अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-३४ देवता—पूषा
उप प्रियं पनिप्रतं युवानमाहुतीवृधम्.
अगन्म बिभ्रतो नमो दीर्घमायुः कृणोतु मे.. (१)
सब को प्रसन्न करने वाले, स्तुति किए जाते हुए, नित्य तरुण एवं घृत की आहुतियों से
बढ़ने वाले अग्नि देव को हम नमस्कार एवं हविरूप अन्न ले कर मिलें. वे मेरी और मेरे
विद्यार्थी की आयु १०० वर्ष करें. (१)
सूक्त-३४ देवता—पूषा
सं मा सिञ्चन्तु मरुतः सं पूषा सं बृहस्पतिः.
सं मायमग्निः सिञ्चतु प्रजया च धनेन च दीर्घमायुः कृणोतु मे.. (१)
मरुत् आदि देवगण मुझ फल चाहने वाले यजमान को पुत्र आदि रूप प्रजा से और धन
से युक्त करें. अग्नि मेरे विद्यार्थी की आयु लंबी करें. (१)
सूक्त-३५ देवता—जातवेद
अग्ने जातान् प्र णुदा मे सपत्नान् प्रत्यजाताञ्जातवेदो नुदस्व.
अधस्पदं कृणुष्व ये पृतन्यवोऽनागसस्ते वयमदितये स्याम.. (१)
हे अग्नि! मेरे उत्पन्न शत्रुओं को मुझ से बहुत दूर जाने की प्रेरणा दो. हे जातवेद अग्नि!
मेरे जो शत्रु उत्पन्न नहीं हुए हैं, उन का विनाश करो. जो शत्रु सेना ले कर मुझ से युद्ध करने
के इच्छुक हैं. उन्हें अपने पैरों के नीचे कुचल दो. हे खंड न करने योग्य पृथ्वी अथवा अदीना
देवमाता! हम पापरहित हो कर तुम्हारे कृपा पात्र बनें. (१)
सूक्त-३६ देवता—जातवेद
प्रान्यान्त्सपत्नान्त्सहसा सहस्व प्रत्यजाताञ्जातवेदो नुदस्व.
इदं राष्ट्रं पिपृहि सौभगाय विश्व एनमनु मदन्तु देवाः.. (१)
हे अग्नि! मेरे उत्पन्न शत्रुओं को बहुत दूर भगा दो. हे उत्त्पन्नों को जानने वाले अग्नि देव!
मेरे ऐसे शत्रुओं का विनाश करो, जिन्हें मैं नहीं जानता. हमारे इस राष्ट्र को तुम सौभाग्य से
पूर्ण करो. सभी देव शत्रु विनाश का प्रयोग करने वाले इस यजमान को प्रसन्न करें. (१)
इमा यास्ते शतं हिराः सहस्रं धमनीरुत.
तासां ते सर्वासामहमश्मना बिलमप्यधाम्.. (२)
हे मुझ से विद्वेष करने वाली स्त्री! तेरी जो गर्भधारण संबंधी सौ से अधिक नाड़ियां हैं
तथा हजार धमनियां हैं, मैं उन सब का मुख पत्थर से ढक कर तुझे बांझ बनाता हूं. (२)
परं योनेरवरं ते कृणोमि मा त्वा प्रजाभि भून्मोत सूनुः.
अस्वं १ त्वाप्रजसं कृणोम्यश्मानं ते अपिधानं कृणोमि.. (३)
हे मेरे प्रतिकूल रहने वाली नारी! मैं तेरी योनि के भीतर वाले स्थान अर्थात् गर्भाशय को
गर्भ धारण के अयोग्य बनाता हूं. इसीलिए तुझे कन्या रूपी संतान भी प्राप्त न हो. तुझे पुत्र
संतान भी न मिले. मैं तुझे खच्चरी के समान संतान रहित बनाता हूं. मैं तेरे गर्भाशय को
पत्थर से ढकता हूं. (३)
सूक्त-३७ देवता—अक्षि, मन
अक्ष्यौ नौ मधुसंकाशे अनीकं नौ समञ्जनम्.
