टमे.
रुतं गच्छासि निष्कृते निष्कृतिर्नाम वा असि.. (६)
हे स्वर्ण के समान वर्ण वाली सुभगा एवं सूर्य के समान चमक वाली ओषधि लाख! तू
शरीर को स्वस्थ बनाती है. तू घाव को ठीक करती है, इसलिए तेरा नाम निष्कृति है. (६)
हिरण्यवर्णे सुभगे शुष्मे लोमशवक्षणे.
अपामसि स्वसा लाक्षे वातो हात्मा बभूव ते.. (७)
हे सोने के समान वर्ण वाली, सुभगा, सूर्य के समान वर्ण वाली एवं लोगों का विनाश
करने वाली लाख! तू जलों की बहन है और वायु तेरी आत्मा है. (७)
सिलाची नाम कानीनो ऽ जबभ्रु पिता तव.
अश्वो यमस्य यः श्यावस्तस्य हास्नास्युक्षिता.. (८)
हे लाख! तेरे नाम सिलाची और कानीन हैं. बकरियों का पालक तेरा पिता है. यमराज
का जो पीले रंग का घोड़ा है, उस के रक्त से तुझे सींचा गया है. (८)
अश्वस्यास्नः सम्पतिता सा वृक्षां अभि सिष्यदे.
सरा पतत्रिणी भूत्वा सा न एह्यरुन्धति.. (९)
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