अन्तः कृणुष्व मां हृदि मन इन्नौ सहासति.. (१)
हे पत्नी! मेरी और तेरी आंखें शहद के समान मधुर हों अर्थात् हम एकदूसरे के प्रति
अनुरक्त हों. हमारी आंखों का अग्रभाग काजल से युक्त हो. तू मुझे हृदयंगम कर अर्थात् ऐसा
प्रयत्न कर, जिस से मैं तेरा प्रिय बन सकूं. हम दोनों का मन समान कार्य करने वाला हो. (१)
सूक्त-३८ देवता—वस्त्र
अभि त्वा मनुजातेन दधामि मम वाससा.
यथा ऽ सो मम केवलॊ नान्यासां कीर्तयाश्चन.. (१)
स्त्री अपने पति से कहती है—हे पति! मैं तुम को अपने मंत्र से युक्त वस्त्र से बांधती हूं.
इस प्रकार तुम केवल मेरे ही हो सकोगे तथा दूसरी नारियों का नाम भी नहीं लोगे. (१)
सूक्त-३९ देवता—वनस्पति
इदं खनामि भेषजं मां पश्यमभिरोरुदम्. परायतो निवर्तनमायतः
प्रतिनन्दनम्.. (१)
मैं वश में करने वाली इस सौवर्चा नामक जड़ी को खोदता हूं. यह मेरे पति को मेरे
अनुकूल बनाए और मेरे पति का अन्य नारियों से संबंध रोके. यह जड़ी मुझे छोड़ कर जाते
हुए पति को वापस लाए तथा मेरी ओर आते हुए पति को आनंदित करे. (१)
येना निचक्र आसुरीन्द्रं देवेभ्यस्परि.
तेना नि कुर्वे त्वामहं यथा ते ऽ सानि सुप्रिया.. (२)
असुरों की माया ने जिस जड़ी के बल से इंद्र के अतिरिक्त सभी देवों को युद्ध में अपने
अधीन किया था, हे पति! उसी जड़ी के द्वारा मैं तुझे अपने वश में करती हूं. मैं ऐसा इसीलिए
करती हूं, जिस से मैं तेरी असाधारण प्यारी हो सकूं. (२)
प्रतीची सोममसि प्रतीच्युत सूर्यम्.
प्रतीची विश्वान् देवान् तां त्वा ऽ च्छावदामसि.. (३)
हे शंखपुष्पी नामक जड़ी! तू वशीकरण के निमित्त सोम के सम्मुख होती है. तू सब के
प्रेरक सूर्य के भी सम्मुख होती है. अधिक कहने से क्या लाभ, तू सभी देवों के सम्मुख होती
है. मैं अपने पति को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए तेरी स्तुति करती हूं. (३)
अहं वदामि नेत् त्वं सभायामह त्वं वद.
ममेदसस्त्वं केवलो नान्यासां कीर्तयाश्चन.. (४)
पति के वशीकरण के लिए जड़ीबूटी पा कर नारी अपने पति से कहती है—हे पति!
आओ. अब मैं ही बोलूंगी. तुम कभी मत बोलना. तुम केवल विद्वानों की सभा में बोलना. हे
पति! तुम केवल मेरे ही रहोगे, अन्य नारियों के नहीं. (४)
यदि वासि तिरोजनं यदि वा नद्यस्तिरः.
इयं ह मह्यं त्वामोषधिर्बद्ध्वेव न्यानयत्.. (५)
हे पति! यदि तुम मेरी दृष्टि से ओझल हो जाओगे अथवा मुझ से दूर नदी के पार चले
जाओगे, तब भी यह शंखपुष्पी नामक जड़ी पति से प्रेम करने वाली मेरे समीप तुम्हें इस
प्रकार लाएगी, जैसे किसी को बांध कर लाया जाता है. (५)
सूक्त-४० देवता—मंत्रों में बताए गए छंद
दिव्यं सुपर्णं पयसं बृहन्तमपां गर्भं वृषभमोषधीनाम्.
अभीपतो वृष्ट्या तर्पयन्तमा नो गोष्ठे रयिष्ठां स्थापयति.. (१)
हे इंद्र! हमारी गोशाला में दिव्य, शोभन गति वाले, जल से पूर्ण, महान जलों के मध्य
रहने वाले, जड़ीबूटियों की वृद्धि के लिए वर्षा करने वाले, सभी ओर से जलों से संगत एवं
सारे संसार को वर्षा से तृप्त करने वाले सारस्वत नामक देव को स्थापित करो. वे सदा धन
वाले प्रदेश में ठहरते हैं. (१)
सूक्त-४१ देवता—सरस्वान
यस्य व्रतं पशवो यन्ति सर्वे यस्य व्रत उपतिष्ठन्त आपः.
यस्य व्रते पुष्टपतिर्निविष्टस्तं सरस्वन्तमवसे हवामहे.. (१)
समस्त पशु अपनी पुष्टि के निमित्त जिस के कर्म का अनुगमन करते हैं, जिस के कर्म में
जल आपस में मिलते हैं तथा जिस के कर्म के अधीन पोषण के स्वामी हैं, उन सरस्वान देव
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की तृप्ति के लिए हम उन का आह्वान करते हैं. (१)
आ प्रत्यञ्चं दाशुषे दाश्वंसं सरस्वन्तं पुष्टपतिं रयिष्ठाम्.
रायस्पोषं श्रवस्युं वसाना इह हुवेम सदनं रयीणाम्.. (२)
सामने हो कर प्रसन्न करने के लिए हम हवि देने वाले यजमान को मनचाहा फल देने
वाले, पोषण के स्वामी, धन के स्थान पर ठहरने वाले एवं धन के पोषक सरस्वान देव को
सेवा के निमित्त बुलाते हैं. (२)
सूक्त-४२ देवता—श्येन
अति धन्वान्यत्यपस्ततर्द श्येनो नृचक्षा अवसानदर्श:.
तरन् विश्वान्यवरा रजांसीन्द्रेण सख्या शिव आ जगम्यात्.. (१)
मनुष्यों के सभी कर्मों के साक्षी एवं अंत में आकाश में दिखाई देने वाले सूर्य मरुस्थल
को पार कर के अत्यधिक जलपूर्ण करें. वे आकाश से नीचे स्थित समस्त लोकों को पार
करते हुए अपने मित्र इंद्र के साथ कल्याणकारी बन कर नवीन गृह निर्माण के स्थान में आएं.
(१)
श्येनो नृचक्षा दिव्यः सुपर्णः सहस्रपाच्छतयोनिर्वायोधाः.
स नो नि यच्छाद् वसु यत् पराभूतमस्माकमस्तु पितृषु स्वधावत्.. (२)
मनुष्यों के सभी कर्मों को देखने वाले, दिव्य एवं शोभन गति वाले, हजार किरणों वाले,
असंख्य कार्यों के कारण एवं अन्न के दाता सूर्य हमें चिरकाल तक स्थापित करें. हमारा जो
धन चोरों ने चुरा लिया है, वह हमारे पितरों के निमित्त स्वधा के रूप में हो. (२)
सूक्त-४३ देवता—सोम
सोमारुद्रा वि वृहतं विषूचीममीवा या नो गयमाविवेश.
बाधेथां दूरं निर्ऋतिं पराचैः कृतं चिदेनः प्र मुमुक्तमस्मत्.. (१)
हे सोम एवं रुद्र देव! सभी ओर फैलने वाले उस अमीवा नामक रोग का विनाश करो जो
हमारे शरीर में प्रवेश कर गया है. इस के अतिरिक्त अमीवा रोग का कारण बनी हुई पिशाची
को विमुख कर के दूर ले जाओ, जिस से वह हमारे पास न आ सके. हमारे द्वारा किए हुए
पाप को भी हम से दूर करो. (१)
सोमारुद्रा युवमेतान्यस्मद् विश्वा तनूषु भेषजानि धत्तम्.
अव स्यतं मुञ्चतं यन्नो असत् तनूषु बद्धं कृतमेनो अस्मत्.. (२)
हे सोम एवं रुद्र देव! तुम दोनों हमारे शरीरों में रोगों को निकालने वाली जड़ीबूटियों को
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